संस्कृति

दान की महिमा का पर्व छेर छेरा

 -कृष्ण कुमार निगम

लोक परंपरा के अनुसार, *छत्तीसगढ़ में पारंपरिक त्यौहार के रूप में, पौष मास के पूर्णिमा को छेरछेरा पुन्नी "तिहार "मनाया जाता है। बाबू रेवाराम की पांडुलिपि में उल्लेख है कि, छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश के कोसल नरेश "कल्याण साय" एवमं मण्डल के राजा के बीच, विवाद हो गया था, जिसके चलते तत्कालीन मुगल सम्राट अकबर ने कौशल नरेश "कल्याण साय "को दिल्ली बुला लिया था, जहां  8 वर्ष  दिल्ली में रहे, एवमं राजनीति व युद्धकाल की शिक्षा प्राप्त कर वापस अपनी राजधानी रतनपुर पहुंचे। उनके आगमन की जानकारी, जब उनकी प्रजा को  हुई तो वे अपने राजा से मिलने रतनपुर, पहुँचने लगे। अपने राजा के प्रति, प्रजा के इस प्रेम को, देखकर, उनकी  रानी "फुलकेना साय "ने  प्रजा के लिए अपनी तिजोरी खोल दी, और खुले मन से दान किया। तब से इस दिन की याद में, प्रति वर्ष, अपने राजा से मिलने, प्रजा आने, आगे चलकर यह एक पारंपरिक त्योहार के रूप में, आम जनमानस में प्रसिद्ध हो गया। यह दिन पौष मास की पूर्णिमा का दिन होता है, जब खेतों की फसल, कटकर खलिहान में, और कोठी में आ, चुकी होती है, अन्न दान के रूप में यह त्योहार मनाया जाता है, जिसमें लोग घरों - घर जाते हैं, और  नृत्य के माध्यम से *छेरछेरा  माई कोठी के धान ला हेर हेरा कहते हैं।


यह पर्व  छत्तीसगढ़ के दान की महिमा को दर्शाता हैं।इस पर्व में गरीब से गरीब परिवार भी अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करता है।इस पर्व के कारण  गावों में छोटे बड़े का भेद भाव और अंहकार की भावना समाप्त होती है। आध्यात्मिक महत्व के रूप में यह पर्व नदी सरोवर में स्नान,दीपदान, तीर्थ ,मेला और शिवालय दर्शन के महत्व को भी दर्शाता है।

छेर छेरा की अन्त शुभकामनाएं

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