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Do Patti : नया बताकर ऑडियंस को परोसी पुरानी कहानी?

स्मिता श्रीवास्तव,मुंबई। ‘दो पत्ती’ से अभिनेत्री कृति सेनन फिल्‍म निर्माता बन गई हैं। इस फिल्‍म की कहानी, पटकथा और संवाद कनिका ढिल्‍लन ने लिखे हैं। इन भूमिकाओं के साथ वह फिल्‍म की निर्माता भी हैं। फिल्‍म में कृति सेनन जुड़वा बहन की भूमिका में हैं। वहीं काजोल पुलिस अधिकारी की भूमिका में है। इनके अलावा शहीर शेख, तन्वी आजमी, बृजेंद्र काला और विवेक मुश्रान जैसे कलाकारों की जमात है।

शीर्षक से लगता है कि ताश के पत्तों की तरह यह रोमांचक खेल होगा क्‍योंकि कहानी दो जुड़वा बहनों की है। फिल्‍म सीता और गीता की तरह यह बहनें बचपन में अलग नहीं हुई हैं। दोनों बचपन से साथ में हैं। उनके माता-पिता का निधन बचपन में ही हो गया था। मां समान अम्‍मा (तन्‍वी आजमी) ने दोनों की परवरिश की है। जैसा कि अक्‍सर दो हमउम्र बच्‍चों में होता है कि एक को लगता है कि मां दूसरे को ज्‍यादा प्‍यार करती है तो उसमें दूसरे के प्रति घृणा, जलन और द्वेष का भाव आ जाता है। यही हाल शैली का भी है। उसमें सौम्‍या के प्रति जलन, प्रतिस्‍पर्धा है।

उसके यहां पर घरेलू हिंसा का मुद्दा भी जोड़ा गया है। इन मसालों के साथ कोर्टरूम ड्रामा, एक महिला पुलिस की मुस्‍तैदी और पैराग्‍लाइडिंग का रोमांच है, लेकिन तमाम मसालों के बावजूद कमजोर लेखन, अधकच्‍चे पात्र इन्‍हें बेमजा बना देता है।

दो बहनों की जलन के इर्द-गिर्द घूमती है 'दो पत्ती' की कहानी

देवीपुर की घाटी में सेट कहानी का आरंभ शुरुआत नीले आसमान तले पैराग्‍लाइडिंग कर रही सौम्‍या (कृति सेनन) अपने पति ध्रुव सूद (शहीर शेख) पर जान लेने का आरोप लगाती है। स्थानीय पुलिस अधिकारी विद्या ज्योति उर्फ वीजे (काजोल) मामले की जांच शुरू करती है। वहां से उनके अतीत की परतें खुलती हैं। सौम्‍या नाम के अनुरूप जितनी सौम्‍य हैं शैली उतनी ही बिंदास, मॉडर्न और मुंहफट।

सौम्‍या को देखकर ध्रुव उसकी ओर आकर्षित होता है। उसी दौरान शैली उसकी जिंदगी में तूफान की तरह आती है और ध्रुव को अपनी ओर आकर्षित करती है। अमीर नेता का बेटा ध्रुव अपना बिजनेस स्‍थापित करने में लगा है। नाटकीय मोड़ के बाद सौम्‍या से ध्रुव शादी करता है। शैली को हार बर्दाश्‍त नहीं होती। शादी के बाद ध्रुव का बर्ताव सौम्‍या के प्रति बदलता है। वह सौम्‍या को मारता-पीटता है। आखिरकार सौम्‍या पुलिस में उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराती है।

कहानी में सबसे अटपटी है ये बात

इस फिल्‍म को लेकर तमाम जिम्‍मेदारियों में फंसी कनिका ढिल्‍लन बेहतर होता कि कहानी पर ही फोकस करती। फिल्‍म का आधा हिस्‍सा तो बहनों की आपसी प्रतिस्‍पर्धा और रिश्‍तों की जटिलता दिखाने में ही बीत गया। चार्मिंग से दिखने वाला ध्रुव की दोहरी शख्सियत धीरे-धीरे सामने आती है। उसके अतीत का संवादों में जिक्र है, लेकिन वह उसके व्‍यक्तित्‍व से कहीं भी मेल नहीं खाते। उसके पिता रसूखदार है लेकिन उनका दबदबा कोर्ट रूम ड्रामा में उनके वकील की दलीलें देखकर लग जाएगा।

फिल्‍म में एक और अनूठी चीज देखने को मिली। पुलिस कर्मी विद्या ही अदालत में सौम्‍या का केस लड़ती हैं। यह कैसे संभव है? भले ही विद्या ने कानून की पढ़ाई की है, लेकिन सेवारत रहते हुए वह कैसे मुकदमा लड़ सकती है? यह बात समझ से परे हैं। इसी तरह पेट्रोलिंग की ड्यूटी पर लगाई गई विद्या तफ्तीश से पहले ही तय कर लेती है कि ध्रुव ही असली दोषी है।

कृति सेनन डबल रोल निभाने में क्या हुईं कामयाब?

चूंकि डबल रोल है तो सौम्‍या और शैली के स्‍वभाव और अंदाज के जरिए उनमें अंतर दिखाने की कोशिश हुई है। कीर्ति ने दोनों किरदारों को उस हिसाब से जीने का प्रयास किया है। हालांकि डिप्रेशन, अस्‍थमा से जूझ रही सौम्‍या की भूमिका में घरेलू हिंसा का दर्द सिर्फ चेहरे पर चोट के निशान में ही नजर आता है, भावों में उसकी कमी साफ नजर आती है। ध्रुव को पाने की जुगत में हैं शैली अपनी बहन का दर्द कभी नहीं दिखता, लेकिन एक सीन में ही उसका हृदय परिर्वतन हो जाता है।

उस पर फिल्‍म का कमजोर कोर्टरूम उसका स्‍वाद और फीका करता है। विवेक मुश्रान तो मूक दर्शक की तरह दिखते हैं। क्‍लाइमेक्‍स का पूर्वानुमान कोई भी बहुत आसानी से लगा सकता है। कुल मिलाकर दो पत्ती का खेल रोमांचक नहीं बन पाया है।

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