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राज्यों का पूंजीगत व्यय: धीमी गति और विकास की चुनौती

राज्यों का पूंजीगत व्यय: धीमी गति और विकास की चुनौती

हाल की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2025–26 के पहले दस महीनों (अप्रैल से जनवरी) में भारत के राज्यों ने अपने कुल पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) बजट का केवल लगभग 51.8 प्रतिशत ही खर्च किया है। पूंजीगत व्यय वह खर्च होता है जो सड़क, पुल, सिंचाई, बिजली, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण पर किया जाता है। इस प्रकार का निवेश दीर्घकालिक आर्थिक विकास का आधार माना जाता है। इसलिए राज्यों द्वारा कैपेक्स का कम उपयोग विकास की गति के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार राज्यों ने लगभग 10.37 लाख करोड़ रुपये के निर्धारित कैपेक्स बजट में से करीब 5.38 लाख करोड़ रुपये ही खर्च किए। इसका अर्थ है कि आधे से अधिक बजट अभी भी खर्च नहीं हो पाया है। यह स्थिति इस बात को दर्शाती है कि कई राज्यों में योजनाओं के क्रियान्वयन की गति अपेक्षाकृत धीमी है। हालांकि कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया है। उदाहरण के लिए तेलंगाना ने अपने निर्धारित बजट से भी अधिक यानी लगभग 121 प्रतिशत पूंजीगत व्यय किया, जो अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। इसके अलावा हरियाणा, केरल और बिहार जैसे राज्यों ने भी अपने बजट का बड़ा हिस्सा खर्च किया है।

इसके विपरीत कई राज्य ऐसे हैं जहाँ पूंजीगत व्यय की गति काफी धीमी रही है। पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, मेघालय और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने अपने कैपेक्स बजट का अपेक्षाकृत कम हिस्सा खर्च किया है। उदाहरण के तौर पर छत्तीसगढ़ ने लगभग 31 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल ने लगभग 29 प्रतिशत ही खर्च किया। यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि इन राज्यों में परियोजनाओं के क्रियान्वयन, प्रशासनिक प्रक्रियाओं या वित्तीय प्रबंधन में कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं।

पूंजीगत व्यय में कमी का सीधा प्रभाव आर्थिक विकास पर पड़ता है। जब सरकार बुनियादी ढांचे पर निवेश करती है तो इससे निर्माण कार्य बढ़ते हैं, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलता है। सड़क, बिजली और परिवहन जैसी सुविधाओं में सुधार से उद्योगों और व्यापार के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। इसलिए यदि पूंजीगत व्यय धीमा रहता है, तो इसका असर समग्र आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के लिए पूंजीगत व्यय का महत्व और भी अधिक है। राज्य में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ बुनियादी ढांचे के विकास की अभी भी आवश्यकता है, जैसे ग्रामीण सड़कें, सिंचाई व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ। यदि इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ता है तो इससे न केवल आर्थिक विकास को गति मिलेगी बल्कि क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में भी मदद मिलेगी।

इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने इसी अवधि में अपने पूंजीगत व्यय का लगभग 76 प्रतिशत उपयोग कर लिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि केंद्र की तुलना में राज्यों में खर्च की गति अपेक्षाकृत धीमी है। भविष्य में राज्यों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे परियोजनाओं की योजना, स्वीकृति और क्रियान्वयन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएं, ताकि निर्धारित बजट का पूरा उपयोग हो सके।

समग्र रूप से देखा जाए तो पूंजीगत व्यय केवल एक वित्तीय आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह विकास की दिशा और गति को निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि राज्य अपने विकास बजट का समय पर और प्रभावी उपयोग करें, तो इससे आर्थिक वृद्धि, रोजगार और सामाजिक विकास को नई गति मिल सकती है।

 

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