<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>छत्तीसगढ़ इतिहास - Dainandini Feed</title><link>https://dainandini.in/</link><description>Dainandini Feed Description</description><item><title>माडमसिल्ली  एशिया का पहला सायफल सिस्टम वाला बांध</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=10590</link><description>माडमसिल्ली बाँध जिसे मुरुमसिल्ली बाँध के नाम से भी जाना जाता है यह बांध सिलारी नदी पर स्थित है जो की महानदी की सहायक नदी है| इस बाँध की स्थापना 1914 से 1923 के मध्य हुयी है जिसे छत्तीसगढ़ का एक वास्तु चमत्कार भी माना जाता है | छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से इसकी दूरी लगभग 95 किमी है|
माडमसिल्ली  एशिया का पहला सायफल सिस्टम वाला बांध

माडमसिल्ली पर्यटन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ राज्य में कई ऐसे जगह हैं, जो आज पिकनिट स्पॉट के तौर पर मशहूर हैं। बस्तर से लेकर अंबिकापुर तक यहां कई मशहूर जलप्रपात हैं, जो पर्यटकों को अपनी ओर अनायास की आकर्षित करते हैं।
इसमें बस्तर के तीरथगढ़ और चित्रकोट जलप्रपात के बारे में तो सभी परिचित हैं ही। इसके अलावा कई और जलप्रपात और बांध हैं, जिसके बारे में हम आपको समय-समय पर जानकारी देते आते हैं।

तो चलिए आज हम आपको बता रहे हैं, एक ऐसे बांध के बारे में, जिसे एशिया का पहला सायफल सिस्टम वाला बांध माना गया है। 1914 से 1923 के बीच निर्मित यह बांध धमतरी जिले में है, जिसे मॉडमसिल्ली और मुरुमसिल्ली के नाम से जाना जाता है। आसपास के क्षेत्र से यहां बड़ी संख्या में लोग पिकनिट मनाने आते हैं। चारों तरफ घने पेड़ों से आच्छादित यह बांध अपनी खूबसूरती से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।


वास्तुशिल्प चमत्कारों में से एक
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित माडमसिल्ली या मुरुमसिल्ली बांध एशिया का पहला बांध है जो सायफन स्पिलवेज है। इसका निर्माण 1914 से 1923 के बीच किया गया था। यह छत्तीसगढ़ में सबसे प्रमुख वास्तुशिल्प चमत्कारों में से एक है।
100 साल बाद भी वैसा ही मजबूत

100 साल की उम्र बीत जाने के बाद भी इस बांध की मजबूती मे कोई फर्क नही आया है, और आज भी इनके सभी गेट चालू हालत में है। बारिश के मौसम मे बांध लबालब होते ही ऑटोमेटिक सायफन गेट से पानी निकलना शुरू हो जाता है।
राजधानी से 95 किमी दूर
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित माडमसिल्ली या मुरुमसिल्ली बांध प्रदेश की राजधानी से सिर्फ 95 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है।
सिलयारी नदी पर स्थित
माडमसिल्ली बांध सिलयारी नदी पर स्थित है। आपको बता दें कि सिलयारी नदी छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी महानदी की एक सहायक नदी है।




मॉडमसिल्ली कैसे पहुंचे


सड़क मार्ग से
मॉडमसिल्ली बांध तक पहुंचने के लिए आप सड़क मार्ग का उपयोग कर सकते हैं। राजधानी रायपुर से यह 95 किलोमीटर दूर सीधे सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।


हवाई यात्रा से
यदि आप छत्तीसगढ़ के बाहर से आना चाहते हैं तो सबसे नजदीक एयरपोर्ट आपको माना (रायपुर) में स्थित एयरपोर्ट मिलेगा। यहां से आप प्राइवेट कार या टैक्सी लेकर मॉडमसिल्ली बांध जा सकते हैं।


ट्रेन मार्ग से
धमतरी से जिले से 25 किलो मीटर की दूरी पर स्थित मॉडम सिल्ली बांध तक पहुंचने के लिए आप रेलवे का भी सहारा ले सकते हैं। लेकिन यहां आपको छोटी लाइन रेल के जरिए धमतरी तक पहुंचना होगा। इसके बाद आप प्राइवेट टैक्सी या कार से मॉडम सिल्ली पहुंच सकते हैं।</description><guid>10590</guid><pubDate>2025-05-28 18:27:04 6:39:53 pm</pubDate></item><item><title>बंजारी माता के मंदिर में सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि मां से आशार्वाद लेने नाग-नागिन का जोड़ा भी आता है</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=10552</link><description>रायपुर के बंजारी माता मंदिर में नाग-नागिन के जोड़े के आने की मान्यता सदियों पुरानी है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, नाग-नागिन के जोड़े माता के दर्शन के लिए आते हैं, और यह मान्यता है कि देवी उनकी इच्छाओं को पूरा करती है।
बंजारी माता मंदिर में नाग-नागिन जोड़े के आने का इतिहास:
ऐतिहासिक मान्यता:
बंजारी माता मंदिर में नाग-नागिन के जोड़े के आने की मान्यता सदियों पुरानी है। स्थानीय लोगों में यह विश्वास है कि देवी नाग-नागिन के जोड़े की भी इच्छाओं को पूरा करती है।
पुजारी का दावा:
मंदिर के पुजारी के अनुसार, पहले केवल एक या दो सांप के जोड़े ही यहां आया करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या में भी धीरे-धीरे बढ़ोतरी होती जा रही है।
देवी का आशीर्वाद:
नाग-नागिन के जोड़े को माता का आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं, और यह मान्यता है कि माता उनकी इच्छाओं को पूरा करती है।
नवरात्रि में विशेष रूप से आते हैं:
नवरात्रि के दौरान नाग-नागिन के जोड़े मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
अन्य देवी-देवताओं के साथ:
नाग-नागिन के जोड़े के अलावा, मंदिर में अन्य देवी-देवताओं के भी दर्शन किए जाते हैं।
अन्य मान्यताएं:
मंदिर में अन्य मान्यताएं भी प्रचलित हैं, जैसे कि बंजर जमीन से प्रकट हुई माता और बंजारा जाति के लोगों की देवी होना।
बंजारी माता मंदिर का महत्व:
प्राचीन मंदिर:
बंजारी माता मंदिर एक प्राचीन मंदिर है, जो लगभग 500 साल पुराना है
बंजारी माता के मंदिर में सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि मां से आशार्वाद लेने नाग-नागिन का जोड़ा भी आता है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि वो अपने बचपन से माता पिता के साथ मंदिर की देखरेख कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जिस तरह लोग यहां अपनी मुराद पूरी करने के लिए आते हैं, वैसे ही नाग नागिन का जोड़ा भी आता है।
</description><guid>10552</guid><pubDate>2025-05-22 15:01:41 3:06:56 pm</pubDate></item><item><title>सरगुजा में कुदरत का करिश्मा, इस पत्थर से आती है अलग-अलग आवाजें - भगवान राम वनवास के समय....</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=7500</link><description>सरगुज़ा: धरती पर आपने कुदरत के कई अलग-अलग अजूबे देखे होंगे. सरगुज़ा की ही बात करें तो कहीं धरती हिलती है तो कहीं पानी उल्टा बहता है. ऐसा ही कुदरत का एक और अजूबा सरगुजा जिले के छिंदकालो में स्थित है. इस जगह पर पत्थर से अलग-अलग आवाजें आती हैं. एक बड़ी शिला जिससे कई तरह की ध्वनियां निकलती है, छोटे पत्थर से इस बड़ी शिला को ठोकने से ये धातु की तरह आवाज करता है. इस करिश्मे को देखने सैलानी भी दूर दूर से यहां आते हैं.
छिंदकालो गांव में मौजूद है ठीनठिनी पठार                                                                               

सरगुज़ा संभाग मुख्यालय अम्बिकापुर से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित है छिंदकालो गांव, यह गावं दरिमा एयरपोर्ट के पीछे स्थित है. यहां एक धार्मिक स्थल है जो ठीनठिनी पत्थर के नाम से मशहूर है. इस जगह को ठीनठिनी पत्थर इसलिए कहा जाता है क्योंकि, यहां एक पत्थर से ठीनठिन की आवाज आती है एक पत्थर से करीब 5 अलग अलग तरह की आवाजें आती हैं. घड़े की आवाज, घंटी की आवाज, लोहे की आवाज जैसी कई अलग अलग आवाजें इस पत्थर को ठोकने से निकलती है.                                                                                           
इस स्थान का है धार्मिक और पुरातात्विक महत्व




                                                                             


इस स्थान को लेकर पुरातत्व विभाग के दावे अलग हैं, और ग्रामीण भी इसे लेकर धार्मिक दावे करते हैं. ग्रामीण कहते हैं कि, भगवान राम वनवास के समय यहां आये थे और इस पत्थर को उन्होंने जिस जिस स्थान पर छुआ वहां वहां निशान पड़ गए. इसी वजह से इस पत्थर से ऐसी आवाज आती हैं. यह स्थान ग्रामीणों की धार्मिक आस्था का भी केंद्र है. अब बड़ी बात ये है कि सच्चाई चाहे जो भी हो लेकिन सैलानियों को ये जगह खूब पसंद आती है. कई राज्यों से तमाम लोग यहां आते हैं. क्योंकि यह मैनपाट जाने के रास्ते में पड़ता है. लिहाजा मैनपाट जाने वाले लोग इस अजूबे को भी देखने आते हैं.









</description><guid>7500</guid><pubDate>2024-12-31 18:04:04 6:10:22 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ रायपुर के लाल बंगले  की रहस्यमयी कहानी......  </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=7473</link><description>छत्तीसगढ़ जो अपनी खनीज संपदा के लिए जाना जाता है, वहीं हरेली के दिन जादू  टोने की मान्यता भी है। इस राज्य की कुछ ऐसी जगह भी हैं जिनके बारे में लोग बात करने से भी डरते है। रायपुर का लाल बंगला भी एक ऐसी ही जगह है जहां लोगों के लिए थोड़ी देर भी रुकना मुश्किल हो जाता है। लोगों का कहना है की यहां आत्माएं जीवित लोगों में दिखाई देती है।

लाल बंगले में मौत का सिलसिला

साल 1994 में रायपुर के लाल बंगले में अंबेडकर अस्पताल के एक डाक्टर और उनकी बेटी रहते थे। उनकी पत्नी का पहले ही दहांत हो गया था। डाक्टर की बेटी के अनुसार, डाक्टर एक दिन अस्पताल से देर रात अपने घर लौटे। वो हरेली की रात थी, जब उनके दरवाज़े पर मददके लिए एक महिला ने दस्तक दी। डाक्टर साहब ने उस महिला को अंदर बुलाया और बैठा कर पूछा की उसे क्या दिक्कत है, तो वह पेट दर्द और उलटी का बहाना बना कर बाथरूम में चली गई। बहुत देर तक जब वह बाहर नहीं आई तो डाक्टर ने दरवाजा तोड़ दिया। मगर, उन्हें अंदर कोई नहीं मिला और यह देख डाक्टर और उनकी बेटी महिला को पूरे घर में ढूढ़ने लगे। इन्हीं सब के चलते डाक्टर एक कमरे में गया जिसका दरवाजा अचानक से खुद ही बंद हो गया। जब लड़की की नज़र कमरे की खिड़की पर पड़ी तो लड़की ने अपने पिता को लटका हुआ पाया। यह देख उसने पुलिस को बुलाया और सरसों ढूढ़ने लगी। उसे किसी ने बताया था की सरसों को हाथ में रखने से आत्माएं नुकसान नहीं पहुंचा पाती। जब वहां पुलिस पहुंची तो लड़की को बचाने में एक पुलिस वाले की भी रहस्यमय तरीके से मौत हो गई। इसके बाद किसी तरह से लड़की को बचा लिया गया।


इस लाल बंगले में जाने वाले लोगों का कहना है कि वहां एक हल  चल को महसूस किया जा सकता है और हवा में किसी के होने का अहसास भी होता है। यहां की मौतें हमेशा के लिए रहस्यमय ही रही है, आज तक कोई भी इनकी असल वजह का पता नहीं लगा पाया है। हरेली की रात घटी इस घटना ने सब को हिला कर रखा दिया है।
</description><guid>7473</guid><pubDate>2024-12-30 16:46:15 4:53:00 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ में है झरनों का स्वर्ग, दिल जीत लेगा चित्रकोट, रानीदाह और रमदहा भुला देगा दर्द</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=7441</link><description>रायपुर: छत्तीसगढ़ की सुंदर वादियां हमेशा से पर्यटकों की पहली पसंद रहा है. चाहे यहां की हरियाली हो या फिर यहां के खूबसूरत झरने दोनों आपका दिल जीत लेंगे. छत्तीसगढ़ में आकर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी घाटी में उतर आए हों. छत्तीसगढ़िया संस्कृति और यहां की प्राचीन विरासत दोनों के बीच यहां के वाटरफॉल आपको रिफ्रेश कर देंगे. शांत जंगल से बीच गिरते झरने और नदी के पानी का कल कल आपको मजबूर कर देगा कि आप कुछ पल वहीं पर ठहर जाएं. चित्रकोट का झरना जब अपने शबाब पर होता है तो आपको स्वर्ग में होने की अनुभूति देता है. तो चलिए करते हैं झरनों के प्रदेश की सैर.
चित्रकोट जलप्रपात: बस्तर में इंद्रावती नदी पर बना चित्रकोट जलप्रपात पूरी दुनिया में मशहूर है. चांदनी रात और बिजली रोशनी में चित्रकोट जलप्रपात को देखना अपने आप में बिल्कुल अलग अनुभव देता है. चित्रकोट जल प्रपात को सरकार ने और डेवलप किया है. रात के वक्त यहां लाइटिंग की व्यवस्था की गई है ताकि झरने की सुंदरता और बढ़ जाए. हर साल यहां लाखों पर्यटक बाहर से आते हैं.


तीरथगढ़ झरना: जगदलपुर से करीब 35 किमी की दूरी पर तीरतगढ़ झरना है. मुनगाबहार नदी पर बना ये जलप्रपात इतना सुंदर है कि लोग घंटों यहां खड़े होकर झरने को निहारते रहते हैं. बारिश के दिनों में जब पानी भरपूर होता है तब इस झरने की सुंदरता को चार चांद लग जाते हैं. पहाड़ी से तीन फीट नीचे जब पानी आता है तो लगता है जैसे दूध की धारा बह रही हो.





















मलाजकुण्डम झरना: दूध नदी पर बना मलाजकुंडम जल प्रपात अपनी हरियाली और सुंदरता के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में मशहूर है. झरने में पानी कहां से आता है इसको जानने के लिए पर्यटक जरूर चोटी पर जाते हैं. दूध नदी का उद्गम स्रोत पहाड़ी की चोटी पर है. नीचे जब पानी पहुंचता है तो ऊपर से पूरा नजारा मन मोह लेता है. झरने से निकलने वाला पानी कुंड में जाकर जमा होता है इसीलिए इसका नाम मलाजकुंडम जलप्रपात पड़ा.





















गुप्तेश्वर झरना: गुप्तेश्वर झरना अपने नाम के अनुरुप है. बस्तर के माचलकोट के पास शबरी नदी पर ये झरना बनता है. गुप्तेश्वर झरना जगदलपुर से करीब 22 किमी की दूरी पर है. हर साल यहां लाखों पर्यटक झरने की सुंदरता को देखने के लिए आते हैं. शबरी नदी में जब पानी का दबाव ज्यादा होता है तब झरने की सुंदरता और बढ़ जाती है.





















खुरसेल झरना: खुरसेल जलप्रपात नारायणपुर जिले में है. जंगल और पर्वतों के बीच खुरसेल झरने की सुंदरता अपने आप में अदभुत है. सुरसेल के आस पास आबादी कम होने के चलते यहां का वातावरण काफी शांत और मनमोहक है. खुरसेल आने वाले पर्टयक बार बार यहां आना चाहते हैं. खुरसेल की सुंदरता यहां आने वाले पर्टयक अपनी आंखों में बसाकर जाते हैं ताकि दोबारा आ सकें.





















मल्हे इन्दुल झरना: मल्हे इन्दुल झरने को नारायणपुर के सबसे सुंदर झरनों में गिना जाता है. मल्हे इन्दुल झरने को देखने के लिए स्थानीय और बाहरी पर्यटक हर साल हजारों की संख्या में यहां पहुंचते हैं. मॉनसून के मौसम में यहां आते हुए हरे भरे जंगल आपको रोक लेंगे. दिल करेगा आप थोड़ी देर यहां रुककर ही आगे बढ़ें. झरने से आने वाली आवाजें किसी संगीत का अनुभव कराती हैं.





















पुलपड़ा ईंदुल झरना: दंतेवाड़ा के कुआंकोंडा में पुलपड़ा ईंदुल झरना है. पालनार से इस झरने तक जाने में आपको सात किमी का सफर तय करना होता है. पुलपड़ा ईंदुल झरना को दंतेवाड़ा का सबसे ऊंचा झरना माना जाता है. पुलपड़ा ईंदुल झरना बैलाडीला पहाड़ी क्षेत्र के अरनपुर घाटी के कुरुम नाला से होते हुए नीचे आती है और झरने का निर्माण करती है.





















मिलकुलवाड़ा झरना: जगदलपुर से 39 किलोमीटर दूर इन्द्रावती नदी पर यह जलप्रपात है. 90 फीट की ऊंचाई से यहां पानी नीचे गिरता है. पानी गिरने की जो आवाज यहां सुनाई देती है वो काफी तेज शोर पैदा करती है. मिलकुलवाड़ा झरना आस पास के लोगों के लिए सबसे बेहतरीन पिकनिक स्पॉट के रुप में मशहूर है.




















रानी दहा झरना 
खुरसेल झरना: खुरसेल जलप्रपात नारायणपुर जिले में है. जंगल और पर्वतों के बीच खुरसेल झरने की सुंदरता अपने आप में अदभुत है. सुरसेल के आस पास आबादी कम होने के चलते यहां का वातावरण काफी शांत और मनमोहक है. खुरसेल आने वाले पर्टयक बार बार यहां आना चाहते हैं. खुरसेल की सुंदरता यहां आने वाले पर्टयक अपनी आंखों में बसाकर जाते हैं ताकि दोबारा आ सकें.






















राजपुरी जलप्रपात: जशपुर का ये झरना पिकनिक प्रेमियों की पहली पसंद के तौर पर गिना जाता है. नए साल के मौके पर यहां मेला जैसा माहौल रहता है. सर्दियों के मौसम में तो पिकनिक मनाने वाले लोगों की भरमार रहती है. यहां आकर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप शिमला या मनाली की वादियों में आ गए हैं. यहां के सेल्फी प्वाइंट तो पर्यटकों की पहली पंसद हैं.






















दमेरा जलप्रपात: दमेरा जलप्रपात छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में स्थित है। यह जशपुर नगर से दक्षिण में स्थित है और बध्यीखाना गांव के निकट लगभग 12 कि.मी. पर स्थित है। यह एक पर्यटन स्थल के रूप में मान्य है। यहाँ रामनवमी और कार्तिक पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मेला लगता है





















मेंदरी घूमर जलप्रपात: मेन्द्री घुमर जलप्रपात विशाल चित्रकोट झरने के रास्ते पर एक सुंदर मौसमी झरना है। प्रसिद्ध रूप से घाटी की धुंध के रूप में जाना जाता है, मेहेंदरी घुमर के पास एक सुंदर घाटी है। यह 125-150 फीट ऊंचाई से गिरने वाली हरी घाटी के बीच चुपचाप अपनी उपस्थिति को चिह्नित करता है। शीर्ष से घने वन क्षेत्र को देखते हुए शांति महसूस कर सकती है।





















मेन्द्री घुमर जलप्रपात: में सुंदर सुंदरता और बूंदा -बांदी इसे देखने के लिए एक आकर्षक अनुभव बनाती है। चित्रधारा, तामड़ा घूमर और मेन्द्री घुमर जलप्रपात चित्राकोट झरने के लिए सर्किट को और भी सुखद और आनंददायक बनाते हैं





















तामड़ा घूमर जलप्रपात: बस्तर प्रकृति की विशाल सुंदरता के लिए जाना जाता है।. मारडूम के पास चित्रकोट के रास्ते पर एक बारहमासी झरना तमड़ा घुमर है. यह झरना इंद्रवती नदी से सीधे 100 फीट से गिरकर बहती है. राज्य पर्यटन विभाग ने झरने के आस पास के क्षेत्र को और डेवलप किया है.





















केन्दाई जलप्रपात:जगदलपुर से 39 किलोमीटर दूर इन्द्रावती नदी पर यह जलप्रपात बनता है. 90 फुट उपर से इन्द्रावती की ओजस्विन धारा गर्जना करते हुये नीचे गिरती है. इसके बहाव में इन्द्रधनुष का शानदार दृष्य बनता है. बस्तर संभाग के जलप्रपातों में ये सबसे सुंदर वाटरफॉल के रुप में गिना जाता है.
</description><guid>7441</guid><pubDate>2024-12-29 16:43:41 6:17:55 pm</pubDate></item><item><title> छत्तीसगढ़ में है विश्व का सबसे बड़ा स्वयंभू प्राकृतिक शिवलिंग</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=7052</link><description>Bhuteshwar Mahadev in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में कई शिव मंदिर हैं जो अपने आप में अनेकों रहस्य को समेटे हुए हैं।

आज हम आपको एक ऐसे ही अद्भुत और रहस्यमय शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि विश्व के एक मात्र स्वयंभू प्राकृतिक शिवलिंग हैं।

अगर पूरे विश्व में सबसे अलग शिव मंदिर की बात होती है तो ये भूतेश्वरनाथ का नाम सबसे पहले स्थान पर आएगा। भूतेश्वर नाथ महादेव जागृत अवस्था में माने जाते हैं।

प्रचलित कथाओं की मानें तो साल दर साल यहां स्थापित शिवलिंग का आकार बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान समय में भूतेश्वरनाथ का आकार 80 फीट तक पहुंच गया है।

इसी कारण से इस शिवलिंग के दर्शन करने के लिए देश के साथ विदेशी नागरिक भी गरियाबंद पहुंचते हैं। आइए हम आपको इस मंदिर की पूरी जानकारी देते हैं।
कहां स्थित हैं भूतेश्वरनाथ महादेव
छत्तीसगढ़ के भूतेश्वरनाथ महादेव एक रहस्यमय शिवलिंग है। महादेव के इस मंदिर की मान्यता ज्योतिर्लिंग की तरह ही रही है।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में मौजूद भूतेश्वर महादेव अर्धनारीश्वर प्राकृतिक शिवलिंग है, जो राजधानी रायपुर से 90 किमी. दूर, गरियाबंद जिला मुख्यालय से लगभग 4 किमी. दूर और महासमुंद से 80 किमी. दूर घने जंगलों में स्थित है।

हर साल बढ़ रहा शिवलिंग का आकार
इस मंदिर के बारे में कथाएं और यहां के लोग बताते हैं कि पहले भूतेश्वर महादेव एक छोटे टीले के रूप में थे। फिर धीरे-धीरे इनका आकार बढ़ता गया।


इसके साथ ही शिवलिंग का आकार बढ़ना अब भी जारी है। शिवलिंग में प्रकृति प्रदत जललहरी भी दिखाई देती है जो धीरे धीरे जमींन के ऊपर आती दिखाई दे रही है। इसलिए इसे भूतेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने लगा।
भर्कुरा महादेव के नाम से भी हैं प्रचलित
भूतेश्वर नाथ महादेव को भकुर्रा महादेव के नाम से भी जाना जाता हैं। छत्तीसगढ़ की भाषा मे हुँकारना (आवाज़ देना) की ध्वनि को भकुर्रा कहा जाता हैं।

इसलिए भूतेश्वर महादेव को भकुर्रा महादेव के नाम से भी पुकारा जाता हैं। भूतेश्वर नाथ महादेव के पीछे भगवान शिव की प्रतिमा स्थित है, जिसमे भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिक, नंदी जी के साथ विराजमान है।


इस शिवलिंग मे हल्की सी दरार भी है, इसलिए इसे अर्धनारीश्वर के रूप मे पूजा जाता हैं। इस शिवलिंग का बढ़ता हुआ आकार आज भी शोध का विषय है।
शिवरात्री के साथ सावन में लगती है भीड़
सावन मास मे यहाँ आपको विशेष रूप से भक्तो की भीड़ नज़र आती है। भक्तजन दूर- दूर से बाबा का चमत्कार देखने व दर्शन करने आते है।

कावड़ियों के लिए यहाँ विशेष रूप से व्यवस्था की गयी है, इसके साथ ही साथ शिवरात्रि मे यहाँ तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता हैं।


भूतेश्वर नाथ, पंच भूतो के स्वामी है और भक्तजन महाशिवरात्रि को यहाँ पहुँच कर अपने आप को काफी सौभाग्यशाली मानते हैं।
क्या है मंदिर का इतिहास
कथाएं ऐसा बताती हैं कि इस मंदिर की खोज लगभग सैकड़ों साल पहले हुई थी, जब चारों तरफ घने जंगल थे. इन घने जंगलों के बीच मौजूद एक छोटे से टीले से, आसपास के गांव वालों को बैल के हुंकारने की आवाज आती थी।


लेकिन जब ग्रामीण नजदीक जाते तो उन्हें कोई भी जानवर नहीं दिखता। धीरे धीरे ग्रामीणों की आस्था टीले के प्रति जागृत होती गई। सभी लोगों ने टीले को शिव का रूप मानकर पूजा करना शुरू किया। आज वही छोटा सा टीला एक विशाल शिवलिंग का आकार ले चुका है।
</description><guid>7052</guid><pubDate>2024-12-19 18:16:37 6:27:13 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ रायपुर में स्थित महादेव घाट, हरिद्वार की तर्ज पर खारुन नदी के ऊपर बना है लक्ष्मण झूला</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=6769</link><description>रायपुर। जयस्तंभ चौक से 10 किलोमीटर और रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड से 12 किलोमीटर की दूरी पर कलकल, छलछल बहती है खारुन नदी। इसी के किनारे स्थित है पर्यटन और धार्मिक आस्था का केंद्र महादेव घाट। यहां प्राचीन हटकेशवर महादेव मंदिर है।
महादेव घाट पर एक ओर जहां भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए लोग उमड़ते हैं, वहीं पिकनिक मनाने के लिए भी परिवार समेत लोग पहुंचते हैं। हरिद्वार की तर्ज पर खारुन नदी के ऊपर बना लक्ष्मण झूला और नौकायन का आनंद भी यहां का विशोष आकर्षण है।

लक्ष्मण झूला के नीचे पर्यटकों के लिए 50 से अधिक सजी-धजी नौकाओं की व्यवस्था है। इन नौकाओं में बैठकर पर्यटक नदी की बीच धारा तक जाकर प्रकृति के अद्भुत नजारे का आनंद ले सकते हैं। नौका में संगीत की मधुर धुनें गूंजती रहती हैं। एक यात्री मात्र 20 रुपये अदा करके नौकायन का लुत्फ उठा सकता है। कुल पांच लोग नौका में सवार होते हैं।


झूले के ऊपर से होकर नदी के उस पार जाने पर मनमोहक गार्डन देखने को मिलता है। यहां बच्चों के साथ पिकनिक मनाने का आनंद लिया जा सकता है। इस पुल के बीच में खड़े होकर लोग बहती नदी एवं प्राकृतिक सौंदर्य का नजारा लेते नजर आते हैं। गार्डन में अनेक झूले और सेल्फी जोन है, जहां से युवक-युवतियां प्रकृति के बीच रहकर फोटो खिंचाने में रुचि लेते हैं।


एक किमी लंबी सीढ़ियों पर बैठकर देखें नजारा


महादेव घाट की ऊंची सीढ़ियों के किनारे बैठकर भी नदी का मनमोहक नजारा देखा जा सकता है। लगभग एक किलोमीटर तक लंबी सीढ़ियों पर रविवार एवं पर्व त्योहारों के दिन भीड़ रहती है, दूर-दूर तक बैठकर लोग नौकायन कर रहे सैलानियों के वापस आने का इंतजार करते हैं, ताकि वे भी जा सकें। खारुन के किनारे साल में तीन बार भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।


आसपास के ग्रामीण इलाकों से हजारों लोग मेला घूमने आते हैं। मनोरंजन के लिए झूले, खेल तमाशा के साथ खरीदारी करते हैं। पहला मेला महाशिवरात्रि, दूसरा हिंदू संवत्सर के माघ महीने की पूर्णिमा और तीसरा मेला कार्तिक पूर्णिमा पर लगता है। शरद्धालु नदी में पुण्य की डुबकी लगाते हैं और महादेव का दर्शन लाभ लेते हैं।

हटकेशवर नाथ मंदिर में लगती है कांवरियों की भीड़


महादेवघाट में सैकड़ों साल पुराने हटकेशवर नाथ महादेव मंदिर में सावन के महीने में खासकर रविवार, सोमवार को हजारों कांवरिए शिवलिंग पर जल अर्पण करने आते हैं। हटकेशवर महादेव मंदिर के पुजारी पं. सुरेश गिरी गोस्वामी ने बताया कि शरीमद्भागवत गीता के पांचवें स्कंध के 16 वें और 17वें शलोक में हटकेशवर नाथ का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि हटकेशवर नाथ अतल लोक में अपने पार्षदों के साथ निवास करते हैं। जहां स्वर्ण की खान पाई जाती है। मान्यता है कि हजारों साल पहले मंदिर के किनारे स्वर्ण पाया जाता था।


द्वापर युग की द्वारकी नदी है खारुन नदी


वर्तमान में बहने वाली खारुन नदी को द्वापर युग में द्वारकी नदी के नाम से जाना जाता था। कालांतर में महाकौशल प्रदेश के हैहयवंशी राजा ब्रह्मदेव जब नदी किनारे स्थित घनघोर जंगल में शिकार करने आए थे, तब नदी में बहता हुआ पत्थर का शिवलिंग नजर आया। इस शिवलिंग पर नागदेवता लिपटे थे। राजा ने नदी किनारे मंदिर बनवाकर शिवलिंग स्थापित करवाया। ऐसी मान्यता है कि बाद में 1402 में कल्चुरि शासक भोरमदेव के पुत्र राजा रामचंद्र ने मंदिर का नव निर्माण करवाया।


हर की पौड़ी की तरह अस्थि विसर्जन


खारुन नदी के किनारे ही शमशानघाट है, जहां अंतिम संस्कार के बाद लोग खारुन नदी में उसी तरह अस्थियों का विसर्जन करते हैं, जैसे हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी में किया जाता है। महादेव घाट को छत्तीसगढ़ का मिनी काशी भी कहा जाता है। नदी के उस पार 20 फीट ऊंची खारुणेशवर महादेव की प्रतिमा दर्शनीय है। समीप ही वैष्णो धाम मंदिर निर्माणाधीन है, इस मंदिर की शीघ्र ही प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।


छोटे-बड़े करीब 50 से अधिक मंदिर


महादेवघाट शिव मंदिर के आसपास छोटे-बड़े करीब 50 से अधिक मंदिर हैं। इनमें काली मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, कुम्हार मंदिर, संगमरमर से बना हनुमान मंदिर, सांई मंदिर, संत कबीरदासजी के चार कानों वाले घोड़े की समाधि आदि प्रसिद्ध है। इसे चौकन्नो घोड़े की समाधि कहा जाता है। इस समाधि का गुंबद संत कबीर साहेब की टोपी के रूप में बनाया गया है।</description><guid>6769</guid><pubDate>2024-12-12 17:51:32 5:56:35 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ का चंदखुरी भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मस्थली है.</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=6372</link><description>रायपुर:प्राचीन कथाओं में छत्तीसगढ़ का उल्लेख दक्षिण कोसल के नाम से मिलता है. छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल भी कहा जाता है. भगवान राम की माता कौशल्या की जन्मस्थली छत्तीसगढ़ की चंदखुरी है. चंदखुरी में माता कौशल्या का मंदिर भी है, जिसमें माता कौशल्या अपनी गोद में भगवान राम को लिए हुए हैं. इसके साथ ही छत्तीसगढ़ में भगवान राम को भांजे के रूप में प्रणाम भी किया जाता है. इस बात का उल्लेख रामायण में भी मिलता है.

प्राचीन और ऐतिहासिक शास्त्रों और पुराणों में संपूर्ण भारत को अलग-अलग प्रदेशों के नाम से जाना जाता है. इसमें से दक्षिण कोसल की राजकुमारी जिनका नाम भानुमति था. उनके पिता का नाम भानुमंत था. राजकुमारी भानुमति का नाम बाद में कोसल प्रदेश की वजह से कौशल्या पड़ा. दक्षिण कौशल की राजकुमारी कौशल्या का विवाह उत्तर कौशल के राजकुमार दशरथ जी के साथ हुआ था. पूरे विश्व में एकमात्र मंदिर छत्तीसगढ़ के चंदखुरी में स्थित है, जिसे कौशल्या माता मंदिर के नाम से जाना जाता है. इस मंदिर में माता कौशल्या की गोद में भगवान राम बैठे हुए हैं.
भगवान राम छत्तीसगढ़ के भांजे:भगवान राम की माता कौशल्या इस क्षेत्र की बेटी थी. इस क्षेत्र की बेटी होने के कारण दक्षिण कौशल उनका मायका हुआ इसलिए इस क्षेत्र के समस्त रहवासी भगवान राम को भांजे की तरह मानते हैं, और उन्हें प्रणाम करते हैं. छत्तीसगढ़ के लोग भगवान राम को भांजा मानते हैं. यहां लोग भगवान राम को प्रणाम करते हैं और अपने आपको मामा मानकर गर्व महसूस करते हैं.</description><guid>6372</guid><pubDate>2024-11-25 16:33:31 4:39:29 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ : भनवारटंक का मरही माता मंदिर : येजो रेल लाइन के पार दीवार दिख रही है, वो मन्नतों के नारियलों से पट गई है</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=6134</link><description>रायपुर| ये भनवारटंक का मरही माता मंदिर है। यहां सालों से देवी मां के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते रहे हैं। अपनी मन्नत को लेकर भक्त यहां श्रीफल, चुनरी, चूड़ियां और रक्षासूत्र बांधते हैं। ये मंदिर जंगल के बीच स्थित है। मंदिर प्रांगण की कोई ऐसी जगह नहीं, जहां चुनरी में लिपटे श्रीफल, रक्षा सूत्र और चूड़ियां बंधी हों। बिलासपुर से अगर रेल मार्ग से जाना चाहते हैं तो कटनी की ओर जाने वाली किसी भी पैसेंजर ट्रेन के जरिये भनवारटंक पहुंच सकते हैं। रेल मार्ग से भनवारटंक स्टेशन की दूरी बिलासपुर से 100 किलोमीटर है, जहां पहाड़ियों के बीच से गुजरती रेल लाइन यहां की मनोरम वादियों का दीदार भी करवाती है। सड़क मार्ग से पहुंचने के लिए कई रस्ते हैं। इनमें बिलासपुर से बेलगहना-खोंगसरा मार्ग या फिर केंवची मार्ग प्रमुख हैं छत्तीसगढ़ में सतपुड़ा के घोर जंगल के बीच बसा छोटा सा गांव भनवारटंक बेलगहना में (भनवारटंक) मरही माता मंदिर की महिमा की वजह से प्रसिद्ध है। यहां भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यहां शनिवार एवं रविवार को हजारों की भीड़ में लोग दूर -दूर से से अपनी मन्नत एवं परिवार की खुशहाली के लिए माता रानी के दर्शन के लिए आते हैं।
 

बिलासपुर कटनी रेल रूट पर स्थित भनवारटंक रेलवे स्टेशन से करीब चार सौ मीटर की दूरी पर रेलवे लाईन के किनारे स्थित मरही माता के मंदिर है। केवल पैसेंजर ट्रेनों का ठहराव होने के कारण यहां पैसेंजर ट्रेनो के समय खासी भीड़ उतरती है, जोकि जान जोखिम में डालकर रेलवे ट्रेक से ही होकर आना जाना करते हैं। यह मरही माता का आशीर्वाद ही कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा कि अब तक कोई हादसा यहां नहीं होने पाया है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धालु अपनी मन्नतें पूरी होने पर बकरे की बलि आज भी दे रहे हैं, मंदिर जिसके सामने भव्य तालाब है, जिस पर लोग भोजन प्रसाद भण्डारे की व्यवस्था है। भनवारटंक में सभी लोकल ट्रेन रूकती हैं, यहां पर कोई भी प्रकार से मोबाइल का नेटर्वक काम नहीं करता जिससे लोगों को बहुत परेशानिओं का सामना करना पड़ता है. नवरात्रि के समय में मातारानी के मंदिर के सामने से गुजरने वाली ट्रेनों के पहिए अपने आप रुक जाते हैं। माँ मरही माता के दरबार में मन्नत पूरी होने पर बकरे का बलि दिया जाता है। मन्नत को लेकर श्रद्धालु माता जी को श्रीफल, चूड़िया, चुनरी व  रक्षासूत्र बांधते है।
 
</description><guid>6134</guid><pubDate>2024-11-17 14:16:36 2:22:09 pm</pubDate></item><item><title>तीर्थ के रूप में जाना जाता है सिरपुर </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=5644</link><description>सिरपुर,छत्तीसगढ़ राज्य में महानदी नदी के तट पर बसा एक छोटा सा गाँव है। यह महासमुंद जिले से 35 किमी दूर है और रायपुर शहर से लगभग 78 किमी दूर है, जो छत्तीसगढ़ की राजधानी है। सिरपुर गाँव एक पुरातात्विक आश्चर्य है। कई वास्तुकारों के लिए प्रेरणा, यह गाँव अपनी मंदिर संस्कृति में समृद्ध है। एक अनोखा छिपा हुआ रत्न, इसका बौद्ध धर्म की दुनिया से गहरा संबंध है और 8वीं शताब्दी से पुरातात्विक खोजों का खजाना है।


यहाँ कई मंदिर हैं जहाँ कोई भी जा सकता है, और यह आम तौर पर उत्साही इतिहासकारों का केंद्र है। ऐतिहासिक कलाकृतियों और मंदिरों की दीवारों पर गहरी नक्काशी ने दुनिया भर के कई वास्तुकारों को प्रेरित किया है। इस गाँव के बौद्ध मठों को भारत में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इन गाँवों में समृद्ध ऐतिहासिक महत्व और आकर्षक खोजों के अलावा, इस गाँव में और भी बहुत कुछ है। छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड बौद्ध स्थलों को बढ़ावा देने और इसकी संस्कृति का जश्न मनाने के लिए यहाँ एक संगीत और नृत्य उत्सव का आयोजन करता है। विभिन्न प्रदर्शन, कला के गहन इतिहास और विकास के साथ कला और संस्कृति का दुर्लभ मिश्रण प्रस्तुत करने वाला सिरपुर एक शांतिपूर्ण गांव है जो आश्चर्यों से भरा हुआ है।

सिरपुर का इतिहास
श्रीपुर या श्रीपुर के नाम से भी जाना जाता है, इस नाम का अर्थ है एक शुभ शहर। इसकी एक समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य पृष्ठभूमि है और इसे अक्सर प्राचीन विरासत के रूप में संदर्भित किया जाता है। अलेक्जेंडर कनिंघम (एक ब्रिटिश उपनिवेशवादी) द्वारा 1872 में यहां आने पर लक्ष्मण मंदिर पर लिखी गई एक रिपोर्ट ने सिरपुर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। यहां कई मंदिरों के लिए प्रसिद्ध, पिछले कुछ वर्षों में कई साइट उत्खनन ने प्रमुख पुरातात्विक खोजों और मंदिर वास्तुकला विकास की समझ को जन्म दिया है। 2000 के दशक में किए गए उत्खनन से शिव मंदिर, 5 विष्णु मंदिर और जैन विहार मिले।

लक्ष्मण मंदिर सिरपुर को हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के लिए तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है; इस गांव में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ आप इसके प्रतिष्ठित इतिहास के बारे में जान सकते हैं। लक्ष्मण मंदिर इस गांव के सबसे लोकप्रिय स्थलों में से एक है, और इस मंदिर की वास्तुकला कई वास्तुकारों के लिए निरंतर प्रेरणा रही है।


बालेश्वर मंदिर माना जाता है कि यह मंदिर लुप्त हो चुका है, इस मंदिर की हाल ही में खुदाई की गई थी। इसका नाम राजा महाशिवगुप्त बलार्जुन के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने मंदिर का निर्माण किया था। हाल ही में की गई खुदाई में उनकी कई वस्तुएँ मिली हैं। इस मंदिर के बारे में एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि इस स्थान पर एक नहीं बल्कि तीन और मंदिर हैं और वे सभी महान शिव को समर्पित हैं।


राम मंदिर यह मंदिर सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और माना जाता है कि यह राम और लक्ष्मण को समर्पित है। एक लोकप्रिय आकर्षण, इसमें जगती नामक एक तारे के आकार का मंच है और यह स्थान लक्ष्मण मंदिर के पास स्थित है।


बुद्ध विहार सिरपुर बुद्ध विहार के नाम से मशहूर यह 8वीं शताब्दी का बौद्ध मंदिर है जिसे भिक्षु आनंद प्रभु ने बनवाया था। सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले बौद्ध तीर्थयात्रियों में से एक, इस जगह ने कई इतिहासकारों को आकर्षित किया है जो बौद्ध धर्म की समयरेखा का अध्ययन कर रहे हैं और उसके बिंदुओं को जोड़ रहे हैं। यह एक ऐसी जगह है जहाँ आप वास्तुकला के चमत्कार देख सकते हैं।


तीवरदेव लक्ष्मण मंदिर से ज़्यादा दूर नहीं, यह एक बौद्ध मठ है जिसमें बौद्ध कलाकृतियाँ, मूर्तियाँ और पंचतंत्र की कहानियों जैसे हिंदू विषय हैं। बौद्ध और हिंदू वास्तुकला का एक सुंदर संगम, इस मंदिर का निर्माण शैव खान और उनकी बौद्ध रानी ने करवाया था।

एएसआई संग्रहालय एएसआई संग्रहालय जिसमें पिछले कई सालों में विभिन्न साइट पर की गई खुदाई में एकत्रित कलाकृतियों का एक समृद्ध संग्रह है। संग्रहालय लक्ष्मण मंदिर में ही स्थित है इसलिए यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है और यहाँ ज़रूर जाना चाहिए।</description><guid>5644</guid><pubDate>2024-11-04 16:42:29 5:14:40 pm</pubDate></item><item><title> माटी की महिमा दर्शाता माटी का दिया</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=5548</link><description> सतयुग से दीपपर्व मनाने की परम्परा आरंभ हुई थी,वह सतत चली आ रही है। कार्तिक माह के पांच दिवसीय महापर्व में क्रमशः धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाईदूज का त्योहार शामिल है। इस पर्व के दौरान मिट्टी से निर्मित दिया जलाने की प्राचीनतम प्रथा प्रचलित है।कार्तिक अमावस्या की रात सर्वाधिक मात्रा में प्रज्जवलित मिट्टी का छोटा सा दिया मानवीय मूल्यों को बनाए रखने का बड़ा संदेश देता है।यह सर्वविदित है कि मिट्टी से निर्मित वस्तुओं का जन्मजात नाता मनुष्य से जुड़ा होता है।अत्याधुनिक युग आने के बावजूद मिट्टी से निर्मित सुराही के पानी का स्वाद मंहगे फ्रिज का ठंडा पानी नहीं दे पाता।
   ग्रीष्म काल के आते ही जैसे मिट्टी से निर्मित मटके की मांग बढ़ जाती है। उसी तरह दीपावली पर्व में मिट्टी के दीये की पूछ परख बढ़ जाती है। इसके बिना दीपावली मनाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।विविध किस्म के रंग-बिरंगे बिजली चलित झालर और खूबसूरत आकार लिए मोमबत्ती बाजार में उपलब्ध हैं,पर मिट्टी के दीये के बिना इस पर्व की दशा बिन पानी की नदिया जैसी होगी।
      बालपन की बातें याद आती हैं ,जब दशहरा दिवाली की छुट्टी होती थी तो एक दिन गंवाए बिना ननिहाल के लिए रवाना हो जाते थे। वहां घरों की साफ सफाई, लिपाई पुताई में हम जुट जाते थे।नानी जी मिट्टी के दिये खरीद कर उन्हें पानी में डूबा कर रख देती थीं। वे बताती थी कि दिया अधिक पानी सोख लेगा तो तेल कम सोखेगा।आज उनकी बातें ज्यादा अच्छे ढंग से समझ में आती हैं।
   वे यह भी कहती थीं कि दूसरों के जीवन को प्रकाशित करने वाले दिया तले अंधेरा ही होता है,किन्तु इससे व्यथित हुए बिना वह अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा करने में तल्लीन रहता है। परोपकार की सीख को संचारित करता हुआ दिया सतत दूसरों के लिए जलता है। इंसानों की तरह वह दूसरों से नहीं जलता है। मनुष्य के भीतर सब कुछ बटोर लेने की बढ़ती लिप्सा के बीच बटोरने के बजाय बांटने की सीख नन्हा दिया देता है।
   दीवाली को कुम्हारों के गर्व,प्रतिभा और प्रतिष्ठा का पर्व भी कह सकते हैं।कुम्हारों की मिट्टी शिल्प कला का शानदार प्रदर्शन दिवाली की रात दीपमालिका बने दीये प्रदर्शित करते हैं। दीये बनाने की कारीगरी में दक्ष कुम्हारों का यह पुश्तैनी धंधा है। मिट्टी के दिए,सुराही,मटके, खिलौने,गमले बनाने के अलावा विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाकर बाजार में बेचना ही उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख आधार है।
  सुखी मिट्टी को बारीक कूट- पीटकर उसे पानी में भिगोना,गुंथना और फिर उससे कोई भी वस्तु बना देना कुम्हारों के लिए खेल की तरह होता है।यद्यपि बदलते वक्त के साथ कुम्हार समुदाय की जिंदगी में भी भारी उलटफेर हुए हैं।बदलाव की बयार ने इनकी जिंदगी से मिट्टी शिल्प कला के रिश्ता को धीरे धीरे तोड़ना भी आरंभ कर दिया है। दरअसल अन्य सामग्रियों की तरह कुम्हारों के व्यवसाय में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों के दाम आसमान को छू रहे हैं। कोयला,भूसा,माटी, पानी की महगांई के साथ साथ आधुनिक बाजार के बने सस्ते सामानों ने इनके व्यवसाय को बुरी तरह से प्रभावित किया है।
   पसीना बहाते,रात दिन मेहनत करके बनाए समानों की लागत को ग्राहकों से निकाल पाना इनके लिए बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है,फलस्वरूप अब कुम्हार समुदाय के बहुत से परिवारों ने माटी से नाता तोड़कर अन्य व्यवसाय से नाता जोड़ लिया है।कुम्हार समुदाय का मिट्टी के मोह से परे जाना एक गंभीर चिंता का विषय है। मिट्टी शिल्प कला से दूर होना पर्व,परंपरा,संस्कृति सहित पुश्तैनी धंधे को विलुप्त करने की राह पर ढकेलने जैसा घातक कदम है। साथ ही जड़ से जुड़ने के बजाय टूटने का भयावह संकेत है।
   मिट्टी का दिया मनुष्य को माटी और उसकी
सोंधी सुगंध से जोड़ कर रखता है। जानबूझकर इससे अनजान बना इंसान आधुनिकता की आड़ में पुराने रीति-रिवाजों से दूर होता चला जा रहा है। गांव शहर में तब्दील हो रहे हैं। पवित्र मन का मालिक ग्रामीण भी अब स्वयं को शहरी चकाचौंध तड़क भड़क रंग में रंगकर झूठी शान की चादर ओढ़ने में गर्व का अनुभव कर रहा है।
    ऐसे संक्रमण काल में मिट्टी का दिया और बिजली चलित झालर के बीच हो रहे संवाद की याद सहज हो आती है,जो कि इस तरह है - दिवाली की रात मिट्टी के दिये और झालर में तू तू मैं मैं की बहस चल रही थी।झालर ने कहा- सुन रे दिया, नए जमाने में तेरी पूछ परख लगातार कम हो रही है। तेरा ठिकाना केवल गांव गरीब की झोपड़ी तक सिमट कर रह गया है। मेरी जगह महलों और गगनछूती इमारतों के बीच में है।
    यह सुनकर हल्की मुस्कान के साथ दिया ने कहा -हां वो तो ठीक है, पर पूजा की थाली में तुम्हें नहीं मुझे ही जगह मिलती है। झालर भाई ज्यादा घमंड मत करो। घमंडी- अहंकारी का सिर नीचे और पराजय सुनिश्चित है। हमारे विद्वानों का कहना है कि अंहकारमें तीन गए धन,वैभव और वंश,न मानो तो देख लो कौरव,रावण और कंस।
   दिया की ऐसी बातों का मनन करते हुए यह भी नहीं भूलना चाहिए कि मिट्टी का एक दिया आंधी तूफान से जूझते हुए भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता। घोर अंधकार को चीरते हुए वह बताता है - मानव निर्मित माटी का दिया सारी रात अंधेरे से लड़ता है। हे मानव, तू तो ईश्वर का बनाया हुआ है तू किस बात से डरता है।</description><guid>5548</guid><pubDate>2024-10-28 12:05:41 12:06:36 pm</pubDate></item><item><title>डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी की महिमा अपरंपरा, </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=5512</link><description>रायपुर/डोंगरगढ़,छत्तीसगढ़ केराजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी का दरबार चैत्र नवरात्र में खूब सजा हुआ है। पहाड़ी, मंदिर और माता के दरबार में आकर्षक
 रोशनी की गई है। कोरोना के कारण पिछले दो साल तक मां के दर्शन से वंचित श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। इस बार वे आसानी से माता के दर्शन कर सकेंगे।
 उनके उत्साह को देखते हुए ही रेलवे ने भी डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन पर 15 यात्री गाड़ियों के ठहराव की घोषणा की है।
मां बम्लेश्वरी का दरबार 1600 मीटर ऊंची पहाड़ी पर है। श्रद्धालुओं को यहां तक पहुंचने के लिए 1100 सीढ़ियां चढ़नी पड़ेगी। हालांकि यहां रोपवे की भी व्यवस्था
 है। इसके अलावा आनलाइन दर्शन की भी सुविधा उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई है। पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी का मुख्य मंदिर है। उन्हें बड़ी बम्लेश्वरी के
 रूप में जाना जाता है।

वहीं पहाड़ के नीचे भी मां बम्लेश्वरी का एक मंदिर है। यहह छोटी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि वे मां बम्लेश्वरी की छोटी बहन हैं। नवरात्र पर यहां मेला शुरू हो गया है। पूजन के साथ ही विभिन्न् प्रकार के सामानों की दुकानें सजी हुई हैं। दो साल बाद हो रहे इस मेले को लेकर दुकानदारों को अच्छा खासा कारोबार होने की उम्मीद है।
मंदिर का इतिहास



मां बम्लेश्वरी शक्तिपीठ का इतिहास करीब 2000 वर्ष पुराना है। डोंगरगढ़ का इतिहास मध्य प्रदेश के उज्जैन से जुड़ा है। इसे वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी को मध्य प्रदेश के उज्जयनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है। इतिहासकारों ने इस क्षेत्र को कल्चूरी काल का पाया है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी मां बगलामुखी हैं। उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। उन्हें यहां मां बम्लेश्वरी के रूप में पूजा जाता है।
ऐसे पहुंचें मंदिर
जिला मुख्यालय राजनांदगांव से सड़क मार्ग से डोंगरगढ़ की दूरी 35 किलोमीटर है। इसके अलावा हावड़ा-मुंबई रेलमार्ग से भी यह जुड़ा हुआ है। यहां रेल और सड़क दोनों मार्गों से आसानी से पहुंचा जा सकता है।
</description><guid>5512</guid><pubDate>2024-10-27 17:01:19 5:05:03 pm</pubDate></item><item><title>मंदिरों और तालाबों का यह नगर मां महामाया के नगर के नाम से विख्यात है। रतनपुर</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=5461</link><description>रतनपुर,में स्थित देवी दुर्गा, महालक्ष्मी को समर्पित एक मंदिर है और पूरे भारत में फैली 52 शक्तिपीठों में से एक है। देवी महामाया शक्ति के रूप में यहां प्रमाणित तौर पर है। शक्तिपीठ की स्थापना के साथ ही रतनपुर का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया है। रतनपुर की भौगोलिक स्थिति भी देखते ही बनती है।मंदिरों और तालाबों का यह नगर मां महामाया के नगर के नाम से विख्यात है। देवी महामाया को कोशलेश्वरी के रूप में भी जाना जाता है, जो पुराने दक्षिण कोशल क्षेत्र (वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य) की अधिष्ठात्री देवी हैं। न्यायधानी बिलासपुर से तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आदिशक्ति मां महामाया देवी की पवित्र पौराणिक नगरी रतनपुर का इतिहास प्राचीन एवं गौरवशाली है।

त्रिपुरी के कल्चुरियों की एक शाखा ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर दीर्घकाल तक छत्तीसगढ़ में शासन किया। राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर नामक गांव को रतनपुर नाम देकर अपनी राजधानी बनाई। आदिशक्ति मां महामाया देवी मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम द्वारा 11वीं शताब्दी में कराया गया था। 1045 ई में राजा रत्नदेव प्रथम मणिपुर नामक गांव में रात्रि विश्राम एक वट वृक्ष पर किया।
अर्धरात्रि में जब राजा की आंख खुली तब उन्होंने वट वृक्ष के नीचे आलौकिक प्रकाश देखा। यह देखकर चमत्कृत हो गए कि वहां आदिशक्ति श्री महामाया देवी की सभा लगी हुई है। इतना देखकर वे अपनी चेतना खो बैठे। सुबह होने पर वे अपनी राजधानी तुम्मान खोल लौट गए और रतनपुर को अपनी राजधानी बनाने का निर्णय लिया। 1050 ई में श्री महामाया देवी का भव्य मंदिर निर्मित कराया।



एक किंवदंती यह भी
यह कथा यह भी प्रचलित है कि सती की मृत्यु से व्यथित भगवान शिव उनके मृत शरीर को लेकर तांडव करते हुए ब्रह्मांड में भटकते रहे। इस समय माता के अंग जहां-जहां गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गए। इन्हीं स्थानों को शक्तिपीठ रूप में मान्यता मिली। महामाया मंदिर में माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं आविर्भूत होकर उसे कौमारी शक्तिपीठ का नाम दिया था। इसीलिए इस स्थल को माता की 51 शक्तिपीठों में शामिल किया गया। महामाया मंदिर प्रांगण में प्रात:काल से देर रात तक भक्तों की भीड़ लगी रहती है। हय मान्यता यह भी है कि नवरात्र में यहां की गई पूजा निष्फल नहीं जाती है।
इतिहास
12-13वीं शताब्दी में बना यह मंदिर देवी महामाया को समर्पित है। यह उस स्थान पर स्थित है जहां राजा रत्नदेव ने देवी काली के दर्शन किए थे। मूल रूप से मंदिर तीन देवियों महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के लिए था। बाद में महाकाली ने पुराने मंदिर को छोड़ दिया। राजा बहार साईं द्वारा एक नया मंदिर बनाया गया था जो देवी महालक्ष्मी और देवी महासरस्वती के लिए था।
मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1552 में हुआ था। मंदिर का जीर्णोद्धार वास्तुकला विभाग द्वारा कराया गया है। मंदिर का स्थापत्य कला भी बेजोड़ है। गर्भगृह और मंडप एक आकर्षक प्रांगण के साथ किलेबंद हैं, जिसे 18 वीं शताब्दी के अंत में मराठा काल में बनाया गया था।
मंदिर के संरक्षक की भूमिका में काल भैरव को माना जाता है। राजमार्ग पर महामाया मंदिर के ही रास्ते पर काल भैरव का मंदिर स्थित है। आम धारणा यही है कि महामाया मंदिर जाने वाले तीर्थ यात्रियों को अपनी तीर्थयात्रा पूरी करने के लिए काल भैरव मंदिर में पूजा अर्चना करनी पड़ती है।
</description><guid>5461</guid><pubDate>2024-10-26 18:09:16 6:13:33 pm</pubDate></item><item><title>दो नदियों के तट पर विराजी हैं मां दंतेश्वरी, जानें मंदिर का हजारों साल पुराना इतिहास</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=5380</link><description>रायपुर।बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी दंतेवाड़ा में शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम तट पर विराजी हैं। दंतेश्वरी शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। माना जाता है कि माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए यह पावन स्थल दंतेश्वरी शक्तिपीठ कहलाता है। मां दंतेश्वरी को विशेष अवसरों दशहरा एवं फाल्गुन मंड़ई के मौके पर गार्ड आफ आनर दिया जाता है और सम्मान में हर्ष फायर की पंरपरा निभाई जाती है। बस्तर संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से इस शक्तिपीठ की दूरी 84 किलोमीटर है। यहां साल में तीन नवरात्र मनाई जाती है। तीसरी नवरात्र फाल्गुन माह में पूरे 10 दिन आदिवासी समाज के लोग मनाते हैं। यहां मध्य भारत का सबसे बड़ा जोत कलश भवन बनाया जा रहा है।



इतिहास


मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। 705 साल पहले वारंगल से आए चालुक्य नरेश अन्नमदेव ने शक्तिपीठ का जीर्णोद्धार कराया था। वर्तमान में यह केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की देखरेख में है। शक्तिपीठ में प्रतिष्ठित मां दंतेश्वरी की मूर्ति जिस शिला में उकेरी गई है, उसके ठीक ऊपर नृसिंह भगवान की आकृति है। शक्तिपीठ के ठीक सामने गरुड़ स्तंभ स्थापित है। भगवान नृसिंह विष्णु अवतार हैं, इसलिए प्रति वर्ष दीपावली के दिन मां दंतेश्वरी की माता लक्ष्मी के रूप में विशेष पूजा होती है। मां दंतेश्वरी शक्तिपीठ प्रक्षेत्र को आठ भैरव भाइयों का निवास स्थल माना जाता है। सन 1313 ईस्वी में अन्नमदेव वारंगल छोड़कर बीजापुर होते हुए बारसूर पहुंचा था। उसने अंतिम नागवंशी नरेश हरिशचंद्र देव को पराजित कर 1314 में सिंहासन संभाला था। कुछ सालों बाद उसने बारसूर से अपनी राजधानी दंतेवाड़ा स्थानांतरित की और मां दंतेश्वरी देवी की मूर्ति लाकर दंतेवाड़ा शक्तिपीठ में स्थापित की। शक्तिपीठ में तीन शिलालेख और 56 प्रतिमाएं हैं।

देवी मंदिरों में आमतौर पर चैत्र और क्वांर महीने में नवरात्र मनाई जाती है, किंतु दंतेश्वरी शक्तिपीठ में फागुन मड़ई के नाम से तीसरी नवरात्र होती है। इसे आखेट नवरात्र कहा जाता है। देवी के नौ रूपों के सम्मान में नौ दिन माईजी की डोली निकाली जाती है। इस मौके पर 600 से ज्यादा गांवों के देवी-देवता शक्तिपीठ में आमंत्रित किए जाते हैं। बस्तर दशहरा में शामिल होने को मां दंतेश्वरी की डोली जगदलपुर आती है। यह पर्व माता को समर्पित है, इसलिए रावण वध की पंरपरा नहीं है।

माता सती का अधोदंत (निचला दांत) डंकिनी और शंखिनी नदी के संगमतट पर गिरा था, इसलिए यहां देश का 51 वां शक्तिपीठ स्थापित है। मां दंतेश्वरी बस्तर राजपरिवार की ही नहीं, अपितु संपूर्ण बस्तरवासियों की आराध्य देवी हैं। सच्चे दिल से की गई प्रार्थना माता जरूर पूरी करती हैं।



दंतेश्वरी शक्तिपीठ में प्रतिवर्ष वासंती और शारदीय नवरात्र के अलावा 10 दिवसीय आखेट नवरात्र भी मनाया जाता है। इसे फागुन मड़ई भी कहते हैं। इस महापर्व में लगभग छह सौ गांवों के देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। वैसे तो यहां पूरे साल भक्तों का आना-जाना लगा रहा है पर चैत्र, क्वांर नवरात्र और फागुन मंडई में हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है।</description><guid>5380</guid><pubDate>2024-10-25 16:39:01 4:41:38 pm</pubDate></item><item><title>विश्व का सबसे बड़ा स्वयंभू प्राकृतिक शिवलिंग, भूतेश्वर महादेव की हर साल बढ़ती है ऊंचाई</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4912</link><description>गरियाबंद :छत्तीसगढ़ में कई शिव मंदिर हैं. लेकिन यदि सबसे अलग शिव मंदिर की बात होती है तो भूतेश्वरनाथ का नाम सबसे पहले आएगा.भूतेश्वर नाथ महादेव जागृत माने गए हैं. क्योंकि साल दर साल यहां स्थापित शिवलिंग का आकार बढ़ता जा रहा है. मौजूदा समय में भूतेश्वरनाथ का आकार 80 फीट तक पहुंच चुका है.यही वजह है कि इस शिवलिंग के दर्शन करने के लिए देश के साथ विदेशी नागरिक भी गरियाबंद पहुंचते हैं.

सावन में उमड़ी भक्तों की भीड़ :सावन के पहले सोमवार पर प्राकृतिक शिवलिंग भूतेश्वरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों की भीड़ पहुंची. सुबह पांच बजे से ही मंदिर में भक्तों का तांता लगने लगा. इस मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए इस साल समिति ने कई तरह की व्यवस्थाएं की हैं ताकि लोगों को परेशानी ना हो.
गरियाबंदसे 3 किलो मीटर दूर घने जंगलों के बीच बसा है ग्राम मरौदा। सुरम्य वनों एवं पहाडियों से घिरे अंचल में प्रकृति प्रदत्त विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग विराजमान है। एक ओर जहां महाकाल और अन्य शिवलिंग के आकार के छोटे होते जाने की खबर आती है वहीं एक शिवलिंग ऐसा भी है जिसका आकार घटता नहीं बल्कि हर साल और बढ़ जाता है। यह शिवलिंग प्राकृतिक रूप से निर्मित है। हर साल महाशिवरात्रि और सावन सोमवार को लंबी पैदल यात्रा करके कांवरिए यहां पहुंचते हैं। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित इस शिवलिंग को यहां भूतेश्वरनाथ के नाम से पुकारा जाता है। जिसे भकुर्रा भी कहा जाता है द्वादश ज्योतिर्लिंगों की भांति छत्तीसगढ़ में से अर्धनारीश्वर शिवलिंग होने की मान्यता प्राप्त है।सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस शिवलिंग का आकार लगातार हर साल बढ़ रहा है।संभवतः इसीलिए यहां पर हर साल आने पैदल आने वाले भक्तों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। छत्तीसगढ़ी भाषा में हुकारने की आवाज को भकुर्रा कहते हैं, इसी से छत्तीसगढ़ी में इनका नाम भकुर्रा पड़ा है।

कब हुई थी स्थापना :इस मंदिर की खोज लगभग तीस साल पहले हुई थी, जब चारों तरफ घने जंगल थे. इन घने जंगलों के बीच मौजूद एक छोटे से टीले से, आसपास के गांव वालों को बैल के हुंकारने की आवाज आती थी. लेकिन जब ग्रामीण नजदीक जाते तो उन्हें कोई भी जानवर नहीं दिखता.धीरे धीरे ग्रामीणों की आस्था टीले के प्रति जागृत हुई. सभी लोगों ने टीले को शिव का रूप मानकर पूज करना शुरू किया. आज वही छोटा सा टीला एक विशाल शिवलिंग का आकार ले चुका है.
कितनी है शिवलिंग की ऊंचाई :80 फीट ऊंचा और 290 फीट गोलाई लिए हुए यह विश्व का विशालतम प्राकृतिक शिवलिंग भूतेश्वर नाथ है. 1959 में प्रकाशित कल्याण पुस्तिका में भी इसका उल्लेख है. बताया जाता है कि शिवलिंग जब तीन फीट का था, तब से इसका पूजा पाठ शुरू हुआ. इसके बाद से शिवलिंग का आकार बढ़ने लगा. कई बार शिवलिंग के आकार को नापा जा चुका है. हर बार इसका आकार पिछली बार के मुकाबले ज्यादा होता है</description><guid>4912</guid><pubDate>13-Oct-2024 4:29:51 pm</pubDate></item><item><title> छत्तीसगढ़ के चैतुरगढ़ में बसा है सदियों पुराना देवी मां का मंदिर, जानें रहस्य</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4608</link><description>चैथुरगढ़ (लाफागढ़) कोरबा शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित है। यह पाली से 25 किलोमीटर उत्तर में है और पहाड़ी की चोटी पर 3060 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसका निर्माण राजा पृथ्वीदेव प्रथम ने करवाया था। पुरातत्वविद इसे सबसे मजबूत प्राकृतिक किलों में से एक मानते हैं। चूँकि यह मजबूत प्राकृतिक दीवारों से सुरक्षित है, इसलिए केवल कुछ जगहों पर दीवारें बनाई गई हैं। किले के तीन मुख्य प्रवेश द्वार हैं जिन्हें मेनका, हुमकारा और सिंहद्वार नाम दिया गया है।
पहाड़ी की चोटी पर 5 वर्ग किलोमीटर का एक मैदानी क्षेत्र है, जहाँ पाँच तालाब हैं। जिनमें से तीन हमेशा पानी से भरे रहते हैं।यहाँ प्रसिद्ध महिषासुर मर्दिनी मंदिर स्थित है। गर्भगृह में महिषासुर मर्दिनी की 12 भुजाओं वाली मूर्ति स्थापित है। मंदिर से 3 किलोमीटर दूर शंकर गुफा स्थित है। सुरंगनुमा यह गुफा 25 फीट लंबी है। गुफा का व्यास बहुत छोटा होने के कारण इसमें रेंगकर ही प्रवेश किया जा सकता है।
चैथुरगढ़ की पहाड़ियाँ अपनी प्राकृतिक सुंदरता और रोमांचकारी अनुभवों के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ कई प्रकार के जंगली जानवर और पक्षी पाए जाते हैं। SECL ने यहाँ पर्यटकों के लिए एक विश्राम गृह का निर्माण किया है। मंदिर ट्रस्ट ने पर्यटकों के लिए कुछ कमरे भी बनाए हैं।नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।</description><guid>4608</guid><pubDate>02-Oct-2024 6:51:48 pm</pubDate></item><item><title> बारसूर छत्तीसगढ़ का इतिहास</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4444</link><description>बारसूर,बस्तर की गोद में प्राचीन, सांस्कृतिक और प्राकृतिक नजारों से ओतप्रोत दृष्य हमेशा देखने को मिलता हैं। जिसमे से एक हैं, गीदम के जंगलों के बीच स्थित
 बारसूर (Barsur Chhattisgarh), जहाँ महाभारत काल से लेकर प्राचीन सभ्यता तक के मंदिर, तालाबों व झरने, जगह-जगह देखने को मिल जाते हैं।
आज हम आपको बारसूर में पाए जाने वाले प्राचीन मंदिरो व तालाबों के बारे में बताने जा रहे हैं। यहाँ पहुंचने के उत्तम मार्ग, कब व कैसे जाना चाहिए, जाने
का सर्वोत्तम समय क्या हैं। साथ ही यहाँ घूमने का Tour Package भी उपलब्ध करवाने वाले हैं। मंदिरो व तालाबों का शहर कहे जाने वाले Barsur
Chhattisgarh अपनी प्राचीन सभ्यता और कथाओं से परिपूर्ण हैं। यहाँ महाभारत कालीन घटनाओ का उल्लेख मिलता रहता हैं।
कहा जाता हैं महाभारत काल में यहाँ भगवान् शिव से अक्षय वरदान प्राप्त राजा बाणासुर का राज्य फैला हुआ था। जिसका उल्लेख यहाँ के मंदिरो की
कहानियों में मिलता हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार बारसूर की मंदिर ज्यादातर छिन्दक नागवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया हैं। जो अपनी अद्भुत
नक्काशी और कलाकृतियों से
भरा हुआ हैं। कहा जाता हैं बारसूर क्षेत्र के अंतर्गत पहले 147 तालाब व 147 मंदिर पाए जाते थे, जो कालांतर में कुछ ही शेष बचे हुए हैं।



एक किवदंती के अनुसार राजा बाणासुर देवों के देव  महादेव की घनघोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें अक्षय पताका दिया, और उन्होंने वरदान
दिया, जब तक यह पताका लहराता रहेगा, राज्य में सुख, शांति व समृद्धि रहेगी। जो पताका को नीचे गिरायेगा वही आपको युद्ध में पराजित कर पायेगा।
जगदलपुर से भोपालपट्टनम रोड वाले रास्ते में ही Battisa Temple Barsur पड़ता हैं, जो बारसूर शहर में ही स्थित हैं। 32 स्तंभों (32 Pillors) में खड़े हैं
जिसके कारण इसे बत्तीसा मंदिर कहा जाता हैं।
इस मंदिर की स्थापना लगभग 11-12 वीं शताब्दी ई. में हुआ होगा। इस मंदिर में दो गर्भगृह विद्यमान हैं। जिसमे दोनों जगह शिवलिंग स्थापित हैं। जो
भगवान् शिव जी को समर्पित हैं। यह मंदिर हिन्दू मंदिरों में अनोखा हैं, प्रथम गर्भ गृह के शिवलिंग कोसोमेश्वरतथा द्वितीय गर्भगृह के लिंग
कोगंगाधरके नाम से स्थापित हैं। मंडप में शिवलिंग की ओर मुख किये हुए नंदी बैठा हुआ हैं। नंदी की प्रतिमा बहुत सजीव और सुन्दर हैं। ऐसी मान्यता
हैं की नंदी के कान में गुप्त रूप से
अपनी मनोमकाना बताने से वह पूर्ण हो जाती हैं।कहा जाता हैं दोनों शिव को घुमाने से घूमता हैं, ऐसी मान्यता हैं, की दोनों शिवलिंग को एक सही दिशा में
रखने से Battisa Temple में एक रहस्यमयीदरवाजा खुलता है, जो छिन्दक नागवंशी राजा या अन्य किसी राजवंश के खजाना पर लेकर छोड़ता हैं।
कालांतर में असामाजिक तत्वों के द्वारा बार-बार घूमने से शिवलिंग में छति होने के कारण पुरातत्व विभाग द्वारा दोनों शिवलिंग को चिपका के रख दिया गया
हैं, जिससे अब कोई भी उसे घुमाकर नहीं देख सकता हैं। समय के अनुसार भगवान कृष्ण के पुत्र व बाणासुर की पुत्री में प्रेम हो गया ततपश्चात बाणासुर का
पताका नष्ट होने लगा। भगवान् कृष्ण और बाणासुर में भयानक युद्ध हुआ, जिसमे श्री कृष्ण की जीत हुई। भगवन शिव की परम भक्त होने के कारण श्री
किशन के बारे में शिव जी ने बाणासुर को बताया, तदुपरांत दोनों में संधि हुआ। बाणासुर ने शिव और विष्णु मंदिर का निर्माण गनमन तालाब के पास
करवाया हैं।</description><guid>4444</guid><pubDate>27-Sep-2024 6:30:25 pm</pubDate></item><item><title> देवरानी जिठानी मंदिर, ताला,अमेरी काँपा,बिलासपुर</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4441</link><description>ताला,यह अतीत में वापस जाने और कालातीत मूर्तियों द्वारा मंत्रमुग्ध होने जैसा है। निश्चित रूप से अनंत काल और कलात्मक पत्थर की मूर्तियों की भूमि, ताला
 अमेरिकापा के गांव के पास मनियारी नदी के तट पर स्थित है। अक्सर मेकाला के पांडुवामशियों के अभिलेखों में वर्णित संगमग्राम के रूप में पहचाना जाता है, ताला
 शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम पर स्थित है। देवरानी-जेठानी मंदिरों के लिए सबसे मशहूर, ताला की खोज 1873-74 में जे.डी. वेलगर ने की थी, जो प्रसिद्ध
 पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के सहायक थे । इतिहासकारों ने दावा किया है कि ताला गांव 7-8 वीं शताब्दी ईस्वी की है।
ताला के पास सरगांव में धूम नाथ का मंदिर है। इस मंदिर में भगवान किरारी के शिव स्मारक हैं, और मल्हार यहां से केवल 18 किमी दूर है। ताला बहुमूल्य
 पुरातात्विक खुदाई की भूमि है जिसने उत्कृष्ट मूर्तिकला के काम को प्रकट किया है। पुरातत्त्वविदों और इतिहासकारों को जटिल रूप से तैयार पत्थर की नक्काशी से
 मंत्रमुग्ध कर दिया जाता है। इन उत्कृष्ट खुदाई 6 वीं से 10 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान ताला की समृद्धि का वर्णन करती हैं। हालांकि, विभिन्न खुदाई वाले खंडहर
 प्राप्त हुए और मूर्तिकला-शैली हमें विभिन्न राजवंशों को बताती है जो ताला में शासन करते थे और भगवान शिव के भक्त और शिव धर्म के प्रचारक थे। शायद, यही
 कारण है कि आज भी शिव भक्त विभिन्न अनुष्ठान करने और पवित्र महामृत्यजय मंत्र का जप करने के लिए यहां मंदिरों को ढूंढ लेते हैं। भगवान शिव के भक्त यहां
 अपनी प्रार्थनाएं देते हैं और अन्य खुदाई का दौरा भी पसंद करते हैं। ताला निषाद समाज द्वारा निर्मित विभिन्न मंदिरों का भी घर है, जिसमें राम-जानकी मंदिर, स्वामी
 पूर्णानंद महाजन मंदिर और गोशाला शामिल हैं।
देवरानी  जेठानी मंदिर, अमेरीकांपा (जिला बिलासपुर)
प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के शरभपुरीय राजाओं के राजत्वकाल में मनियारी नदी के तट पर ताला नामक स्थल पर अमेरिकापा गाँव के समीप दो शिव मंदिरों का
 निर्माण कराया गया था जिनका संछिप्त विवरण निम्नानुसार है 

देवरानी मंदिर इन मंदिरो प्रस्तोर निर्मित अर्ध भग्नि देवरानी मंदिर, शिव मंदिर है जिसका मुख पूर्व दिशा की ओर है।इस मंदिर के पिछे की तरफ शिवनाथ की
 सहायक नदी मनियारी प्रवाहित हो रही है |इस मंदिर का माप बाहर की ओर से 7532 फीट है जिसका भुविन्यास अनूठा है | इसमें गर्भगृह ,अन्तराल एवं खुली
 जगहयुक्त संकरा मुखमंड़प है |मंदिर में पहुच के के लिए मंदिर द्वार की चंद्रशिलायुक्त देहरी तक सीढ़ियाँ निर्मित है||मुख मंडप में प्रवेश द्वार है |मन्दिरं की
 द्वारसखाओं पर नदी देवियो का अंकन है |सिरदल में ललाट बिम्ब में गजलक्ष्मी का अंकन है | इस मंदिर में उपलब्ध भित्तियो की उचाई 10 फीट है इसमें शिखर
 अथवा छत का आभाव है इस मंदिर स्थली से हिन्दू मत के विभन्न देवी-देवताओं ,वयंतर देवता,पशु ,पोराणिक आकृतिया ,पुष्पांकन एवं विविध ज्यामितिक एवं
 अज्यामितिक प्रतिको के अंकनयुक्त प्रतिमाये एवं वास्तुखंड प्राप्त हुए है |
जेठानी मंदिर दक्षिणाभीमुखी यह भगवान शिव को समर्पित है। भग्नाोवशेष के रूप में ज्ञात संरचना उत्खननन से अनावृत किया गया है। किन्तु कोई भी इसे
 देखकर इसकी भू-निर्माण योजना के विषय में जान सकता है।सामने इसके गर्भगृह एवं मंडप है जिसमे पहुँचाने के लिए दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम दिशा से प्रविष्ट होते थे |
मंदिर का प्रमुख प्रवेश द्वार चौड़ी सीढियों से सम्बन्ध था |इसके चारों ओर बड़े एवं मोटे स्तंभों की यष्टियां बिखरी पड़ी हुई है और ये उनके प्रतीकों के अन्कंयुक्त है|
 स्तंभ के निचले भाग पर कुम्भ बने हुए है | स्तंभों के ऊपरी भाग पर कुम्भ आमलक घट पर आधारित दर्शाया गया है जो कीर्तिमुख से निकली हुई लतावल्लरी से
 अलंकृत है |मंदिर का गर्भगृह वाला भाग बहुत अधिक क्षतिग्रस्त है और मंदिर के ऊपरी शिखर भाग के कोई प्रणाम प्राप्त नहीं हुए हैं | दिग्पाल देवता या गजमुख
 चबूतरे पर निर्मित किये गये है निःसंदेह ताला स्तिथ स्मारकों के अवशेष भारतीय स्थापत्यकला के विलक्षण उदहारण है | छत्तीसगढ़ के स्थासपत्यअ कला की
 मौलिक्ताा इसके पाषाण खण्डा में जिवित हो उठी है।
देवरानी-जेठानी मंदिर भारतीय मूर्तिकला और कला के लिए बहुत प्रसिद्ध है। 1987-88 के दौरान था देवरानी मंदिर में प्रसिद्ध खुदाई में भगवान शिव की एक बेहद अनोखी रुद्र छवि वाली मूर्ति प्रकट हुई।
शिव हमें भगवान के व्यक्तित्व के विभिन्न रंगों में एक झलक देता है। शैव धर्म के संबंध में, शिव की यह अनूठी मूर्ति विभिन्न प्राणियों का उपयोग करके तैयार की जाती
 है। प्रतीत होता है कि मूर्तिकार ने अपने शरीर रचना का हिस्सा बनने के लिए हर कल्पनीय प्राणी का उपयोग किया है, जिसमें से नाग एक पसंदीदा प्रतीत होता है।
 कोई भी ऐसा महसूस कर सकता है जैसे पृथ्वी पर जीवन के विकास को इस सृजन के लिए थीम के रूप में लिया जाता है। अपने विभिन्न शारीरिक भागों में आ रहे हैं,
 हम शायद ऊपर से धीरे-धीरे नीचे से शुरू हो सकते हैं।
रूद्रशिव के नाम से संबोधित की जाने वाली एक प्रतिमा सर्वाधिक महत्वापूर्ण है। यह विशाल एकाश्ममक द्विभूजी प्रतिमा समभंगमुद्रा में खड़ी है तथा इसकी उचांर्इ
 2.70 मीटर है। यह प्रतिमा शास्त्र के लक्षणों की दृष्टी से विलक्षण प्रतिमा है | इसमें मानव अंग के रूप में अनेक पशु, मानव अथवा देवमुख एवं सिंह मुख बनाये गये है
 | इसके सिर का जटामुकुट (पगड़ी) जोड़ा सर्पों से निर्मित है | ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ के कलाकार को सर्प-आभूषण बहुत प्रिय था क्योंकि प्रतिमा में रुद्रशिव का
 कटी, हाथ एवं अंगुलियों को सर्प के भांति आकार दिया गया है | इसके अतिरिक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग पर दोनों ओर एक-एक सर्पफण छत्र कंधो के ऊपर प्रदर्शित
 है | इसी तरह बायें पैर लिपटे हुए, फणयुक्त सर्प का अंकन है |दुसरे जीव जन्तुओ में मोर से कान एवं कुंडल, आँखों की भौहे एवं नाक छिपकली से,मुख की ठुड्डी
 केकड़ा से निर्मित है तथा भुजायें मकरमुख से निकली हैं | सात मानव अथवा देवमुख शरीर के विभिन अंगो में निर्मित हैं |ऊपर बतलाये अनुसार अद्वितीय होने के
 कारण विद्वानों के बीच इस प्रतिमा की सही पहचान को लेकर अभी भी विवाद बना हुआ है | शिव के किसी भी ज्ञात स्वरुप के शास्त्रोक्त प्रतिमा लक्षण पूर्ण रूप से न
 मिलने के कारण इसे शिव के किसी स्वरुप विशेष की प्रतिमा के रूप में अभिरान सर्वमान्य नहीं है | निर्माण शैली के आधार पर ताला के पुरावशेषों को छठी शती
 ईसवीं के पूर्वाद्ध में रखा जा सकता है |</description><guid>4441</guid><pubDate>27-Sep-2024 5:43:39 pm</pubDate></item><item><title>जानिए मां महामाया मंदिर के बारे में मां महामाया मंदिर रायपुर </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4357</link><description>रायपुर,पुरानी बस्ती में स्थित मां महामाया मंदिरकी बात करेंगे। छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग द्वारा मां महामाया मंदिर को 8वीं शताब्दी का बताया गया है।
इसके अनुसार मंदिर का इतिहास करीब 13 सौ साल से ज्यादा पुराना है। माता का यह ऐतिहासिक मंदिर बहुत चमत्कारिक माना जाता है। तांत्रिक पद्धति से बने इस मंदिर के गर्भगृह में मां महामाया मां काली के स्वरूप में विराजमान हैं।


श्री यंत्र के आकार में मंदिर के गुंबद का निर्माण हुआ है। इससे मंदिर में आने वाले भक्तों को मां महालक्ष्मी का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां महामाया के दर्शन के लिए भक्तों को मंदिर के गर्भगृह के मुख्य द्वार से थोड़ा तिरछा खड़ा होना होता है।मंदिर प्रांगण में मां महामाया मंदिर के सामने मां समलेश्वरी देवी का मंदिर है। समलेश्वरी माता को मां सरस्वती का स्वरुप माना जाता है। मां समलेश्वरी देवी उड़ीसा के संबलपुर क्षेत्र की कुलदेवी रही हैं।

महामाया के दरबार में श्रद्धालुओं द्वारा सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूरी पूरी होती है। मां महामाया मंदिर देश का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां लाल भैरव और काल भैरव के दर्शन होते हैं। मां महामाया के दर्शन के लिए श्रद्धालु देश ही नहीं विदेशों से भी रायपुर आते हैं।

मां महामाया मंदिर प्रांगण में कई देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं। मां दुर्गा का भव्य रूप मंदिर की दीवारों पर उकेरा गया है। श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन भी यहां होते हैं।
मंदिर प्रांगण में नौ देवी की प्रतिमा स्थापित की गई है। इसमें शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघण्टा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्री, महागौरी, सिद्धिदात्री हैं। मंदिर में शिवलिंग के दर्शन भी होते हैं। 
गर्भगृह में पहुंचती है सूरज की किरणें
मां महामाया मंदिर के गर्भगृह में सूरज की किरणें पहुंचती हैं। मंदिर में दो खिड़कियां बनी हुई हैं। एक खिड़की से माता के दर्शन होते हैं जबकि दूसरी खिड़की से ऐसा नहीं होता।
मां महामाया मंदिर पहले एक साधना स्थली थी। यहां बड़े बड़े साधक आकर साधना करते थे। मंदिर का निर्माण भी कुछ अलग तरीके से किया गया है। मंदिर के गुंबद में कलश ना होकर श्री यंत्र की तरह चक्र लगा हुआ है।


महामाया मंदिर में सुबह शाम भव्य आरती
मां महामाया मंदिर में सुबह 7:30 बजे और शाम 7:30 बजे भव्य आरती की जाती है। सबसे पहले मां महामाया की आरती होती है उसके बाद समलेश्वरी माता की आरती की जाती है।
मां महामाया मंदिर खुलने का समय सुबह 6 से दोपहर 12 बजे तक। संध्या 4 से रात्रि 9 बजे तक का है। नवरात्र में सुबह 8 बजे दोपहर 12:30 बजे और रात्रि 8 बजे भव्य आरती की जाती है।
मंदिर खुलने का समय प्रात: 4 बजे से दोपहर 3 बजे तक और शाम 4 से रात्रि 12:30 बजे तक। नवरात्र में ज्योति कलश की स्थापना भी की जाती है।

</description><guid>4357</guid><pubDate>25-Sep-2024 5:05:09 pm</pubDate></item><item><title>बत्तीसा मंदिर का अनोखा और प्राचीन घूमता हुआ शिवलिंग</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4354</link><description>बारसूर का बत्तीसा मंदिर:-बत्तीसा मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य में दंतेवाड़ा ज़िले के बारसूर नगर में स्थित है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी के नागवंशीय नरेश सोमेश्वर देव के काल का माना जाता है। मंदिर चतुर्भज की आकृति में बत्तीस खम्भों पर खड़ा है।मंदिर में बत्तीस स्तम्भ हैं, जो आठ पंक्तियों में एकदम सावधानी से उकेरे गए बड़े-बड़े केवल पत्थरों के हैं।गर्भगृह के बाहर एकदम सजा-धजा नंदी बैल है, तो अंदर एक अत्यंत सुन्दर, अनदेखा-सा शिवलिंग है।शिलालेख के अनुसार दिन रविवार फाल्गुन शुक्ल द्वादश शक संवत 1130 जिसके अनुसार 1209 ई इस मंदिर का निर्माण काल है। मंदिर के खर्च एवं रखरखाव के लिये केरामरूका ग्राम दान में दिया गया था। इस कार्य में मंत्री मांडलिक सोमराज, सचिव दामोदर नायक, मेंटमा नायक, चंचना पेगाड़ा, द्वारपाल सोमीनायक, गुडापुरऐरपा रेडडी, विलुचुदला प्रभु, प्रकोटा कोमा नायक गवाह के रूप में उपस्थित थे। यह षिलालेख वर्तमान में नागपुर के संग्रहालय में सुरक्षित है।यहां के दो शिवालय में राजा और रानी शिव की अलग-अलग आराधना करते थे। दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिर में बत्तीस स्तम्भ हैं, जो आठ पंक्तियों में एकदम सावधानी से उकेरे गए बड़े-बड़े केवल पत्थरों के हैं। गर्भगृह के बाहर एकदम सजा-धजा नंदी बैल है, तो अंदर एक अत्यंत सुन्दर, अनदेखा-सा शिवलिंग है।

शिवलिंग पत्थर का बना हुआ है और वह एक बड़े से मैकेनिकल सिस्टम पर टिका हुआ है। जैसे पानी के गिरने से पनचक्की घूमती है, वैसे ही ये शिवलिंग भी घूमता है। यानि की कई सौ सालों से इसे घुमाया जा रहा है और ये घूम रहा है। यह शिवलिंग बिना आवाज़ के, बिना किसी घर्षण के, पूरा घूमता है।किवदंती है कि राजा बलि से तीन पग जमीन मांगने के बाद भगवान विष्णु के वामन अवतार ने उसे पाताल में पहुंचा दिया था। इसके बाद बलि पुत्र बाणासूर ने दंडकारण्य वनांचल में बाणासूरा नाम नई राजधानी बसाई थी। श्रीकृष्ण के पुत्र अनिरुद्घ के बाणासूरा प्रवेश के बाद से यहां का पतन शुरू हुआ। इस मंदिर की छत्तीसगढ़ में एक पावन तीर्थस्थान के रूप में अत्यधिक मान्यता है। मुख्यतः यह मंदिर सर्वव्यापी शिवजी की उपस्थिति और अपनी प्राचीन शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है।इस मंदिर का धार्मिक ही नहीं वरन ऐतिहासिक महत्त्व भी है, इसी कारण यह मंदिर यहाँ के प्राचीन स्मारकों में से एक है और छत्तीसगढ़ के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष 2003 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था।यहां स्थित नंदी के कान में प्रार्थना करने से मनौती पूर्ण होती है। राजधानी से दूरी 395 किलोमीटर, विशेषता यहां विश्व की तीसरी सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा है। बारसूर का बत्तीसा मंदिर(Battisa Mandir) बस्तर के सभी मंदिरों में अपना विशिश्ट स्थान रखता है। बारसूर नागकालीन प्राचीन मंदिरों के लिये पुरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है। यहां के मंदिरों की स्थापत्य कला बस्तर के अन्य मंदिरों से श्रेश्ठ है। बारसूर का यह युगल शिवालय बस्तर के सभी शिवालय में अपनी अलग पहचान रखता है।





</description><guid>4354</guid><pubDate>25-Sep-2024 4:50:56 pm</pubDate></item><item><title>भगवान परशुराम से युद्ध हारकर इस पर्वत की चोटी पर अकेले बैठे हैं गणपति बड़ी मुश्किल से होते हैं लोगों को दर्शन</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4277</link><description>बैलाडिला,ढोलकल गणेश जिला दंतेवाड़ा में बैलाडिला पहाड़ी में 3000 फीट ऊंचा एक सुंदर स्थान है। माना जाता है कि भगवान गणेश की 3 फीट सुंदर पत्थर की
 मूर्ति 10 वीं और 11 वीं शताब्दी के बीच नागा वंश के दौरान बनाई गई थी, यह साइट का मुख्य आकर्षण है। जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से 13 किमी दूर स्थित, यह
 जगह प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग है, और उन लोगों के लिए जो हरे पहाड़ियों के बीच ट्रेक करना पसंद करते हैं।भारत के मंदिर एक तो बहुत ज्यादा खूबसूरत हैं,
 जिन्हें देखकर आपका दिल खुश हो जाता है। वहीं इन मंदिरों से ऐसी-ऐसी कहानी जुड़ी हैं, जिन पर यकीन करना मुश्किल है। बिल्कुल ऐसा ही एक मंदिर भगवान
 गणेश का, जो घने जंगल के बीच एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है। इस पहाड़ पर गणपति बप्पा अकेले विराजमान है। इनके दर्शन के लिए जाना भी आसान नहीं है।
दरअसल, भगवान गणेश का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में ढोलकल पहाड़ी के ऊपर स्थित है, जोकि रायपुर से महज 350 किमी
 दूर पड़ता है।गणेश जी का मंदिर समुद्र तल से 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां का रास्ता बहुत ही ज्यादा मुश्किल है।
ऐसा कहा जाता है कि बप्पा का यह मंदिर करीबन 1 हजार साल पुराना है, जहां उनकी प्रतिमा ढोलक के आकार की है। यही वजह है कि इस
 पहाड़ी को ढोलकल पहाड़ी और ढोलकल गणपति के नाम से पुकारा जाता है।इस मंदिर भगवान गणेश की जो प्रतिमा विराजमान है, उसमें वह अपने ऊपरी दाएं
 हाथ में फरसा और ऊपरी बाएं हाथ में अपना टूटा हुआ दांत पकड़े हुए हैं। वहीं निचले दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में मोदक हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस पर्वत
 पर भगवान परशुराम और गणपति बप्पा के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। युद्ध का सबसे बड़ा कारण यह था कि भगवान परशुराम ने महादेव की तपस्या से बहुत
 अधिक शक्ति प्राप्त की थी।ऐसे में जब वह महादेव को धन्यवाद देने के लिए कैलाश जा रहे थे, तो गणपति बप्पा ने उन्हें इसी पर्वत पर रोका था, जिसके बाद
 परशुराम के हाथ से किए गए परशुप्रहार से बप्पा का एक दांत आधा टूट गया। इसी घटना के बाद से बप्पा की एक आधा दंत और दूसरे पूरे दांत वाली मूर्ति की पूजा
 होती है।जिस पहाड़ की चोटी पर बप्पा का यह मंदिर स्थित है, वहां पहुंचने के लिए आपको 5 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करनी पड़ेगी। इस यात्रा के दौरान
 आपको घने जंगल-बड़े-बड़े झरने, पुराने पेड़ और ऊंची चट्टानें देखने को मिलेंगी। हालांकि, इसके बाद भी ढोलकल शिखर पर विराजे गणपति के दर्शन करने के
 लिए बड़ी संख्या में लोग आते हैं।वैसे आपको बता दें कि इस प्राचीन मंदिर की खोज 1934 में एक विदेशी भूगोलवेत्ता ने की थी, जिसके बाद 2012 में दो पत्रकार
 ट्रैकिंग करते हुए वहां पहुंचे थे और उन्होंने इस मंदिर की तस्वीरें वायरल कर दी थीं। इस घटना के बाद यहां लोगों का आना-जाना बढ़ गया। हालांकि, साल 2017 में
 भगवान गणेश की मूर्ति के साथ छेड़छाड़ करने की वारदात भी सामने आई थी।
दरअसल, कुछ असामाजिक तत्वों ने भगवान की मूर्ति को नीचे खाई में फेंक दिया था, जिसके बाद प्रशासन ने ड्रोन कैमरे की मदद से मूर्ति को ढूंढा और उसे फिर से स्थापित किया।</description><guid>4277</guid><pubDate>23-Sep-2024 3:01:01 pm</pubDate></item><item><title>यह है भारत का इकलौता काष्ठ स्तम्भ किरारी काष्ठ स्तम्भ</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4196</link><description>छत्तीसगढ़,किरारी काष्ठस्तम्भभारत में अनेक स्थानों से शिलालेख एवं स्तम्भ लेख प्राप्त हुए हौ जिनसे भारत के स्वर्णिम इतिहास के बारे में जानकारी प्राप्त होती है, परंतु सम्पूर्ण भारतवर्ष में केवल एक काष्ठ स्तम्भ ( लकड़ी का खंभा)प्राप्त हुआ है। यह काष्ठ स्तम्भ छत्तीसगढ़ के वर्तमान सक्ती जिले के मालखरौदा तहसील के किरारी गांव से प्राप्त हुआ है, जिस वजह से इसेकिरारी काष्ठस्तम्भकहते है। यहभारत का इकलौता काष्ठस्तंभ हैजिसकीखोज वर्ष 1921में की गई थी।


किरारी काष्ठ स्तम्भ की खोज अप्रैल, 1921 में हीराबांध तालाब से हुई थी। वर्ष 1921 में तालाब के सुख जाने पर खाद के लिए तालाब के मिट्टी को निकालने के दौरान इस स्तम्भ की प्राप्ति हुई। लेकिन तालाब से निकलने पर यह स्तम्भ सुख गया, जिस वजह से इसमे लिखित अभिलेख खराब हो गया। गांव वालों ने इसे वापस पानी मे डालना ही सही समझा, परंतुगांव के पुरोहित श्री लक्ष्मी प्रसाद उपाध्याय ने इस स्तम्भ की उपयोगिता को समझते हुए औरस्तम्भ में उत्कीर्ण अक्षरों की कागज में एक प्रतिलिपि बना ली।


यह सातवाहन कालीन अभिलेख है। इस स्तम्भ की ऊंचाई 13 फ़ीट 9 इंच थी। स्तम्भ के ऊपरी हिस्से में कलश था(1 फीट 2इंच), जो एक सकरे गर्दन से शेष स्तम्भ से जुड़ा हुआ था। बाद में कलश वाले हिस्से को शेष स्तम्भ से काट दिया गया, जो वर्तमान में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में सुरक्षित है। यह स्तम्भ बीजा-साल की लकड़ी का बना है, अभिलेख की भाषा सातवाहन कालीन प्राकृत तथा लिपि ब्राम्ही है।


लेख अब काफी नष्ट हो चुका है इसमें अनेक शासकीय अधिकारियों के नाम और पदनाम उल्लेखित हैं।पदनामों में से बहुतेक का उल्लेख कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी मिलता है।


उदाहरण के लिए


    वीरपालित और चिरगोहक नमक नागररक्षी(कोतवाल)
    वामदेय नामक सेनापति
    खिपत्ति नामक प्रतिहार(दोवरिक)
    नागवंशीय हेअसि नामक गणक(लेखपाल)
    घरिक नामक गृहपति
    असाधिक नामक भाण्डागारिक(संग्रहागार का अधिकारी) हस्त्यरोह,अश्वारोह, पादमलिक(पुरोहित या पंडा)रथिक,
    महानसिक(रसोई संबंधी प्रबंध करने वाला),
    हस्तिपक, धावक(आगे-आगे दौड़ने वाला),
    सौगंधक ( शपथ दिलाने वाला ), गोमांडलिक, यानशालायुधगारिक, प्लवीथिदपालिक, लेखहारक( राजकीय दस्तावेजों को संरक्षित करने वाला),
    कुलपुत्रक (गृह निर्माण करने वाला राज मिस्त्री/अभियंता )
    महासेनानी ( सेना का सर्वोच्च अधिकारी)।




इन पदाधिकारियों का एक साथ इस लेख में उल्लेख होने से अनुमान किया जा सकता है कि प्रस्तुत स्तम्भ अवश्य ही किसी बड़े समारोह जैसे कि यज्ञ के आयोजन के अवसर पर खड़ा किया गया था और उस आयोजन को करने वाला राजा शक्तिशाली रहा होगा। इस वजह से इसे यज्ञ स्तम्भ भी कहा जाता है।


किरारी काष्ठ स्तम्भ के अभिलेख का सर्वप्रथम अध्ययन डॉ हीरानंद शास्त्री ने किया। यह अध्ययन एपिग्राफिका इंडिका (1925-26) में प्रकाशित कराया गया था बाद मेंबालचंद जैन ने उत्कीर्ण लेख में इसका देवनागरी में प्रकाशन वर्ष 1961 में किया।</description><guid>4196</guid><pubDate>21-Sep-2024 12:07:09 pm</pubDate></item><item><title>जंगल में चुपके से बजरंगबली को दुग्ध स्नान कराती थी गौ-माता दूधाधारी मठ</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4169</link><description>रायपुर छत्तीसगढ़ प्रदेश सिर्फ लोक कला संस्कृति ही नहीं, ऐतिहासिक धरोहर के लिए भी पहचाना जाता है. राजधानी रायपुर में कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जिसका सम्बन्ध इतिहास और मान्यताओं से जुड़ा हुआ है. दूधाधारी मठ छत्तीसगढ़ रायपुर के प्रसिद्ध हिंदू धार्मिक स्थलों में से एक है. यह मठ अपने इतिहास और शानदार स्थापत्य कला के लिए भी पहचाना जाता है. कहा जाता है कि यह मठ 550 साल पुराना है. मठ के महंत बलभद्र दास हनुमानजी के परम भक्त थे.

इतने साल पुराना है ये मंदिर
दूधाधारी मठ के निर्मल दास वैष्णव ने बताया कि राजधानी का दूधाधारी मठ लगभग साढ़े पांच सौ वर्ष पुराना है. यहां पहले घनघोर जंगल हुआ करता था. जंगल में स्वामी बलभद्र दास जी महाराज कुटी बनाकर आश्रम में तपस्या कर रहे थे. तपस्या करते-करते इस स्थान को विकसित किया. स्वामी बलभद्र दास के बारे बताया जाता है कि उन्होंने जीवन भर दूध का आहार लिया था. दूध का आहार लेने के कारण इस स्थान का नाम दूधाहारी पड़ा, फिर दूधाहारी बोलचाल की भाषा में दूधाधारी हो गया. तब से इस स्थान को दूधाधारी मठ के नाम से जाना जाता है. यहां के प्रथम आचार्य बलभद्र दास जी थे. दूधाधारी मठ में भगवान बालाजी संकटमोचन विराजित हैं.
पहले से बड़ी प्रतीत होती है मूर्ति
मठ में सदियों से स्थापित हनुमानजी के मूर्ति भी चमत्कारी है. जो लोग वर्षों से इसे देखते आ रहे हैं, उनका कहना है कि हनुमानजी की मूर्ति पहले से बड़ी प्रतीत होती है. दूधाधारी मठ में हनुमानजी की स्थापना के पूर्व से विराजित है. जहां के जंगल में हनुमानजी विराजित थे, वहां गौ माता दुग्ध स्नान कराती थी और स्नान कराकर चली जाती थी. इस घटना को स्वामी बलभद्र दास महाराज ने देखा और हनुमानजी की सेवा प्रारंभ की. बलभद्र दास जी महाराज ने हनुमानजी की सेवा करते-करते इस स्थान को विकसित किया. आज की स्थिति में हजारों भक्त इस ऐतिहासिक मठ में आते हैं और दर्शन कर लाभ उठाते हैं.</description><guid>4169</guid><pubDate>20-Sep-2024 3:13:18 pm</pubDate></item><item><title>जशपुर के अनोखे नागलोक की कहानी</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4167</link><description>तपकरा,आम तौर पर सांप का नाम लेने के साथ ही बदन में सिहरन पैदा हो जाती है और अगर सामने नाग दिख जाए तो ऐसा लगता है कि मानों मौत से साक्षात्कार हो गया। ज्यादातर मामलों में या तो सांप को मार दिया जाता है या तो फिर सांप लोगों को डस लेता है। कुल मिलाकर यहां के निवासियों की जिंदगी हमेशा सांपों के आसपास की गुजरती है।

दरअसल, बात जशपुर की हो रही है जिसे लोग आज भी 'नागलोक' के नाम से जानते हैं। आदिवासी बहुल और जंगलों से घिरा जशपुर में प्राय: हर इलाके में सांप मिल जाते हैं, लेकिन फरसाबहार से लेकर तपकरा तक इलाका ऐसा है जिसे आज भी लोग नागलोक से जानते हैं। यहां पर कुल 40 प्रजाति के सांप हैं जिनमें करीब 4-5 प्रजातियों के सर्प विषधर हैं। ऐसे में बारिश में इस इलाके नें नंगे चलना का मतलब मौत को दावत देना है।

आज से दो साल पहले तक औसतन 100-150 लोगों की मौत सांप या किसी विषैले जीव के काटने से हो जाती थी, अभी ये आंकड़ा 50-70 है। परंतु क्या ये काफी है कि किसी भी स्थान को सांपलोक या नागलोक रूप में घोषित करने के लिए।

सांपलोक या नागलोक
जशपुर में सांप के काटने से मरने वालो सर्वाधिक मौत करैत सांप के काटने से होती है। फिर भी लोग इसे करैत लोक या सांपलोक के बजाए नागलोक कहना पसंद करते हैं, ऐसा क्यों? ये सवाल किसी के भी जेहन में उठ सकता है।

नागलोक के पीछे का रहस्य
जंगलों से घिरा जशपुर का तपकरा इलाका आज भी काफी पिछड़ा हुआ है, जिसके कारण किंवदंतियों, परीकथाओं और जादुई तिलस्म जैसे तमाम चीजों का बोलबाला है। तपकरा के ठीक बीचों-बीच जंगल को चीरते हुए इव नदी बहती है। एक छोड़ पर प्राचीन महादेव मंदिर है तो करीब दूसरी ओर पहाड़ पर करीब 400 मीटर दूर गुफा का द्वार, जिसे कोतेविरा या कपाट द्वार या पातालद्वार या पाताल गेट कहा जाता है। फिलहाल इस गुफा के गेट पर एक बड़ा सी चट्टान है जिसके कारण गुफा बंद है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो भी इस गुफा में गया, वो आज तक नहीं लौटा।

आस्था का केंद्र है रहस्यमय शिव मंदिर
मंदिर के बारे में तमाम तरह की जातक कथाएं प्रचलित है। कोई इसे द्वापर युग से जोड़ता है तो कोई इसे त्रेता युग से।

राम और शूर्पनखा करते थे शिव की पूजा
स्थानीय लोगों की माने तो जशपुर का समूचा इलाका दंडकारण्य वन में पड़ता था। यहां पर रावण की बहन शूर्पनखा का राज चलता था। वो शिव भक्त थीं, चिरैय डांड नामक जगह पर वो भगवान महादेव की पूजा करती थी। वनवास के दौरान भगवान श्रीरामचंद्र सीता माता के साथ इव नदी के किनारे बने मंदिर में पूजा करते थे। पाताल द्वार से नागराज आकर तब तक उन लोगों की रक्षा करते थे। रामचंद्र के जाने के बाद भी शिव लिंग के पास नाग पहरा देते रहते थे। कई लोगों ने यहां तक बताया कि मंदिर में उन्होंने शिवलिंग के पास काले नाग को देखा है।

पाताल द्वार का महाभारत कनेक्शन
लोक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में जब भीम छोटे थे, तब दुर्योधन ने षडयंत्र कर धोखे से उन्हें जहरीली खीर खिला दी थी। इसके बाद मरनासन्न भीम को नदी में बहा दिया। कहते हैं कि मृत अवस्था में भीम बहते- बहते इव नदी में आ गए थे, जहां पर नदी में स्नान कर रही नाग कन्याओं की नजर उस पर पड़ गई। इसके बाद नागलोक ले जाकर इलाज के बाद भीम को नई जिंदगी मिली और लौटते समय भीम को हजार हाथियों का बल नागलोक के राजा से मिला। इसके बाद से इंसानों के लिए नागलोक में प्रवेश वर्जित कर दिया गया। तब से आज तक जो भी गया, वापस नहीं लौटा।

करैत के कारण ज्यादा मौतें
स्थानीय पत्रकार का कहना है कि बाहरी शख्स के लिए नागलोक या करैतलोक या सांपलोक पर बहस और विवाद हो सकता है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए नहीं। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान स्थापित कर चुके अमानुलहक का कहना है कि यहां पर लोगों की मौत सांप काटने से इसलिए होती है क्योंकि वे नंगे चलते हैं और जमीन पर सोते हैं। सांप कोल्ड ब्लडेड होते हैं। बारिश के समय में उनके बिलों में पानी भर जाता है। कई बार गर्मी पाने के लिए सांप सोते हुए व्यक्ति के बिस्तर पर आ जाता है। ऐसे में पैर या हाथ लग जाने के कारण सांप उसे काट लेता है।

संस्थान के सांप पकड़नेवाले विशेषज्ञ कि उन्होंने जशपुर के कुनकुरी से लेकर तपकरा तक की यात्रा कर वहां की जमीन देखी है। मिट्टी भुरभुरी और पथरीली है। पहले जंगल काफी घना था, लेकिन अब काफी कट गए, ऐसे में सांप जाए तो जाए कहां। रही बाद करैत के डसने की तो ये अक्सर सुप्त सांपों की कैटेगेरी में आते हैं और रात को जब लोगों को डसते हैं तब पता भी नहीं चलता है। यदि कोबरा डसता है तो वो फुंफकारता है और लोग डर जाते हैं। इसलिए करैत काटने से ज्यादा मौतें होती हैं।</description><guid>4167</guid><pubDate>20-Sep-2024 2:58:05 pm</pubDate></item><item><title>रायगढ़ राज्य में न्याय व्यवस्था का संचालन</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=4086</link><description>छत्तीसगढ़,रायगढ़ राज्य में न्याय व्यवस्था का संचालन:- जिसे आज हम रायगढ़ और खरसिया तहसील का क्षेत्र कहते हैं वह विलय समझौते यानि राज्य के विलय के पूर्व रायगढ़ राज्य का क्षेत्र कहलाता था और रायगढ़ स्टेट कहलाता था। रायगढ़ से ही कलकत्ता से मुम्बई लाइन तक रेलवे की मुख्य शाखा गुजरती थी जो आज भी गुजर रही है और इसका उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम क्षेत्र क्रमशः जबलपुर, जशपुर, धरमजयगढ़, सारंगढ़ स्टेट तथा झारसुगुड़ा, संबलपुर की सीमाओं से सटा हुआ था। मध्यप्रदेश के पूर्वांचल छत्तीसगढ़ में खूबसूरत प्रकृति की गोद में बसे रायगढ़ राज्य की नींव करीब 500 वर्ष पूर्व महाराजा मदन सिंह ने रखी थी। बाद में राजा भूपदेव सिंह, चक्रधर सिंह और ललित सिंह ने गद्दी संभाली। संगीत सम्राट चक्रधर सिंह जी का जन्म संवत 1862 में गणेश चतुर्थी के दिन हुआ था। इसी क्रम में प्रतिवर्ष गणेश मेला का आयोजन होता है और इसी दौरान चक्रधर समारोह के नाम से संगीत महोत्सव का आयोजन होता है। रायगढ़ की तहसीलें धरमजयगढ़, घरघोड़ा, सारंगढ़, खरसिया और रायगढ़ हैं। 1854 में भोंसला राज्य के समाप्त होने और ब्रिटिश शासन के प्रत्यक्ष प्रभाव में आने के बाद, यहाँ की रियासतों और ज़मींदारियों के साथ पिछले समझौतों और चार्टर आदि को नवीनीकृत किया गया। 1864 से, छत्तीसगढ़ की ज़मींदारियों के दो विभाग बनाए गए। पहले वर्ग में शामिल ज़मींदारियों को रियासतों का दर्जा दिया गया और उनके शासकों को राजा या शासक प्रमुख कहा जाता था और दूसरे वर्ग के ज़मींदारों को ज़मींदार कहा जाता था।


प्रारंभ में, छत्तीसगढ़ के अंतर्गत स्थित 14 रियासतों में से, कालाहांडी, पटना रायखोल, बामरा और सोनपुर उड़िया भाषी क्षेत्र थे और बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, छुईखदान, खैरागढ़, कवर्धा, रायगढ़, सक्ती, सारंगढ़ हिंदी भाषी रियासतें थीं। सन् 1905 में छत्तीसगढ़ की पांच उड़िया भाषी रियासतों को बंगाल प्रांत में स्थानांतरित कर दिया गया तथा पांच हिंदी भाषी रियासतों छोटा नागपुर, सरगुजा, जशपुर, उदयपुर, कोरिया एवं चंगाबखार को मध्य प्रांत एवं बरार में शामिल कर लिया गया। इस तरह चौदह रियासतें एक बार फिर छत्तीसगढ़ में रह गईं। रायगढ़ राज्य का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार श्री भूपदेव सिंह आत्मज धनश्याम सिंह जो 1894 में न्यायापालिका प्रमुख बने थे, उन्हें तीस शासन काल में राजा बहादुर की उपाधि दी गई थी तथा वे ही रायगढ़ राज्य का प्रशासन संचालित करते थे। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके छोटे पुत्र चक्रधर सिंह रायगढ़ के राजा साहब बने। जिनकी मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र राजा ललित कुमार सिंह रायगढ़ राज्य के अंतिम राजा बने। जिनका राज्य भारत सरकार ने विलय समझौते के माध्यम से अपने में मिला लिया था। रायगढ़ राज्य में उच्च न्याय संबंधी व्यवस्थाओं के लिए बहुत पहले ही पॉलिटिकल एजेंट कोर्ट एवं बाद में एक उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी, जिसे कॉमन उच्च न्यायालय के नाम से जाना जाता है। उक्त न्यायालय में रजिस्ट्रार के पद की स्थापना के साथ ही दीवान साहब ने न्यायाधीश के रूप में उच्च न्यायालय की अधिकारिता शक्तियों का प्रयोग किया।


उच्च न्यायालय की स्थापना की पृष्ठभूमि - पूर्वी राज्य एजेन्सी में सम्मिलित उड़ीसा एवं छत्तीसगढ़ रियासतों की न्याय व्यवस्था में समानता लाने के मुख्य उद्देश्य से कॉमन उच्च न्यायालय की स्थापना की गई थी। एजेन्सी की सम्पूर्ण 39 रियासतों के लिए एक ही कॉमन उच्च न्यायालय की स्थापना को रेजिडेंट सी.पी. हेकॉक ने 25 जनवरी 1943 को सबसे सस्ता एवं प्रभावी बताया था। वायसराय ने भारत सचिव को न्यायाधीशों की योग्यता एवं संख्या भी भेजी थी - निर्धारित योग्यता के अनुसार। ऐसा व्यक्ति जिसने ब्रिटिश प्रांतों में कम से कम 5 वर्ष तक जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो या ब्रिटिश भारत के उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश या इंग्लैंड या उत्तरी आयरलैंड में 15 वर्ष का अनुभव रखने वाला बैरिस्टर जिसने भारत के उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक बैरिस्टर के रूप में कार्य किया हो। उसे इसका न्यायाधीश बनने के लिए योग्य माना गया। प्रारंभ में सामान्य उच्च न्यायालय के लिए न्यायाधीशों की संख्या तीन निर्धारित की गई थी, किन्तु बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर चार कर दी गई। जिनमें से एक मुख्य न्यायाधीश तथा शेष उप-न्यायाधीश होते थे। नागपुर उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश मुहम्मद इस्माइल को प्रथम मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात जब उन्हें भारत सरकार ने भारत का मुख्य आयुक्त बनाकर पाकिस्तान भेजा तो उनके रिक्त पद पर एम.बी. नियोगी को नियुक्त किया गया। इसी प्रकार कनिष्ठ न्यायाधीश के पद पर क्रमशः रायबहादुर राजकृष्ण तथा अमूल्य कुमारी भादुड़ी को नियुक्त किया गया, किन्तु बाद में जब उनके पद भी रिक्त हो गए तो उनके स्थान पर डॉ. जे.एन. बनर्जी भोलानाथ राय तथा रायबहादुर चिंतामणि आचार्य को ११ मार्च १९४६ को नियुक्त किया गया। यहां भी स्पष्ट है कि उपर्युक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति रेजीडेंट के अनुमोदन पर नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा की गई थी। न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते  उन्हें नियंत्रण बोर्ड द्वारा निर्धारित वेतन एवं भत्ते प्राप्त होते थे। वेतन एवं भत्ते की राशि प्रत्येक राज्य द्वारा दी जाती थी।</description><guid>4086</guid><pubDate>17-Sep-2024 5:06:27 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ का सबसे प्राचीन मंदिर </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=2124</link><description>लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से १२० कि॰मी॰ तथा संस्कारधानी शिवरीनारायण से ३ कि॰मी॰ की दूरी पर बसे खरौद नगर में स्थित है। यह नगर प्राचीन छत्तीसगढ़ के पाँच ललित कला केन्द्रों में से एक हैं और मोक्षदायी नगर माना जाने के कारण इसे छत्तीसगढ़ की काशी भी कहा जाता है।
</description><guid>2124</guid><pubDate>08-May-2024 3:08:51 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ का सबसे पुराना नाम क्या है?</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=2122</link><description>प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाता था। सभी ऐतिहासिक शिलालेख, साहित्यिक और विदेशी यात्रियों के लेखों में, इस क्षेत्र को दक्षिण कोशल कहा गया है। आधिकारिक दस्तावेज में छत्तीसगढ़ का प्रथम प्रयोग १७९५ में हुआ था।
राज्य में वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 3 करोड़ 22 लाख है, इसलिए ओबीसी 41 प्रतिशत के साथ सर्वाधिक हो गए हैं।
राज्य में वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 3 करोड़ 22 लाख है, इसलिए ओबीसी 41 प्रतिशत के साथ सर्वाधिक हो गए हैं।</description><guid>2122</guid><pubDate>08-May-2024 2:58:12 pm</pubDate></item><item><title> क्रिसमिस पर्व विशेष लेख</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=1557</link><description>छत्तीसगढ़ का महागिरजाघर कुनकुरी
प्रभु ईसा मसीह के जन्मदिवस का महापर्व क्रिसमस कटु अनुभव, दुर्व्यवहार को भूलाकर क्षमा करने की सीख देता है। मानव समुदाय को अटूट बंधन में बांधे रखने की शक्ति दयालुता में ही है का पाठ पढ़ाता है। सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ाने वाले इस महापर्व के दिन चर्च में बड़ा ही उत्साहजनक वातावरण निर्मित होता है।
    प्रभु ईसा मसीह के प्रति प्रबल आस्था का गढ़ छत्तीसगढ़ भी है।यहां एशिया महाद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा चर्च कुनकुरी में निर्मित है।प्राकृतिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत मनमोहक जिला जशपुर कुनकुरी के इस चर्च को महागिरजाघर (कैथेड्रल) के नाम से ख्याति मिली हुई है।उल्लेखनीय है कि एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा चर्च सुमी बैप्टिस्ट नागालैंड में है। 
   सैलानियों के आकर्षण का केंद्र यह महागिरजाघर श्वेत संगमरमर के उपयोग से बना है ।इसके भीतर दस हजार श्रद्धालुओं की बैठने की क्षमता है।अर्ध गोलाकार इस पवित्र भवन को रोजरी की महारानी चर्चके नाम से भी प्रसिद्धि प्राप्त है।

वास्तु कला का यह बेजोड़ नमूना है।इसकी नींव वर्ष 1962 में रखी गई थी।बेल्जियम के आर्किटेक्ट जे एम कार्डिनल कार्सी ने इसके नक्शा को बनाया था।एक ही बीम पर बने इस पवित्र भवन को अद्भुत नक्शा के अनुरूप आकार देने में लगभग सत्रह साल लग गए थे।ऊंचाई से देखने पर इसकी बनावट ऐसे दिखाई देती है, मानो ईश्वर दोनों हाथ फैलाए हुए भक्तजनों को अपनी और आमंत्रित कर रहे हैं। 27 अक्टूबर 1979 वह ऐतिहासिक दिन है,जब इस महागिरजाघर को श्रद्धालुओं के लिए लोकार्पित किया गया था।
प्रारंभ में यह गिरजाघर घने जंगलों से घिरा हुआ था। समय के साथ प्रगति की गति ने आज इस स्थल को सर्व सुविधायुक्त बना दिया है।कैथोलिक समुदाय के धर्मग्रंथों में सात अंक को अति महत्वपूर्ण माना गया है। इसी के अनुपालन में ईसाई समुदाय के सात संस्कार यथा - पाप स्वीकार,रोगी सेवा,पुरोहित संस्कार,प्रसाद ग्रहण, बपतिस्मा,विवाह संस्कार और सुदृढ़ संस्कार के चिन्ह रंगीन कांच के चित्रो में यहां अंकित हैं।ग्रेनाइट पत्थर से भी निर्मित हैं।  
      इसी मान्यता के अनुरूप गिरजाघर में सात छत,सात खूबसूरत दरवाजे बनाए गए हैं।प्रभु यीशु के संदेशों का सुंदर चित्रण लेखन इसकी छतों और दीवारों पर भी दर्ज है।गर्व की बात कि क्षेत्रीय आदिवासी मजदूरों के श्रम से इस विशालकाय गिरजाघर का निर्माण हुआ है।हिंदू समुदाय में जैसे चार धामों का,मुस्लिम समुदाय में जैसे मक्का का महत्व है।वैसा ही महत्व क्रिश्चियन समुदाय में कुनकुरी के इस गिरजाघर का है।
    प्रभू ईसा मसीह के जन्मोत्सव में गूंजते कैरोल गीत से समूचा विश्व माह दिसम्बर में झूम उठता है।ऐसे मनोहारी समय में यहां की हरियाली,क्रिसमस ट्री की सजावट और शांत वातावरण से तन मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।

 भारत के इस सर्वाधिक बड़े गिरजाघर की ओर से स्कूल,कालेज,अस्पताल का संचालन सहित दीन दुखियों का दुःख दर्द दूर करने जनहितकारी कार्यक्रम किए जाते हैं।जहां बिना किसी भेदभाव के शिक्षा चिकित्सा सेवाओं का लाभ जरूरतमंदों को दिया जाता है।परमपिता परमेश्वर ने ऐसे ही परहितकारी कार्यों का निष्पादन निस्वार्थ भाव से करने के लिए मनुष्य की उत्पत्ति सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में की है।
विजय मिश्रा 'अमित'
पूर्व अति महाप्रबंधक (जन)
एम 8 सेक्टर 2' अग्रोहा सोसायटी पोआ- सुंदर नगर रायपुर (छग)492013
मोबा 989312310</description><guid>1557</guid><pubDate>24-Dec-2023 2:53:40 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ का खास: बेजोड़ मोहरिया पंचराम देवदास </title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=1547</link><description>स्मृतिशेष :24दिसम्बर विशेष
हमारे छत्तीसगढ़ की माटी ,पर्व,गीत संगीत में लोकवाद्य मोहरी रचा बसा है। छत्तीसगढ़ के गांड़ा समाज का यह खास वाद्य यंत्र हे।अनादि काल से मोहरी,गुदुम, दमऊ,दफड़ा और निसान नामक वाद्यों का चलन छत्तीसगढ़ में है। इन्हें सामूहिक रूप से गांड़ा बाजा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के गांड़ा समाज के जीविकोपार्जन का बड़ा सहारा रहा है।आज भी गांव गंवई में विवाहोत्सव,दिवाली पर तथा विशिष्ट जनों के आगमन पर इसे बजाते स्वागत किया जाता है। छत्तीसगढ़ के इन लोकवाद्यों में जोरदार मोहरिया रहे हैं पंचराम देवदास।मोहरी बजाने में माहिर पंचराम का निधन वर्ष 2017 में 24 दिसम्बर को हुआ था।वर्ष 1950 में 14 अगस्त के दिन इनका जन्म राजनादगांव के निकट आमगांव में हुआ। इन्हें इनके पिताश्री जीवन लाल और मां फूल बाई के दुलार के साथ ही मोहरी का सानिध्य भी मिला।
    पंचराम के मोहरी वादन से छत्तीसगढ़ राज्य उत्सव का अगाज होता था। छत्तीसगढ़ में मेला-मड़ई के साथ ही दिल्ली,मुम्बई,इलाहाबाद- उज्जैन महाकुंभ, अंतरराष्ट्रीय शिल्प महोत्सव सूरजकुंड हरियाणा,जमेशदपुर महोत्सव,अंतरराज्यीय संस्कृति महोत्सव भुनेश्वर,जैसे अनेक बहुप्रतिष्ठित संस्कृति जगार मेला में पंचराम की मोहरी की धुन श्रोताओं दर्शकों के कान में शहद जैसी मिठास घोलती रही है। छत्तीसगढ़ का बहुप्रतिष्ठित सम्मान रामचंद्र देशमुख बहुमत सम्मान सहित अनेक पुरस्कार,सम्मान से वे अलंकृत हुए हैं।
 आज उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण करते हुए मेरी कलम लिख रही है वर्ष 1999 की बातें।उस जमाने में लोकगीतों की रिकार्डिंग,कैसेट हेतु छत्तीसगढ़ के कलाकार जबलपुर,कटक के स्टुडियो ही जाते थे।
   इसी तरह गीतों की रिकॉर्डिंग हेतु सुप्रसिद्ध लोकगायिका कविता-विवेक वासनिक अपने दल के साथ मेरे घर जबलपुर में ही ठहरे थे, चूंकि मैं भी अनेक छत्तीसगढ़ी लोकमंचों में इनके साथ एक्टिंग एंकरिंग करता था। मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल जबलपुर में जनसंपर्क अधिकारी की नियुक्ति उपरांत लोकमंचों से कुछ दूरियां बढ़ीं पर रिश्तों में प्रगाढ़ता बनी रही।
      मेरे घर पर ही कविता- विवेक के साथ लगातार एक सप्ताह तक संगीतकार खुमान साव,गिरिजा सिन्हा(बेंजो),पंचराम देवदास (मोहरी),राकेश साहू (तबला), प्रभु सिन्हा, महादेव हिरवानी,भगवती साहू रूके और 'धरोहर -धनी- धुन' आडियो कैसेट के गीतों की रिकार्डिंग कार्य को पूरा करवाए।
      रिकार्डेड गीतों में बजे पंचराम देवदास की मोहरी देशी घी की तरह पृथक पहचान बना गई। पंचराम की मोहरी का मैं मुरीद हो गया था। एक दिन घर की छत पर धूप सेंकते पंचराम जी से मैंने पूछा-लोक वाद्य मोहरी से आपकी मित्रता का किस्सा क्या है जी?मेरा सवाल सुनकर वे हाथ पैर में सरसों तेल लगाते हुए पंचराम बोले- महराज जी,मोहरी साथ हमारी मितानी खानदानी है। दरअसल हमारे गांड़ा समाज के ए पुरखौती बाजा है।इसे बजाने की कला जन्मजात मेरे लहू में समाहित है।
   बात आगे बढ़ाते मैने फिर सवाल किया-आपके बालपन की सखी मोहरी की बनावट कैसे, किससे होती है?इसके जवाब में अपने निकट रखे मोहरी को द दिखाते हुए वे बोल - ये देखिए,मोहरी एक हाथ लम्बी होती है। शास्त्रीय वादकों का मानना है इस प्राचीन लोकवाद्य का ही परिष्कृत रूप शहनाई है। मोहरी की बनावट को तीन भागों में बांट सकते हैं।पोंगा जैसे बनावट इसके अग्रभाग को 'फेर' कहते हैं।आजकल यह लकड़ी के अलावा कांसा,पीतल,स्टील से बनने लगा है।फेर के पीछे अर्थात मोहरी के मध्य भाग को 'डांडी' कहते हैं। डांडी को ठोस बांस से बनाते हैं,जिसमें बासुरी की तरह सात आठ छिद्र होते हैं।मोहरी बजाते समय इन्हीं छिद्रों पर उंगलियां सुरों की उत्पत्ति की जाती है। डांडी से जुड़ा मोहरी का सबसे पिछला भाग 'सोंसी' कहलाता है।सोंसी के साथ ही नारियल खोटली से निर्मित गोल ढक्कन की तरह 'फिलफिली' जुड़ी होती है,जो कि मोहरिया के फूंकते समय मुंह से निकलती हवा को सीधे सोंसी में भेजने में सहायक होती है।
    मोहरी से निकलती कोयली जैसी मीठी स्पष्ट आवाज का राज पूछने पर पंचराम जी बताए- मोहरी से मीठे सुर निकालने में ताल पेंड़ की पत्ती की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।ताड़पत्ते के छोटे से टुकड़े को मोहरी की सोंसी में फंसाया जाता है।मोहरिया लोग एक छोटे डिब्बे में ताड़पत्र के टुकड़ों को सुरक्षित रखते हैं।इसे मोहरी में फंसाने के पहले पानी में में भिगोकर रखा जाता है।जिससे कोमल होकर ताड़पत्र टूटता नहीं और मधुर आवाज भी निकालता है।
 छत्तीसगढ़ी लोक संगीत में मोहरी की उपादेयता पूछने पर पंचराम बोले - सिंदूर बिना सुहागिन जैसी स्थिति मोहरी बिना लोकगीत संगीत की होगी।मेरी मोहरी के सुर में सजे ऐसे गीतों का मजा आकाशवाणी,दूरदर्शन अऊ छत्तीसगढ़ की नामी संस्था चंदैनी गोंदा,सोनहा बिहान,लोकनाट्य कारी, अनुराग धारा के गीतों में ले सकते हैं।
  तभी मेरी श्रीमती जी गरम गरम चिला और धनिया -मिरची-टमाटर की महकती हुई चटनी लेकर आ गईं।उनका स्वाद लेते मैंने सवाल किया-पंचराम भईया,
छत्तीसगढ़ के लुप्त होते लोकवाद्यों में मोहरी की भी गिनती होने लगी है।मोहरी को बचाने हेतु नये जमाने के मोहरियों के लिए आपकी भूमिका क्या है?
   इस सवाल के जवाब में पंचराम बोले-सौ फीसदी चिंता की बात उठाए हैं महराज जी।आज के बच्चे असल को छोंड़कर नकल के पीछे भागते दिख रहे हैं। नई पीढ़ी परम्पराओं पुस्तैनी कलाओं से जुड़े इस मंशा को लिए हुए मैं नये बच्चों को फोकट में मोहरी बजाना सिखाता हूं।सौ से भी ज्यादा मोहरी बना कर बांट चुका हूं।नये मोहरियों से कहता हूं मोहरी एक फूंकनी वाद्य है।इसे बजाने के लिए दमदार सांस जरूरी है,अतः बीड़ी चोंगी सिगरेट से दूर रहें।लगे दम तो मिटे गम का वहम मन में न पालें।बात चीत करते करते बारा बज गए थे।वे लोग खा पीकर रिकार्डिंग हेतु स्टूडियो चले गए।
  उस घड़ी को याद करते हुएआज भी कहीं मोहरी सुनता हूं तो देवदास जी की मोहरी में डूबा मन कहता है-नाम गुम जाएगा,चेहरा ए बदल जाएगा, मेरी आवाज ही मेरी पहचान है, गर याद रहे।
विजय मिश्रा 'अमित'
वरिष्ठ लोक रंगकर्मी
एम 8 सेक्टर 2,अग्रोहा सोसायटी,सुंदर नगर रायपुर (छग)492013
9893123310</description><guid>1547</guid><pubDate>22-Dec-2023 5:46:15 pm</pubDate></item><item><title>आदिवासी परंपरा: छत्तीसगढ़ के भंगाराव देवी के न्यायालय में देवी-देवताओं को सज़ा मिलनी है</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=953</link><description>

नगरी:धमतरी जिले की सिहावा क्षेत्र की वनांचल और आदिवासी बाहुल्य समुदाय की ऐसा क्षेत्र, जहां कभी बस्तर राजघराने का सीमा हुआ करता था। मगर परिवर्तन की दौर में वर्तमान में,यह क्षेत्र बस्तर से अलग हो चुका है।बहरहाल इस इलाके के आदिवासी समुदाय,आज भी बस्तर राज परिवार की देव परंपरा प्रतिवर्ष निभाते आ रहे हैं।जिस तरह से इंसान अगर असंवैधानिक कार्य करते हैं और उनका परिणाम उन्हें न्यायिक हिरासत से गुजरना पड़ता है उसी प्रकार,ऐसा पारंपारिक देव अदालत जहां इष्ट देवी देवताओं के ग़लत की सज़ा देवी देवताओं के न्यायाधीश जिन्हें भंगाराव माई के नाम से लोग मानते हैं उनकी न्यायालय में खड़ा होना पड़ता है,हमारे और आपके लिए ये बात भले ही चौंकाने वाली बात हो,मगर छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के आदिवासी समाज के लिए ये बात पुरखों से चली आ रही है। भंगाराव देवी के प्रमुख गायता घुटकले निवासी प्रफुल्ल सामरथ और स्थानीय देव गायता चैतराम मरकाम लिखमा निवासी ने बताया आदिवासी समाज की रुढ़िजन्य देवप्रथा परंपरा अनुसार कुलदेवी-देवताओं को, भी अपने आप को साबित करना पड़ता है वो भी बाकायदा अदालत लगाकर। ये अनोखी अदालत भंगाराव माई के दरबार में लगती है
भंगाराव माई का दरबार धमतरी जिले के कुर्सीघाट बोराई मार्ग में भादो के शुरुआती महीने में लगते हैं।बस्तर राजघराने से चली आ रहा सदियों पुराने,इस दरबार को देवी-देवताओं के न्यायालय के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भंगाराव की मान्यता के बिना देव सीमा में स्थापित कोई भी देवी-देवता कार्य नहीं कर सकते।
हर साल भादों के महीने में आदिवासी देवी-देवताओं के न्यायधीश भंगा राव माई का जात्रा होता है.इस वर्ष भी बड़े ही धूमधाम से बाजागाजा के साथ लिखमा घुटकल से विधि विधान से कुल देवता की सेवा अर्जी उपरांत देवी देवताओं का आगमन भंगाराव देव ठाना जात्रा में सम्मिलित हुए। जहां दर्शन और मनोकामनाएं को लेकर कई हजारों की संख्या में धमतरी,उड़ीसा और बस्तर के श्रद्धालु जात्रा में पहुंचे।
चर्चा के दौरान देव परिवार के प्रमुख महरू राम मरकाम,पुनाराम सामरथ,दुलार सामरथ,आरके सामरथ, गंगाराम सामरथ,उदेराम सामरथ,मंगऊ राम सामरथ,बीजूराम मरकाम,फूलसिंग साक्षी,राम सामरथ,जगत सामरथ,मिश्रीलाल नेताम,ईश्वर नेताम,मनोज साक्षी जिनकी अगुवाई में जात्रा की विधि विधान पुर्वक सेवा अर्जी से देव कार्य का,परंपरा अनुसार शुभारंभ हुई।जात्रा के दौरान सोलह परगना सिहावा,बीस कोस बस्तर और सात पाली उड़ीसा के देवी-देवता जात्रा में सम्मिलित हुए।वहीं इस देवजात्रा में महिलाओं का शामिल होना परंपरा अनुसार वर्जित है।





आदिवासी समाज की पुरातन मान्यता है उनकी अपनी देव पद्धति है अपनी देवी-देवताओं की सेवा अर्जी परंपरा अनुसार करते हैं अपनी हर समस्याओं को उनके सामने रखते हैं,ताकि उन पर किसी तरह की विपत्ती न आए मगर जब देवी-देवता उनकी समस्याओं पर खरा नहीं उतरते, यूं कहें कि अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर पाते या असफ़ल हो जाते हैं तो गायता पुजारी व ग्रामीण जनों की शिकायत के आधार पर भंगाराव माई के अदालत में देव को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।जहां इनकी सुनवाई होती है, अगर आरोप लगते हैं या दोषी पाए जाते हैं तो अराध्य देवी देवताओं को भी सज़ा मिलती है. आदिवासी समाज की परेशानियां दूर नहीं कर पाते तो उन्हें दोषी माना जाता है।भंगाराव की उपस्थिति में कई गांवों से आए,देवी-देवताओं की एक-एक कर देव प्रथा अनुसार देव प्रथा अनुसार शिनाख़्त किया जाता हैं.
फिर देव परिसर में ही अदालत लगती है. देवी-देवताओं पर लगने वाले आरोपों की गंभीरता से सुनवाई होती है. आरोपी पक्ष की ओर से दलील पेश करने सिरहा, पुजारी,गायता,माझी, पटेल आदि ग्राम के प्रमुख भी उपस्थित होते है। दोनों पक्षों की गंभीरता से सुनवाई के पश्चात आरोप सिद्ध होने पर तत्काल फ़ैसला भी सुनाया जाता है,देव परिसर के कुछ दूरी पर एक नाला है.इसे आम भाषा में कारागार भी कह सकते है। दोष साबित होने पर देवी-देवताओं के लाट,बैरंग,आंगा,डोली आदि को इसी नाले में रवानगी कर दिया जाता है इस तरह से देवी-देवताओं को सजा दी जाती है.





और इस जात्रा के पश्चात ही आदिवासी समाज की प्रमुख पर्व नवाखाई मनाने का दिन तिथि देव आदेशानुसार निर्धारित होती है।
क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य मनोज साक्षी क्या कहते हैं जात्रा को लेकर,, आदिवासी समुदाय वास्तव में प्रकृति और पुरखा पेन शक्ति के पूजक हैं और भंगाराव देवी की जात्रा को अनादिकाल से यह देव परंपरा को सिहावा परगना,उड़ीसा और बस्तर के आदिवासी समुदाय निभाते आ रहे हैं।













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</description><guid>953</guid><pubDate>10-Sep-2023 9:12:42 am</pubDate></item><item><title>हबीब साहब की 100वीं जयंती: छत्तीसगढ़ के महान कलाकार को सलाम, सीएम बघेल ने किया नमन</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=880</link><description>

रायपुर: छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी, लोक-कला, लोक-रंग से अगर दुनिया के कई देश परिचित हैं तो उसकी एक बड़ी वजह हबीब साहब रहे हैं. वही हबीब साहब जिनकी आज 100वीं जयंती है. आज विशेष मौके पर एक बार फिर हबीब साहब को सुरता(याद) कर रहे हैं. एक ऐसे महान कलाकार जिन्होंने छत्तीसगढ़ की धरा में जन्म लिया और यहां की मिट्टी की खुशबू को देश-दुनिया में पहुंचाने का काम किया. अपनी अद्भुत नाट्य शैली के लिए विश्व विख्यात रहे हबीब तनवीर रायपुर के रहने वाले थे. प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हबीब तनवीर जी की 100वीं जयंती पर उन्हें नमन किया है.





सीएम भूपेश बघेल ने ट्वीट कर लिखा है कि छत्तीसगढ़ के गौरव, अंचल की कला को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व. हबीब तनवीर जी की जयंती पर हम सब उनका पावन स्मरण करते हैं. राज्य शासन द्वारा रंगकर्म के क्षेत्र में हबीब तनवीर जी के योगदानों को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए उनके नाम से पुरस्कार प्रदान करने की भी घोषणा हमने की है. हबीब तनवीर जी को कई अवार्ड एवं वर्ष 2002 में पद्म विभूषण सम्मान मिला. वे 1972 से 1978 तक राज्यसभा सांसद भी रहे. उनका नाटक चरणदास चोर, एडिनवर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टीवल (1982) में पुरस्कृत होने वाला ये पहला भारतीय नाटक गया. उनकी प्रमुख कृतियों में आगरा बाजार (1954) चरणदास चोर (1975) शामिल है.





हबीब तनवीर जी का जीवन परिचय
हबीब साहब का जन्म 1 सितंबर 1923 को बैजनाथ पारा में हुआ था. तनवीर साहब ने स्कूली शिक्षा रायपुर से और स्नातक की उपाधि नागपुर से ली. इसके बाद उन्होने एमए की पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पूरी की. बचपन से कला के प्रति आकर्षित रहने वाले हबीब साहब ने एमए की शिक्षा लेने के बाद खुद को पूरी तरह से थियेटर के लिए समर्पित कर दिया. उन्होंने भारत के साथ-साथ कई देशों की यात्राएं की और दुनिया भर के रंगकर्म का अध्ययन किया. नाट्य विधा की बारीकियों को समझने के बाद हबीब साहब ने भोपाल में नया थियेटर के नाम से नाट्य संस्था की स्थापना की.
नया थियेटर के जरिए उन्होंने नाट्य यात्रा प्रारंभ की. इस यात्रा के दौरान उन्होंने यह महसूस किया कि छत्तीसगढ़ की लोक-कला, लोक-रंग को दुनिया के सामने भव्य मंचों में लाया जाए. लिहाजा उन्होंने प्रदेश भर से नाचा कलाकारों को इक्कट्ठा किया. उन्होंने लोक कलाकारों को नया थियेटर में शामिल कर अपनी नई पारी की शुरुआत की. इस दौरान उन्होने मिट्टी की गाड़ी नाटक का निर्देशन किया. यह संस्कृत में लिखित नाटक का छत्तीसगढ़ी रूपांतरण था, जो उनका पहला महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी नाटक बना.
बताते हैं कि नाचा कलाकारों को साथ लेकर जब हबीब साहब देश-दुनिया की यात्रा पर निकले तो दुनिया भर के नाट्य प्रेमी प्राचीन लोक नाट्य शैली को देखकर दंग रह गए. जिस तरह से एक जौहरी पत्थर को तराशकर उसे चमकदार हीरा बना देता है, कुछ इसी तरह से हबीब साहब ने नाचा के कलाकारों को तराशकर उन्हें नाट्य मंचों का हीरा बनाने का काम किया था. उन्होने दुनिया को छत्तीसगढ़ की रंग-परंपरा, छत्तीसगढ़ के रंगकर्मियों की कलाकारी और यहां की समृद्ध संस्कृति को दिखाया.





तनवीर साहब के जीवन के बीच एक महत्वपूर्ण जानकारी जिसे साझा करना जरूरी है वह है दाऊ मंदराजी. छत्तीसगढ़ी नाचा-गम्मत में जहां दाऊ मंदराजी, रामचंद्र देशमुख का नाम लिया जाता है, वहीं नाचा-गम्मत को नाचा कलाकारों के साथ उसे रंगकर्म के रूप में विश्व विख्यात बनाने का श्रेय हबीब तनवीर को जाता है. हबीब तनवीर ने आगरा बाजार, मोर नाँव दामाद गांव के नाँव ससुराल, चरनदास चोर, बहादुर कलारिन, राजरक्त से जैसे कई चर्चित नाटको का निर्देशन किया. ये वो नाटक थे जिसने छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ के कलाकारों की पहचान पूरी दुनिया में कराई.
छत्तीसगढ़ी भाषा में निर्मित चरन दास चोर नाटक इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरी दुनिया ने जाना की छत्तीसगढ़ की नाचा रंग-परंपरा कितना समृद्ध और विशाल है. चरन दास चोर में चोर की भूमिका अदा करने वाले स्वर्गीय पद्मश्री गोविंद राम निर्मलकर को रंगकर्मियों के बीच एक बड़े मंचीय नायक के रूप में उभार दिया.
हबीब साहब के कुछ प्रमुख छत्तीसगढ़ी नाटक
चरनदास चोर, बहादुर कलारिन, मोर नाँव दमाद, गाँव के नाँव ससुराल, मिट्टी की गाड़ी
छत्तीसगढ़ी लोक-गीतों, पहनावा का विशेष प्रयोग





हबीब साहब के नाटकों की एक सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने अपने अधिकतर नाटकों में छत्तीसगढ़ी लोक गीतों और पहनावा का प्रयोग किया. छत्तीसगढ़ी नाटकों में यह प्रयोग तो देखने में मिलता ही है, हिंदी के कई नाटकों में भी उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों का समावेश किया. हबीब साहब के नाटकों में पंथी, पंडवानी, भरथरी, गौरा-गौरी, जस गीतों का विशेष आकर्षण देखने को मिलता है. इसके साथ ही उन्होंने करमा और ददरिया के कई पारंपरिक गीतों को अपने नाटकों में भरपूर स्थान दिया है.
वास्तव में हबीब साहब रंग-मंच के महानायक थे. ऐसे महान कलाकार को आज हम उनके जन्मदिवस पर सादर नमन करते हैं.










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</description><guid>880</guid><pubDate>01-Sep-2023 3:42:19 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ में अनोखा मंदिर : भाई-बहन का एक साथ दर्शन प्रतिबंधित, जानिए इसकी पीछे कहानी</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=803</link><description>
इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 30-31 अगस्त 2023 यानी इन दोनों दिन मनाया जाएगा. ये त्योहार भाई-बहन के रिश्ते के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. रक्षाबंधन में बहनें अपने भाई को राखी बांधती हैं. इस दिन भाई-बहन धार्मिक स्थलों के दर्शन भगवान का आशीर्वाद लेते हैं और राखी का पर्व मनाते हैं.
रक्षाबंधन के इस मौके पर लोग कुछ खास जगहों पर जा सकते हैं, लेकिन भारत में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां भाई-बहन को एक साथ कभी नहीं जाना चाहिए. इस मंदिर में भाई-बहन के साथ दर्शन और पूजा करने पर प्रतिबंध है. मंदिर से जुड़ी कुछ धार्मिक मान्यताएं हैं और कथाएं हैं. अगर आप भी रक्षाबंधन के मौके पर कहीं सफर की योजना बना रहे हैं या आम दिनों में भी भाई-बहन साथ कहीं घूमने जा रहे हैं तो इस मंदिर में एक साथ प्रवेश न करें. 





छत्तीसगढ़ में है अनोखा मंदिर
बता दें कि छत्तीसगढ़ में एक अनोखा मंदिर है, जहां भाई बहन का एक साथ प्रवेश करना वर्जित है. राज्य के बलौदाबाजार के कसडोल के पास नारायणपुर गांव में स्थित मंदिर नारायणपुर के शिव मंदिर के नाम पर मशहूर है. इस मंदिर में भाई बहन को साथ दर्शन के लिए नहीं जाना चाहिए.
मंदिर का इतिहास और नक्काशी
इस मंदिर का निर्माण 7वीं से 8वीं शताब्दी के बीच कलचुरी शासकों ने कराया था. मंदिर लाल-काले बलुआ पत्थरों से बनाया गया है. मंदिर के स्तंभों पर कई सुंदर आकृतियां बनी हुई हैं. मंदिर 16 स्तंभों पर टिका हुआ है. हर स्तंभ पर खूबसूरत नक्काशी की गई है. मंदिर में छोटा सा संग्रहालय है, जहां खुदाई में मिली मूर्तियों को रखा गया है. 
भाई बहन क्यों मंदिर में साथ नहीं जा सकते
यह एकमात्र मंदिर है, जहां भाई-बहन के एक साथ जाने पर पाबंदी है. इसके पीछे एक कहानी है. मंदिर का निर्माण रात के समय हुआ करता था. मंदिर छ महीने में तैयार किया गया था. मंदिर जनजाति समुदाय से जुड़ा है. शिल्पी नारायण रात के वक्त निर्वस्त्र होकर मंदिर का निर्माण करते थे.
मंदिर निर्माण करने वाले शिल्पी नारायण की पत्नी उन्हें खाना देने आती थीं. लेकिन एक शाम नारायण की पत्नी की जगह बहन खाना लेकर निर्माण स्थल पर आ गईं. क्योंकि शिल्पी नारायण नग्न होकर मंदिर निर्माण करते थे, बहन को देखकर उन्हें शर्मिंदगी महसूस हुई और उन्होंने मंदिर के शिखर से कूदकर अपनी जान दे दी. इस कारण भाई-बहन मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं. इसके अलावा मंदिर अपने स्थापत्य कला के लिए मशहूर है. यहां की मुख्य दीवारों पर उकेरी गई हस्तमैथुन की मूर्तियों के कारण भी भाई-बहन यहां साथ आने में असहज महसूस करते हैं.








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</description><guid>803</guid><pubDate>25-Aug-2023 12:14:17 pm</pubDate></item><item><title>चमत्कारी हनुमान मंदिर: अंबिकापुर के लमगांव में बढ़ती हुई मूर्ति के साथ आश्चर्यजनक कहानी</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=775</link><description>
रायपुर: अंबिकापुर के लुंड्रा विकासखंड के लमगांव में अद्भुत चमत्कारी हनुमान मंदिर है. ग्रामीण बताते हैं कि यहां स्थापित बजरंगबली की प्रतिमा अपने आप बढ़ती जा रही है. इस अद्भुत चमत्कार के चर्चे दूर-दूर तक पहुंच रहे हैं. इस वजह से लोग लमगांव में हनुमान जी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर में हर शनिवार और मंगलवार को काफी भीड़ होती है, लोगों का मानना है की यहां सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है, साथ ही हर शनिवार को भंडारे का आयोजन भी किया जाता है.
80 वर्ष पहले यहां एक पेड़ के नीचे लगभग एक फीट से छोटी बजरंगबली की प्रतिमा दिखी थी. तभी से इस पेड़ के नीचे बजरंगबली की पूजा-अर्चना की जाने लगी. बाद में लोगों ने इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1995 में कराया था. पेड़ तो सूख गया, लेकिन बजरंगबली आज भी उसी स्थान पर विराजमान हैं. सबसे ख़ास बात यह की यहाँ वर्ष 2002 से 24 घंटे रामचरित मानस का पाठ किया जा रहा है. साथ ही अखंड दीप प्रज्वलित है.
बजरंगबली की अद्भुत महिमा तब लोगों को अचरज में डाल देती है जब उन्हें पता चलता है की एक फीट छोटी मूर्ति इतने वर्षों में बढ़ कर साढ़े तीन फीट से भी अधिक ऊंची हो चुकी है. बजरंगबली की मूर्ति की लंबाई लगातार बढ़ रही है.
हनुमान मंदिर, लमगांव से जुड़ी रोचक कहानी
लमगांव स्थित स्वयं प्रकट हनुमान जी की मूर्ति से जुड़ी कहानी बहुत ही दिलचस्प है, ऐसा माना जाता है की बाबा त्रिवेणी नाम के एक व्यक्ति थे जिनके सपने में हनुमान जी ने दर्शन दिए और कहा की वे एक पेड़ में फसें हुए उन्हें बाहर निकालें, ऐसा सपना उनको कई बार उसके बाद बाबा त्रिवेणी जी उस पेड़ के पास गए और उस पेड़ को काटकर देखा तो दंग रह गए, सच में वहाँ हनुमान जी की मूर्ति थी.
ऐसे पहुंच सकते हैं हनुमान मंदिर
अगर आप भी लमगांव के बजरंगबली के दर्शन करना चाहते हैं तो रायगढ़-अंबिकापुर मार्ग पर अंबिकापुर से 17 किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे पर मंदिर का पहला द्वार आपको दिख जाएगा. इस द्वार से आगे बढ़ने पर लगभग दो किलोमीटर अंदर जाने के बाद इस हनुमान मंदिर में पहुंचा जा सकता है.







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</description><guid>775</guid><pubDate>22-Aug-2023 2:48:54 pm</pubDate></item><item><title>रायपुर की 100 साल पुरानी मिठाई दुकान: ऐसी मिठाई के दीवाने जो बाजार में भी मशहूर हैं</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=753</link><description>

ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा, जिसे मीठाई पसंद न हो. मीठाई हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है. मीठाई के बिना कोई भी त्यौहार पूरा नहीं होता. हर शुभ काम की शुरुआत मीठे से ही होती है. हर शहर में आपको एक ऐसी मिठाई की दुकान मिल ही जाएगी जिसकी एक खास मिठाई का नाम सबकी जुबान पर चढ़ा होता है. अपने शहर रायपुर में ऐसी ही एक दुकान है, जिसका नाम है रामजी हलवाई की दुकान. रायपुर फेमस फ़ूड में आज हम इसी दुकान की फेमस बालूशाही के बारे में बताएंगे.
इस दुकान में हर समय आपको गरमागरम बालूशाही मिल जाएगी. इतना ही नहीं, अगर आप इस रास्ते से गुजर जाएंगे तो गर्मा गरम बालूशाही की खुशबू आपको अपनी ओर खींच लेगी और आप यहां रुकने को मजबूर हो ही जाएंगे.





आज भी सबसे कम कीमत की मिठाई
आज के समय में बाजार की किसी भी मिठाई की कीमत 400 रुपये से कम नहीं है. लेकिन रामजी हलवाई की दुकान की बालूशाही का दाम सिर्फ 140 रुपये किलो है. इसकी फेमस होने की एक वजह दाम भी है. वैसे तो आपको यहां हमेशा ही भीड़ मिलेगी. लेकिन त्योहारों में तो यहां का नजारा देखने लायक होता है. आम दिनों में भी लोग इंतजार करते हैं.
सभी ग्राहक एक समान
इस दुकान की एक और सबसे अच्छी बात ये है कि यहां अपने सभी ग्राहक को एक समान माना जाते हैं. यानी यहां कोई 20 रुपये की बालूशाही भी लेने आया हो या फिर 20 किलो बालूशाही लेने आया हो, सभी ग्राहक इनके लिए एक समान हैं. यदि कम मात्रा में लेने वाला ग्राहक पहले से आया है और ज्यादा मात्रा में लेने वाला बाद में आया है, तो भी यहां पहले आए ग्राहक को ही पहले बालूशाही दी जाती है.
100 साल से स्वाद कायम
दुकान संचालक विनोद अग्रवाल बताते हैं कि 100 साल पहले उनके पूर्वजों ने इस दुकान की नींव रखी थी. वे चौथी पीढ़ी से हैं. 100 सालों में दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, पर इनकी बालूशाही का स्वाद जस का तस है. गद्दी भी नहीं बदली है. विनोद अग्रवाल कहते हैं कि बालूशाही पसंद करने वाले दूर-दूर से आते हैं. यहां तक कि रायपुर छत्तीसगढ़ के अलावा विदेशों में भी उनकी बालूशाही के दीवाने है. कई ऐसे परिवार हैं जो अपने रिश्तेदारों के यहां विदेश जाते हैं, तो यहां की बालूशाही पैक करवा के ले जाते हैं.
यहां के ये आइटम भी फेमस
यहां पर आपको कई तहर की मिठाई, जैसे- गुलाब जामुन, बूंद लड्डू, नारियल बर्फी, बेसन बर्फी, जलेबी के अलावा आपको मिक्सचर की कई वेराइटी मिल जाएगी. एक और सबसे अच्छी बात ये है कि आपको सारे आइटम अपनी आंखों के सामने बनते हुए दिखेंगे. यहां सफाई का भी बहुत ख्याल रखा जाता है.








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</description><guid>753</guid><pubDate>20-Aug-2023 12:08:16 pm</pubDate></item><item><title>भगवान राम द्वारा भोलेनाथ की पूजा की गई छत्तीसगढ़ का विशेष मंदिर, जानें इसकी विशेषता</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=459</link><description>

आरंग: आज सावन का दूसरा सोमवार है. मंदिरों का नगर के नाम से प्रसिद्ध आरंग शिवमय हो गया है. यहां के शिवालयों में सुबह से ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी है. यहां के सबसे प्राचीन मंदिरो में से एक बाबा बागेश्वरनाथ मंदिर में भी भक्तों की भारी भीड़ देखी गई. यहां पूरे सावन माह के दौरान रोजाना रुद्राभिषेक किया जा रहा है.
कहा जाता है कि वनवास के समय भगवान श्री राम ने बाबा बागेश्वर नाथ मंदिर में रुक कर भोलेनाथ की पूजा की थी. वनवास के दौरान भगवान श्री राम के यहां श्री बागेश्वर नाथ बाबा मंदिर में रुकने के प्रमाण से यह लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. बता दें कि वाल्मीकि रामायण में इस मंदिर का उल्लेख राम वन गमन पथ के रूप में मिलता है. सांस्कृतिक शोध संस्थान व्यास नई दिल्ली के शोध कर्ता डॉ. रामअवतार शर्मा के अनुसार भी श्रीराम जी वनवास के दौरान जिन 249 स्थानों में रुके थे उनमें से एक आरंग के श्री बागेश्वर नाथ मंदिर भी है, जो की उनकी पुस्तक में जंह जंह राम चरण चलि जाहि में 98 नंबर पर उल्लेखित है.
शिवलिंग पर पड़ती है सूर्य की पहली किरण
108 खंभों से निर्मित इस मंदिर में 24 खंभे गर्भगृह मंडप के लिए है. शेष 84 खंभों से मंदिर के चारों ओर चार दीवारी बनाई गई है. यह मंदिर पूर्वाभिमुख है. यहां के श्रद्धालु बताते हैं कि सूर्योदय की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह में भोलेनाथ की मूर्ति पर सीधा पड़ती है. यहां शिवलिंग का विशेष श्रृंगार के साथ पूजा अर्चना प्राख्यात है. इस मार्ग से जब भी जगतगुरु शंकराचार्य गुजरते हैं, तो भगवान भोलेनाथ का दर्शन करने अवश्य पहुंचते हैं.











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</description><guid>459</guid><pubDate>17-Jul-2023 12:32:24 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ में विशेष महत्व हमर पहला त्यौहार के, बैल और हल की होती है पूजा, युवा गेड़ी चढ़कर लेते है आनंद</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=458</link><description>

छत्तीसगढ़ के हर निवासी के लिए हरेली त्यौहार बहुत खास है। क्योंकि हरेली छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्यौहार परंपरागत् रूप से उत्साह के साथ मनाया जाता है।
इस दिन किसान खेती-किसानी में उपयोग आने वाले कृषि यंत्रों की पूजा करते हैं गांव में बच्चे और युवा गेड़ी का आनंद लेते हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर लोक महत्व के इस पर्व पर सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया गया है।
इससे छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक पर्वों की महत्ता भी बढ़ गई है। लोक संस्कृति इस पर्व में अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने के लिए छत्तीसगढ़िया ओलंपिक की भी शुरूआत की जा रही है।
जाने महत्व
दरसअल, हरेली छत्तीसगढ़ के लिए बहुत ही खास है और हमारे अन्नदाताओं के असीम मेहनत का सम्मान है। ग्रामीण इस पर्व को बड़े ही उत्साह के साथ मानते है। भगवान को खुश करने छत्तीसगढ़िया व्यंजन बना कर भोग लगाया जाता हैं।
वहीं, इस मौसम में फैलने वाले बैक्टीरीया-वायरस और मौसमी कीड़े मकोड़े से बचने घरों के दरवाजे पर नीम की पत्तीयां लगाई जाती हैं, जो हवा को शुद्ध करती है। गांव में पौनी-पसारी जैसे राऊत व बैगा हर घर के दरवाजे पर नीम की डाली खींचते हैं। गांव में लोहार अनिष्ट की आशंका को दूर करने के लिए चौखट में कील लगाते हैं। यह परम्परा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है।
किसान भाई इस दिन पशुधन आदि को नहला-धुला कर पूजा करते हैं। गेहूं आटे को गंथ कर गोल-गोल बनाकर अरंडी या खम्हार पेड़ के पत्ते में लपेटकर गोधन को औषधि खिलाते हैं। ताकि गोधन को विभिन्न रोगों से बचाया जा सके।
औजारों की पूजा
वर्षा ऋतु में धरती हरा चादर ओड़ लेती है। वातावरण चारों ओर हरा-भरा नजर आने लगता है। हरेली पर्व आते तक खरीफ फसल आदि की खेती-किसानी का कार्य लगभग हो जाता है। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धोकर, धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ का चीला भ लगाया जाता है। गांव के ठाकुर देव की पूजा की जाती है और उनको नारियल अर्पण किया जाता है।
बच्चे और युवा गेड़ी चढ़कर लेते है आनंद
हरेली तिहार पर बच्चे और युवा गेड़ी चढ़कर आनंद लेते है। गड़ी बांस से बनाई जाती है। दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाई जाती है। एक और बांस के टुकड़ों को बीच से फाड़कर उन्हें दो भागों में बांटा जाता है। फिर नारियल बूच की रस्सी से बांधकर दो खांचे बनाए जाते है।
यह खांचे पैर दान का काम करता है जिसे लंबाई में पहले कांटे गए दो बांसों में लगाई गई कील के ऊपर बांध दिया जाता है।गेड़ी पर चलते समय रच- रच की ध्वनि निकलती हैं, जो वातावरण को संगीतमय बना देती है।
छत्तीसगढ़ी व्यंजन से पूजा और खेल
लकड़ी से बनी गेड़ी गांव में बारिश के समय कीचड़ आदि से बचाव में भी काफी उपयोगी होती है। गेड़ी से गली का भ्रमण करने का अपना अलग ही आनंद होता है। किसान अपने खेती-किसानी के उपयोग में आने वाले औजार नांगर, कोपर, दतारी, टंगिया, बसुला, कुदारी, सब्बल, गैती आदि की पूजा कर छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुल भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते हैं।
इसके अलावा गेड़ी की पूजा भी की जाती है। शाम को मनोरंजन के लिए गांवो में युवा वर्ग, बच्चे गांव के मैदान में नारियल फेंक, कबड्डी आदि कई तरह के खेल खेलते हैं। बहु-बेटियां सावन झूला, बिल्लस, खो-खो, फुगड़ी आदि खेल का आनंद लेती हैं।













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</description><guid>458</guid><pubDate>17-Jul-2023 12:14:10 pm</pubDate></item><item><title>राजधानी से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भकुर्रा महादेव मंदिर, 3 से 80 फीट तक बढ़ते शिवलिंग की कहानी</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=404</link><description>

गरियाबंद जिला: भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई में बढ़ोतरी की कहानी
गरियाबंद जिला, जो छत्तीसगढ़ की राजधानी से केवल 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, इसमें स्थित है ग्राम मरौदा का वन्यजीवी क्षेत्र, जहां प्राकृतिक शिवलिंग भूतेश्वर महादेव स्थित है। इस शिवलिंग की ऊंचाई की वजह से यह धार्मिक स्थल पूरे विश्व में मशहूर हो रहा है। भकुर्रा महादेव के नाम से भी जाना जाता है, जो अर्धनारीश्वर के स्वरूप में भी प्रसिद्ध है।
शिवलिंग की ऊंचाई को लेकर ग्राम मरौदा के भूतेश्वर महादेव के पुजारी रामांधार का कहना है कि हर सावन मास में कांवड़ियों द्वारा भूतेश्वर महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है। महाशिवरात्रि पर इस शिवलिंग की ऊंचाई की मापदंड की जाती है।
भूतेश्वर महादेव संचालन समिति से जुड़े मनोहर लाल देवांगन ने बताया कि भूतेश्वर महादेव को भकुर्रा महादेव भी कहा जाता है। यह विश्व का पहला ऐसा शिवलिंग हो सकता है, जिसकी ऊंचाई हर साल बढ़ती है। इस स्थान पर 17 गांवों की समिति द्वारा सेवा कार्य संचालित किया जाता है।




भूतेश्वर महादेव की ऊंचाई के विवरण को 1952 में प्रकाशित कल्याण तीर्थांक के पृष्ठ क्रमांक 408 में दर्ज किया गया है। उसमें इस शिवलिंग की 35 फीट की ऊंचाई और 150 फीट का व्यास उल्लेखित है। 1978 में इसकी ऊंचाई को 40 फीट बताया गया है। 1987 में यह 55 फीट बढ़ी और 1994 में थेडोलाइट मशीन के माध्यम से नापने पर इसकी ऊंचाई 62 फीट और व्यास 290 फीट पाया गया। वर्तमान में इस शिवलिंग की ऊंचाई 80 फीट बताई जा रही है।
छत्तीसगढ़ के इतिहास ज्ञानी, डॉ. दीपक शर्मा के मुताबिक, इस शिवलिंग पर छूरा क्षेत्र के जमींदारों ने कभी हाथी पर चढ़कर अभिषेक किया करते थे। शिवलिंग पर एक छोटी सी दरार भी होती है, जिसे कई लोग अर्धनारीश्वर के स्वरूप मानते हैं। मंदिर परिसर में छोटे-छोटे मंदिर भी स्थापित हैं।
पहले यहां नंदी की भकुर्राहट सुनाई देती थी, जिसके कारण इसे भकुर्रा के नाम से जाना जाता है। आजादी से पहले यहां घने जंगल फैला हुआ था। मरौदा गांव में एक लगभग 3 फीट ऊंची पत्थर की शिवालय जैसी चीज थी, जिसे लोगों ने भकुर्रा महादेव के नाम से पुकारा। जब शिवलिंग बढ़ने लगा, तब इसके प्रताप की जानकारी मिली। भकूर्रन के ध्वनि को नंदी का भकुर्राना माना गया। इसके बाद से यहां का नाम भकुर्रा महादेव के रूप में प्रचलित हो गया।








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</description><guid>404</guid><pubDate>10-Jul-2023 5:03:25 pm</pubDate></item><item><title>चिंगरा पगार वाटरफॉल का मनमोहक दृश्य और नजारा मानसून में बढ़ जाती है खूबसूरती</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=388</link><description>

चिंगरा पगार जलप्रपात: मनोहारी दृश्य और आकर्षण से भरपूर पिकनिक स्थल
चिंगरा पगार वाटरफॉल का मनोहारी दृश्य और आकर्षण आपको बेहद पसंद आएगा। यहां लोग अपने पिकनिक के साथ आकर्षक रील्स बनाते नजर आएंगे। रायपुर के आसपास स्थित प्रमुख और श्रेष्ठ पिकनिक स्थलों में इस जलप्रपात का भी नाम होता है।
गरियाबंद जिला पर्यटन के दृष्टिकोण से बहुत समृद्ध है। यहां आपको हर जगह सुंदर पहाड़ियां देखने को मिलेंगी। छत्तीसगढ़ में चित्रकोट और तीर्थगढ़ जलप्रपात जैसे कई जलप्रपात अपनी पहचान बना चुके हैं। आज हम गरियाबंद जिले के चिंगरा पगार जलप्रपात की बात कर रहे हैं, जो अपने मनोहारी दृश्य के कारण लोगों को आकर्षित करता है।
यह जलप्रपात महासमुंद जिले से 64.4 किलोमीटर और रायपुर से 90 किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले में स्थित है। चिंगारा गांव के कारण इसे चिंगारा जलप्रपात के नाम से भी जाना जाता है।
जलप्रपात के साथ एक पिकनिक स्थल भी है
युवाओं के बीच यह वाटरफॉल बहुत लोकप्रिय है। यहां के मनोहारी दृश्य और आकर्षण आपको बेहद पसंद आएंगे। अधिकांश लोग यहां पिकनिक के साथ इंस्टाग्राम पर रील्स बनाते हुए नजर आएंगे। रायपुर के आस-पास स्थित प्रमुख और श्रेष्ठ पिकनिक स्थलों में इस जलप्रपात का भी नाम आता है। यह जलप्रपात एक पिकनिक स्थल भी है। कई लोग इस जगह पर पिकनिक के लिए आते हैं। पानी की उचित व्यवस्था के कारण इस पिकनिक स्थल का प्रशंसा किया जाता है। वाटरफॉल में पिकनिक के लिए सर्वोत्तम स्थान है।
पूरे साल भीड़ रहती है
चिंगरा पगार जलप्रपात बहुत ही सुंदर है और यहां पूरे साल लोगों की भीड़ लगी रहती है। ज्यादातर बारिश के समय इस जगह पर लोगों की भीड़ देखने योग्य होती है। जंगल से आने वाला पानी पहाड़ की ऊंचाई से गिरकर खूबसूरत चिंगरा पगार का निर्माण करता है। इसकी सुंदरता को देखने के लिए बाहर से लोग यहां आते हैं। चिंगरा पगार जलप्रपात तक पहुँचने के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध है। यह सड़क से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और जलप्रपात तक पहुँचने के लिए 500 मीटर पैदल चलना होता है।








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</description><guid>388</guid><pubDate>08-Jul-2023 3:16:23 pm</pubDate></item><item><title>छत्तीसगढ़ में सबसे पहले यहीं माता सीता ने मवई नदी में पखारे थे पांव</title><link>https://dainandini.in//chhattisgarhhistory.php?articleid=172</link><description>माता सीता ने स्थापित की रसोई, यह पुण्य भूमि है सीतामढ़ी हरचौका
छत्तीसगढ़ के लोगों ने सहेजकर रखी हैं भगवान श्रीराम से जुड़ी स्मृतियां
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने रामवनगमन पर्यटन परिपथ विकसित कर इस पुण्यभूमि को संवारने की अनुपम पहल की
 यह छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम का प्रवेश द्वार, माता सीता से संबंधित अनुश्रुति
 रामकथा के अरण्य कांड के अद्भुत सुंदर और अविस्मरणीय स्मृतियों को समेटे हुए है सीतामढ़ी हरचौका
रायपुर, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में सीतामढ़ी हरचौका ऐसी जगह है जहाँ वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम और माता सीता के कदम छत्तीसगढ़ में पड़े थे और यह भूमि पुण्यभूमि हो गई। मवई नदी ने माता सीता के पैर पखारे। वनवास के दौरान अपना आरंभिक समय प्रभु श्रीराम ने यहीं बिताया और माता सीता और भ्राता लक्ष्मण ने उनका साथ निभाया। माता सीता ने यहां रसोई बनाई और इस वनप्रदेश में भगवान श्रीराम की गृहस्थी बसी। भगवान श्रीराम से जुड़े इस पुण्यस्थल के बारे में स्थानीय जनश्रुतियां तो थीं लेकिन श्रद्धालुओं के लिए पर्यटन नक्शे में इस जगह की जानकारी थी।
मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की सरकार ने रामवनगमन पर्यटन परिपथ बनाने की पहल की ताकि यहाँ आने वाले स्थानीय श्रद्धालुओं को भी जरूरी सुविधा मिल सके और देश-विदेश में बसे राम भक्त उन तक पहुंचे। अब यह सुंदर पुण्यस्थली भक्तों के लिए पूरी तरह तैयार है। इसका वैभव और इसका आध्यात्मिक महत्व अब लोगों के लिए सहज उपलब्ध है। भगवान श्रीराम और माता सीता से जुड़ी इस सुंदर पुण्य भूमि की गुफाओं में 17 कक्ष हैं। इस स्थान को हरचौका कहा जाता है और सीता की रसोई के नाम से भी लोग इसे जानते है।
सीतामढ़ी हरचौका - भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास काल का अधिकांश समय दण्डकारण्य में व्यतीत हुआ। वनवास काल में भगवान श्रीराम, पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ जहां-जहां ठहरे, उनके चरण जहां पड़े, ऐसे 75 स्थानों को चिन्हांकित किया गया हैै। इनमें से प्रथम 09 स्थानों को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की शुरुआत छत्तीसगढ़ सरकार ने की है। राम वनगमन पर्यटन परिपथ परियोजना की शुरूआत मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के सीतामढ़ी हरचौका नामक स्थान से होती है। मवई नदी के किनारे स्थित सीतामढ़ी हरचौका, दण्डकारण्य का प्रारंभिक स्थल है, जहां से वनवास काल के दौरान भगवान श्री राम का आगमन छत्तीसगढ़ की धरती पर हुआ था। सीतामढ़ी- हरचौका के पुरातात्विक महत्व को संरक्षित करने के लिए इस परिपथ के प्रमुख स्थलों का पर्यटन तीर्थ के रूप में विकास किया जा रहा है।
शिलाखंड पर भगवान राम के पदचिन्ह
सीतामढ़ी हरचौका में विशाल शिलाखंड स्थित है, जिसे लोग भगवान राम का पद चिन्ह मानते हैं। लोक आस्था और विश्वास के कारण लोग शिलाखंड की पूजा-अर्चना करते है। प्रभु राम के पदचिन्ह का पुरातात्विक महत्व होने के कारण इस पर शोध कार्य भी जारी है।
छत्तीसगढ़ में राम लोक मानस में बसे हैं। यह सुखद संयोग है कि छत्तीसगढ़ में उनसे जुड़े अनेक स्थान हैं जो उनके प्रसंगों को रेखांकित करते हैं। वनवासी राम का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। भगवान राम ने वनगमन के समय हमेशा समाज के वंचित वर्ग को गले लगाया।
पर्यटन तीर्थ के रूप में विकास
 
सीतामढ़ी-हरचौका को लोेक आस्था के केन्द्र के रूप में विकसित करने का कार्य किया जा रहा है। नदी के घाट का सौंदर्यकरण चल रहा है। यहां पर्यटकों के ठहरने के लिए आश्रम भी निर्माणाधीन है और खान-पान की व्यवस्था के लिए कैफेटेरिया भी बनाया जा रहा है। यहां से भगवान राम की 25 फीट ऊंची प्रतिमा भी नजर आएगी।
कैसे पहुंचे सीतामढ़ी हरचौका
राजधानी रायपुर से मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला मुख्यालय मनेन्द्रगढ़ की दूरी लगभग 400 किमी. है और सड़क मार्ग से सीधे हरचौका पहुंच सकते है।
राजधानी रायपुर से यहां पहुंचने के लिए सीधी ट्रेन उपलब्ध है जो बैकुंठपुर रोड स्टेशन तक जाती है। यहां से लगभग 170 किमी. की दूरी पर सीतामढ़ी-हरचौका स्थित है। बैकुंठपुर रोड स्टेशन से सीतामढ़ी- हरचौका जाने के लिए टैक्सी सेवा भी उपलब्ध है।


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सप्ताह भर तक चलने वाले इस महाआयोजन में जहां अखंड राम नाम सप्ताह के मंडप में शहर के मोहल्लों द्वारा टोली के रुप समयबद्ध ढंग से मंडप पर पंहुच कर रामनाम का जाप किया गया वहीं समापन शोभायात्रा के दिन ग्रामीण क्षेत्रों से टोलियों का आगमन एवं लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति समूचे वातावरण को राममय-रामधुन रंग में रंगती हुई नजर आई, इस महाआयोजन मे जन सरोकारों में सदैव आपके साथ के उद्देश्य को अंगीकार करते हुए जहां एक ओर अखंड राम नाम सप्ताह मंडप से The Great BHANDEKAR यू ट्यूब चैनल के माध्यम से TGB मीडिया द्वारा लाईव प्रसारण किया गया,वहीं शोभायात्रा के दिन लगभग 6घंटे निरंतर शोभायात्रा का प्रसारण किया गया,लिंक..............इससे पहले जन्माष्टमी के दिन लगातार 12घंटे श्री अखण्ड रामनाम सप्ताह मंडम मे चलाया गया,जिसके चलते भाटापारा सहित पुरे भारत वर्ष मे लोगों के द्वारा लिंक _____............के माध्यम से इस अनूठे महाआयोजन का आनंद और लाभ उठाया गया, कवरेज प्रसारण के साथ ही TGB मीडिया परिवार द्वारा शोभायात्रा के साथ चल रही टोलियों का सम्मान राधे अंकित गमछा प्रदान कर किया गया, राम सप्ताह मंडप से लेकर शोभायात्रा प्रसारण तक
अमित कुमार की माता श्रीमती सुमित्रा बाई, TGBमीडिया के डायरेक्टर अमित कुमार सहित सीनियर रिपोर्टर मुकेश शर्मा,मीडिया मैनेजर पुष्पा साहू, TGB मीडिया प्रचारक गिरधर गोपाल शर्मा ,रितेश शर्मा पवन यादव, सुमित कुमार, योगेश शर्मा आदि संपूर्ण सक्रियता के साथ बरसते पानी में भी अपने दायित्व निर्वहन में लगे रहे।

झांकियों टोलियों श्रद्धालुओं का दिव्य नजारा, भव्य शोभायात्रा में राममय हुआ भाटापारा,
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अखंड राम नाम सप्ताह के समापन शोभायात्रा में उमड़ा जनसैलाब
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धार्मिक आयोजनों की नगरी भाटापारा में अखंड राम नाम सप्ताह भाटापारा की पहचान के रुप में जानी जाती है, 83वर्ष पूर्व क्षेत्र में पड़े भीषण अकाल और एक महात्मा की प्रेरणा से नगरवासियों द्वारा किये गये अखंड राम नाम जाप के फलस्वरूप क्षेत्र को दुर्भिक्ष से मिली मुक्ति के स्मरण में मनाये जाने वाले सप्तदिवसीय अखंड राम नाम सप्ताह के 84वें समापन शोभायात्रा में माहौल जन उत्साह से सराबोर नजर आया।
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रथयात्रा के साथ लगभग सौ टोली
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13अगस्त से प्रारंभ हुए अखंड राम नाम सप्ताह का समापन हवन पूजन के उपरांत दोपहर लगभग दो बजे भगवान राम की भव्य शोभायात्रा के रुप में प्रारंभ हुई, जो नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरती हुई दूसरे दिन प्रात राम सप्ताह के मंडप में वापस पंहुची,रथयात्रा मार्ग में जहां एक ओर सैकडों की संख्या में आकर्षक वेशभूषा विविध झांकियों के साथ रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम की धुन में नृत्य करती हुई ग्रामीण क्षेत्रों से आयी भजन मंडलियां थी,वहीं रथ के साथ रथयात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं का विशाल जन समूह भी भगवान का दर्शन करते हुए शोभायात्रा के साथ चल रही थीं।
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जगह जगह स्वागत पंडाल
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कोरोनाकाल के अवरोध के बाद हो रहे इस महा आयोजन में जनमानस का उत्साह और बढ़ चढ़ कर भागीदारी स्पष्ट रुप से नजर आ रही थी,टोलियों के स्वागत एवं श्रद्धालुओं को सुविधा प्रदान करने के लिए शहर के विभिन्न राजनैतिक दलों एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा रथयात्रा मार्ग पर जगह जगह पंडाल लगाये गये थे, और उनके द्वारा जहां एक ओर टोलियों का स्वागत करते हुए विभिन्न प्रतीक चिन्ह अर्पित किये जा रहे थे,वहीं श्रद्धालुओं की सेवा के तहत जगह जगह खान पान के विविध सामाग्री का भी वितरण किया जा रहा था।</description><guid>159</guid><pubDate>21-Aug-2022 4:36:55 pm</pubDate></item></channel></rss>