छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

मंझोली रवन में मनरेगा का सच — मजदूरों का हक छीना, मशीनों से हुआ काम

 पंडरिया/कवर्धा -

 जिले के जनपद पंचायत पंडरिया अंतर्गत ग्राम पंचायत मंझोली (रवन) में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत कराए गए निर्माण कार्य को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। स्थल पर लगाए गए नागरिक सूचना पटल में दर्ज जानकारी और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। नई बनी संरचना में जगह-जगह दरारें उभर आई हैं, जिससे कार्य की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

नागरिक सूचना पटल के अनुसार यह कार्य “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (छत्तीसगढ़)” के अंतर्गत स्वीकृत है। कार्य का विवरण ग्राम पंचायत मंझोली (रवन) में 96 मीटर लंबाई के निर्माण कार्य के रूप में दर्ज है। प्रशासनिक स्वीकृति क्रमांक 3302004015/P F/465238 अंकित है। स्वीकृति अवधि 19.02.2026  कार्य प्रारंभ तिथि 27.02.2026 एवं पूर्णता तिथि 27.03.2026 लिखी गई है।

पटल पर प्रदर्शित वित्तीय जानकारी के अनुसार कुल स्वीकृत लागत लगभग 19.59 लाख रुपये बताई गई है। इसमें सामग्री लागत लगभग 17.51 लाख रुपये अंकित है। मजदूरी दिवसों की संख्या 913 दर्ज है तथा प्रति दिवस मजदूरी दर 261 रुपये दर्शाई गई है। तकनीकी सहायक के रूप में सुमित मंडपे एवं कार्यक्रम अधिकारी के रूप में  बाबू लाल मेहरा का नाम और मोबाइल नंबर भी प्रदर्शित है। संबंधित सरपंच और ग्राम पंचायत का उल्लेख भी सूचना पटल पर मौजूद है।

लेकिन निर्माण स्थल पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। हाल ही में पूर्ण बताए जा रहे इस कार्य में कई स्थानों पर दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। गुणवत्ता नियंत्रण के मानकों के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य में प्रारंभिक चरण में ही दरारें उभरना गंभीर लापरवाही का संकेत माना जाता है। इससे न केवल सरकारी धन के समुचित उपयोग पर सवाल उठता है, बल्कि योजना की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

सबसे गंभीर आरोप खुदाई कार्य को लेकर सामने आया है। ग्राम पंचायत के पंच फगनू सिंह राज ने बताया कि “खुदाई का कार्य मजदूरों से नहीं, बल्कि जेसीबी मशीन से कराया गया है।” यदि यह आरोप सत्य है, तो यह मनरेगा अधिनियम, 2005 की मूल भावना के प्रतिकूल है। अधिनियम के प्रावधानों एवं भारत सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार मनरेगा एक श्रमप्रधान योजना है, जिसमें मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित है, सिवाय विशेष परिस्थितियों के और वह भी सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से।

मनरेगा में 60:40 का श्रम एवं सामग्री अनुपात अनिवार्य है। योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण बेरोजगारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि खुदाई जैसे श्रमप्रधान कार्य में मशीनों का उपयोग हुआ है, तो यह न केवल मजदूरों के रोजगार के अधिकार का हनन है, बल्कि वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में भी आ सकता है।

ग्राम स्तर पर लगाए गए नागरिक सूचना पटल का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। लेकिन जब पटल पर दर्ज 913 मानव दिवस और मौके पर मशीनों से कार्य कराए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो यह पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या कागजों में मजदूरों की हाजिरी दर्ज कर भुगतान दिखाया गया? क्या गुणवत्ता परीक्षण की औपचारिकता पूरी की गई? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर प्रशासन को देना होगा।

ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की तकनीकी एवं वित्तीय जांच कराई जाए। निर्माण की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण हो तथा मशीन उपयोग के आरोपों की सत्यता सामने लाई जाए। यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों, तकनीकी अमले और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध छत्तीसगढ़ पंचायती राज अधिनियम एवं वित्तीय नियमों के तहत कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।

ग्राम पंचायत मंझोली (रवन) का यह मामला केवल एक निर्माण कार्य की खामियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना के क्रियान्वयन पर व्यापक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जब 96 मीटर के निर्माण में ही दरारें दिखाई देने लगें और श्रमिकों की जगह मशीनों के उपयोग के आरोप लगें, तो जवाबदेही तय करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी बन जाती है।

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।

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