मात्र कर्म धर्म से भगवद्प्राप्ति सम्भव नहीं - सुश्री धामेश्वरी देवी
राजनांदगांव, सुबह 10 से 1 बजे तक श्री राम जन्मोत्सव का आयोजन जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी दीदी जी के सानिध्य में कस्तूरबा स्कूल में हर्षोल्लास एवं धूमधाम से संकीर्तन, आरती, महाभोग के साथ आयोजित हुआ। तत्पश्चात् शाम 7 से रात 9 बजे स्टेट हाई स्कूल मैदान में आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के तेरहवें दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाणों सहित बताया कि कुछ लोग कर्म-धर्म के द्वारा ईश्वर को पाना चाहते हैं किन्तु भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं सर्वधर्मान परितज्य मामेकम् शरणम् व्रज, सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। क्योंकि कलियुग में कर्म-धर्म का आचरण करना कठिन ही नहीं असम्भव है । किसी भी कर्म-धर्म में मंत्र, देश, काल, कर्ता, आदि का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है और यदि मंत्र उच्चारण में ही त्रुटि हो गई या क्रिया के विधान आदि में त्रुटि हो गई तो ये सभी कर्म-धर्म यजमान का नाश कर देंगे। जैसे बिजली घर में अगर गलत तार कहीं से जुड़ गया तो पूरी मशीनरी खराब हो जाती है। इसी प्रकार गलत मंत्र उच्चारण करने पर पूरा कर्म-धर्म नष्ट हो जाएगा और हमें दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। और यदि धर्म का आचरण कलियुग में कोई कर भी ले यदि कोई वेदों का ज्ञाता है तो भी उसका परिणाम मिलेगा हमें स्वर्ग और स्वर्ग नश्वर होता है। स्वर्ग से लौटकर हमें फिर कूकर, शूकर, कीट, पतंगादि हीन शरीरों में भटकना पड़ता है। इसलिये कर्मयोग का उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिया गया है - निरंतर मन ईश्वर में लगाकर कर्म कर। तात्पर्य यह है कि मन से ईश्वर में अनुराग हो एवं शरीर से शास्त्रोक्त कर्म भी हो, वही कर्मयोग कहलायेगा। कर्म के साथ-साथ भगवान् को याद करो। किसी भी कर्म को करते समय यह याद रखो कि ईश्वर का ही दिया सब कुछ है और उन्हीं की भक्ति करते हुए हम अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। किन्तु किसी भी कर्म में आसक्ति न हो। और यदि कोई पूछे कि ऐसा कैसे हो कि हम सांसारिक कर्म करें और आसक्ति न करें? तो यह तब होगा जब हमारे मन का लगाव या मन का प्यार ईश्वर में हो जाएगा। यह धीरे-धीरे अभ्यास से ही होता है। तो इस कर्मयोग का अभ्यास हमें धीरे-धीरे करना होगा। कर्म के साथ ईश्वर को साथ लिया जाए। वरना खाली फिजिकल ड्रिल या शारीरिक कर्म जो हम करते हैं उससे हमें केवल संसार की प्राप्ति ही होगी। यानि कर्म बंधन हमें प्राप्त होगा। तो कर्म बंधन से मुक्ति के लिये कर्मयोग को छोड़कर कर्मसन्यास भी एक मार्ग है । कर्म सन्यास का मार्ग एक सही गुरू के मार्ग दर्शन में होता है वास्तविक गुरू समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए और जिन्होंने भगवान् को पा लिया हो यानि उसकी माया समाप्त हो चुकी हो। तो मात्र कर्म धर्म से भगवद्प्राप्ति सम्भव नहीं है। कल ज्ञान मार्ग पर प्रकाश डाला जावेगा। प्रवचन का अंत श्री राधा कृष्ण भगवान की आरती के साथ हुआ। 15 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 8 अप्रैल 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।।