संस्कृति

रुपध्यान है वैदिक मेडिटेेेशन - सुश्री धामेश्वरी देवी

रुपध्यान है वैदिक मेडिटेेेशन - सुश्री धामेश्वरी देवी
जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा राधा कृष्ण मंदिर, ब्रज मंडल सेक्टर 6, कालीबाड़ी के पास भिलाई में चल रही 11 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के नवमें दिन बताया कि भगवान श्रीकृष्ण के तीन स्वरुप है। एक निराकार निगुण ब्रह्म, दूसरे सगुण साकार परमात्मा, तीसरे सगुण साकार भगवान्। ज्ञानी ब्रह्म के उपासक होते हैं, योगी परमात्मा के उपासक होते हैं और भक्त भगवान् के उपासक होते हैं। 
वेदों में ज्ञान के दो प्रकार बताए गए - एक शाब्दिक ज्ञान और दूसरा अनुभवात्मक ज्ञान। किसी भी विषय का शाब्दिक ज्ञान से, लेकिन साधना द्वारा उसका अनुभव ना हुआ हो तो वह कोरी कल्पना ही समझिये। यह ज्ञान दो क्षेत्रों से संबंधित होता है एक माया का क्षेत्र और एक मायतीत ईश्वर का क्षेत्र। जो ज्ञानी होते हैं उन्हें किसी भी विषय का शाब्दिक ज्ञान होता है, इस आधार पर वें प्रवचन में बड़ी-बड़ी बातें बताते हैं, लेकिन अनुभवात्मक साधना के अभाव में उनके इस ज्ञान का कोई विशेष प्रभाव नहीं होता। वेदों में यह भी कहा गया है कि ज्ञानी व्यक्ति का पतन हो जाता है। वह ज्ञान अज्ञान है जिसमें ईश्वर प्रेम ना हो अर्थात कर्म स्वर्ग देकर समाप्त हो जाता है और ज्ञान से मोक्ष मिलता है यह भी निंदनीय है। ज्ञानी अपने बल पर शास्त्र वेदां के ज्ञान के आधार पर साधना करता है तो स्वयं को ही ब्रह्म समझता है, भगवान के शरणागत नहीं होता। ज्ञान मार्ग पर चलना कलयुग में बहुत मुश्किल है क्योंकि उसमें अधिकारी होना चाहिए। संसार से पूर्ण विरक्त व्यक्ति ही ज्ञान मार्ग में अधिकारी बनेगा और दूसरी बात ज्ञानी भगवान् की शरण में नहीं जाता है और नियम ये है कि सगुण साकार भगवान् के शरणागत होने पर ही मायानिवृति हो सकती है। ज्ञानी का ज्ञान मार्ग में बार बार पतन होता है जिसकी रक्षा करने वाला न भगवान् होता है न गुरु ही होता है और जो भक्त है भक्ती मार्ग में वो भगवान् तथा गुरु के शरणागत रहता है, आश्रित रहता है इसलिए भगवान् उसकी रक्षा करते है। भक्त की रक्षा करते है भगवान्, किंतु ज्ञानी की रक्षा नहीं करते। ज्ञानी की रक्षा तब करेगें जब ज्ञानी भगवान् की शरण में जायेगा। जब ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है। ज्ञानी भगवान् के शरण में जायेगा तभी उसको ब्रह्मज्ञान अथवा मोक्ष हो सकता है। माया भगवान् की शक्ति होने के कारण बिना उनकी कृपा के नहीं जा सकती। जब तक माया नहीं जायेगी तब तक भगवद्प्राप्ति नहीं होगी इसलिए भगवान् की शरणागति करना एवं साधना करना आवश्यक है। 
जगद्गुत्तम श्री कृपालु जी महाराज जी द्वारा रुपध्यानयुक्त साधना करने का विज्ञान प्रकट किया गया है। रुपध्यान ध्यान की ऐसी विधि है जिसमें हम अपने चंचल मन को श्रीराधा कृष्ण के सुंदर रुप, विभिन्न नाम, दया, कृपा जैसे उनके गुण, बाल-लीला, झूलन लीला, वन विहार लीला, जल विहार लीला, रास लीला आदि में लगाते हैं, इसी का अभ्यास करते हैं। ऎसा चिंतन करते हुए कीर्तन करना और उनके रूपों का मन से ध्यान करना उनसे शीघ्रता से प्रेम बढ़ाने में मदद करता है। इस प्रकार के ध्यान को रूपध्यान मेडिटेशन कहा जाता है। सर्वांतर्यामी ईश्वर की कृपा से उसका ज्ञान व आनंद प्राप्त होने लगता है जिससे मन पुनः गलत जगहों में नहीं लगता एवं अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है।
जगद्गुत्तम श्री कृपालु जी महाराज स्वयं वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य निखिलदर्षनसमन्वयाचार्य अर्थात समस्त शास्त्रों वेदों के सिद्धांतों का समन्वय कर वेद में उल्लेखित मार्ग की प्रतिष्ठापना करने वाले संत सिरोमणि हैं। श्री महाराज जी द्वारा बताये गये रुपध्यान जो ध्यान की अत्यंत सरल एवं सर्वोच्च परिणाम सहजता से दिलाने वाली वैदिक पद्धति है का क्रियान्वित अभ्यास श्री महाराज जी की प्रचारिका सुश्री धामेष्वरी दीदी जी के सानिध्य में प्रवचन श्रंखला के अंतिम दिन दिनांक 21 दिसम्बर 2025 को सुबह 8 बजे से षाम 7 बजे तक प्रवचन स्थल पर भिलाई में विष्व ध्यान दिवस के अवसर पर प्राप्त होने जा रहा है।

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