सलमान खान के दुश्मन लॉरेंस के बिश्नोई समाज के 363 लोगों को क्यों कुल्हाड़ी से काट डाला गया...हैरान कर देगी ये कहानी
नई दिल्ली: साल 1730 में सितंबर की शायद 11-12 तारीख। सुबह से ही रेगिस्तानी इलाके जोधपुर के खेजड़ली गांव में एक महिला पेड़ से चिपक गई। उसे भनक लगी कि मारवाड़ के महाराजा अभय सिंह के नए-नए बन रहे फूल महल के लिए लकड़ी की जरूरत है, जिसके लिए गांव के ही खेजड़ी के पेड़ों को काटा जाएगा। राजा के मंत्री गिरधर दास भंडारी अपने लाव-लश्कर लेकर खेजड़ली गांव पहुंच गए। अमृता देवी बिश्नोई नामक की यह बहादुर महिला खेजड़ी के एक पेड़ से चिपक गई। धीरे-धीरे पूरा गांव ही आसपास के खेजड़ी के वृक्षों को बचाने के लिए एकजुट हो गया। बाबा सिद्दीकी की हत्या और सलमान खान को धमकी देने वाले लॉरेंस के बिश्नोई समाज की यह कहानी बेहद वीरता और बहादुरी के मामले में बेमिसाल है। जानते हैं उस बिश्नोई समाज की उस महिला की कहानी, जिसने पेड़ के लिए अपने जान न्यौछावर कर दिए थे।
खेजड़ी के पेड़ों को घेरा बनाकर खड़ी हो गईं अमृता देवी
महाराजा के कारिंदे जब पेड़ काटने गांव पहुंचे तो अमृता देवी और गांव के लोग खेजड़ी के पेड़ों के चारों ओर हाथों से घेरा बना कर खड़े गए। अमृता देवी ने कहा कि खेजड़ी के पेड़ बिश्नोई लोगों के लिए पवित्र हैं। उसमें उनकी जान बसती है। खेजड़ी के पेड़ों को वह तुलसी और पीपल की तरह ही पवित्र मानते थे।
कुल्हाड़ी चलती रही और लाशें बिछती गईं, 363 लोग शहीद
महाराजा के कारिंदों ने जब देखा कि अमृता देवी और बाकी गांववाले पेड़ों से नहीं हट रहे हैं तो उन्होंने कुल्हाड़ियों से ही उन्हें मार डाला। अमृता देवी के आखिरी शब्द थे, कटे हुए पेड़ से ज्यादा सस्ता है कटा हुआ सिर। अमृता देवी की तीन बेटियां भी पेड़ को बचाने के लिए अपनी जान दे दी। पेड़ बचाने के लिए 84 गांवों के लोग जमा हो गए। ये सभी लोग पेड़ों को पकड़ कर खड़े हो गए। राजा के कारिंदों ने बारी-बारी से करीब 363 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
महाराजा ने जारी किया खेजड़ी के पेड़ों को नहीं काटा जाएगा
जब महाराजा के पास इस नरसंहार की खबर पहुंची तो उन्होंने फौरन अपना आदेश वापस लिया और कारिंदों को लौटने को कहा। इसके बाद महाराजा ने लिखित में आदेश जारी किया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी के पेड़ को नहीं काटा जाएगा। इस आदेश का आज तक पालन होता अया है। तब से लेकर आज तक भादवा सुदी दशम को बलिदान दिवस के रूप में खेजड़ली गांव में मेला लगता है।
बिश्नोई समाज के लिए खेजड़ी कितना पवित्र
रेगिस्तान के कल्पवृक्ष खेजड़ी को शमी वृक्ष के नाम से भी जाना जाता है। यह मूलतः रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है। अंग्रेजी में शमी वृक्ष प्रोसोपिस सिनेरेरिया के नाम से जाना जाता है। रेगिस्तान में भी हरियाली बरकरार रखने में इस पेड़ की अहम भूमिका रही है। इस पेड़ पर लगने वाले फल सांगरी का उपयोग सब्जी बनाने में होता है। इसकी पत्तियों से बकरियों को भोजन मिलता है। इस कारण ग्रामीण क्षेत्र में खेजड़ी इनकम का प्रमुख सोर्स भी माना जाता है।