बारामती समेत वेस्ट महाराष्ट्र की सीटों पर रोचक मुकाबला, शरद पवार और अजित के गढ़ में नजर आ रही फैमिली फाइट
बारामती : लोकसभा चुनाव के बाद अब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी सभी की निगाह बारामती सीट पर लगी हुई हैं। उप मुख्यमंत्री एवं एनसीपी प्रमुख अजित पवार 8वीं बार अपनी परंपरागत सीट से विधानसभा पहुंचने के लिए मैदान में हैं। वहीं लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी भतीजे को पटखनी देने के लिए सीनियर पवार ने पूरा जोर लगा दिया है। लोकसभा चुनाव में जिस तरह अजित पवार ने शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले को हराने के लिए पत्नी सुनेत्रा पवार को मैदान में उतारा था, उसी का बदला लेते हुए सीनियर पवार ने बारामती में अजित पवार के सामने उनके ही सगे भतीजे युगेंद्र पवार को खड़ा कर दिया है। इससे यह मुकाबला राजनीतिक के साथ पारिवारिक भी हो गया है।
अजित पवार का पलड़ा भारी!
बारामती लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आनेवाली बारामती विधानसभा सीट से अजित पवार लगातार सात बार विधायक चुने गए हैं। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में अजित पवार ने इस सीट पर बीजेपी के गोपीचंद पडालकर को रेकार्ड 1,65,265 वोट से हराया था। अब अजित स्वयं पार्टी प्रमुख हैं। ऐसे में कम से कम पिछले रेकार्ड को बरकरार रखने का उन पर दबाव है। हालांकि लाडली बहना और पश्चिम महाराष्ट्र में किए गए विकास की वजह से अजित पवार का पलड़ा इस चुनाव में थोड़ा भारी दिखाई दे रहा है।
अजित पवार ने बदली रणनीति
पश्चिम महाराष्ट्र के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में स्थिति अलग है। बारामती और पश्चिम महाराष्ट्र आज भी सीनियर और जूनियर पवार में उलझा हुआ है। इसीलिए यहां का मतदाता कुछ भी खुलकर नहीं बोल रहा है। हालांकि लोकसभा में की गई गलती से सबक लेते हुए अजित पवार चाचा को ज्यादा टार्गेट नहीं कर रहे हैं। बारामती का शहरी मतदाता अजित पवार के साथ दिखाई दे रहा है। वहीं ग्रामीण इलाकों में आज भी शरद पवार के चाहने वाले हैं। इसके बाद भी विधानसभा चुनाव से काफी हद तक यह साफ हो जाएगा कि बारामती और पश्चिम महाराष्ट्र की जनता किस तरफ है।
जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में एनसीपी में फूट से लोग नाराज थे और उन्होंने वोटिंग के जरिए उसे जाहिर किया। लेकिन विधानसभा चुनाव अलग है और लोगों में अब वह नाराजगी भी नहीं दिखाई दे रही है। इसके बावजूद वोटिंग से पहले सीनियर पवार कौन-सा दांव चल दें, यह कहा नहीं जा सकता है। इस चुनाव में एनसीपी (अजित) ने अपने ज्यादातर मौजूदा विधायकों को मैदान में उतारा है, जबकि एनसीपी (शरद पवार) ने ज्यादातर नए लोगों पर भरोसा किया है।
अजित पवार की बगावत ने बदले समीकरण
वर्ष 2023 में एनसीपी के टूटने से पहले पार्टी में यही कहा जाता था कि दिल्ली में सुप्रिया सुले और महाराष्ट्र में अजित पवार पार्टी का नेतृत्व करेंगे। लेकिन अजित पवार की बगावत और पार्टी हथियाने के बाद एनसीपी की पॉलिटिक्स बदल गई। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में एक तरह से महायुति के खिलाफ लहर थी। वर्ष 2023 में एनसीपी में विभाजन के बाद से शरद पवार और अजित पवार दोनों के लिए यह चुनाव काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।
पश्चिम महाराष्ट्र एनसीपी का गढ़
पांच साल पहले शरद पवार ने बीजेपी को मात देने में कामयाबी हासिल की थी और फिर महाविकास आघाडी (एमवीए) बनी थी। इसमें 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद वैचारिक रूप से अलग-अलग शिवसेना और कांग्रेस को एक साथ लाकर सरकार बनवाई। लेकिन जब शिवसेना के विभाजन ने एमवीए सरकार को गिरा दिया और अजित की बगावत ने एनसीपी को तोड़ दिया तो शरद ने अपनी पार्टी को फिर से खड़ा किया और पश्चिमी महाराष्ट्र में अपने जनाधार को मजबूत करने पर काम किया। इसका लाभ उन्हें लोकसभा चुनाव में मिला। इसलिए जानकारों का कहना है कि विधानसभा चुनाव भी सीनियर पवार, अजित पवार के लिए राजनीति की पिच पर अबूझ पहेली बने हुए हैं।