छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

डीएमएफ के लाखों रुपये से बना ‘कागजी चैक डैम’, सूचना पटल गायब, पानी रोकने की क्षमता संदिग्ध, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल

 कवर्धा

 कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चोरभट्ठी के आश्रित ग्राम थूहापानी में जिला खनिज न्यास निधि (डीएमएफ) से निर्मित चैक डैम निर्माण कार्य अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। जिस उद्देश्य से डीएमएफ जैसी महत्वपूर्ण योजना के माध्यम से खनन प्रभावित क्षेत्रों में जल संरक्षण, भू-जल संवर्धन और ग्रामीण विकास के कार्य किए जाने चाहिए, वहां थूहापानी में बना यह चैक डैम पहली नजर में ही सरकारी धन के उपयोग पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ा और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि निर्माण स्थल पर अनिवार्य नागरिक सूचना पटल तक नहीं लगाया गया है, जिससे यह पता ही नहीं चल पा रहा कि कार्य की स्वीकृत लागत कितनी है, निर्माण एजेंसी कौन है, तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने प्रदान की है और कार्य कब स्वीकृत हुआ।

शासन के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार प्रत्येक शासकीय निर्माण कार्य स्थल पर सूचना पटल लगाया जाना आवश्यक है ताकि आम नागरिक कार्य की जानकारी प्राप्त कर सकें और उसकी निगरानी कर सकें। लेकिन थूहापानी में यह अनिवार्य व्यवस्था पूरी तरह गायब है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जनता से जानकारी छिपाने की जरूरत क्यों महसूस की गई । क्या संबंधित अधिकारी और निर्माण एजेंसी शुरू से ही इस कार्य को जनता की निगरानी से दूर रखना चाहते थे।

निर्माण स्थल का अवलोकन करने वाले ग्रामीणों और क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जिस संरचना को चैक डैम बताया जा रहा है, उसे देखकर यह विश्वास करना मुश्किल है कि उसमें पर्याप्त मात्रा में पानी का संग्रहण हो सकेगा। स्थल की भौगोलिक स्थिति, संरचना की ऊंचाई और निर्माण की बनावट को देखकर यह समझना कठिन है कि वर्षा ऋतु में जल प्रवाह रुककर किस प्रकार संग्रहित होगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह निर्माण ऐसा प्रतीत होता है मानो केवल सीमेंट-कंक्रीट की दीवार खड़ी कर दी गई हो, जबकि वास्तविक जल संरक्षण की दृष्टि से इसकी उपयोगिता नगण्य दिखाई देती है। यदि निर्माण के बाद पानी रुकने की पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं है तो फिर यह चैक डैम किस उद्देश्य की पूर्ति करेगा।

लोगों का मानना है कि किसी भी चैक डैम के निर्माण से पहले विस्तृत सर्वेक्षण, जलग्रहण क्षेत्र का अध्ययन और तकनीकी परीक्षण आवश्यक होता है। यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया तो लाखों की योजनाएं भी केवल कागजों में सफल और जमीन पर विफल साबित होती हैं। थूहापानी का मामला भी कुछ ऐसा ही प्रतीत हो रहा है, जहां निर्माण तो कर दिया गया लेकिन उसके वास्तविक लाभ को लेकर गंभीर संदेह पैदा हो गया है।

इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करना बेहद जरूरी है। सबसे पहले संबंधित विभाग के कार्यपालन अभियंता और उप अभियंता की जवाबदेही बनती है, जिन्होंने तकनीकी परीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित करना था। यदि चैक डैम की संरचना जल संग्रहण के उद्देश्य को पूरा नहीं करती तो तकनीकी स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की भूमिका स्वतः संदेह के दायरे में आ जाती है। इसके अतिरिक्त निर्माण एजेंसी की भी जवाबदेही बनती है कि उसने स्वीकृत डिजाइन और मानकों के अनुरूप कार्य किया या नहीं। वहीं डीएमएफ मद के कार्यों की निगरानी करने वाले जिला स्तरीय अधिकारियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। यदि बिना सूचना पटल और बिना प्रभावी निगरानी के निर्माण कार्य आगे बढ़ता रहा तो यह प्रशासनिक विफलता का स्पष्ट उदाहरण माना जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या निर्माण कार्य की नियमित मॉनिटरिंग की गई। क्या किसी अधिकारी ने स्थल निरीक्षण कर कार्य की उपयोगिता का मूल्यांकन किया। यदि किया गया तो सूचना पटल के अभाव और संरचना की संदिग्ध उपयोगिता पर आपत्ति क्यों नहीं दर्ज की गई। यदि निरीक्षण नहीं हुआ तो यह और भी गंभीर विषय है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि सरकारी राशि से होने वाले कार्यों की निगरानी केवल कागजों तक सीमित रह गई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि डीएमएफ जैसी महत्वपूर्ण निधि, जिसका उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना है, उसका उपयोग कई बार बिना जनभागीदारी और बिना पारदर्शिता के किया जाता है। थूहापानी का यह मामला भी उसी आशंका को बल देता है। सूचना पटल का न होना, निर्माण की उपयोगिता पर सवाल और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पूरे प्रकरण को संदेहास्पद बना रही है।

अब आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन, कलेक्टर कबीरधाम और जिला खनिज न्यास निधि प्रबंधन समिति इस मामले को गंभीरता से लें। निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, स्वीकृत प्राक्कलन और वास्तविक निर्माण का मिलान किया जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि चैक डैम वास्तव में जल संरक्षण की क्षमता रखता है या नहीं। यदि जांच में अनियमितता, तकनीकी लापरवाही या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।

थूहापानी का यह मामला केवल एक चैक डैम का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या डीएमएफ की जनता के लिए स्वीकृत राशि वास्तव में जनता के हित में खर्च हो रही है या फिर विकास के नाम पर केवल औपचारिक निर्माण कर सरकारी धन को ठिकाने लगाया जा रहा है। जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे निर्माण कार्यों पर उठते सवाल थमने वाले नहीं हैं।

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