<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0"><channel><title>संस्कृति - Dainandini Feed</title><link>https://dainandini.in/</link><description>Dainandini Feed Description</description><item><title>करौली शंकर महादेव धाम: आस्था और ध्यान से रोगों और कष्टों का अंत</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=12290</link><description>सचिव महंत जगतार मुनि ने साझा किया स्वास्थ्य लाभ का अनुभव
कानपुर। 'स्वस्थ विश्व, भयमुक्त मानवता' के संकल्प के साथ कानपुर स्थित करौली शंकर महादेव धाम में बैशाख अमावस्या के पावन अवसर पर निःशुल्क 'आनंद दरबार' का भव्य आयोजन हुआ। श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी के सानिध्य में आयोजित इस दरबार में देश के विभिन्न राज्यों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने ध्यान और संकल्प के माध्यम से असाध्य रोगों, मानसिक कष्टों और भय से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
इस गरिमामयी अवसर पर श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन निर्वाण के सचिव महंत श्री जगतार मुनि जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने जनसमूह के सम्मुख अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि वे रीढ़ की हड्डी (L4-L5) की गंभीर समस्या से लंबे समय से पीड़ित थे। देश के नामी अस्पतालों में इलाज के बावजूद उन्हें राहत नहीं मिली।
जब मेरी मुलाकात हरिद्वार में पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी से हुई और मैंने अपनी व्यथा रखी, तब गुरुदेव के आशीर्वाद और धाम की दिव्य पद्धति से मैं आज पूर्णतः स्वस्थ हूँ। भ्रम फैलाने वालों की परवाह न कर मेरा अटूट विश्वास ही मेरी शक्ति बना। - महंत श्री जगतार मुनि जी
करौली शंकर महादेव धाम की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का 'निशुल्क आनंद दरबार' है। यहाँ समाज का हर वर्गचाहे वह उच्च पदस्थ नौकरशाह हो, राजनीतिज्ञ हो या साधारण नागरिकएक ही कतार में बैठकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त आनंद का अनुभव करता है। धाम की मान्यता है कि भक्त अपने 'दृढ़ संकल्प' और 'प्रार्थना' से स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगता है।
उदासीनता: शून्यता नहीं, बल्कि अनंत का विस्तार:: पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव
श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी ने उदासीन अखाड़े से सम्बंधित उदासीन शब्द का अर्थ समझाया |उन्होंने बताया कि 'उदासीन' का अर्थ निष्क्रियता नहीं है, बल्कि 'तटस्थता' है। ब्रह्मांड में जो 'व्यापक' है, वह स्वयं कोई क्रिया नहीं करता, लेकिन ब्रह्मांड की हर क्रिया उसी के भीतर होती है। जैसे एक खाली कमरा उदासीन है। वह न हिलता है, न कुछ करता है, लेकिन उसी कमरे के 'होने' के कारण ही हम उसमें चल-फिर सकते हैं। वह 'आधार' है, इसलिए वह उदासीन है।
व्यापक वस्तु में जो समाया है वह ईश्वर है। वह शून्य या आकाश जो पृथ्वी, चाँद, सितारों और सूर्य को घेरे हुए है। यह इतना 'व्यापक' है कि इसकी सीमाओं का अंत नहीं। इस व्यापकता के भीतर जो ऊर्जा, जो चेतना कार्य कर रही है, वही 'ईश्वर' या 'ऐश्वर्य' है। यह वह 'स्टेज' है जिस पर सृष्टि का नाटक चल रहा है। अभिनेता (ग्रह, नक्षत्र, जीव) क्रिया करते हैं, लेकिन स्टेज (उदासीन तत्व) स्वयं क्रियाशून्य रहकर सबको स्थान देता है। आपने स्पष्ट किया कि वह 'कर्ता' नहीं है लेकिन उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है। हम और आप जो 'पदार्थ' हैं, हमारा अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि वह 'व्यापक उदासीन तत्व' हमें जगह दे रहा है।
पूर्ण गुरु जी ने कहा कि जब हम 'उदासीन अखाड़ा' की बात करते हैं, तो यहाँ 'उदासीन' का अर्थ हैवह साधक जो संसार की माया और विकारों से 'तटस्थ' हो चुका है। जैसे वह 'व्यापक आकाश' सबको घेरे हुए है पर किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही उदासीन संप्रदाय के साधक संसार में रहते हुए भी उससे निर्लिप्त रहते हैं। वे उसी 'व्यापक ईश्वर' की साधना करते हैं जो सर्वत्र है, तटस्थ है और सबका आधार है। उदासीनता ही वास्तव में पूर्णता है। जो किसी एक क्रिया में नहीं बंधा, वही 'व्यापक' हो सकता है। इसीलिए वह उदासीन तत्व ही सृष्टि का आदि और अंत है।




लक्ष्य: नशा मुक्त और शोक मुक्त विश्व
श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर पूर्ण गुरु श्री करौली शंकर महादेव जी ने इस अवसर पर कहा कि धाम का एकमात्र लक्ष्य पूरे विश्व को रोग, शोक, भय और नशा मुक्त करना है। उन्होंने बताया कि आनंद दरबार का आयोजन समाज के अंतिम व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुख के लिए पूर्णतः निशुल्क रहता है। आगामी 1, 2 और 3 मई को 'पूर्णिमा महोत्सव' का त्रि-दिवसीय वृहद आयोजन होगा। इस महोत्सव में तंत्र-मंत्र दीक्षा और उच्च स्तरीय ध्यान साधना के माध्यम से भक्तों का कल्याण किया जाएगा।</description><guid>12290</guid><pubDate>2026-04-19 12:22:01 12:23:40 pm</pubDate></item><item><title>करौली शंकर महादेव बने महामंडलेश्वर</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=12249</link><description>योग, मंत्र दीक्षा, ध्यान साधना व भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं करौली शंकर महादेव : मुखिया महंत भगतराम जी महाराज
श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण में आयोजित भव्य समारोह में अखाड़ों, संत-महंतों, गणमान्यजनों की उपस्थिति में करौली शंकर महादेव का पट्टाभिषेक समारोह हुआ सम्पन्न

श्री करौली शंकर महादेव धाम, मिश्री मठ के परमाध्यक्ष करौली शंकर महादेव बने श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण के महामण्डलेश्वर
हरिद्वार, 31 मार्च। श्री करौली शंकर महादेव धाम, मिश्री मठ के परमाध्यक्ष करौली शंकर महादेव महाराज का पट्टाभिषेक समारोह श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण में आयोजित भव्य समारोह में अखाड़ों के प्रतिनिधियों, संत-महंतों, गणमान्यजनों की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण के पदाधिकारियों मुख्य रूप से मुखिया महंत भगतराम जी महाराज, मुखिया महंत आकाश मुनि जी, मुखिया महंत मंगलदास जी, अध्यक्ष महंत धूनी दास जी महाराज, सचिव मुखिया महंत जगतार मुनि जी, अध्यक्ष महंत गोपाल दास जी महाराज ने विधि-विधान से करौली शंकर महादेव महाराज का तिलक-चादर व पट्टाभिषेक सम्पन्न करवाया।

पट्टाभिषेक समारोह को सम्बोधित करते हुए मुखिया महंत भगतराम जी महाराज ने कहा कि करौली शंकर महादेव योग, मंत्र दीक्षा, ध्यान साधना व भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं। संतों का जीवन परमार्थ को समर्पित रहता है। करौली शंकर महादेव महाराज देश-दुनिया में मानव मात्र को कष्टों से मुक्ति दिलाने का भागीरथ कार्य कर रहे हैं। मुखिया महंत भगतराम जी महाराज ने कहा कि उन्हें आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि करौली शंकर महादेव श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण की परम्पराओं का पालन करते हुए अखाड़े के मान-मर्यादा व सम्मान में वृद्धि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायंेगे।

सचिव मुखिया महंत जगतार मुनि जी ने कहा कि नया अखाड़ा के महामण्डलेश्वर के रूप में करौली शंकर महादेव भगवान श्री श्री चन्द्र जी के विचारों और परम्पराओं को आत्मसात कर श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण की गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने का कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि पंडित श्री राधा रमण जी मिश्र के सुयोग्य शिष्य के रूप में करौली शंकर महादेव का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने शिव तंत्र ज्ञान को अंधविश्वास से निकालकर स्मृति आधारित आध्यात्मिक विज्ञान के रूप में स्थापित किया, जिससे मानव जीवन के कष्टों के मूल कारण को समझा जा सके।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष, महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रविन्द्र पुरी जी महाराज ने करौली शंकर महादेव महाराज को महामण्डलेश्वर पद पर आसीन होने पर मंगल कामनाएं देते हुए कहा कि करौली शंकर महादेव विलक्षण संत हैं, जिन्हांेने सदैव मानवता की सेवा की है। उनके पूज्य गुरूदेव पंडित श्री राधा रमण जी मिश्र को सनातन परंपरा के उन विरले संतों में माना जाता है जिन्होंने तंत्र और आध्यात्मिक साधना को एक नई दिशा दी। उनकी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए करौली शंकर महादेव महामण्डलेश्वर के रूप में भारतीय संस्कृति व सनातन को शिखर पर ले जाने का कार्य करंेगे।
श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा श्री महंत ज्ञानदेव सिंह जी महाराज ने कहा कि करौली शंकर महादेव उच्च कोटि के साधक हैं। नया अखाड़ा ने उन्हें महामण्डलेश्वर बनाकर संत समाज को नयी ऊर्जा व शक्ति प्रदान की है।

कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने कहा कि करौली शंकर महादेव के पट्टाभिषेक समारोह में उमड़ा संतों व भक्तों का सैलाब इस बात का प्रमाण है कि करौली शंकर महादेव हम सबकी आस्था के केन्द्र हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार आगामी कुम्भ को संतों के आशीर्वाद व सहयोग से भव्यतापूर्वक आयोजित करने हेतु जुटी है।
पट्टाभिषेक समारोह में उपस्थित संत समाज व अखाड़ा परिषद का आभार व्यक्त करते हुए करौली शंकर महादेव ने कहा कि उनके पूज्य गुरूदेव पंडित श्री राधारमण जी मिश्र भी श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन से जुड़े थे जिस कारण उन्होंने महामण्डलेश्वर के रूप में इसी अखाड़े को चुना है। उन्हांेने कहा कि श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण ने महामण्डलेश्वर नियुक्त कर जो सम्मान उन्हें दिया है उसे आजीवन सेवा के माध्यम से समाज को लौटाने का कार्य करंेगे। उन्होंने कहा कि आगामी कुम्भ दिव्य व भव्य रूप से तीर्थनगरी हरिद्वार में आयोजित होगा उसमें अखाड़े की ओर से जो भी जिम्मेदारी उन्हें सौंपी जायेगी उसे पूर्ण निष्ठा से निभाने का निरन्तर प्रयास करंेगे। पट्टाभिषेक समारोह का संचालन महामण्डेलश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द जी महाराज ने किया।

इस अवसर पर श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन से कोठारी राघवेंद्र दास, सूर्यांश मुनि जी, कोठारी गोविंद दास जी, श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा श्री महंत ज्ञानदेव सिंह जी, महंत जसविंदर सिंह शास्त्री, महामंडलेश्वर हरिचेतनानंद बड़ा उदासीन अखाड़ा, महामंडलेश्वर रूपेन्द्र प्रकाश, महंतश्री बाबा बलराम दास हठयोगी निर्माेही अखाड़ा, महामंडलेश्वर चंद्र मुनि जी, महामंडलेश्वर योगेंद्रानंद, महामंडलेश्वर सुरेश मुनी, मुकामी महंत स्वामी देवानंद जी महाराज, महंत सोहन दास जी, महंत अमर दास जी, महंत सोहन दास दया कला पंजाब, महंत बुध दास, महंत रामशरण दास, मुख्य सेवादार नितिन दास, मिश्री मठ के प्रबन्धक डॉ. उमेश सचान, अनिरूद्ध शर्मा, शैलेश भाई, बम्मा भाई, राम मुनि जी महाराज, महंत दुर्गादास, रविदेव शास्त्री, महंत दिनेश दास, महंत सुतीक्ष्ण मुनि, महंत दुर्गेशानन्द सरस्वती, म.मं. प्रबोधानन्द जी महाराज, स्वामी जगत स्वरूप दास जी महाराज, डॉ. दयामूर्ति जी महाराज, रामतीर्थ जी महाराज, गुरूमीत सिंह जी महाराज, महंत जीत सिंह, महंत जमुना दास, स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज, बलराम मुनि जी महाराज, महंत मोहन सिंह जी महाराज, रामविशाल दास जी महाराज, आचार्य चन्द्रभूषण जी, म.मं. स्वामी ललितानन्द गिरि जी महाराज, महंत बलवन्त सिंह जी, महंत रघुवीर दास, महंत सूरज दास, महंत दमोदर शरण जी, मुख्य विकास अधिकारी डॉ. ललित नारायण मिश्र, अपर मेलाधिकारी दयानन्द सरस्वती, उप मेलाधिकारी मनजीत सिंह, कौशल कुमार शुक्ला विधिक सलाहकार राज्यपाल, आदेश चौहान विधायक, मेयर किरण जैसल, पूर्व मेयर मनोज गर्ग, सुभाष चन्द, अनिरूद्ध भाटी, विनित जौली, अशोक शर्मा, परमिन्दर सिंह गिल, मुकुल पाराशर, गंगा सभा अध्यक्ष नितिन गौतम, विष्णुदत्त राकेश समेत देशभर से आये संतजन, भक्तजन उपस्थित रहे।</description><guid>12249</guid><pubDate>2026-04-02 15:12:19 3:13:54 pm</pubDate></item><item><title>भगवान महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर होगा रक्तदान शिविर टिक्कू जैन</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=12232</link><description>भगवान महावीर जन्म कल्याणक दिवस पर होगा रक्तदान शिविर टिक्कू जैन
कवर्धा- सत्य अहिंसा के साथ मानव सेवा के प्रतिरूप भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक दिवस 31 मार्च को दिन मंगलवार को मनाया जाएगा। जैन समाज एवं भारतीय जैन संघटना पंडरिया के श्री टीकम चंद ने बताया कि रक्त दान के छठवे वर्ष को विशेष रूप से रक्तदान शिविर के साथ ही सैटआयोजन के साथ रक्त देने वाले रक्तवीरों को सड़क सुरक्षा के संदेश के साथ हेलमेट का वितरण किया जाना है
*जैन समाज के अध्यक्ष हरीश जैन,भारतीय जैन संघटना के अध्यक्ष प्रणय जैन ने सर्व समाज के लोगो से अपील की है कि भगवान महावीर के सिद्धांत जिओ और जीने दी की प्रेरणा से प्रेरित होकर रक्तदान कर सेवा के इस मंगलमयी कार्य में अधिक से अधिक लोगो को भाग लेने का आग्रह किया है
इस कार्यक्रम में संदीप सिंह ठाकुर अनुविभागीय अधिकारी के साथ पुलिस विभाग के Asp अमित पटेल,sdop पंडरिया भूपत सिंह के साथ पंडरिया थाना प्रभारी अजय सिन्हI ने उपस्थिति देकर रक्तदान के साथ सड़क सुरक्षा के इस कार्यक्रम में अपना सहयोग एवम उपस्थति देने की बात कही है
* टिक्कू जैन ने बताया कि समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सभी समाज के लोगो का भी सहयोग मिल रहा है*</description><guid>12232</guid><pubDate>2026-03-30 15:25:14 3:27:16 pm</pubDate></item><item><title> दान की महिमा का पर्व छेर छेरा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=12037</link><description>-कृष्ण कुमार निगम
लोकपरंपरा के अनुसार, *छत्तीसगढ़ में पारंपरिक त्यौहार के रूप में, पौष मास के पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी तिहार मनाया जाता है। बाबू रेवाराम की पांडुलिपि में उल्लेख है कि, छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश के कोसल नरेश कल्याण साय एवमं मण्डल के राजा के बीच, विवाद हो गया था, जिसके चलते तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर ने कौशल नरेश कल्याण साय को दिल्ली बुला लिया था, जहां 8 वर्ष दिल्ली में रहे, एवमं राजनीति व युद्धकाल की शिक्षा प्राप्त कर वापस अपनी राजधानी रतनपुर पहुंचे। उनके आगमन की जानकारी, जब उनकी प्रजा को हुई तो वे अपने राजा से मिलने रतनपुर, पहुँचने लगे। अपने राजा के प्रति, प्रजा के इस प्रेम को, देखकर, उनकी रानी फुलकेना साय ने प्रजा के लिए अपनी तिजोरी खोल दी, और खुले मन से दान किया। तब से इस दिन की याद में, प्रति वर्ष, अपने राजा से मिलने, प्रजा आने, आगे चलकर यह एक पारंपरिक त्योहार के रूप में, आम जनमानस में प्रसिद्ध हो गया। यह दिन पौष मास की पूर्णिमा का दिन होता है, जब खेतों की फसल, कटकर खलिहान में, और कोठी में आ, चुकी होती है, अन्न दान के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है, जिसमें लोग घरों - घर जाते हैं, और नृत्य के माध्यम से *छेरछेरा माई कोठी के धान ला हेर हेरा कहते हैं।


यह पर्व छत्तीसगढ़ के दान की महिमा को दर्शाता हैं।इस पर्व में गरीब से गरीब परिवार भी अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करता है।इस पर्व के कारण गावों में छोटे बड़े का भेद भाव और अंहकार की भावना समाप्त होती है। आध्यात्मिक महत्व के रूप में यह पर्व नदी सरोवर में स्नान,दीपदान, तीर्थ ,मेला और शिवालय दर्शन के महत्व को भी दर्शाता है।

छेर छेरा की अन्त शुभकामनाएं
</description><guid>12037</guid><pubDate>2026-01-04 14:33:38 2:35:57 pm</pubDate></item><item><title>25 दिसंबर को *मेरी राधा डे का आयोजन*</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11992</link><description>

विश्व के पंचम मूल जगतगुरु एवं जगद्गुरत्तम श्री कृपालु जी महाराज वेदों एवं समस्त शास्त्रों तथा अन्यान्य धर्म ग्रंथो के निष्णात ज्ञाता होने के साथ-साथ उन्होंने धर्म सम्प्रदायों से परे समस्त मानवता के आध्यात्मिक और भौतिक कल्याण के लिए कार्य किया। श्री कृपालु जी महाराज को पंचमूल जगतगुरु एवं जगद्गुरुत्तम की पदवी 14 जनवरी सन् 1957 को काशी की तत्कालीन सभा काशी विद्वत परिषद द्वारा प्रदान की गई थी। उन्होंने विश्व में श्री राधा कृष्ण की भक्ति के प्रचार के लिए प्रेम मंदिर वृंदावन, भक्ति मंदिर श्री कृपालु धाम मनगढ़, जिला प्रतापगढ़, कीर्ति मंदिर बरसाना धाम वृंदावन बनवाये जो आज विश्व प्रसिद्ध हैं और पीड़ित मानवता की सेवा के लिए इन तीनों मंदिरों के पास चिकित्सालय बनाकर संचालित किये। 

इन चिकित्सालय में शत प्रतिशत निःशुल्क सेवा की जाती है। यह सेवाएं निरंतर चल रही है इसके अतिरिक्त हजारों हजारों विधवाओं, साधुओं एवं सरकारी विद्यालय के बच्चों को प्रति वर्ष में कई बार उनके आवश्यकता, उपयोग की सामग्री प्रदाय की जाती है। यह श्री महाराज जी की पीड़ित मानवता के प्रति अत्यंत संवेदनशीलता, करुणा और दया का प्रमाण है। उन्होंनेअन्य संप्रदायों की मान्यताओं और संस्कृति का सम्मान किया।

उनके द्वारा 25 दिसंबर को भक्ति से जोड़ते हुए मेरी राधा डे के रूप में उत्सव मनाया जाता। इसी तारतम्य में भिलाई शहर में 25 दिसंबर को शिवाजी चौक, अश्वत ट्रेडर्स, 90s कैफे के सामने, चैप्टर 2 की पार्किंग के सामने दोपहर 3:00 से 5:00 तक श्री कृपालु जी महाराज जी की प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी के सानिध्य में मेरी राधा डे का आयोजन होने जा रहा है। जिसमें भगवद् विषय में रुचि रखने वाले साधक रसमय संकीर्तन का लाभ ले सकेंगे।</description><guid>11992</guid><pubDate>2025-12-22 16:46:56 4:48:08 pm</pubDate></item><item><title> मानव जीवन का उद्देश्य और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11991</link><description>
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास भिलाई में चल रही 11 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के ग्यारहवें एवं अंतिम दिन बताया कि वेददृशास्त्रों के अनुसार इस सृष्टि में मानव जीवन सर्वोत्तम और दुर्लभ है। 84 लाख योनियों में भ्रमण के पश्चात प्राप्त यह मानव देह ईश्वर-प्राप्ति का एकमात्र साधन है। प्रत्येक जीव का परम लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है, और वह आनंद केवल ईश्वर को जानने एवं उनकी भक्ति से ही संभव है। सांसारिक सुख क्षणिक और नश्वर हैं, जबकि ईश्वर का सुख शाश्वत है।

मनुष्य स्वभावतः ईश्वर का अंश होते हुए भी अज्ञानवश संसार में आसक्त होकर दुःख भोगता है। वेद बताते हैं कि प्रत्येक जीव आस्तिक भी है और नास्तिक भी आस्तिक इसलिए कि वह निरंतर आनंद की खोज करता है, और नास्तिक इसलिए कि व्यवहार में वह इंद्रिय-भोग को ही प्राथमिकता देता है। वास्तविक समस्या बाह्य संसार नहीं, बल्कि मन के भीतर का संसार है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ग्रसित रहता है।

ईश्वर को बुद्धि मात्र से नहीं जाना जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे महान तत्व भी उन्हें पूर्णतः नहीं जान सकते। ईश्वर-प्राप्ति केवल भगवद् कृपा से संभव है, और वह कृपा मन-बुद्धि की पूर्ण शरणागति से प्राप्त होती है। इसके लिए एक वास्तविक गुरु (महापुरुष) का मार्गदर्शन अनिवार्य है, जो स्वयं ईश्वर-तत्त्व का अनुभवी हो।
वेद तीन मार्ग बताते हैं कर्म, ज्ञान और भक्ति। कर्मकांड केवल स्वर्ग तक सीमित फल देता है, ज्ञान मार्ग कलियुग में अत्यंत कठिन है, जबकि भक्ति मार्ग सरल, सर्वसुलभ और श्रेष्ठ है। भक्ति का सार है मन को संसार से हटाकर निरंतर ईश्वर में लगाना। जब मन पूर्ण रूप से ईश्वर की शरण में आ जाता है, तभी मानव जीवन सार्थक होता है और जीव को वास्तविक आनंद की प्राप्ति होती है।

दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के अंतिम दिन, विश्व ध्यान दिवस पर दीदी जी के सानिध्य में एक दिवसीय साधना शिविर के आयोजन में साधको ने रुपध्यान अभ्यास कर साधना का लाभ लिया। प्रवचन के पश्चात् श्री गुरुदेव चरण पादुका पूजन के एवं महाआरती का आयोजन हुआ।</description><guid>11991</guid><pubDate>2025-12-22 10:39:50 10:41:06 am</pubDate></item><item><title>आस्था के माध्यम से जुड़ाव: सोनी सब प्रस्तुत करता है गणेश कार्तिकेय में पवित्र अष्टविनायक गाथा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11987</link><description>आस्था के माध्यम से जुड़ाव: सोनी सब प्रस्तुत करता है 'गणेश कार्तिकेय' में पवित्र अष्टविनायक गाथा, जिसे हमारी विरासत से मिली पवित्रता और भक्ति के साथ सुनाया गया है
यह चैनल दर्शकों को भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों की दिव्य यात्रा पर निकलने के लिए आमंत्रित करता है


मुंबई, दिसंबर 2025: पीढ़ियों से, भगवान गणेश की कहानियाँ दादा-दादी द्वारा प्रेमपूर्वक सुनाई जाती रही हैं, जिन्हें श्रद्धा, सरलता और स्नेह के साथ बताया जाता है। भारत के अग्रणी जीईसी में से एक सोनी सब, अब उसी परंपरा को आज के दर्शकों तक पहुँचा रहा है, और अपनी प्रिय पौराणिक शृंखला 'गाथा शिव परिवार की - गणेश कार्तिकेय' में अगली दिव्य कथा का अनावरण कर रहा है। यह शृंखला भगवान गणेश के पवित्र अष्टविनायक रूपों को पवित्रता, भक्ति और टाइमलेस नॉलेज के एक नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करती है।


प्रोमो यहाँ देखें:https://www.instagram.com/reel/DSU-8zBDee_/?igsh=MWpwdnMzcmVnZWQzNA==


सार्थक, मूल्य-आधारित कहानी कहने के लिए चैनल की प्रतिबद्धता पर आधारित, यह सिनेमाई एक्सप्लोरेशन भगवान गणेश के प्रत्येक पूजनीय अष्टविनायक रूपों का उत्सव मनाता है। प्रत्येक अवतार अपनी किंवदंती, अपना पाठ और अपना इतिहास लेकर आता है, जो दर्शकों को प्रत्येक दिव्य रूप के पीछे की सांस्कृतिक समृद्धि और आध्यात्मिक महत्व का साक्षी बनने के लिए आमंत्रित करता है। भक्ति, कहानी कहने और दृश्य भव्यता का एक हार्दिक मिश्रण - प्रत्येक एपिसोड दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाएगा जहाँ भगवान गणेश प्रथम पूज्य के रूप में उभरते हैं और अनदेखे विघ्नों तथा ब्रह्मांडीय अशांति से हिल चुके ब्रह्मांड का सामना करते हैं।


सोनी सब को परिभाषित करने वाले लोकाचार, गर्मजोशी, सकारात्मकता और परिवार-केंद्रित कथाओं पर आधारित रहते हुए, सोनी सब पर गणेश कार्तिकेय के साथ परंपराओं और मूल्यों की इस नई यात्रा को शुरू करें, क्योंकि अष्टविनायक की आठ कहानियाँ एक समय में एक दिव्य अवतार के रूप में सामने आएंगी।


सोनी सब के बिजनेस हेड, अजय भालवणकर ने कहा, सोनी सब में हमारा मानना है कि आस्था की कहानियों को उसी पवित्रता और प्रेम के साथ बताया जाना चाहिए जिसका उपयोग पिछली पीढ़ियों ने उन्हें अपने बच्चों को सुनाते समय किया था। हम भगवान गणेश की गाथा को गहरी श्रद्धा के साथ गढ़ रहे हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि हर किंवदंती और लीला अपनी भावनात्मक और सांस्कृतिक सच्चाई को बरकरार रखे। अष्टविनायक रूपों को समर्पित एपिसोड परिवारों के लिए एक साथ आने, हमारी साझा विरासत को फिर से खोजने और उन मूल्यों में निहित नई परंपराओं को शुरू करने का एक आमंत्रण है जो समय के साथ बने रहते हैं।


गाथा शिव परिवार की - गणेश कार्तिकेय देखने के लिए ट्यून करें हर सोमवार से शनिवार रात 8 बजे, केवल सोनी सब पर</description><guid>11987</guid><pubDate>2025-12-20 10:45:16 10:47:15 am</pubDate></item><item><title>रुपध्यान है वैदिक मेडिटेेेशन - सुश्री धामेश्वरी देवी</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11985</link><description>रुपध्यान है वैदिक मेडिटेेेशन - सुश्री धामेश्वरी देवी
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास भिलाई में चल रही 11 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के नवमें दिन बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के तीन स्वरुप है। एक निराकार निगुण ब्रह्म, दूसरे सगुण साकार परमात्मा, तीसरे सगुण साकार भगवान्। ज्ञानी ब्रह्म के उपासक होते हैं, योगी परमात्मा के उपासक होते हैं और भक्त भगवान् के उपासक होते हैं।
वेदों में ज्ञान के दो प्रकार बताए गए - एक शाब्दिक ज्ञान और दूसरा अनुभवात्मक ज्ञान। किसी भी विषय का शाब्दिक ज्ञान से, लेकिन साधना द्वारा उसका अनुभव ना हुआ हो तो वह कोरी कल्पना ही समझिये। यह ज्ञान दो क्षेत्रों से संबंधित होता है एक माया का क्षेत्र और एक मायतीत ईश्वर का क्षेत्र। जो ज्ञानी होते हैं उन्हें किसी भी विषय का शाब्दिक ज्ञान होता है, इस आधार पर वें प्रवचन में बड़ी-बड़ी बातें बताते हैं, लेकिन अनुभवात्मक साधना के अभाव में उनके इस ज्ञान का कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। वेदों में यह भी कहा गया है कि ज्ञानी व्यक्ति का पतन हो जाता है। वह ज्ञान अज्ञान है जिसमें ईश्वर प्रेम ना हो अर्थात कर्म स्वर्ग देकर समाप्त हो जाता है और ज्ञान से मोक्ष मिलता है यह भी निंदनीय है। ज्ञानी अपने बल पर शास्त्र वेदां के ज्ञान के आधार पर साधना करता है तो स्वयं को ही ब्रह्म समझता है, भगवान के शरणागत नहीं होता। ज्ञान मार्ग पर चलना कलयुग में बहुत मुश्किल है क्योंकि उसमें अधिकारी होना चाहिए। संसार से पूर्ण विरक्त व्यक्ति ही ज्ञान मार्ग में अधिकारी बनेगा और दूसरी बात ज्ञानी भगवान् की शरण में नहीं जाता है और नियम ये है कि सगुण साकार भगवान् के शरणागत होने पर ही मायानिवृति हो सकती है। ज्ञानी का ज्ञान मार्ग में बार बार पतन होता है जिसकी रक्षा करने वाला न भगवान् होता है न गुरु ही होता है और जो भक्त है भक्ती मार्ग में वो भगवान् तथा गुरु के शरणागत रहता है, आश्रित रहता है इसलिए भगवान् उसकी रक्षा करते है। भक्त की रक्षा करते है भगवान्, किंतु ज्ञानी की रक्षा नहीं करते। ज्ञानी की रक्षा तब करेगें जब ज्ञानी भगवान् की शरण में जायेगा। जब ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है। ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है। माया भगवान् की शक्ति होने के कारण बिना उनकी कृपा के नहीं जा सकती। जब तक माया नहीं जायेगी तब तक भगवद्प्राप्ति नहीं होगी इसलिए भगवान् की शरणागति करना एवं साधना करना आवश्यक है।
जगद्गुत्तम श्री कृपालु जी महाराज जी द्वारा रुपध्यानयुक्त साधना करने का विज्ञान प्रकट किया गया है। रुपध्यान ध्यान की ऐसी विधि है जिसमें हम अपने चंचल मन को श्रीराधा कृष्ण के सुंदर रुप, विभिन्न नाम, दया, कृपा जैसे उनके गुण, बाल-लीला, झूलन लीला, वन विहार लीला, जल विहार लीला, रास लीला आदि में लगाते हैं, इसी का अभ्यास करते हैं। ऎसा चिंतन करते हुए कीर्तन करना और उनके रूपों का मन से ध्यान करना उनसे शीघ्रता से प्रेम बढ़ाने में मदद करता है। इस प्रकार के ध्यान को रूपध्यान मेडिटेशन कहा जाता है। सर्वांतर्यामी ईश्वर की कृपा से उसका ज्ञान व आनंद प्राप्त होने लगता है जिससे मन पुनः गलत जगहों में नहीं लगता एवं अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है।
जगद्गुत्तम श्री कृपालु जी महाराज स्वयं वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य निखिलदर्षनसमन्वयाचार्य अर्थात समस्त शास्त्रों वेदों के सिद्धांतों का समन्वय कर वेद में उल्लेखित मार्ग की प्रतिष्ठापना करने वाले संत सिरोमणि हैं। श्री महाराज जी द्वारा बताये गये रुपध्यान जो ध्यान की अत्यंत सरल एवं सर्वोच्च परिणाम सहजता से दिलाने वाली वैदिक पद्धति है का क्रियान्वित अभ्यास श्री महाराज जी की प्रचारिका सुश्री धामेष्वरी दीदी जी के सानिध्य में प्रवचन श्रंखला के अंतिम दिन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 को सुबह 8 बजे से षाम 7 बजे तक प्रवचन स्थल पर भिलाई में विष्व ध्यान दिवस के अवसर पर प्राप्त होने जा रहा है।</description><guid>11985</guid><pubDate>2025-12-19 18:23:10 6:25:11 pm</pubDate></item><item><title>विश्व ध्यान (मेडिटेशन) दिवस पर होगा एक दिवसीय रुपध्यानयुक्त साधना शिविर का आयोजन </title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11981</link><description>भिलाई छ.ग., राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास चल रही दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के आठवें दिन, जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज के प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि विश्व का प्रत्येक प्राणी केवल आनंद ही चाहता हैं। वह आनंद केवल भगवान् की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता हैं। सर्वसमर्पण करके कोई भी जीव भगवत्कृपा का लाभ ले सकता हैं। इसके लिये हमें संसार से वैराग्य और भगवान में अनुराग करना होगा। वैराग्य हमें मन से करना होगा। हमें संसार की वास्तविकता समझनी होगी कि संसार में सुख नही हैं। यदि कोई कहीं सुखी दिखाई भी पड़ता हैं तो वह भ्रान्ति मात्र हैं क्योंकि सांसारिक सुख अनित्य और सीमित हैं। वेदों में भगवत्कृपा प्राप्त करने के लिये तीन मार्ग बताये गयें हैं, कर्म, ज्ञान, और भक्ति मार्ग। इसके अलावा जितने भी मार्ग विश्व में प्रचलित है, वह पाखंडियो द्वारा बनायें गयें हैं।
कर्म मार्ग का विश्लेषण करते हुए देवी जी ने बताया कि कि वेदों में अनेक कर्मकांडों का वर्णन मिलता है पूजा-पाठ, यज्ञ आदि, लेकिन वेदों में कर्मकांड की घोर निंदा भी की गई है। इसका कारण यह बताया कि कर्मकांड से स्वर्ग की प्राप्ति होती है लेकिन स्वर्ग भी क्षणभंगुर है, मायिक है। अतः कर्मकांड करना घोर मूर्खता है कुछ लोग यज्ञ आदि करते हैं लेकिन वेदों में यज्ञ के लिए बड़े कड़े-कड़े नियम बताए गए हैं सही स्थान, सही समय, सही तरीके से कमाया धन, उससे एकत्रित हवन सामग्री और आहूति डालते समय, वेद मंत्रों का ठीक-ठीक उच्चारण आदि आवश्यक होता है। यदि मंत्र उच्चारण में ही त्रुटि हो गई या क्रिया के विधान आदि में त्रुटि हो गई तो ये सभी कर्म-धर्म यजमान का नाश कर देंगें। जैसे बिजली घर में अगर गलत तार कहीं से जुड़ गया तो पूरी मशीनरी खराब हो जाती है। इसी प्रकार गलत मंत्र उच्चारण करने पर पूरा कर्म-धर्म नष्ट हो जाएगा और हमें दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा।
कुछ लोग कर्म-धर्म के द्वारा ईश्वर को पाना चाहते हैं किन्तु भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं सर्वधर्मान परितज्य मामेकम् शरणम् व्रज, सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। कलियुग में कर्म-धर्म का पालन करना ही असम्भव है क्योंकि इसमें बड़े कठिन नियम हैं, लेकिन यदि कोई इन नियमों का वेदों के अनुसार पालन कर भी लेता है तो उसका अधिक से अधिक फल स्वर्ग है। किसी भी कर्म-धर्म में मंत्र, देश, काल, कर्ता, आदि का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है और यदि धर्म का आचरण कलियुग में कोई कर भी कर भी ले यदि कोई वेदों का ज्ञाता है तो भी उसका परिणाम मिलेगा हमें स्वर्ग और स्वर्ग नश्वर होता है। स्वर्ग से लौटकर हमें फिर कूकर, शूकर, कीट, पतंगादि हीन शरीरों चैरासी लाख योनियों में घूमना पड़ता हैं। उन्होनें बताया कि स्वर्ग सोने की बेड़ियाॅं है। यदि किसी कर्म-धर्म के पालन से प्रभु में प्रेम नहीं बढ़ता तो वह कर्म-धर्म निंदनीय है। भक्ति रहित किसी भी साधन से हम प्रेमानन्द प्राप्त नही कर सकतें हैं।
इसलिये कर्मयोग का उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिया है। अर्थात् निरंतर मन ईश्वर में लगाकर कर्म कर। तात्पर्य यह है कि मन से ईश्वर में अनुराग हो एवं शरीर से शास्त्रोक्त कर्म भी हो, वही कर्मयोग कहलायेगा। कर्म के साथ-साथ भगवान को याद करो। किसी भी कर्म को करते समय यह याद रखो कि ईश्वर का ही दिया सब कुछ है और उन्हीं की भक्ति करते हुए हम अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। किन्तु किसी भी कर्म में आसक्ति न हो। और यदि कोई पूछे कि ऐसा कैसे हो कि हम सांसारिक कर्म करें और आसक्ति न करें? तो यह तब होगा जब हमारे मन का लगाव या मन का प्यार ईश्वर में हो जाएगा। यह धीरे-धीरे अभ्यास से ही होता है। तो इस कर्मयोग का अभ्यास हमें धीरे-धीरे करना होगा। कर्म के साथ ईश्वर को साथ लिया जाए वरना खाली फिजिकल ड्रिल या शारीरिक कर्म जो हम करते हैं उससे हमें केवल संसार की प्राप्ति ही होगी यानि कर्म बंधन हमें प्राप्त होगा। तो कर्मबंधन से मुक्ति के लिये कर्मयोग को छोड़कर कर्मसन्यास भी एक मार्ग है कर्मसन्यास का मार्ग एक सही गुरू के मार्ग दर्शन में होता है वास्तविक गुरू समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए और जिन्होंने भगवान को पा लिया हो यानि उसकी माया समाप्त हो चुकी हो। तो मात्र कर्म धर्म से भगवत् प्राप्ति सम्भव नहीं है। आगामी प्रवचन में ज्ञान एवं भक्ति मार्ग पर प्रकाष डाला जायेगा। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के समापन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 विष्व ध्यान (मेडिटेसन) दिवस को प्रवचन स्थल पर सुबह 8 बजे से शाम 7 तक एक दिवसीय साधना षिविर का आयोजन होगा जिसमें दीदी जी के सानिध्य में रुपध्यानयुक्त साधना करने का दुर्लभ अवसर नगरवासियों को प्राप्त होगा।</description><guid>11981</guid><pubDate>2025-12-18 18:07:58 6:08:34 pm</pubDate></item><item><title> क्यों है महापुरुष (गुरु) की आवश्यकता - सुश्री धामेश्वरी देवी</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11979</link><description>क्यों है महापुरुष (गुरु) की आवश्यकता - सुश्री धामेश्वरी देवी


जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा भिलाई राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास चल रही 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के छठवें दिन बताया गया कि उस ईश्वर तत्व को जानने के लिए श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की आवश्यकता है, जिसके शरणागत होकर सेवापूर्वक जिज्ञासु बनकर ही परमतत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। ग्रंथों एवं लोक में भी तीन शब्द पढ़ने सुनने में आते हैं - एक पुरुष, दूसरा महापुरुष, तीसरा परमपुरुष। जिस पुरुष या जीवात्मा ने परमपुरुष या परमात्मा को जान लिया, देख लिया, उसमें प्रविष्ट हो चुका हो, वही महापुरुष या महात्मा है। भावार्थ यह कि ईश्वर-प्राप्त जीव को ही महापुरुष कहते हैं। प्रायः दो प्रकार के महापुरुष प्राप्त होते हैं।

1. जिनको ईश्वर का वास्तविक ज्ञान, दर्शन आदि अनुभव हो एवं बाहर भी उसी रूप में दिखते हो। ऐसे महापुरुष को पहचानना सरल है।
2. दूसरे महापुरुष होते हैं जो भीतर से तो वास्तव में ही महापुरुष होते हैं किंतु बाह्य व्यवहार में सांसारिक से दिखते हैं ऐसे महापुरुष को पहचाना अति कठिन होता है।
जो महापुरुष अनादिकाल से मायातीत ही रहे, कभी मायाधीन नहीं थे। उन्हें ईश्वर का परिकर, पार्षद आदि कहते हैं। दूसरे वे जो अनादि काल से मायाधीन रहे हैं, किन्तु किसी गुरु की शरण में जाकर उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चलकर अनंत काल के लिए वे भी महापुरुष हो गए हैं।

वास्तव में महापुरुष उसे कहते हैं जो कुछ न कर सके, न शुभ कर्म कर सके और न अशुभ कर्म कर सके। महापुरुष मिथ्या आशीर्वाद नहीं देता एवं श्राप भी नहीं देता।
महापुरुष को पहचानने का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि महापुरुष के दर्शन सत्संग आदि से ईश्वर में स्वाभाविक रूप से मन लगने लगता है। दूसरा प्रत्यक्ष लाभ यह होता है कि साधक की साधना पथ की क्रियात्मक गुंथिया होती है उन्हें वह सुलझा कर बोधगम्य करा देता है। तीसरा प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वास्तविक महापुरुष की वें क्रियात्मक अवस्थाएं जो समय-समय पर बहिरंग रूप से गोचर होती है उन्हें देखकर साधक को स्वाभाविक उत्साह एवं उत्तेजना मिलती है। प्रेमास्पद भगवान के नाम, गुण, लीला आदि के स्मरण कीर्तन आदि से वह प्रेम बाहर छलक पड़ता है। जिसे हम सात्विक भाव के रूप में देखते हैं।

प्रवचन का अंत श्री राधा कृष्ण भगवान की आरती के साथ हुआ। प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 तक प्रतिदिन शाम 5 से 7 बजे तक होगा।</description><guid>11979</guid><pubDate>2025-12-16 17:25:13 5:26:34 pm</pubDate></item><item><title> अलग अलग होता है भीतर और बाहर का संसार - सुश्री धामेश्वरी देवीजी</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11978</link><description>अलग अलग होता है भीतर और बाहर का संसार - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
भिलाई छ.ग., राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास चल रही दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के पांचवें दिन, जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज के प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी ने वेदों के अनुसार संसार के स्वरूप को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि वास्तव में दो प्रकार का संसार होता है एक भीतर का संसार, दूसरा बाहर का संसार। कुछ ज्ञानी लोग कहते हैं कि संसार मिथ्या है और कुछ कहते हैं कि संसार सत्य है यह दोनों बातें वेदों शास्त्रों के अनुसार सही सिद्ध हो जाती हैं।

 वास्तव में हमारे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि माया के विकार होते हैं। साथ ही मन सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी, तीन तरह की माया के अधीन रहता है इसी कारण हमारे मन के विचार प्रतिक्षण बदलते रहते हैं और यही कारण है कि संसार में किसी की किसी से नहीं पटती अर्थात् विचारों में आपसी मतभेद रहता है। यह भीतर का संसार हमारे लिए ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि जैसे मानसिक विचार होते हैं वैसे ही व्यक्ति की प्रवृत्तियां हो जाती है कोई सतोगुणी, कोई रजोगुणी तो कोई तमोगुणी दिखाई पड़ता है। इसके विपरीत बाहर का संसार हमारे भौतिक शरीर को चलाने के लिए ईश्वर द्वारा बनाया गया है। बाहरी संसार सत्य है क्योंकि वह सदैव समान बना रहता है पंचतत्व का हमारा शरीर, पंचतत्व के बने इस सत्य संसार से ही ठीक ठीक चलता है।

देवी जी ने बताया कि कोई भी संसारी विचार मन में आते ही मन को वहां से हटाकर तुरंत भगवान में लगाना है। संसार से मन हटाना और भगवान में मन लगाना, निरंतर इसका अभ्यास करना होगा तभी अनादिकाल से संसार में आसक्त मन धीरे-धीरे भगवान में लगने लगेगा और वास्तविक गुरु की कृपा से मन पूर्ण रूप से भगवान के शरणागत हो जाएगा। संसार के स्वरुप का वेद शास्त्र आधारित और भी विवरण आगे प्रवचन में बताया जायेगा। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 तक प्रतिदिन शाम 5 से 7 बजे तक होगा।</description><guid>11978</guid><pubDate>2025-12-15 16:39:10 4:40:12 pm</pubDate></item><item><title>रामकथा के चतुर्थ दिवस मानस विदुषी देवी चंद्रकला ने गरियाबंद के गांधी मैदान में श्री राम जन्म की कथा का रसपान कराया।</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11974</link><description>राधेश्याम सोनवानी
गरियाबंद :- सत्संग मानस मंडली द्वारा आयोजित राम कथा के चौथे दिन दीदी चंद्रकला ने कहा कि भगवान बांधने की चीज नहीं है , भगवान एक जगह केवल बंधते हैं उसका नाम है प्रेम..इसके अलावा संसार में कोई चीज ऐसी नहीं है जो परमात्मा को बांध सके , बैकुंठ में नहीं निवास मेरा ना योगी हृदय में आता हूँ मेरे भक्त जहां मेरा गान करें मैं वहीं स्वयं को पाया हूं भक्तों के खातिर सब करता मेरे भक्त मेरी दुर्बलता है यदि उन पर आँच कोई भी आए तो विधि विधान भी हिलता है मैं काल परे कल्पना परे मन बुद्धि में नहीं आता हूँ ब्रह्माण्ड अखिल में ना सिमटू पर भक्त हृदय में समाता हूं

हमारे सनातन धर्म में विश्वास की प्रधानता दी गई है , अंधविश्वास की नहीं
धर्म तो एक ही है सनातन धर्म , पंथ अनेक हो सकते हैं , आपको अगर अपने धर्म से प्रेम है तो एक बात याद रखिएगा , आप जिस पर भी आश्रित हैं चाहे वो संत हो चाहे वह गुरु हों मै हाथ जोड़कर बात एक कह रही हूं जीवन में जो व्यक्ति भगवान से मिलने का मार्ग बताए वही सच्चे गुरु होंगे और अगर कोई ये कहे राम नहीं , कृष्ण नहीं , देवी नहीं , शंकर जी नहीं बल्कि जो हैं बस हम हैं तो आज से कान पकड़ के उनसे दूर हो जाईए , वो न संत हो सकते हैं न सतगुरु हो सकते हैं क्योंकि सतगुरु भगवान से मिलने का रास्ता बताता है खुद भगवान नहीं बनता है। आपका कर्तव्य बनता है एसे गुरु का ही आदर् और सम्मान करें जो भगवान से मिलने का रास्ता बताए , उन्होंने कालनेमी हनुमान जी का उदाहरण भी बताया।
सनातन धर्म से दूसरा इस संसार में कोई दूसरा धर्म नहीं
सदियों की मौन प्रतिक्षा में जब सपने पूरे होते हैं तब रोम रोम रो उठता है केवल दो नयन न रोते हैं, स्वाभिमान की रक्षा की जब कीमत बलिदान चुकाता है तब जाकर हम लोगों को ये शुभ दिन भगवान दिखाता है , हम है गवाह इन घड़ियों के हथकडियों से मजबूर नहीं पुष्पक विमान आकाश में हैं अब राम हमारे दूर नहीं, सत्कार आस्था का करिए युग बीत गए जो बनी रही।
हिंदुस्तान के लिए बड़े गर्व का क्षण था जब कितने वर्षों के बाद ये वो पल आया जब अयोध्या धाम में हमारे राम लला अपने निज महल में विराजमान हुए ।</description><guid>11974</guid><pubDate>2025-12-15 13:53:07 1:55:06 pm</pubDate></item><item><title>भगवद् कृपा से ही बुद्धि जान सकेगी भगवान को - सुश्री धामेश्वरी देवीजी</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11971</link><description>भगवद् कृपा से ही बुद्धि जान सकेगी भगवान को - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
भिलाई छ.ग., राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के तीसरे दिन वेद और शास्त्रों के प्रमाणों सहित देवी जी ने बताया कि सर्वान्तरयामी सर्वशक्तिमान भगवान् को बुद्धि के द्वारा बड़े बड़े ज्ञानी तो क्या, ब्रम्हा विष्णु शंकर भी नहीं जान सकते क्योंकि भगवान् बुद्धि से परे हंै, मायातीत हंै। हम सभी जीव गुणों के आधीन हैं, भगवान् माया से परे है, दिव्य है, शाश्वत है, हमारी इन्द्रिय मन बुद्वि मायिक है, प्राकृत है इसलिए क्षुद्र शक्ति युक्त है। इसके अतिरिक्त भगवान् अनंत विरोधी धर्मों के अधिष्ठान भी हैं इसलिए बडे़ बडे़ ब्रम्हा विष्णु शंकर आदि बुद्धि के आधार पर नहीं जान सकते तो साधारण मनुष्य भी भगवान् की शक्ति को नहीं जान सकता। भगवान् छोटे से भी छोटा है, भगवान् बडे़ से भी बड़ा है, वो धर्म से परे है, अधर्म से भी परे है, सृष्टि से परे है किन्तु सृष्टिकर्ता भी है, अकर्ता है किन्तु न्यायकर्ता भी है, कृपाकर्ता भी है, भगवान् से भय भी भयभीत होता है किन्तु भगवान् यशोदा मैया की छड़ी से डरते हंैंै। भगवान् को बड़े बडे़ ऋषि मुनि महात्मा अपने पराक्रम से नहीं जान सकते और वो आत्माराम पूर्णकाम है किन्तु ब्रजगोपियों के साथ रास भी करते हैं इसलिए ऐसे भगवान् को जानना बुद्धि से असंभव है। बुद्धि से भगवान् को जाना नहीं जा सकता परंतु यदि किसी पर भगवान् की कृपा हो जाये और भगवान् की बुद्धि (दिव्य शक्ति) उसे मिल जाये, तो साधारण मनुष्य भी भगवान् को जान सकता है।
विश्व के अधिकांश महानुभाव यह कह दिया करते हंै कि ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता। कुछ लोग कोटेशन आदि के द्वारा प्रत्येक कर्म के लिए भगवान् को जिम्मेदार ठहराते हंैंै। उसे जैसा करना होता है, करा लेता है। किन्तु यह बात गलत है। ईश्वर ने हमें मनुष्य देह दिया, कर्म करने की शक्ति दी। चाहे हम अच्छे कर्म करें, चाहे बुरे कर्म। भगवान् उन कर्मों को नोट करता है फिर उन कर्मों के अनुसार हमें फल देता है।
भगवान् ने हमें सत्कर्म करने की शक्ति दी है किंतु उसकी दी हुई शक्तियों का हम दुरुपयोग करते हंै। यानि संसार में आसक्ति करते हंै और फिर कह देते हैं, हमारे भाग्य में नहीं है। अथवा भगवान् को दोषी ठहराते हंैंै। मनुष्य देह प्राप्त करके ईश्वर की भक्ति करने की बजाय संसार की जिम्मेदारियों की आड़ लेते हैं। वास्तव में भगवान् की कृपा का सही अर्थ समझना होगा, शास्त्रों से और संतो से। भगवद् कृपा के बिना भगवान् को नहीं जाना जा सकता। भगवान् की जिस पर कृपा हो जाती है वह उसे पूर्णतया जान लेता है। देवीजी ने यह भी बताया कि सगुण साकार भगवान् ही कृपा करता है इनकी कृपा के बिना किसी की भी माया-निवृत्ति नहीं हो सकती। प्रवचन का समापन श्री राधाकृष्ण भगवान् की आरती के साथ हुआ। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 तक प्रतिदिन शाम 5 से 7 बजे तक होगा।</description><guid>11971</guid><pubDate>2025-12-13 18:21:40 6:26:26 pm</pubDate></item><item><title> प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी के 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन </title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11960</link><description>प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी के 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन


जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी का भिलाई में शुभागमन: आज के भौतिक जीवन की उधेड़ बुन में व्यक्ति अपने जीवन का लक्ष्य भूलता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में ईश्वर हम जीवों के उद्धार हेतु अपने संतों को इस धरा धाम पर भेजते हैं। वे संत ही कृपा द्वारा हम भटकते हुए जीवों का पथ प्रदर्शन करते हैं। हमें सही रास्ता दिखाते हैं। ऐसे ही विश्व विख्यात संत हैं जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज। आज विश्व में शायद ही कोई व्यक्ति हो जो श्री महाराज जी को न जानता हो। श्री महाराज जी द्वारा वृंदावन धाम में स्थापित दिव्य प्रेम मंदिर हमारे सनातन धर्म की पताका है।


जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की दिव्यता उनके बाल्यकाल से ही प्रकट हो चुकी थी। बचपन से ही विशिष्ट मेधावी छात्र के रूप में प्रख्यात रहे, 16 वर्ष की अल्पायु में चित्रकूट के शरभंग आश्रम के समीपस्थ बीहड़ वनों में वास किया। श्रीकृष्ण प्रेम में विभोर भावास्था का गोपन करके श्री कृष्ण भक्ति का प्रचार करने लगे। प्रेम के साथ-साथ ज्ञान का भी प्रकटीकरण होने लगा। इनके ज्ञान की ख्याति सुनकर काशी विद्वत् परिषत् के विद्वानों ने शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया और श्री महाराज जी के वेदों शास्त्रों के अलौलिक, दिव्य एवं समन्वयात्मक ज्ञान के समक्ष नतमस्तक होकर, श्री महाराज जी को जगद्गुरु ही नहीं अपितु जगद्गुरूत्तम की उपाधि से सम्मानित किया।
भारत की अमूल्य निधि वेद, शास्त्रों के ज्ञान को सरलतम रूप में जनसाधारण के समक्ष प्रस्तुत करने जैसे अद्वितीय कार्य के साथ भक्ति प्रेम रस की धारा प्रवाहित करने वाले वृन्दानधाम के दिव्य प्रेममंदिर, बरसाना धाम के कीर्ति मंदिर, श्रीकृपालुधाम मनगढ़ के दिव्य भक्ति मंदिर के अनुपमेय उपहार देने के साथ इन तीनों स्थानों पर पूर्णत निःशुल्क चिकित्सालय - निस्हाय विधवाओं, साधुओं एवं सामान्य जनों के लिए स्थापित, उनकी करुणा के प्रतीक है।
ऐसे महानतम् गुरु की प्रमुख प्रचारिका सुभी धामेश्वरी देवी जी का शुभागमन भिलाई में सनातन धर्म के प्रचारार्थ हो चुका है। धामेश्वरी देवी ने बचपन से ही कृष्ण भक्ति में प्रवृत्त दीदी जी ने 16 वर्ष की अल्पायु में गुरु चरणों में समर्पित होकर अपना सम्पूर्ण जीवन गुरुआज्ञा पालन से सनातन धर्म के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया है। प्रत्येक सनातनी के लिए सनातन धर्म के सिद्धान्तों को जानना अत्यन्त आवश्यक है इसलिए देवी जी का आगमन शहरवासियों के लिए अत्यंत सौभाग्य का अवसर रहा। देवी जी का स्वागत नगरवासियों द्वारा धूमधाम से किया गया।
गुरुआज्ञा से उडीसा के कटक शहर की उत्कल यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एम ए की डिग्री प्राप्तकर गुरु द्वारा प्राप्त अलौकिक तत्व ज्ञान का प्रचार प्रसार आरंभ किया। मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश छत्तीसगढ के विभिन्न शहरों इंदौर, भोपाल, जबलपुर, सागर, रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, जावरा, ग्वालियर, दमोह, खरगौन, राजनांदगाव, रायपुर, दिपका आदि शहरों में उनके प्रवचनों एवं साधना के कार्यक्रमों से लोग आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति कर रहे है।
आज भौतिक जीवन में अनियंत्रित कामनाओं की पूर्ति की उधेड़बुन में हमारा युवावर्ग तनाव से ग्रसित हो जीवन का वास्तविक लक्ष्य से दूर, मानसिक झंझावात से गुजर रहा है। आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में जीवन में वास्तविक आनंद व स्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाप्तप्राय हो गयी है। ऐसी स्थितियों पर विजय पाने के लिए युवाओं को सनातन ज्ञान की अत्यंत आवश्यकता है अतः ऐसे कार्यक्रम में उनका आना उनके जीवन में परिवर्तन ला सकता है।
संसार में दृढता एवं स्थिरता से आगे बढ़ने और साथ-साथ आध्यात्मिक कल्याण हेतु ज्ञान प्राप्त करने का यह प्रवचन कार्यक्रम स्वर्णिम अवसर युवाओं को प्रदान कर रहा है। अतएव ऐसे विलक्षण एवं दुर्लभ अवसर का लाभ सभी युवाओं को लेना चाहिये।
संत शिरोमणि श्री कृपालु जी महाराज जी की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन 11 से 21 दिसम्बर 2025 तक राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास भिलाई छ.ग. में सायं 5 से रात्रि 7 बजे तक नियत है। प्रवचन श्रृंखला में मनुष्य देह देव दुर्लभ, जीव का चरम लक्ष्य भगवद्प्राप्ति, भगवद् प्राप्ति के लिए भगवद् कृपा आवश्यक, मन बुद्धि की शरणागति से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव, वास्तविक गुरु की शरणागति से ही भगवद् प्राप्ति संभव, संसार का स्वरूप आदि विषयों पर वेद, शास्त्रों, गीता, भागवत, रामायण आदि धर्म ग्रंथो के आधार पर ज्ञान का लाभ जिज्ञासु जीवों को प्राप्त होगा। अतः सभी नगर वासियों से प्रार्थना है सत्संग लाभ हेतु अवश्य पधारंे राधे-राधे।</description><guid>11960</guid><pubDate>2025-12-09 16:36:01 4:37:30 pm</pubDate></item><item><title>महापुरुषों का अपमान समाज को बुरा तो लगेगा ही</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11767</link><description>सच यह है कि महापुरुष तो पूरे मानव समाज का होता है, यानी हर समाज का होता है, पूरे राज्य का होता है, पूरे देश का होता है। उसे किसी समाज या राज्य के दायरे में नहीं रखना चाहिए, यह नहीं मानना चाहिए कि वह हमारे समाज का ही है। महापुुरुष भले ही किसी परिवार व समाज में पैदा होते हैं लेकिन काम तो वह पूरे मानव समाज के हित में करते हैं। इसलिए वह सभी के लिए महापुरुष होने चाहिए। सभी को उनको महापुरुष मानना चाहिए। उनका अपमान किसी भी तरह से नहीं करना चाहिए।कोई अपमान करता है तो सभी लोगों को उसका विरोध करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि समाज विशेष के लोग ही इस बात का विरोध करें और बाकी समाज के लोग मूकदर्शक बने रहे।
हर राज्य में कई समाज के लोग होते हैं।हर समाज में दूसरे समाज से अपने समाज को जोड़ने व दूसरे समाज से खुद को तोड़ने वाले लोग भी होते हैं।समाज को जोड़ने वाले जो लोग होते हैं, वह दूसरे समाज से अपने समाज को जोड़ते हैं। दूसरे समाज के लोगों का सम्मान करते हैं, उनके तीज त्यौहार में उनसे मिलते है, उनको शुभकामनाएं देते हैं, उनके जुलूस,रैली का स्वागत करते हैं।उनके महापुरुषों का सम्मान करते हैं। समाज जब दूसरे समाज का सम्मान करता है तो दोनों समाज के बीच अच्छे संबंध बनते है, दोनों समाज के लोग एक दूसरे का सम्मान करते हैं, एक दूसरे के महापुरुषों का सम्मान करते हैं। सम्मान करने से सम्मान मिलता है राज्य में सद्भाव बना रहता है।


सभी समाजों मे समाज जोड़ने वाले लोगों के अलावा समाज को तोड़ने वाले लोग भी होते हैं। ऐसे लोग जब समाज में प्रभावी हो जाते हैं, वह संगठन बना लेते हैं तो इसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है, थोड़े से तोड़ने वाले लोगों को कारण माना जाता है कि पूरा समाज ही ऐसा है,हकीकत मे सब समाज में जोड़ने वाले ज्यादा होते है और तोड़ने वाले कम होते हैं, इसलिए समाज के बहुसंख्यक लोगों की यह जिम्मेदारी होती है कि वह समाज को तोड़ने वाले लोग कुछ गलत करते हैं तो उनको खुल कर कहें कि आप लोग यह काम गलत कर रहे हो। इससे पूरे समाज की इमेज खराब होती है,समाज की बदनामी होती है।कई बार ऐसा होता है कि समाज को जोड़ने वाले लोग चुप रह जाते हैं तो समाज के तोड़ने वालों को लगता है कि उन्होंने जो किया है सही किया है जो कहा है सही कहा है।


हाल ही में तेलीबांधा में छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा किसी मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति ने तोड़ दी तो सभी लोगों ने इसकी निंदा की,सबने इसे गलत कहा, सबने इसे छत्तीसगढ़ का अपमान कहा।सबने इसे गंभीरता से लिया, सभी लोगों गलत हुआ तो गलत कहा।यह राज्य के सम्मान जुडा़ हुआ मामला था तो सरकार ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया और २४ घंटे के अंदर दोषी व्यक्ति को गिरप्तार करने के साथ ही छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा वहीं पर स्थापित कर दी।इस मामले को लेकर भी राजनीति करने वालों ने राज्य के लोगों को दो भागों में बांटने की कोशिश की लेकिन वह असफल रहे, राज्य के लोग इस मामले में एकजुट रहे। इसी तरह राज्य के लोगों को किसी भी समाज या समाजों के महापुरुषों का कोई संगठन या किसी संगठन का नेता करता है तो राज्य के लोगों को इसे मुखर होकर कहना चाहिए कि ऐसा जिसने भी किया है, गलत किया है. सभी राजनीतिक दलों व सभी संगठनों के लोगों को गलत करने वालो से कहना चाहिए कि आपने महापुरुषों का अपमान कर गलत किया है।गलती करने वाले को सब लोग जब गलती करने का एहसास कराते हैं तो उसको पता चलता है कि उससे गलती हो गई है।


एक तो गलती का एहसास सभी लोगों को कहकर कराना चाहिए। ऐसा नहीं होता है तो दूसरा रास्ता यह बचता है कि जिन समाज के महापुरुषों का अपमान किया गया है,वह कानून के रास्ते गलत कहने व करने वाले को सजा दिलाए।इसके लिए गलत कहने वाला व्यक्ति के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराना चाहिए और उसे सजा दिलाने का प्रयास करना चाहिए ताकि उसे एहसास हो कि उसने जो किया था, वह गलत था, वह अपराध था।महापुरुषों का अपमान किया जाए को समाज के लोगों को बुरा तो लगेगा ही।इससे समाजों के बीच दूरी बढ़ती है, दूसरे समाज भी आपके महापुरुषों का अपमान करेंगे। इससे समाज में सद्भभाव बिगड़ेगा। जब समाज में सद्भाव नहीं रहता है, राज्य में सद्भाव नहीं रहता है तो उसका खामियाजा सभी समाज के लोगों को भुगतना पड़ता है। कुछ लोग चाहते हैं कि समाज में,राज्य में सद्भाव न रहे ऐसे लोगों से राज्य के सभी समाज व संगठन के लोगों को सावधान रहना चाहिए।

</description><guid>11767</guid><pubDate>2025-10-29 17:39:57 5:44:22 pm</pubDate></item><item><title>छठ महापर्व: शनिवार से शुरू हुआ नहाय-खाय, चार दिन तक चलेंगे धार्मिक अनुष्ठान</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11735</link><description>नहाय-खायके साथ 25 अक्टूबर से छठ महापर्व का शुभारंभ हो गया है। यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मइया की आराधना के लिए मनाया जाता है और चार दिन तक चलता है। रविवार, 26 अक्टूबर को श्रद्धालु खरना का आयोजन करेंगे। इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को खीर या अन्य प्रसाद ग्रहण करते हैं।

सोमवार, 27 अक्टूबर को संध्या अर्ध्य किया जाएगा। सूर्य देव की पूजा शाम के समय पानी के किनारे या घर पर आयोजित होगी। मंगलवार, 28 अक्टूबर को प्रातः अर्घ्य के साथ पूजा का समापन होगा, जिसमें व्रती सूर्योदय के समय नदी या तालाब में अर्घ्य देकर उपवास तोड़ते हैं।








छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालु शुद्धता और संयम का विशेष ध्यान रखते हैं और पारंपरिक नियमों का पालन करते हैं।

नहाय-खाय और भद्रावास योग
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नहाय-खाय का दिन विशेष रूप से शुभ माना गया है।
इस दिन भद्रावास योग दोपहर 2:34 बजे से रात तक प्रभावी रहेगा।






इस समय किए गए धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ विशेष फलदायी माने जाते हैं।






व्रती इस दिन पवित्रता बनाए रखते हुए भोजन करते हैं और पूजा का पालन करते हैं।

संध्या अर्ध्य: अतिगण्ड योग और सुकर्मा योग
सोमवार, 27 अक्टूबर को संध्या अर्ध्य के दिन दो प्रमुख योग बन रहे हैं:
अतिगण्ड योग  यह थोड़े समय के लिए प्रभावी होगा।
सुकर्मा योग  पूरे दिन और रात्रि तक प्रभावी रहेगा।
ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार ये योग छठ महापर्व के लिए अत्यंत शुभ हैं। इस दौरान की गई पूजा और अनुष्ठान से जीवन में सकारात्मक बदलाव, सुख-समृद्धि और सफलता मिलने की संभावना अधिक होती है।

पूजा का महत्व और भक्तों का उत्साह
छठ महापर्व शुद्धता, संयम और श्रद्धा का प्रतीक है।
श्रद्धालु नदी, तालाब या घर में अर्घ्य देकर जीवन में शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
पर्व के दौरान परिवार और समाज में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का संचार होता है।






विशेष रूप से, यह पर्व प्रकृति और सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त करने का भी अवसर है।


</description><guid>11735</guid><pubDate>2025-10-25 17:20:24 5:23:05 pm</pubDate></item><item><title>गंगरेल मड़ई में उमड़ी श्रद्धा की भीड़, 52 गांवों के देव संग जुटे श्रद्धालु</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11734</link><description>धमतरी ।दीपावली के बाद पहले शुक्रवार को गंगरेल बांध के किनारे स्थित मां अंगारमोती मंदिर परिसर में पारंपरिक गंगरेल मड़ई का आयोजन हुआ। हर साल की तरह इस बार भी श्रद्धा और आस्था का ये मेला पूरे जिले में आकर्षण का केंद्र बना रहा। आयोजन में 52 गांवों के देव विग्रह शामिल हुए, जबकि लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।

निसंतान महिलाओं ने की संतान की कामना
मेला परिसर में करीब 11 सौ से अधिक निसंतान महिलाएं मां अंगारमोती से संतान की कामना करती नजर आईं। उन्होंने पेट के बल जमीन पर लेटकर हाथों में फूल, नींबू, अगरबत्ती और नारियल लेकर माता से संतान की कामना की। इसके बाद मंदिर के पुजारी और बैगा उनके ऊपर से गुजरते हुए उन्हें माता का आशीर्वाद देते हैं। मान्यता है कि इस प्रक्रिया से मां अंगारमोती की कृपा से महिलाओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

49 साल पुरानी परंपरा
जानकारी के अनुसार, मां अंगारमोती मड़ई का आयोजन वर्ष 1976 से निरंतर होता आ रहा है। पहले यह मड़ई चंवर गांव में लगती थी, लेकिन गंगरेल बांध बनने के बाद गांव डूब जाने पर इसे मां अंगारमोती मंदिर परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया। तब से यह परंपरा हर साल दीपावली के बाद के पहले शुक्रवार को निभाई जाती है।

भक्ति और लोक संस्कृति का संगम
गंगरेल मड़ई में न केवल धार्मिक आस्था बल्कि लोक परंपरा, संगीत और जनसंस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। धमतरी जिले के अलावा रायपुर, बालोद, कांकेर और बेमेतरा से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। मां अंगारमोती मंदिर परिसर में भक्ति गीत, पारंपरिक नृत्य और पूजा अनुष्ठानों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।

पंडित यशवर्धन पुरोहित ने बताया कि मां अंगारमोती मातृत्व और शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, और उनकी कृपा से निसंतान महिलाएं संतान सुख प्राप्त करती हैं। मेला प्रशासन की ओर से सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए गए थे।</description><guid>11734</guid><pubDate>2025-10-25 17:15:24 5:18:50 pm</pubDate></item><item><title>किस दिन मनाया जाएगा भाई दूज? जानिए सही तिथि, तिलक लगाने का मुहूर्त और विधि</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11714</link><description>-पंडित यशवर्धन पुरोहित


हिंदूधर्म में भाई दूज का त्योहार अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण माना गया है। दीपावली के बाद मनाया जाने वाला यह पर्व भाई और बहन के स्नेह, प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार देकर प्रेम और सुरक्षा का वचन देते हैं। यह त्योहार दीपोत्सव के पांचवें और अंतिम दिन मनाया जाता है, जिसे पूरे देश में हर्ष और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस वर्ष भाई दूज की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में विस्तार से।

भाई दूज 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाई दूज का पर्व 23 अक्टूबर 2025, गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। वैदिक गणना के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 22 अक्टूबर की रात 8 बजकर 16 मिनट से प्रारंभ होकर 23 अक्टूबर की रात 10 बजकर 46 मिनट तक रहेगी। इस दिन भाई को तिलक करने का सबसे शुभ मुहूर्त दोपहर 1:13 से 3:28 बजे तक रहेगा। यानी बहनों को तिलक करने के लिए लगभग 2 घंटे 15 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा।

भाई दूज की पूजा विधि
भाई दूज के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें। यदि संभव हो तो इस दिन यमुना नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। स्नान के बाद भगवान गणेश और यम देव की विधि-विधान से पूजा करें। पूजा के बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं। उसके सिर पर रुमाल रखें और रोली व अक्षत (चावल) से तिलक करें। इसके बाद भाई के हाथ में कलावा बांधें, मिठाई खिलाएं और दीप प्रज्वलित कर उसकी आरती करें। अंत में भाई अपनी बहन के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।

भाई दूज का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्यदेव की पुत्री यमुना अपने भाई यमराज से अत्यंत स्नेह रखती थीं। वे उन्हें बार-बार अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करती थीं, लेकिन यमराज अपने दायित्वों में व्यस्त होने के कारण नहीं जा पाते थे। एक दिन यमराज ने अपनी बहन का आग्रह स्वीकार किया और उसके घर पहुंचे। यमुना ने अपने भाई का बड़े प्रेम से स्वागत किया, माथे पर तिलक लगाया और स्वादिष्ट भोजन कराया। भाई के स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना को वर मांगने को कहा। यमुना ने प्रार्थना की कि इस दिन जो भी बहन अपने भाई का तिलक करे, उसके भाई की दीर्घायु हो और उसे कभी अकाल मृत्यु का भय न हो। यमराज ने यह वरदान दे दिया, तभी से भाई दूज का पावन पर्व मनाने की परंपरा आरंभ हुई।


</description><guid>11714</guid><pubDate>2025-10-22 17:32:08 5:34:19 pm</pubDate></item><item><title>पर्युषण पर्व (Paryushan Parv) :जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व,समाज को अच्छी सीख</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11446</link><description>जिसे जैन धर्मावलंबी विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। यह पर्व आत्मशुद्धि, तपस्या, और क्षमा याचना पर आधारित होता है। पर्युशन पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि करना और अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह जैसे जैन धर्म के पांच महाव्रतों का पालन करना है।


यह पर्व श्वेतांबर और दिगंबर, दोनों जैन समुदायों द्वारा मनाया जाता है, हालांकि इनके बीच पर्व की तिथियों और कुछ रीति-रिवाजों में थोड़ा अंतर हो सकता है। श्वेतांबर समुदाय में यह पर्व 8 दिन तक चलता है, जबकि दिगंबर समुदाय में इसे 10 दिन तक मनाया जाता है, जिसे 'दश लक्षण पर्व' कहा जाता है।


पर्व के दौरान जैन अनुयायी उपवास करते हैं, ध्यान और प्रार्थना करते हैं, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं, और अपने आचरण को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस पर्व का अंत क्षमावाणी दिवस के साथ होता है, जिस दिन सभी एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं और 'मिच्छामि दुक्कडम' कहकर अपने द्वारा किए गए किसी भी गलत कार्य के लिए क्षमा याचना करते हैं।
पर्युषण पर्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: जैन धर्म की प्राचीन परंपराओं और महावीर स्वामी के उपदेशों से जुड़ी है। यह पर्व जैन धर्म के दोनों प्रमुख संप्रदायों (श्वेतांबर और दिगंबर) में मनाया जाता है और इसका उद्देश्य आत्मशुद्धि, तपस्या, और क्षमायाचना है।


पर्युषण पर्व का इतिहास:
महावीर स्वामी के समय से जुड़ाव:
 पर्युषण पर्व की उत्पत्ति का संबंध 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के समय से माना जाता है। महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों में अहिंसा, सत्य, तप, और संयम पर जोर दिया था। उनके द्वारा प्रचारित इन मूल्यों को जीवंत रखने के लिए इस पर्व का आयोजन किया जाता है। महावीर स्वामी के जीवन और उनके द्वारा प्रचारित धार्मिक सिद्धांत इस पर्व का मुख्य आधार माने जाते हैं। यह पर्व उनके द्वारा प्रतिपादित मोक्ष के मार्ग को अनुयायियों तक पहुंचाने के लिए मनाया जाता है।
पुराने समय में वर्षायोग के साथ संबंध:इस पर्व का प्रारंभिक स्वरूप वर्षायोग से जुड़ा हुआ है। वर्षायोग वह अवधि होती थी जब जैन साधु और साध्वियाँ बारिश के मौसम में स्थायी रूप से एक ही स्थान पर रहते थे। प्राचीन भारत में बारिश के मौसम में यात्रा करना कठिन होता था, और इस कारण साधु-साध्वियाँ वर्षायोग के दौरान एक स्थान पर ध्यान, अध्ययन, और तपस्या करते थे। इस समय का उपयोग आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि के लिए किया जाता था। इसी परंपरा से पर्युषण पर्व का विकास हुआ।
क्षमा की परंपरा: जैन धर्म के इतिहास में क्षमा याचना का विशेष महत्व रहा है। तीर्थंकरों और अन्य धर्मगुरुओं ने हमेशा क्षमा को एक महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य के रूप में स्थापित किया है। यह पर्व लोगों को सिखाता है कि क्षमा मांगना और क्षमा करना दोनों ही आत्मा की शुद्धि और मोक्ष के लिए आवश्यक हैं।


पंचकल्याणक और भगवान महावीर


 पर्युषण पर्व के दौरान कुछ धार्मिक पूजा-पाठ भगवान महावीर के जीवन के महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े होते हैं। पंचकल्याणक पूजा में भगवान महावीर के जन्म, दीक्षा, कैवल्यज्ञान, और मोक्ष की घटनाओं का स्मरण किया जाता है। इस प्रकार, पर्युषण पर्व महावीर स्वामी की शिक्षाओं के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का भी एक तरीका है।


धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन: पर्युषन पर्व के इतिहास में यह देखा जाता है कि इस समय जैन अनुयायी अपने धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और पाठ करते थे। कालांतर में यह परंपरा विकसित होती गई और आज भी अनुयायी कल्पसूत्र जैसे ग्रंथों का पाठ करते हैं। कल्पसूत्र में भगवान महावीर के जीवन की घटनाओं का वर्णन होता है, जिसे इस पर्व के दौरान विशेष रूप से पढ़ा जाता है।


समकालीन परिप्रेक्ष्य:
इतिहास में इस पर्व का स्वरूप और विधियाँ भले ही अलग-अलग रही हों, लेकिन आज भी यह पर्व जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है। इसके माध्यम से जैन अनुयायी अपने धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन करते हैं और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ते हैं पर्युषण पर्व के महत्व और प्रक्रियाओं को समझने के लिए इसे और भी विस्तार से देखा जा सकता है:

पर्युषण के दिन और उनके विशेष महत्व:
श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण पर्व 8 दिन तक चलता है। पहले सात दिनों में लोग प्रार्थना, उपवास और धार्मिक गतिविधियों में संलग्न होते हैं। 8वें दिन को संवत्सरी कहा जाता है, जो पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है।
दिगंबर परंपरा में यह पर्व 10 दिनों का होता है, जिसे 'दशलक्षण पर्व' कहा जाता है। इन 10 दिनों में जैन धर्म के दस धर्मों का पालन करने का प्रयास किया जाता है, जैसे कि क्षमा, मार्दव (विनम्रता), आर्जव (सादगी), सत्य, शौच (पवित्रता), संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य (निर्मोह) और ब्रह्मचर्य।


उपवास और तपस्या:
उपवास पर्युषण पर्व का एक प्रमुख हिस्सा होता है। जैन अनुयायी विभिन्न प्रकार के उपवास करते हैं, जो व्यक्ति की शारीरिक क्षमता और मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। कुछ लोग इस दौरान संपूर्ण जल या आहार का त्याग कर देते हैं, जबकि कुछ सीमित भोजन करते हैं।
अठाईइस में आठ दिनों तक केवल जल ग्रहण किया जाता है।


तेला यह तीन दिनों का उपवास होता है, जिसमें व्यक्ति बिना भोजन और जल के रहता है।


एकासना: इसमें दिन में एक बार ही भोजन ग्रहण किया जाता है।

पर्युषण का आध्यात्मिक संदेश:
इस पर्व का सबसे बड़ा संदेश आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की ओर अग्रसर होना है। जैन धर्म के अनुयायी इस पर्व के माध्यम से यह सीखते हैं कि उन्हें जीवन में अहिंसा, सत्य, और तपस्या का पालन करते हुए मोक्ष के मार्ग पर चलना चाहिए।


डॉ. गीतांजलि पंकज</description><guid>11446</guid><pubDate>2025-09-06 17:34:48 5:35:31 pm</pubDate></item><item><title>मित्रता: हर रिश्ते की जान</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11163</link><description>

मित्रता जीवन की वह धुरी है, जिस पर कई भावनात्मक रिश्ते टिके होते हैं। माता-पिता हमारे जन्मदाता होते हैं, लेकिन मित्र हम स्वयं चुनते हैं। यही कारण है कि एक सच्चा मित्र हमारे जीवन को दिशा दे सकता है। वह हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाता है और हमें संघर्ष के समय संभालता है। मित्रता का मिश्रण किसी भी रिश्ते में मिठास ले आता है।


मित्र जीवन के सभी रंगों में साथ निभाते हैं चाहे वह परीक्षा का तनाव हो, परिवार की कोई समस्या या फिर सफलता की खुशी। एक अच्छा मित्र हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। वह हमारी आत्मा का दर्पण होता है, जो हमें बिना किसी दिखावे के स्वीकार करता है।


सच्चे मित्र की पहचान मुश्किल नहीं होती। वह आपके सामने नकाब नहीं पहनता। जब पूरी दुनिया आपका साथ छोड़ दे, तब भी एक सच्चा मित्र आपके पास खड़ा रहता है। वह आपकी गलतियों पर नाराज़ होता है, लेकिन आपका साथ कभी नहीं छोड़ता।सच्चा मित्र कभी ईर्ष्या नहीं करता, बल्कि आपकी सफलता में दिल से खुश होता है।


आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और डिजिटल दुनिया में सच्ची मित्रता कम होती जा रही है। लोग सोशल मीडिया पर हजारों फ्रेंड्स तो बना लेते हैं, लेकिन दिल से जुड़े दोस्त मिलना कठिन हो गया है। इसलिए यदि आपके जीवन में कोई ऐसा मित्र है जो निस्वार्थ भाव से आपका साथ देता है, तो वह अनमोल है।


मित्रता एक सुंदर रिश्ता है जो जीवन को आसान और रंगीन बनाता है। एक अच्छा मित्र जीवन के हर मोड़ पर हमें संभाल सकता है और हमारी सोच को सकारात्मक बना सकता है। हमें भी एक अच्छा मित्र बनने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि मित्रता सिर्फ पाने की नहीं, निभाने की भी चीज़ है।


मित्रता कोई समझौता नहीं होती, यह एक ऐसा रिश्ता है जो दिलों से जुड़ा होता है। यह रिश्ता मजबूरी का नहीं बल्कि अपनापन और विश्वास का होता है। मित्र वही होता है जो हमारे हँसते चेहरे के पीछे छिपे आँसू भी पढ़ ले।


आज के समय में मित्रता के रूप बदल गए हैं। अब लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जुड़े होते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से दूर होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया में चैट करने वाले दोस्त बहुत हैं, परंतु वे जो दुःख में कंधा दे सकें वो कम हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई मित्रता को प्राथमिकता दें, और अपने सच्चे दोस्तों को समय और अपनापन दें।


मित्रता निभाना भी एक कला है,मित्र बनाना आसान है, लेकिन निभाना कठिन। कई बार अहंकार, जलन या गलतफहमियाँ इस रिश्ते को कमजोर कर देती हैं। एक अच्छा मित्र बनने के लिए ज़रूरी है:


* धैर्य रखना
* विश्वास बनाए रखना
* माफ़ करने की भावना रखना
* और सबसे ज़रूरी  समय देना।


मित्रता जीवन की सबसे प्यारी भावना है। यह वह रिश्ता है जिसे शब्दों में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता। एक सच्चा मित्र जीवन को सरल, सुंदर और प्रेरणादायक बना देता है। ऐसे मित्र को पाकर हम धन्य हो जाते हैं।


हमें भी चाहिए कि हम अपने मित्रों के साथ सच्चाई, वफादारी और स्नेह से जुड़ें और इस पवित्र रिश्ते को जीवन भर निभाएँ।</description><guid>11163</guid><pubDate>2025-08-02 18:59:40 7:01:14 pm</pubDate></item><item><title> हरियाली का उत्सव - हरेली पर्व</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11082</link><description>शीर्षक: हरियाली का उत्सव - हरेली पर्व
भारत विविधता और त्योहारों का देश है। छत्तीसगढ़ राज्य में मनाया जाने वाला हरेली पर्व एक विशेष और पारंपरिक त्यौहार है, जो प्रकृति, कृषि और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यह पर्व किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण जनजीवन के लिए विशेष महत्व रखता है।


हरेली का अर्थ और समय:
हरेली शब्द हरियाली से बना है, जिसका अर्थ है  हरी-भरी धरती। यह पर्व सावन महीने की अमावस्या को मनाया जाता है, जब चारों ओर हरियाली छा जाती है और खेतों में फसलें लहराने लगती हैं।


त्योहार की विशेषताएं:
हरेली मुख्य रूप से कृषि से जुड़ा त्योहार है। इस दिन किसान अपने कृषि यंत्रों  जैसे हल, कुल्हाड़ी, कुदाल, हंसिया आदि की पूजा करते हैं और उन्हें साफ-सुथरा करते हैं। यह त्योहार प्रकृति और श्रम के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का प्रतीक है।


गांवों की परंपराएं: गांवों में घर-घर नीम की डालियों को दरवाजे पर लगाया जाता है, जिससे रोग रहे।बच्चे लकड़ी के बैल (नांगर/हल) बनाते हैं और खेलते हैं।कहीं-कहीं घुड़दौड़ और गेड़ी चढ़ने की प्रतियोगिताएं भी होती हैं, जो बच्चों और युवाओं के बीच खास उत्साह का कारण बनती हैं।


लोक मान्यताएं: ऐसा माना जाता है कि इस दिन अगर किसान अपने औजारों की पूजा करें, तो खेती में समृद्धि आती है और फसलें अच्छी होती हैं। साथ ही, यह पर्व पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक जीवन के महत्व को भी उजागर करता है।


नवाचार और संरक्षण का संदेश:
हरेली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह प्रकृति से जुड़ने और पारंपरिक जीवन मूल्यों को सहेजने का भी प्रतीक है। यह त्योहार हमें पर्यावरण संरक्षण, कृषि संस्कृति और सामूहिकता का पाठ पढ़ाता है।


हरेली पर्व: परंपरा, संस्कृति और समृद्धि का प्रतीक


सांस्कृतिक महत्व:
हरेली छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो ग्रामीण संस्कृति की आत्मा को दर्शाता है। यह त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जन-जीवन की सामाजिक एकता, सहयोग और प्राकृतिक संतुलन का उत्सव भी है।


पशुओं की पूजा:
इस दिन किसान न केवल अपने औजारों की पूजा करते हैं, बल्कि अपने पशुओं  विशेषकर बैल, गाय को भी स्नान कराते हैं, उन्हें सजाते हैं और उनकी पूजा करते हैं। क्योंकि खेती में पशुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, यह दिन उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी दिन होता है।


पारंपरिक व्यंजन:
हरेली के दिन विशेष रूप से चौसला,मुठिया, भजिया, ठेठरी, खुरमी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। गांवों में यह दिन मेल-मिलाप और आनंद का अवसर होता है।


लोकगीत और नृत्य:
कई स्थानों पर महिलाएं और युवतियाँ हरेली के अवसर पर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं, जिनमें वर्षा, हरियाली, बैल और खेती के जीवन को दर्शाया जाता है। ढोलक और मांदर की थाप पर लोकनृत्य भी प्रस्तुत किए जाते हैं।


आज के संदर्भ में हरेली का महत्व:
वर्तमान समय में जब लोग प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, हरेली जैसे पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं। यह त्योहार हमें कृषि कार्य, पर्यावरण प्रेम, पशु संरक्षण, और लोकसंस्कृति के महत्व की याद दिलाता है।


सरकार द्वारा भी इस त्योहार को बढ़ावा देने के लिए हरीतिमा अभियान, स्वच्छता अभियान, और खेती में जैविक तरीकों को अपनानेजैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। स्कूलों में भी इस दिन हरेली उत्सव मनाया जाता है ताकि बच्चों को छत्तीसगढ़ की परंपराओं से जोड़ा जा सके।
हरेली न केवल एक त्योहार है, बल्कि यह हरियाली, स्वास्थ्य, संस्कृति, और समृद्धि का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अगर हम प्रकृति और परंपराओं का सम्मान करें, तो जीवन में खुशहाली और संतुलन बना रहता है।


हरेली पर्व छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और हरियाली के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यह त्योहार हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर चलने की प्रेरणा देता है। आज के युग में ऐसे त्योहारों का संरक्षण करना हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाने जैसा है।




डॉ. गीतांजलि पंकज की कलम से</description><guid>11082</guid><pubDate>2025-07-24 11:23:48 11:25:36 am</pubDate></item><item><title> शांतिकुंज, हरिद्वार से शक्ति कलश रथ का भव्य स्वागत अवंती एलीगेंस परिसर में</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=11075</link><description>शांतिकुंज, हरिद्वार से शक्ति कलश रथ का भव्य स्वागत अवंती एलीगेंस परिसर में


अवंती एलीगेंस, मंगलवार, 22 जुलाई 2025:


आज हमारे अवंती एलीगेंस परिसर को एक दिव्य और ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जब शांतिकुंज, हरिद्वार से पधारा शक्ति कलश रथ परिसर में पहुंचा। इस पावन अवसर पर स्मृति ज्योति राव एवं रुचिता राव ने अवंती एलीगेंस परिवार की ओर से रथ का गर्मजोशी से स्वागत किया।


यह रथ यात्रा परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के शताब्दी महोत्सव के उपलक्ष्य में देशभर में निकाली जा रही है। गुरुदेव द्वारा वसंत पंचमी 1926 को प्रारंभ की गई अखंड दीप स्थापना को वर्ष 2026 की वसंत पंचमी को 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इसी के साथ माताजी (वंदनीय भगवती देवी शर्मा जी) का भी शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है।


इस ऐतिहासिक अवसर को जन-जन तक पहुँचाने और घर-घर गुरुदेव का संदेश फैलाने का संकल्प शक्ति कलश रथ यात्रा के माध्यम से लिया गया है।


गुरुदेव का उद्घोष 
ज्ञान यज्ञ की ज्योति जलाने  हम घर-घर में जाएंगे।
इस रथ यात्रा की आत्मा है, जो आत्मिक जागरण, संस्कार और समाज निर्माण की प्रेरणा को हर परिवार तक पहुंचा रही है।


इस दिव्य आगमन के उपलक्ष्य में एक दीप यज्ञ का आयोजन भी किया गया, जिसमें निवासियों ने बड़ी श्रद्धा और भावनात्मक सहभागिता के साथ भाग लिया।
यह आयोजन अवंती एलीगेंस परिवार के लिए न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बना, बल्कि एकजुटता और सकारात्मकता का प्रतीक भी रहा।


???? सादर,
रुचिता राव
गायत्री परिवार
अवंती एलीगेंस</description><guid>11075</guid><pubDate>2025-07-23 14:48:43 2:49:49 pm</pubDate></item><item><title>केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बाबा महाकाल के किए दर्शन, भस्म आरती में लिया हिस्सा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10667</link><description>उज्जैन।केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपने उज्जैन प्रवास के दौरान महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन-पूजन किया। वे प्रात:कालीन भस्म आरती में शामिल हुए और भगवान महाकालेश्वर का विधिवत पूजन-अर्चन किया। इस अवसर पर मंदिर की पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण में उन्होंने भगवान महाकाल से देश की समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना की।
धर्मेंद्र प्रधान का महाकालेश्वर मंदिर में आगमन सुबह तड़के हुआ। उन्होंने अपनी पत्नी मृदुला प्रधान संग बाबा भस्म आरती में हिस्सा लिया। पूजन का कार्य मंदिर के पुजारी जितेंद्र शर्मा ने संपन्न करवाया। उन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा को पूर्ण किया, जिसमें मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पूरी श्रद्धा के साथ हिस्सा लिया। पूजन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने मंदिर परिसर में कुछ समय व्यतीत किया और भगवान महाकाल के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया।
भस्म आरती महाकाल मंदिर की एक अनूठी और विश्व प्रसिद्ध पूजा है। महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की ओर से मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का भव्य स्वागत किया गया। समिति के सदस्य आशीष दुबे और अभिषेक शर्मा ने उनका सत्कार किया। उन्हें मंदिर की ओर से प्रसाद, शॉल और स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। स्वागत के दौरान समिति ने मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मंदिर की प्राचीन परंपराओं और धार्मिक महत्व के बारे में भी अवगत कराया।
इस दौरान उन्होंने मंदिर की व्यवस्थाओं और प्रबंधन की भी सराहना की। धर्मेंद्र प्रधान ने इस अवसर पर कहा कि बाबा महाकाल की कृपा से वे स्वयं को धन्य महसूस कर रहे हैं। उज्जैन देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक है और यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
महाकालेश्वर मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। ऐसे में इस अवसर पर मंदिर परिसर में सुरक्षा और व्यवस्था के लिए प्रशासन की ओर से व्यापक इंतजाम किए गए थे।</description><guid>10667</guid><pubDate>2025-06-07 17:51:08 5:51:45 pm</pubDate></item><item><title>राम मंदिर में तीन दिवसीय प्राणप्रतिष्ठा महाआयोजन शुरू, मुख्य समारोह 5 जून को</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10630</link><description>अयोध्या।राम नगरी एक बार फिर ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनने जा रही है। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में तीन दिवसीय प्राण प्रतिष्ठा महा आयोजन की शुरुआत हो गई है। इस अनुष्ठान में राम दरबार सहित सात मंदिरों में देव प्रतिमाओं की स्थापना की जाएगी। समापन 5 जून को भव्य समारोह के साथ होगा, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शामिल होंगे।

वैदिक रीति से हो रहा आयोजन
काशी के यज्ञाचार्य जयप्रकाश के नेतृत्व में 101 वैदिक आचार्य पूरे आयोजन को वैदिक विधियों से संपन्न करा रहे हैं। पहले दिन पंचांग पूजन, मंडप प्रवेश, यज्ञ मंडप पूजन, ग्रह योग, अग्निस्थापन जैसे अनुष्ठान हुए। मूर्तियों के शुद्धिकरण और जलाधिवास की प्रक्रिया भी आज सुबह शुरू की गई।

हवन और मंत्रोच्चार के साथ आरंभ
मंगलवार और बुधवार को सुबह 6:30 बजे से लगातार 12 घंटे तक पूजा-पाठ और हवन होगा। इसमें 1975 वैदिक मंत्रों के साथ अग्निहोत्र यज्ञ, रामरक्षा स्तोत्र, हनुमान चालीसा और भक्ति गीतों का पाठ किया जाएगा।

5 जून को होगा मुख्य समारोह
मुख्य आयोजन 5 जून को होगा, जब राम दरबार (श्रीराम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान) की प्राण प्रतिष्ठा होगी। साथ ही सात अन्य देवालयों में भी देव प्रतिमाएं स्थापित की जाएंगी।

श्रद्धालुओं के लिए खुला रहेगा मंदिर
पूरे कार्यक्रम के दौरान भक्तों के दर्शन पर कोई रोक नहीं रहेगी। रामनगरी के प्रमुख संत और विद्वान आचार्य भी इस ऐतिहासिक अवसर पर उपस्थित रहेंगे।

यह आयोजन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद की एक और ऐतिहासिक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें श्रद्धा, परंपरा और राष्ट्र की चेतना का संगम हो रहा है।</description><guid>10630</guid><pubDate>2025-06-03 12:37:35 12:38:23 pm</pubDate></item><item><title>हनुमान जयंती पर रहेगा भद्रा का साया, इस मुहूर्त में करें बजरंगबली की पूजा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10257</link><description>-पंडित यशवर्धन पुरोहित
हिंदूपंचांग के अनुसार, चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को भगवान राम के अनन्य भक्त हनुमान जी का जन्म हुआ था। यही वजह है कि इस दिन देशभर में हनुमान जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी का जन्म वानरराज केसरी और माता अंजना के घर चैत्र पूर्णिमा के दिन हुआ था। मान्यता है कि इस दिन विधिवत पूजा, व्रत और श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से जीवन के सभी दुख-दर्द समाप्त हो जाते हैं और सुख-शांति का वास होता है। हनुमान जी को बजरंगबली, संकटमोचन और अंजनीपुत्र नामों से भी जाना जाता है। इस जयंती पर हनुमान मंत्रों का जाप करना विशेष फलदायी माना गया है। ऐसे में आइए जानते हैं हनुमान जयंती की शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, आरती, कथा सहित अन्य जान


हनुमान जयंती 2025 की तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 12 अप्रैल 2025 को सुबह 3 बजकर 21 मिनट पर होगी और इस तिथि का समापन 13 अप्रैल को सुबह 5 बजकर 51 मिनट पर होगा। ऐसे में इस साल हनुमान जयंती 12 अप्रैल, शनिवार को मनाई जाएगी।

हनुमान जयंती 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ- 12 अप्रैल को सुबह 3 बजकर 21 मिनट से
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि समाप्त- 13 अप्रैल को सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक
हनुमान जन्मोत्सव तिथि- 12 अप्रैल2025,शनिवार

हनुमान जयंती पर रहेगा भद्रा का साया
ज्योतिष की मानें तो इस बार हनुमान जन्मोत्सव के दिन भद्रा काल का साया रहने वाला है। ऐसे में इस दिन आप ब्रह्म मुहूर्त में या फिर भद्रा काल खत्म होने के बाद हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार, भद्रा का समय 12 अप्रैल सुबह 06 बजकर 22 मिनट से शाम 04 बजकर 35 मिनट तक रहेगा।

हनुमान जी का भोग
हनुमान जी को बूंदी के लड्डू अति प्रिय है। इसके अलावा इस दिन आप हनुमान जी को गुड़-चना, इमरती, जलेबी, लड्डू, पान का बीड़ा, खीर और फल आदि का भोग लगाएं।

हनुमान जयंती व्रत पारण का शुभ मुहूर्त
हनुमान जयंती का पारण 13 अप्रैल 2025 को किया जाएगा। पंचांग के अनुसार, 13 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 58 मिनट के बाद आप किसी भी समय व्रत का पारण कर सकते हैं।

हनुमान जन्मोत्सव पूजा का शुभ मुहूर्त
शुभ  उत्तम: सुबह 07:35 से 09:10 तक
लाभ  उन्नति: दोपहर 01:58 से 03:34 तक
अमृत  सर्वोत्तम: दोपहर 03:34 से शाम 05:09 तक
अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:56 से दोपहर 12:48 तक
ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04:29 से 05:14 तक

श्री हनुमान जी की आरती
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।
जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके।।
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतान के प्रभु सदा सहाई।।
दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारी सिया सुध लाए।।
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई।।
लंका जारी असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे।।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आणि संजीवन प्राण उबारे।।
पैठी पताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े।।
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।।
सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे।।
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई।।
लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई। तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।।
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसी बैकुंठ परमपद पावै।।

हनुमान जन्मोत्सव पर करें इन मंत्रों का जाप
हं हनुमते नमः:।
ॐ नमो हनुमते रूद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोग हराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा।
ॐ नमो हनुमते आवेशाय आवेशाय स्वाहा।
ॐ महाबलाय वीराय चिरंजिवीन उद्दते. हारिणे वज्र देहाय चोलंग्घितमहाव्यये। नमो हनुमते आवेशाय आवेशाय स्वाहा।
हनुमन्नंजनी सुनो वायुपुत्र महाबल: अकस्मादागतोत्पांत नाशयाशु नमोस्तुते।


</description><guid>10257</guid><pubDate>2025-04-11 19:07:37 7:14:59 pm</pubDate></item><item><title>हनुमान जन्मोत्सव 12 अप्रैल</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10210</link><description> हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह परनाम ।
 राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम ।।
श्री रामचरित मानस के सुंदर कांड में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा यह पंक्तियां यूं ही नहीं रच दी गईं हैं । इन पंक्तियों का सार पूरी रामायण में स्पष्ट समझा जा सकता है । भगवान श्री राम से वानर राज सुग्रीव की मित्रता का प्रसंग हो या फिर सीता माता की खोज की योजना , प्रभु श्री राम के अनुज को शक्तिबाण लगने के बाद संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राणों की रक्षा का संकल्प , दशानन के भ्राता विभीषण के हृदय में प्रभु श्री राम के प्रति आस्था का दीप प्रज्ज्वलित करने तक इन पंक्तियों का अर्थ भलीभांति समझ में आता है । जब तक प्रभु श्री राम के द्वारा सौंपा गया कार्य सिद्ध नहीं हो जाता , उनके अनन्य भक्त हनुमान जी कहते हैं , उन्हें विश्राम नहीं करना है ! हनुमान जी के उक्त संकल्प के अनेक उदाहरण रामचरित मानस और रामायण में उल्लेखित हैं । इस संदर्भ में सबसे सटीक प्रमाण सुंदर कांड में ही हमारे समक्ष आता है । लंका की ओर जाते समय हनुमान जी को मैनाक पर्वत ने कुछ समय के लिए अपने ऊपर विश्राम करने का निमंत्रण दिया । अपने प्रभु की भक्ति और कर्मनिष्ठा से ओत - प्रोत हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को अपने हाथों से स्पर्श कर प्रणाम किया और बड़े ही विनम्र भाव के साथ कहा :-  अपने प्रभु का काम संपन्न किए बिना मुझे विश्राम नहीं करना है ।
 हनुमान जी इस कलियुग के अकेले ऐसे चिरंजीव प्रभु श्री राम के सेवक हैं , जो आज भी उनके कार्यों को संपन्न कर रहे हैं । हनुमान जी के मस्तिष्क में कूट - कूट कर भरी हुई प्रबंध क्षमता यह बताती है कि उनसे बड़ा  मैनेजमेंट गुरु  कोई और नहीं ! हनुमान जी की प्रबंधन क्षमता का सबसे बाद प्रसंग उस वक्त सामने आता है , जब वे माता सीता की खोज में लंका प्रवेश करते हैं । वे इस विचार में खोए होते हैं कि इतनी बड़ी स्वर्ण नगरी में माता का ठिकाना कैसे और किससे पता करें ? उनके विचारों को पूर्णता मिली जब उन्होंने विभीषण के घर के द्वार पर तुलसी का पौधा , स्वस्तिक और धनुष - बाण के चिन्ह देखे । उनकी तीक्ष्ण बुद्धि से उन्होंने जान लिया कि असुरों की इस स्वर्ण नगरी में कोई तो सज्जन निवास कर रहा है ! उन्होंने विभीषण से दोस्ती की और अपनी प्रबंधन क्षमता का परिचय देते हुए प्रभु श्री राम के गुणों से विभीषण को अवगत कराया ! उन्होंने विभीषण को सीधे - सीधे प्रभु श्री राम के खेमे में शामिल होने का आमंत्रण नहीं दिया । हनुमान जी ने विभीषण के अंतर्मन में प्रभु श्री राम के प्रति उत्सुकता का बीज बो दिया ! जब लंकापति रावण ने भरी सभा में विभीषण का अपमान किया तब विभीषण को हनुमान जी और उनकी कही बातें याद आई और वह सीधे प्रभु श्री राम की शरण में पहुंच गया ! यह बजरंगबली की प्रबंधन क्षमता का ही परिणाम था कि उन्होंने यह समझ लिया था कि लंका पर जीत के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की प्रबल जरूरत होगी जो लंका के हर कोने से , वहां रहने वाले लोगों से भलीभांति परिचित हो ! उन्हें विभीषण में वह व्यक्ति नजर आया ।
 हनुमान जी का अवतार ही प्रभु श्री राम की सहायता के लिए हुआ था । स्कंद पुराण में उल्लेख मिलता है कि भगवान भोलेनाथ के ग्यारहवें रुद्रावतार द्वारा ही श्री विष्णु के राम - अवतार की सहायता की जाएगी । यही कारण था कि भगवान शिव - शंकर ने श्री विष्णु से दास्य ( दास ) रूप में अवतार का वरदान प्राप्त किया । भगवान शंकर के समक्ष बड़ा धर्म संकट था कि जिस रावण के वध हेतु वे श्री राम की सहायता करना चाहते हैं , वह उनका परम भक्त भी है ! इसी रावण ने अपने दस शीश को अर्पित कर भगवान शंकर के दस रुद्रों को संतुष्ट कर रखा था । आखिरकार ग्यारहवें रुद्र के रूप में भगवान भोलेनाथ ने अपने अंशावतार को हनुमान रूप में प्रभु श्री राम की सहायता के लिए अवतरित किया । इतना ही नहीं स्वर्ग के सारे देवताओं ने ग्यारहवें रुद्र के रूप में जन्मे हनुमान जी को अपार शक्तियां प्रदान की । विद्या - बुद्धि से लेकर बल - बुद्धि तक उनकी चतुरता का कोई सानी नहीं था । सर्व - शक्तिशाली होकर हनुमान जी ने अपने आराध्य के प्रति समर्पण का जो भाव अपने अंदर बनाए रखा, उसी के चलते वे एक कुशल प्रबंधक के रूप में स्थापित हुए । हनुमान जी अतुलित बलशाली होते हुए भी भक्ति की अनुपम मिसाल बने रहे ! उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मर्यादा पुरुषोत्तम ने उन्हें वरदान दिया कि मुझसे भी ज्यादा तुम्हारे मंदिर होंगे और कलियुग में लोग अपने संकटों से मुक्ति पाने के लिए तुम्हारी ही उपासना करेंगे !
 हनुमान जी ऐसे भक्त और सेवक सिद्ध हुए हैं जिन्होंने बड़े - बड़े काम करने के बाद भी अपनी शक्ति पर अंहकार नहीं किया ! उन्होंने सारे राम काज का श्रेय भी अपने प्रभु श्री राम को ही दिया । हमने सुंदर कांड में देखा है कि रावण की लंका दहन करने के बाद जब वे अपने आराध्य के पास पहुंचे तब प्रभु श्री राम द्वारा उनकी शक्ति और काम की प्रशंसा को भी उन्होंने अपने प्रभु की कृपा ही करार दिया । जब प्रभु श्री राम ने पूछा कि इतने विशाल समुद्र को उन्होंने कैसे पार किया ? कैसे इतनी बड़ी लंका को अग्नि के हवाले किया ? हनुमान जी ने बड़ी ही विनम्रता के साथ कहा यह सब आपकी कृपा का ही फल है ।  प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि... अर्थात ये सब प्रताप तो आपकी मुद्रिका का ही था जिसे मुंह में रखकर ही मैने सौ योजन समुद्र लांघा ! प्रभु श्री राम ने तब कहा मुद्रिका जब तुमने जनक नंदनी को सौंप दिया तब वापसी में कैसे सागर लांघा ? हनुमान जी की प्रबंधन क्षमता यहां भी सामने आई और उन्होंने बड़ी ही सहजता के साथ कहा - प्रभु लौटते समय मां जानकी का चूड़ामणि मेरे पास था और मैं इस पार आ सका । अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा और भक्ति का ऐसा दृश्य अन्यत्र दुर्लभ है । रामचरित मानस के सुंदर कांड में ही आई चौपाई भी इस बात को सिद्ध करती है कि महाबली हनुमान ने अपने द्वारा किए गए हर कार्य को प्रभु श्री राम की कृपा का आधार सिद्ध कर दिखाया । उन्होंने ऐसे ही प्रश्न पर प्रभु श्री राम के समक्ष कहा -
 ता कहूं प्रभु कछु अगम नहीं , जा पर तुम अनुकूल ।
 तव प्रभाव बड़वानलही, जारि सकई
 खलु तूल ।।
 अर्थात हे ! प्रभु इस संसार में उस व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं जिस पर आपकी कृपा हो । एक रूई का रेशा भी समुद्र की आग को जला सकता है !</description><guid>10210</guid><pubDate>2025-04-08 14:33:47 2:34:20 pm</pubDate></item><item><title>कब है अक्षय तृतीया? एक क्लिक में पढ़ें पर्व को मनाने की खास वजह</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10200</link><description>नई दिल्ली। अक्षय तृतीया के पर्व को आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन अबूझ मुहूर्त होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya 2025) के अवसर पर सभी कामों को करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस दिन सोना और चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन विशेष चीजों का दान करने से धन लाभ के योग बनते हैं। साथ ही सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों अक्षय तृतीया का त्योहार मनाया जाता है? अगर नहीं पता, तो आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।

अक्षय तृतीया 2025 डेट और शुभ मुहूर्त (Akshaya Tritiya 2025 Date and Shubh Muhurat)
वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 29 अप्रैल को शाम 05 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन यानी 30 अप्रैल को दोपहर 02 बजकर 12 मिनट पर तिथि खत्म होगी। सनातन धर्म में सूर्योदय तिथि का विशेष महत्व है। ऐसे में इस बार 30 अप्रैल को (Kab Hai Akshaya Tritiya 2025) अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। अक्षय तृतीया के दिन पूजा करने का शुभ मुहूर्त सुबह 05 बजकर 41 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक है। इस दौरान किसी भी समय साधक पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
ब्रह्म मुहूर्त - सुबह 04 बजकर 15 मिनट से 04 बजकर 58 मिनट तक
अभिजीत मुहूर्त - कोई नहीं
विजय मुहूर्त - दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 24 मिनट तक
सर्वार्थ सिद्धि योग - पूरे दिन
गोधूलि मुहूर्त - शाम 06 बजकर 55 मिनट से 07 बजकर 16 मिनट तक
अक्षय तृतीया का धार्मिक महत्व (Akshaya Tritiya 2025 Significance)
अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर दान करने का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, इस दिन दान करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही मां लक्ष्मी की कृपा बरसती है। पौराणिक कथा के अनुसार, वैशाख माह के शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया से सतयुग की शुरुआत हुई थी। मान्यता है कि अक्षय तृतीया से ही वेद व्यास जी ने महाभारत को लिखने की शुरुआत की थी।
इसके अलावा अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था। भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम माने जाते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भगवान परशुराम ऋषि जमदग्नि और राजकुमारी रेणुका के पुत्र थे। अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जयंती का पर्व भी मनाया जाता है।</description><guid>10200</guid><pubDate>2025-04-08 10:46:26 10:48:44 am</pubDate></item><item><title>रामलला के ललाट पर भगवान सूर्य ने किया तिलक</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10170</link><description>अयोध्या। रामनगरी में चहुंओर आराध्य के जन्मोत्सव की खुशी है। उत्सव मनाने के लिए अयोध्यावासी ही नहीं अपितु सकल प्रदेश और देशवासी उत्सुक हैं। रविवार को सुबह से राम मंदिर परिसर में विविध कार्यक्रम शुरू हो गए हैं।
दोपहर में ठीक 12 बजे भगवान सूर्य ने रामलला के ललाट पर तिलक किया। इस मौके का साक्षी बनने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचे हैं।






आने वाले भक्तों पर ड्रोन से सरयू के पवित्र जल की फुहारों से बारिश कराई गई। रामनगरी में भक्तों की कतारें लगी हैं।
मंदिर के ऊपरी हिस्से पर लगे दर्पण पर सूर्य की किरणें गिरीं। यहां से परावर्तित होकर पीतल के पाइप में पहुंचीं। पाइप में लगे दर्पण से टकराकर किरणें 90 डिग्री कोण में बदल गई।
लंबवत पीतल के पाइप में लगे तीन लेंसों से किरणें आगे बढ़ते हुए गर्भगृह में लगे दर्पण से टकराईं। यहां से 90 डिग्री का कोण बनाकर 75 मिलीमीटर टीके के रूप में रामलला के ललाट को सुशोभित किया।
</description><guid>10170</guid><pubDate>2025-04-06 13:10:37 1:11:12 pm</pubDate></item><item><title>गुरुवार को है षष्ठी तिथि, जानिए शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10113</link><description>3 अप्रैल यानी गुरुवार को चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि और का दिन है. षष्ठी तिथि आज रात 9 बजकर 42 मिनट तक रहेगी. आज चैत्र नवरात्र का छठा दिन है. आज स्कन्द षष्ठी मनायी जाएगी. आज रात 12 बजकर 2 मिनट तक सौभाग्य योग रहेगा. इसके अलावा आज पूरा दिन, पूरी रात पर कर कल सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक मृगाशिरा नक्षत्र रहेगा. जानिए गुरुवार का पंचांग, राहुकाल, शुभ मुहूर्त और सूर्योदय-सूर्यास्त का समय.
03 अप्रैल 2025 का शुभ मुहूर्त
चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि- 03 अप्रैल 2025 को रात 9 बजकर 42 मिनट तक रहेगी
सौभाग्य योग- 03 अप्रैल 2025 को रात 12 बजकर 2 मिनट तक
मृगाशिरा नक्षत्र- 03 अप्रैल 2025 पूरी रात पर कर कल सुबह 5 बजकर 51 मिनट तक
03 अप्रैल 2025 व्रत-त्यौहार- नवरात्रि का छठा दिन, आज स्कन्द षष्ठी भी मनाई जाएगी

राहुकाल का समय
दिल्ली- दोपहर 01:44  03:17 तक
मुंबई- दोपहर 02:15  03:47 तक
चंडीगढ़- दोपहर 02:01  03:35 तक
लखनऊ- दोपहर 01:44  03:17 तक
भोपाल- दोपहर 01:57  03:30 तक
कोलकाता- दोपहर 01:13  02:46 तक
अहमदाबाद- दोपहर 02:16  03:49 तक
चेन्नई- दोपहर 01:44  03:16 तक

सूर्योदय-सूर्यास्त का समय
सूर्योदय- सुबह 6:09 am
सूर्यास्त- शाम 6:39 pm</description><guid>10113</guid><pubDate>2025-04-03 12:29:16 12:33:18 pm</pubDate></item><item><title>आज पूजा में करें मां कूष्मांडा और मां स्कंदमाता की ये आरती, जीवन में मिलेंगे सभी सुख</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10080</link><description>नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, 02 अप्रैल को चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी और पंचमी तिथि है। चैत्र नवरात्र में चतुर्थी तिथि पर मां कूष्मांडा और पंचमी तिथि पर देवी स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करने का विधान है।
इस बार 02 अप्रैल को चतुर्थी और पंचमी तिथि एक ही दिन पड़ रही है, तो ऐसे में मां कूष्मांडा और स्कंदमाता की पूजा-अर्चना एक ही दिन की जाएगी। ऐसे में पूजा के दौरान आरती जरूर करें। मान्यता है कि सच्चे मन से आरती करने से साधक को पूजा का पूरा फल प्राप्त होता है और जीवन में सभी सुख मिलते हैं। आइए पढ़ते हैं मां कूष्मांडा और स्कंदमाता की आरती।  
ये है आरती करने का सही तरीका
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आरती की शुरुआत देवी के चरणों से करनी चाहिए। सबसे पहले आरती को 04 बार देवी के चरणों में, 02  बार नाभि पर, एक बार मुखमण्डल पर और 07 बार देवी के सभी अंगों पर उतारें। ऐसी मान्यता है कि इस तरह से आरती को करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है।
मां कूष्मांडा की आरती ( Maa Kushmanda Aarti)
कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी मां भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे।
सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
मां के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो मां संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥
चैत्र नवरात्र की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।
स्कंदमाता की आरती (Skandamata Ki Aarti)
जय तेरी हो स्कंदमाता।
पांचवां नाम तुम्हारा आता।
सब के मन की जानन हारी।
जग जननी सब की महतारी।
तेरी ज्योत जलाता रहूं मैं।
हर दम तुम्हें ध्याता रहूं मैं।
कई नामों से तुझे पुकारा।
मुझे एक है तेरा सहारा।
कहीं पहाड़ों पर है डेरा।
कई शहरो में तेरा बसेरा।
हर मंदिर में तेरे नजारे।
गुण गाए तेरे भक्त प्यारे।
भक्ति अपनी मुझे दिला दो।
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो।
इंद्र आदि देवता मिल सारे।
करे पुकार तुम्हारे द्वारे।
दुष्ट दैत्य जब चढ़ कर आए।
तुम ही खंडा हाथ उठाएं
दास को सदा बचाने आईं
'चमन' की आस पुराने आई।</description><guid>10080</guid><pubDate>2025-04-02 11:05:28 11:12:35 am</pubDate></item><item><title>मां कूष्मांडा की पूजा में करें इन मंत्रों का जप, रोग-दोष से मिलेगा छुटकारा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10079</link><description>नई दिल्ली। इस बार चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2025) की चतुर्थी और पंचमी तिथि की पूजन एक ही दिन किया जा रहा है। ऐसे में मां कूष्मांडा और स्कंदमाता की पूजा एक ही दिन की जाएगी। ऐसे में यह दिन दो देवियों की कृपा प्राप्ति के लिए बहुत ही उत्तम रहने वाला है।
ऐसे में आपको नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा (Navratri Maa Kushmanda Puja) के दौरान इन मंत्रों का जप जरूर करना चाहिए, ताकि आपको व आपके परिवार को मां कूष्मांडा की कृपा प्राप्त हो सके।
1. मां कूष्मांडा के मंत्र -
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।
जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्।
परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
2. मां कूष्मांडा का बीच मंत्र -
या देवी सर्वभूतेषु कुष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।
माना जाता है कि कूष्मांडा देवी की पूजा से भक्तों की सभी तरह के रोग, कष्ट और शोक से मुक्ति मिल जाती है। ऐसे में नवरात्र की अवधि कूष्मांडा देवी की कृपा के लिए खास मानी जाती है। 

3. मां कूष्मांडा का स्तोत्र (Maa kushmanda Stotra)
वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर किंकिण रत्नकुण्डल मण्डिताम्।
प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्।
कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥
4. मां कुष्मांडा का कवच -
हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥

5. मां कुष्मांडा का ध्यान -
वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥</description><guid>10079</guid><pubDate>2025-04-02 10:56:51 11:00:46 am</pubDate></item><item><title>Chaitra Navratri 2025 Day 4: आज है चैत्र नवरात्र का चौथा दिन, इस नियम से करें पूजा, जानें प्रिय भोग से लेकर सबकुछ</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10078</link><description>नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मां कूष्मांडा को सृष्टि की आदि शक्ति माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी, इसीलिए उन्हें कूष्मांडा कहा जाता है। मां कूष्मांडा आठ भुजाओं वाली हैं और अपने हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा धारण करती हैं। कहते हैं कि उनकी पूजा से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
आज चैत्र नवरात्र का चौथा दिन (Chaitra Navratri 2025 Day 4) है, तो चलिए पूजा विधि से लेकर पूरी डिटेल्स यहां जानते हैं।

पूजा मुहूर्त (Chaitra Navratri 2025 Day 4 Puja Muhurat)
हिंदू पंचांग के अनुसार, सर्वार्थ सिद्धि योग पूरे दिन रहेगा। रवि योग सुबह 06 बजकर 10 मिनट से 08 बजकर 49 मिनट तक रहेगा। इसके साथ ही विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 30 मिनट से दोपहर 03 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस दौरान आप पूजा-पाठ से लेकर कई भी शुभ व मांगलिक काम कर सकते हैं।
पूजा विधि (Chaitra Navratri 2025 Day 4 Puja Vidhi)
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
मां कूष्मांडा की पूजा का संकल्प लें।
मां कूष्मांडा की प्रतिमा स्थापित कर, उनका ध्यान करें।
मां कूष्मांडा का आह्वान करें।
मां को पीले या सफेद रंग के पुष्प अर्पित करें।
उन्हें कुमकुम, अक्षत, हल्दी और चंदन आदि चीजें अर्पित करें।
धूप और दीप जलाएं।
देवी के मंत्रों का जाप करें।
दुर्गा सप्तशती के चतुर्थ अध्याय का पाठ करें।
मां कूष्मांडा को मालपुआ का भोग बहुत प्रिय है, इसके अलावा, आप उन्हें दही और हलवा भी अर्पित कर सकते हैं।
मां कूष्मांडा की आरती करें।
अंत में मां से अपने और अपने परिवार के लिए अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
पूजन मंत्र ( Maa Kushmanda Puja Mantra)
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देवी का प्रिय भोग (Chaitra Navratri 2025 Day 4 Bhog)
मां कूष्मांडा को मालपुआ बेहद प्रिय है। ऐसी मान्यता है कि इस भोग को अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं और भक्तों को आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं। इसके साथ ही आप मां को दही और हलवा भी चढ़ा सकते हैं, जो लोग श्रद्धा भाव से मां की आराधना कर से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।</description><guid>10078</guid><pubDate>2025-04-02 10:46:29 10:52:59 am</pubDate></item><item><title>मां शारदा मंदिर के कपाट बंद होते ही आती हैं आवाजें, मंदिर खुलने से पहले ही हो जाती है पूजा</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10049</link><description>मैहर। मध्य प्रदेश के मैहर में त्रिकूट पर्वत पर स्थित माता के इस मंदिर को मैहर देवी का शक्तिपीठ कहा जाता है। मैहर का मतलब है मां का हार। माना जाता है कि यहां मां सती का हार गिरा था तब से इसे माइहार कहा जाने लगा कुछ समय बाद मैहर कर दिया गया। इसीलिए इसकी गणना शक्तिपीठों में की जाती है। करीब 1,063 सीढ़ियां चढ़ने के बाद माता के दर्शन होते हैं। पूरे भारत में मैहर मंदिर माता शारदा का अकेला मंदिर है।

इस मंदिर की मान्यता है कि यहां शाम की आरती के बाद कपाट बंद कर जब सभी पुजारी नीचे आ जाते हैं, तब मंदिर के अंदर से घंटी और पूजा करने की आवाजें आती है। कहा जाता है कि मां के भक्त आल्हा अभी भी पूजा करने के लिए आते हैं। सुबह की आरती अक्सर वे ही करते हैं। मैहर मंदिर के महंत बताते हैं कि अभी भी मां का पहला श्रृंगार आल्हा ही करते हैं और जब ब्रह्म मुहूर्त में शारदा मंदिर के पट खोले जाते हैं तो पूजा की हुई मिलती है।
कौन थे आल्हा ?
आल्हा और ऊदल दोनों भाई थे। ये बुंदेलखंड के महोबा के वीर योद्धा और परमार के सामंत थे। कालिंजर के राजा परमार के दरबार में जगनिक नाम के एक कवि ने आल्हा खण्ड नामक एक काव्य रचा था। जिसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है। इस ग्रंथ में दों वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है। आखरी लड़ाई उन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ लड़ी थी। युद्ध में चौहान हार गए थे। कहा जाता हैं कि इस युद्ध में उनका भाई वीरगति को प्राप्त हो गया था। गुरु गोरखनाथ के आदेश से आल्हा ने पृथ्वीराज को जीवनदान दे दिया था।

12 वर्षों तक की थी माता की तपस्या
पृथ्वीराज चौहान के साथ उनकी यह आखरी लड़ाई थी। मान्यता है कि मां के परम भक्त आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था, लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा था। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) शारदा मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी जिसे आज तक कोई सीधा नहीं कर पाया है। यहां के लोग कहते हैं कि दोनों भाइयों ने ही सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की थी। आल्हा ने यहां 12 वर्षों तक माता की तपस्या की थी। आल्हा माता को शारदा माई कहकर पुकारा करते थे इसीलिए प्रचलन में उनका नाम शारदा माई हो गया। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि यहां पर सर्वप्रथम आदिगुरु शंकराचार्य ने 9वीं-10वीं शताब्दी में पूजा-अर्चना की थी। माता शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी।
नवरात्रि के दौरान लगता है विशाल मेला
चैत्र नवरात्रि के 9 दिन अलग-अलग स्वरूप में पूजा अर्चना होती है। नवरात्रि के दौरान यहां विशाल मेला भी लगता है। मान्यता है कि मां के दरबार में जो भी व्यक्ति अर्जी लगाता है, वह पूर्ण होती है। इसलिए रोजाना देश के कोने कोने लाखों श्रद्धालु मां के दरबार में माथा टेकने के लिए पहुंचे हैं।

श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम
मैहर पुलिस अधीक्षक सुधीर अग्रवाल ने बताया कि नवरात्रि मेले के दौरान 500 से अधिक पुलिसबल पूरे मेला परिषद में तैनात रहते है। सैकड़ों सीसीटीवी, ड्रोन सहित उपकरणों से पूरे मेले परिसर की निगरानी की जाती है। श्रद्धालुओं को दर्शन में किसी प्रकार की सुविधा न हो इसके लिए पुलिस प्रशासन चप्पे-चप्पे पर तैनात रहता है। इस मेला परिसर को 6 जोन में डिवाइड किया गया है। जिला प्रशासन को मेले के दौरान लाखों श्रद्धालुओं के आने का अनुमान रहता है। इसके मद्देनजर श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अस्थाई विश्रामगृह छाया और पार्किंग ऑटो रिक्शा, स्वास्थ्य सेवा सहित पेयजल की व्यवस्था की जाती है। साथ ही गर्भगृह में वीआईपी दर्शन पर प्रतिबंध रहता है।</description><guid>10049</guid><pubDate>2025-04-01 11:14:48 11:16:11 am</pubDate></item><item><title>Navratri Vrat: उपवास रखने से सेहत को मिलते है ये बेहतरीन लाभ</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10048</link><description>Navratri Vrat: चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व एक महत्वपूर्ण धार्मिक और मानसिक अनुभव होता है, जिसमें भक्त मां दुर्गा की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं.

हालांकि, कुछ लोग यह सोचते हैं कि व्रत से शरीर कमजोर हो सकता है या बीमारियां हो सकती हैं, लेकिन सही तरीके से व्रत रखने से कई शारीरिक और मानसिक लाभ हो सकते हैं. आज हम आपको व्रत रखने से होने वाले फायदों के बारे में बताएंगे.
पाचन तंत्र में सुधार
व्रत रखने से शरीर को आराम मिलता है और पाचन तंत्र को भी समय मिलता है खुद को ठीक करने का. खासकर अगर आप व्रत के दौरान हल्का और पौष्टिक भोजन खाते हैं, तो पाचन बेहतर हो सकता है. व्रत से शरीर की आंतरिक सफाई भी होती है, जिससे पाचन संबंधी समस्याओं में सुधार आता है.

वजन कम करने में मदद
व्रत के दौरान खाने की मात्रा कम हो जाती है, जिससे कुल कैलोरी इनटेक में कमी आती है. इस कारण से वजन कम करने में मदद मिल सकती है. इसके अलावा, व्रत के दौरान स्वस्थ आहार लेना और ताजे फल, द्रव्य पदार्थों का सेवन करना शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है.

मनोबल में वृद्धि
व्रत रखने से मानसिक शक्ति और धैर्य में वृद्धि होती है. विशेष रूप से, जो लोग पूरी श्रद्धा और निष्ठा से व्रत रखते हैं, उनका आत्म-विश्वास और संयम बेहतर होता है. मानसिक शांति और संतुलन के लिए व्रत एक अच्छा तरीका हो सकता है.

इम्यून सिस्टम में सुधार
व्रत के दौरान, खासकर यदि आप संतुलित आहार लेते हैं, तो इससे शरीर की इम्यूनिटी में सुधार हो सकता है. फल, द्रव्य और अन्य पोषक तत्वों का सेवन करने से शरीर को ताकत मिलती है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है.
मन की शांति और ध्यान में मदद
व्रत के दौरान एकाग्रता और ध्यान की ओर बढ़ते हैं. उपवास या व्रत रखने के साथ-साथ पूजा-पाठ और ध्यान मन को शांति देते हैं. यह मानसिक तनाव को कम करता है और आत्मिक शांति मिलती है.

अच्छी त्वचा
व्रत के दौरान अधिक पानी पीने और हल्का आहार खाने से शरीर में टॉक्सिन्स बाहर निकलने में मदद मिलती है, जिससे त्वचा पर भी निखार आता है. इसके अलावा, स्वस्थ आहार जैसे फल, दूध और सूखे मेवे भी त्वचा के लिए लाभकारी होते हैं.

आध्यात्मिक विकास
व्रत के दौरान जब व्यक्ति ईश्वर के साथ जुड़ता है और उसकी पूजा करता है, तो यह उसका आध्यात्मिक विकास करता है. यह समय आत्ममंथन और आत्मसाक्षात्कार के लिए होता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में सही दिशा और उद्देश्य की प्राप्ति करता है.

हृदय और रक्त संचार के लिए फायदेमंद
व्रत के दौरान कम कैलोरी और तेलयुक्त पदार्थों का सेवन होता है, जिससे हृदय स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल लेवल को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है.

बेहतर नींद
व्रत रखने से शरीर में शांति और आराम मिलता है, जिससे अच्छी नींद आ सकती है. जब शरीर और मन शांत होते हैं, तो नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, जिससे अगले दिन आपको अधिक ऊर्जा और ताजगी मिलती है.

इन सभी फायदों को ध्यान में रखते हुए, यदि आप सही तरीके से व्रत रखते हैं और स्वस्थ आहार लेते हैं, तो यह न केवल धार्मिक बल्कि शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण से भी लाभकारी हो सकता है.</description><guid>10048</guid><pubDate>2025-04-01 11:07:06 11:09:47 am</pubDate></item><item><title>जीवन दर्शन: बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है नवरात्र, इन चीजों से बनता है यह पर्व और भी खास</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10028</link><description>श्री श्री रविशंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता आध्यात्मिक गुरु)। परिवर्तन के इस समय में प्रकृति पुराने को त्यागकर फिर से नवीव व युवा हो जाती है। वैदिक विज्ञान के अनुसार, पदार्थ अपने मूल स्वरूप में वापस लौटता है और बार-बार स्वयं को पुन: बनाता है। सृष्टि चक्रीय है, रैखिक नहीं। प्रकृति द्वारा सब कुछ पुनःचक्रित किया जाता है, जो कायाकल्प की एक सतत प्रक्रिया है। हालांकि, मानव मन सृष्टि के इस नियमित चक्र में पिछड़ जाता है। देवी मां को न केवल बुद्धि की चमक के रूप में पहचाना जाता है, बल्कि भ्रम (भ्रांति) के रूप में भी जाना जाता है। वह केवल प्रचुरता (लक्ष्मी) नहीं है, वह भूख (क्षुधा) और प्यास (तृष्णा) भी है। संपूर्ण सृष्टि में देवी मां के इस आयाम की प्रतीति करने से व्यक्ति समाधि की गहरी अवस्था में पहुंच जाता है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के माध्यम से व्यक्ति अद्वैत सिद्धि या अद्वैत चेतना में पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
बुराई पर अच्छाई की जीत
वैसे तो नवरात्र को बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर मनाया जाता है, लेकिन असल लड़ाई अच्छाई और बुराई के बीच नहीं है। वेदांत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो जीत प्रत्यक्ष द्वैत पर परम सत्य की होती है। अष्टावक्र के शब्दों में, यह ऐसी असहाय लहर है, जो अपनी पहचान सागर से अलग रखने की कोशिश करती है, लेकिन सफल नहीं होती। आंतरिक यात्रा हमारे नकारात्मक कर्मों को नष्ट कर देती है।
नवरात्र आत्मा या प्राण का उत्सव है, जो अकेले ही महिषासुर (जड़ता), शुंभ-निशुंभ (गर्व और शर्म) और मधु-कैटभ (लालसा और घृणा के चरम रूप) को नष्ट कर सकता है। ये पूरी तरह से विपरीत हैं, फिर भी एक-दूसरे के पूरक हैं।
जीवन-शक्ति ऊर्जा
जड़ता, गहरी जड़ें जमाए नकारात्मकता और जुनून (रक्तबीजासुर), अनुचित तर्क (चंड-मुंड) और धुंधली दृष्टि (धूम्रलोचन) को केवल प्राण और शक्ति, जीवन-शक्ति ऊर्जा के स्तर को बढ़ाकर ही दूर किया जा सकता है। साधक उपवास, प्रार्थना, मौन और ध्यान के माध्यम से सच्चे स्रोत तक वापस पहुंचता है। नवरात्र कायाकल्प करता है। यह हमारे अस्तित्व के तीन स्तरों (भौतिक, सूक्ष्म और कारण) पर राहत देता है।
उपवास शरीर को शुद्ध करता है, मौन वाणी को शुद्ध करता है और मन को आराम देता है। वहीं ध्यान व्यक्ति को अपने अस्तित्व की गहराई में ले जाता है।
जीवन तीन गुणों द्वारा संचालित
हालांकि हमारा जीवन तीन गुणों द्वारा संचालित होता है, लेकिन हम शायद ही कभी उन्हें पहचान पाते हैं। नवरात्र के पहले तीन दिन तमोगुण (अंतर) के लिए, अगले तीन दिन रजोगुण (गतिविधि) के लिए और अंतिम तीन दिन सत्व गुण (शांति) के लिए माने जाते हैं। हमारी चेतना तमो और रजोगुणों के बीच से होकर निकलती है और अंतिम तीन दिनों में सत्वगुण में खिलती है।</description><guid>10028</guid><pubDate>2025-03-31 11:05:52 11:12:43 am</pubDate></item><item><title>इन आरती के बिना अधूरा है चैत्र नवरात्र का पहला दिन, जरूर करें इनका पाठ</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10008</link><description>नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र का पर्व देवी भक्तों के लिए बहुत खास होता है। यह नौ दिवसीय व्रत मां दुर्गा और उनके नौ अवतारों को समर्पित है, जिनका अपना-अपना महत्व है। कहा जाता है कि इस दौरान मां दुर्गा की पूजा करने से सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। इसके साथ ही सभी कष्टों का नाश होता है। इस साल चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2025) 30 मार्च यानी आज से शुरू हो रहे हैं।
आज नवरात्र का प्रथन दिन है। ऐसे में मां दुर्गा की कृपा पाने के लिए आइए मां की भव्य आरती करते हैं, जो इस प्रकार हैं।

।।मां दुर्गा की आरती।।
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिव री।।
जय अम्बे गौरी,...।
मांग सिंदूर बिराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रबदन नीको।।
जय अम्बे गौरी,...।
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै।।
जय अम्बे गौरी,...।
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर मुनिजन सेवत, तिनके दुःखहारी।।
जय अम्बे गौरी,...।
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत समज्योति।।
जय अम्बे गौरी,...।
शुम्भ निशुम्भ बिडारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती।।
जय अम्बे गौरी,...।
चण्ड-मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे।।
जय अम्बे गौरी,...।
ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।।
जय अम्बे गौरी,...।
चौंसठ योगिनि मंगल गावैं, नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू।।
जय अम्बे गौरी,...।
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता।।
जय अम्बे गौरी,...।
भुजा चार अति शोभित, खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी।।
जय अम्बे गौरी,...।
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति।।
जय अम्बे गौरी,...।
अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावै।।
जय अम्बे गौरी,...।
।।मां शैलपुत्री आरती।।
शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।</description><guid>10008</guid><pubDate>2025-03-30 12:17:12 12:19:03 pm</pubDate></item><item><title>इन शानदार मैसेजेस से अपनों को दें हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10007</link><description>नई दिल्ली। Vikram samvat 2082 Wishes: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2025 Wishes in Hindi) और हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है। ये विक्रम संवत 2082 होगा। हिंदू नववर्ष के पहले दिन लोग देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं। साथ ही विशेष चीजों का दान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन शुभ काम को करने से हिंदू नववर्ष (Hindu Nav Varsh 2025 Whatsapp Status) खुशियों से भरा रहता है। लोग हिंदू नववर्ष (Hindu Nav Varsh 2025 Messages in Hindi) की शुरुआत अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं (Hindu Nav Varsh 2025 Quotes in Hindi) देकर करते हैं, तो ऐसे आप भी इन संदेशों को अपने करीबियों आदि को भेजकर शुभकामनाएं दे सकते हैं।

हिंदू नववर्ष 2025 शुभकामनाएं इन हिंदी (Hindu Nav Varsh 2025 Wishes in Hindi)
हिंदू नववर्ष में आपको आशीर्वाद मिले गणेश जी से
विद्या मिले सरस्वती से, धन-समृद्धि मिले मां लक्ष्मी से
जीवनभर प्यार मिले सबसे
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
दिल में हों नई उमंगें, आंखों में उल्लास नया
नए गगन को छू लेने का मन में हो विश्वास नया,
नए वर्ष में चलो पुराने मौसम का हम बदलें रंग
नई बहारें लेकर आए जीवन में मधुमास नया
आपको और आपके परिवार को हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
देश के लिए और सम्पूर्ण मानवता के लिए नई उम्मीदों,
सुख-शांति और समृद्धि का वर्ष हो
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
सभी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर आपको
हिंदू नववर्ष की शुभकामनाएं
ऋतु से बदलता हिंदू वर्ष
नए वर्ष में आती मौसम में बहार,
बदलाव दिखता प्रकृति में हर तरफ
ऐसे आता है हिन्दू नववर्ष का त्योहार
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा का है अवसर
खुशियों से बीते नववर्ष का हर एक पल
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
नए वर्ष का नया प्रभात
बस खुशियां ही खुशियां लाए
मिट जाए सब मन का अंधेरा
हर पल बस रोशन हो जाए
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
नए साल की सुबह के साथ,
आपकी जिंदगी भी उजाले से भर जाए,
हम यही दुआ करेंगे,
नया साल आपकी जिंदगी में ढेर सारी खुशियां लाए
हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
चैत्र नवरात्र की सम्पूर्ण जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।
मां तेरे चरणों में भेंट हम चढ़ाते हैं,
कभी नारियल तो कभी हम फूल चढ़ाते हैं
और झोलियां भर-भर के तेरे दर से आते हैं।
चैत्र नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं
नव दीप जलें, नव फूल खिलें
रोज मां का आशीर्वाद मिले।
इस नवरात्रि आपको वो सब मिले,
जो आपका दिल चाहता है।
चैत्र नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं</description><guid>10007</guid><pubDate>2025-03-30 12:07:47 12:09:28 pm</pubDate></item><item><title>देवियों का गढ़ है छत्तीसगढ़</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10006</link><description>नवरात्रि पर्व विशेष आलेख
  अनादि काल से देवी उपासना का केंद्र छत्तीसगढ़ रहा है। पुराने जमाने में यहां के सामंतों जमीदारों और राजा महाराजाओं ने कुलदेवी की स्थापना की है।यहां खेत- खलिहान,डोंगरी- पहाड़,गांव -शहर में देवियों का वास होता है।
छत्तीसगढ़ महतारी क्यों?
आपको बताते चलें कि संभवतः दुनिया का कोई भी देश अपने देश को माता नहीं कहता।भारतवासी कहते हैं भारत माता।भारत के किसी भी राज्य के लोग अपने राज्य को माता नहीं कहते। छत्तीसगढ़ के लोग कहते हैं छत्तीसगढ़ महतारी। दरअसल छत्तीसगढ़ के कण-कण में देवी मां अपने विविध रूप- नाम से विराजती है। छत्तीसगढ़ में पांच प्रमुख ऐसे धार्मिक स्थल है जिन्हें श्रद्धालुजन शक्तिपीठ की तरह विशेष महत्व देते हैं। जिनमें डोंगरगढ, दंतेवाड़ा, चंद्रपुर, रतनपुर और खल्लारी शामिल है।शक्ति पीठ ऐसे पूजा स्थलों को कहते हैं,जहां कि माता सती के निष्प्राण शरीर से विभिन्न अंग गिरे थे। माता सती के मृत देह को लेकर शिव जी ने तांडव करते ब्रह्मांड का विचरण किया था। इस दौरान माता सती के अंग जहां-जहां गिर गए उन स्थलों को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता मिली है।
    शक्ति स्वरुपा मां दुर्गा छत्तीसगढ़ की अधिष्ठात्री है। देवी के छोटे बड़े मंदिरों में नवरात्रि पर्व पर अखण्ड ज्योति जलाने,और जंवारा बोने की प्राचीन परम्परा है। हज़ारों हज़ारों की संख्या में प्रज्वलित ज्योति भक्तजनों को मोहित करती है। दिन-रात जलने वाली ज्योति की देखभाल के लिए सेवक नियुक्त होते हैं। बंद कलश कक्ष में तपिश- धूएं के बीच निष्ठापूर्वक कार्यरत वे ज्योति को बूझने नहीं देते।
रतनपुर की महामाया देवी
बिलासपुर जिले में कोरबा मार्ग पर रतनपुर में महामाया देवी विराजमान है।राजा रत्न देव द्वारा ग्यारवीं शताब्दी में निर्मित मंदिर की कथा है कि वे शिकार के लिए आए थे। तब अर्धरात्रि के समय वहां एक विशाल वृक्ष के नीचे उन्होंने दिव्य प्रकाश को देखा।जिसमें उन्हें आदिशक्ति देवी के दर्शन हुए तब उन्होंने वहां मंदिर का निर्माण करवाया।
      मंदिर में महाकाली महासरस्वती और महालक्ष्मी देवी की प्रतिमाएं हैं।ऐसी मानयता है कि रतनपुर में महामाया देवी का सिर है और उनका धड़ अंबिकापुर में स्थित है।यहां निर्मित मंदिर का मंडप सोलह स्तंभों में टिका हुआ है ।गर्भ गृह में मां महामाया की प्रतिमा के पृष्ठ भाग में मां सरस्वती की भी प्रतिमा है। दंतकथा के अनुसार देवी सती का दाहिना स्कंध यहां गिरा था। भगवान शिव ने इस स्थल को कौमारी शक्तिपीठ का नाम दिया था।
चंद्रपुर की चंद्रहासिनी देवी
छत्तीसगढ़ के डबरा तहसील जांजगीर-चांपा जिले के मांड और महानदी के संगम पर स्थित चंद्रपुर में चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां माता सती का बांया कपोल गिरा था।संबलपुर के राजा चंद्रहास ने देवी मंदिर का निर्माण करवाया था।ऐसा माना जाता है कि चंद्रसेनी देवी सरगुजा से आकर यह विराजमान हुई है।देवी का मुख चंद्रमा की आकृति जैसा होने के कारण इन्हें चंद्रहासिनी,चंद्रसेनी मां के नाम से जाना जाता है,
       मंदिर परिसर में अर्धनारीश्वर,महाबली हनुमान,द्रोपदी चीर हरण, महिषासुर वध,शेषनाग विष्णु सैया,कृष्ण लीला सहित अनेक विशाल मूर्तियां निर्मित है जिन्हें देखकर सहज ही धार्मिक कथाओं का ज्ञान होता है।
    माता के मंदिर से कुछ दूरी पर महानदी के बीच बने टापू में मां नाथल दाई का मंदिर स्थित है।बड़ी बहन चंद्रहासिनी देवी के दर्शन उपरांत छोटी बहन माता नाथलदाई का दर्शन भी अनिवार्य माना जाता है।
दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी
घने वनांचल बस्तर में स्थित दंतेवाड़ा में मां दंतेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर है।चौदहवीं शताब्दी में दक्षिण भारतीय वास्तु कलानुसार निर्मित मंदिर स्थल पर माता सती का दांत गिरा था।ऐसी मान्यता है कि आंध्र प्रदेश के वारंगल से यहां देवी जी का आगमन हुआ और शंखिनी-डंकनी नदी के तट पर वे विराजित हुई। वारंगल के राजाअन्नम देव ने मंदिर का निर्माण कर दंतेवाड़ा नगर बसाया था। मंदिर में काले ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित छः भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा स्थापित है। नक्काशी युक्त प्रतिमा के ऊपरी भाग में नरसिंह भगवान अंकित है।मंदिर में देवी के चरण चिन्ह मौजूद है। 
   मंदिर के द्वार पर दांई बांई ओर सर्प और गदाधारी दो द्वारपाल की मूर्ति है। मंदिर के सामने पत्थर से बना गरुड़ स्तंभ भी है।गर्भ गृह और महामण्डप का निर्माण एक ही पत्थर से किया गया है।काष्ठ,खपरैल आदि से निर्मित मंदिर में देवी दर्शन हेतु सीले हुए वस्त्र के बजाय धोती पहनकर जाना होता है।चमड़े से बनी वस्तुएं अंदर ले जाना वर्जित है। मंदिर के पास ही नदी के किनारे भैरव भाइयों का वास माना जाता है इसलिए इस स्थल को तांत्रिकों की साधना स्थली भी कहां जाता है।
डोंगरगढ़ में बम्लेश्वरी देवी
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में शक्ति रूपा मां बमलेश्वरी देवी का मंदिर स्थापित है।लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसे कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। यहां राजा वीरसेन द्वारा मंदिर निर्माण-देवी जी की स्थापना की गई थी।सोलह सौ फीट ऊंची चोटी पर बड़ी बमलेश्वरी मां तथा पहाड़ी के नीचे छोटी बमलेश्वरी मां का मंदिर स्थित है।इन्हें राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी भी कहा जाता है।पहाड़ी से सटा हुआ यहां एक सुंदर जलाशय कामकंदला है।
    राज्य की सबसे ऊंची चोटी पर विराजमान देवी दर्शन करने हेतु यहां रोपवे भी निर्मित है।यह छत्तीसगढ़ का एकमात्र देवी स्थल है,जहां की रोपवे है।क्वांरऔर चैत्र मास की नवरात्रि में देशभर से यहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं।इसीलिए यहां रेलवे स्टेशन पर अनेक नॉन स्टॉपेज ट्रेन का भी अस्थाई स्टॉपेज बनाया जाता है।धार्मिक पर्यटन दृष्टि से यह देश भर में केंद्र बना हुआ है।
खल्लारी की देवी मां
छत्तीसगढ़ के प्राचीन ऐतिहासिक देवी मंदिरों में खल्लारी माता का मंदिर शामिल है।प्राचीन काल में खल्लवाटिका के नाम से प्रसिद्ध यह स्थल महासमुंद जिले से बत्तीस किलोमीटर दूर है।पहाड़ी के ऊपर माता खल्लारी का मंदिर स्थित है। खल्लारी का अर्थ होता है दुष्टों का नाश करने वाला।पुराने जानकार लोग बताते हैं कि पहाड़ी के उपर खोह में देवी मां की उंगली के निशान थे।श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के कारण यहां मंदिर एवं सुसज्जित सीढ़ियों का निर्माण किया गया।
     नौ सौ सीढ़ियों की चढ़ाई उपरांत माता खल्लारी की मनोहारी मूर्ति के दर्शन होते हैं।पहाड़ी के नीचे भी माता का भव्य मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है कि भक्तजनों को पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ने में होने वाली तकलीफ को देखते हुए माता ने अपने कटार को पहाड़ी से नीचे फेंका और जहां कटार गिरा उस स्थल पर शक्ति पीठ की स्थापना हुई।मंदिर का निर्माण चौदहवीं सदी में राजा ब्रम्हदेव के शासनकाल में हुआ।
       ऐसी मान्यता है कि महाभारत युग में इस पहाड़ी पर पांडव आए थे।उस पहाड़ी पर भीम के विशाल चरण चिन्ह,भीम चूल्हा और नाव के आकार में एक विशालकाय पत्थर भीम डोंगा,भीम हंडा है।भीम का विवाह राक्षसी हिडिंबा से होने तथा उनके पुत्र घटोत्कच की जन्मस्थली भी इसे कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ के कुछ अन्य प्रसिद्ध देवी मंदिर
छत्तीसगढ़ में देवी मां के और भीअनेक सिद्ध स्थल हैं। जिनमें घुंच्चापाली बागबाहरा की चण्डी मां,धमतरी की बिलाई माता,अगांरमोती माता,रायपुर की बंजारी, कंकाली माता, गरियाबंद में घटारानी जतमई माता, झलमला में महामाया, सूरजपुर में कुदरगढ़ी माता,कोरबा मड़वारानी धमधा में त्रिमूर्ति महामाया मंदिर, बेमेतरा में सिद्धि माता,भद्रकाली मंदिर, कवर्धा में हिंगलाज माता, कोंडागांव में तेलीन सती, बंजारी माता,अम्बिकापुर में महामाया समलेश्वरी देवी माता के मंदिर शामिल हैं।
विजय मिश्रा 'अमित'
पूर्व अति.महाप्रबंधक (जन) एम 8,सेक्टर 2 अग्रसेन नगर पोआ- सुंदर नगर रायपुर( छग) 492013 मोबाइल 98931 20310।</description><guid>10006</guid><pubDate>2025-03-30 12:02:21 12:03:26 pm</pubDate></item><item><title> नवरात्र व्रत में इन विशेष बातों का रखें ध्यान, वरना खंडित हो सकता है व्रत</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10005</link><description>नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। यह नौ दिनों का पर्व मां दुर्गा को समर्पित है। इस दौरान साधक नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि शारीरिक और मानसिक शुद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, व्रत के दौरान कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना हर किसी के लिए जरूरी है। वरना इससे व्रत खंडित हो सकता है और उसका पूर्ण फल नहीं मिलता है, तो चलिए यहां व्रत के नियम जानते हैं।
नवरात्र व्रत के नियम (Chaitra Navratri 2025 Fast Rules)

इस दौरान सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
इसमें अनाज के अलावा तामसिक चीजें जैस - मांस, मछली, अंडे और प्याज-लहसुन का सेवन न करें।
व्रती फल, दूध, दही, सूखे मेवे, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा और साबूदाना आदि चीजें खा सकते हैं।
व्रत में सेंधा नमक (रॉक सॉल्ट) का ही प्रयोग करना चाहिए।
इस दौरान साधारण नमक का सेवन वर्जित है।
व्रत के दौरान अत्यधिक तले हुए और मसालेदार भोजन से बचें।
इस दौरान कुछ लोग नौ दिनों तक निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ केवल फलाहार करते हैं।
अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत का संकल्प लें।
इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें।
इस दौरान शांत और प्रसन्न रहने का प्रयास करें।
व्रती दिन में सोने से बचें।
इस दौरान किसी का भी अपमान न करें।
पूजा-पाठ नियम (Chaitra Navratri 2025 Puja Method)
नौ दिनों तक मां दुर्गा की नियमित रूप से पूजा-अर्चना करें।
सुबह और शाम दोनों समय आरती और मंत्र जाप करें।
अगर आपने कलश स्थापित किया है, तो उसकी नियमित देखभाल करें और सभी नियमों का पालन करें।
नवरात्र के दौरान दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है, इसलिए छोटी कन्याओं को भोजन कराएं और उन्हें उपहार दें।</description><guid>10005</guid><pubDate>2025-03-30 11:59:37 12:00:43 pm</pubDate></item><item><title>चैत्र नवरात्र में 9 दिनों तक मां दुर्गा को लगाएं ये दिव्य भोग, मिलेगा व्रत का पूरा फल</title><link>https://dainandini.in//culture.php?articleid=10004</link><description>नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र के दौरान साधक पूरी श्रद्धा भाव से व्रत रखते हैं और मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए मां दुर्गा को प्रसन्न करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में मां दुर्गा को विभिन्न प्रकार के भोग अर्पित करने का विधान है। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri 2025) के नौ दिनों में मां के नौ रूपों को कौन-कौन से दिव्य भोग लगाए जा सकते हैं, जो इस प्रकार हैं।
मां दुर्गा को लगाएं ये भोग (Nine Day Nine Bhog)

पहला दिन (मां शैलपुत्री) - नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इन्हें गाय के घी से बने व्यंजन अर्पित करना शुभ माना जाता है। आप मां को शुद्ध घी, घी और चीनी से बनी पंजीरी या ऋतु फल अर्पित कर सकते हैं।
दूसरा दिन (मां ब्रह्मचारिणी) - दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। इन्हें मिश्री और पंचामृत का भोग लगाना उत्तम माना गया है। ऐसे में आप मां को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) अर्पित कर सकते हैं।
तीसरा दिन (मां चंद्रघंटा) - मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई जैसे - खीर या बर्फी का भोग लगा सकते हैं।
चौथा दिन (मां कूष्मांडा) - मां कूष्मांडा को मालपुआ का भोग अति प्रिय है। आप उन्हें हलवा या दही-बड़े भी अर्पित कर सकते हैं।
पांचवा दिन (मां स्कंदमाता) - पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा होती है। इन्हें आप केले या अन्य ऋतु फल अर्पित कर सकते हैं।
छठा दिन (मां कात्यायनी) - मां कात्यायनी को शहद का भोग लगाना विशेष फलदायी होता है। ऐसे में आप उन्हें मिठाई में शहद मिलाकर भी अर्पित कर सकते हैं।
सातवां दिन (मां कालरात्रि) - मां कालरात्रि को गुड़ का भोग बहुत प्रिय है। ऐसे में आप उन्हें गुड़ से बने प्रसाद जैसे - हलवा या लड्डू अर्पित कर सकते हैं।
आठवां दिन (मां महागौरी) - अष्टमी के दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। इन्हें नारियल या नारियल से बनी मिठाई का भोग लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व है और कन्याओं को भोजन कराया जाता है।
नौवां दिन (मां सिद्धिदात्री) - नवरात्र के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन मां को हलवा, पूरी, चना और खीर का भोग लगाया जाता है। इसे कन्या पूजन के बाद प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है।
भोग का महत्व (Chaitra Navratri 2025 Bhog Significance)
आपको बता दें कि भोग हमेशा शुद्ध और सात्विक होना चाहिए। अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार आप मां दुर्गा को कोई भी फल, मिठाई या भोजन अर्पित कर सकते हैं। इसमें महत्वपूर्ण है आपका भाव और भक्ति। इन दिव्य भोगों को अर्पित करके आप मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और अपने व्रत का पूर्ण फल पा सकते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि चैत्र नवरात्र 2025 में मां दुर्गा की आराधना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।</description><guid>10004</guid><pubDate>2025-03-30 11:52:30 11:54:24 am</pubDate></item></channel></rss>