भाग्य अथवा पुरुषार्थ - कैसे मिलेगी भगवत् कृपा - सुश्री धामेश्वरी देवीजी
भिलाई, लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रांगण, अनुष्ठा रेसीडेंसी, जुनवानी खम्हारिया रोड नियर स्मृति नगर में चल रही जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवी जी की दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के तीसरे दिन देवी जी ने वेद और शास्त्रों के प्रमाण सहित बताया कि बुद्धि से भगवान् को जाना नहीं जा सकता परंतु यदि किसी पर भगवान् की कृपा हो जाये और भगवान् की बुद्धि (दिव्य शक्ति) उसे मिल जाये, तो साधारण मनुष्य भी भगवान् को जान सकता है। भगवद् कृपा के बिना भगवान् को नहीं जाना जा सकता। किन्तु भगवान् की कृपा के सिद्धांत का मतलब यह नहीं कि सब कुछ भगवान् ही करेगा, हमें भी कर्म करने की आवश्यकता है। कर्म का मतलब है प्रमुख रूप से मन से हरि गुरु का स्मरण एवं उनकी मानसी सेवा, यह भक्ति रूपी पुरुषार्थ है।
जब भगवान् की भक्ति का नंबर आता है तो मनुष्य बहाना बनाता है कि मेरे भाग्य में नहीं लिखा है या तो समय नहीं आया है या तो ईश्वर की इच्छा नहीं है। इसका मतलब यह है भगवान् की इच्छा से ही मनुष्य देह मिलता है और मनुष्य देह केवल भगवान् को पाने के लिए ही मिलता है क्योंकि चैरासी लाख में पशु पक्षी कीट पतंग भगवान् को नहीं जान सकते हैं तो इसीलिए मनुष्य देह भगवान् देते हैं और जब तक हम भक्ति रूपी पुरुषार्थ नहीं करेंगे हमारा भाग्य भी अच्छा नहीं हो सकता। भाग्य को अच्छा स्वयं को बनाना पड़ता है, वो पुरुषार्थ से परिश्रम से होगा। भगवान् हमें पुरुषार्थ को करने के लिए मार्ग बताएँगे किन्तु मनुष्य को स्वयं ही पुरुषार्थ करना है और उसी पुरुषार्थ से भगवान् की कृपा होगी, बहुत से लोग भगवान् की कृपा का गलत मतलब लगाते हैं कि सब कुछ ईश्वर ही कराता है। ईश्वर तभी कराएगा जब हम परिश्रम करेंगे किन्तु कोई कितना भी परिश्रम करे भगवान् की कृपा पाने के लिए शर्त होती है वो शर्त क्या है वो आगे कल प्रवचन में बताया जायेगा। प्रवचन के अंत में श्री राधाकृष्ण भगवान् की आरती के साथ समापन हुआ। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 14 मई 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।