मध्य प्रदेश

सादर प्रकाशनार्थ आलेख - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : पोला: माटी, मवेशी और मानवीय संवेदना

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आलेख - 

पोला: माटी, मवेशी और मानवीय संवेदना 

हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक, स्तंभकार, बालाघाट, मप्र।

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के अंचलों में पोला केवल एक पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि कृषि संस्कृति की रीढ़ समझे जाने वाले मवेशियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने वाला एक सजीव जीवंत अनुष्ठान है। भादों मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व कृषि और पशुधन के अभेद्य संबंध को रेखांकित करता है। जब खेतों में रोपाई का कार्य पूर्ण हो जाता है और फसलें लहलहाने लगती हैं, तब किसान अपनी हलिया-बैल की जोड़ी को विश्राम देकर उन्हें सम्मानित करते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भारत की ग्रामीण सभ्यता मशीनों से नहीं, बल्कि प्रकृति और पशुओं के सह-अस्तित्व से निर्मित हुई है।

गौरक्षा के प्रति स्वाभाविक जुड़ाव

इस दिन बैलों को नहला-धुलाकर सिंगार किया जाता है, उनके सींगों को रंगा जाता है और उन्हें ठेठरी-खुरमी जैसे पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पोला केवल बड़ों की कृतज्ञता तक सीमित नहीं है; बच्चों के लिए मिट्टी के बैल और जाता-पोला (खिलौने) खरीदे जाते हैं, जो आने वाली पीढ़ी में कृषि, गौरक्षा और हस्तशिल्प के प्रति स्वाभाविक जुड़ाव उत्पन्न करते हैं। आज के यंत्रीकरण के युग में जब ट्रैक्टरों और आधुनिक मशीनों ने कृषि क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया है, पोला पर्व की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है।

मारबत बुराई के अंत का प्रतीक

बैल पोला या तान्ह्या पोला के दूसरे दिन गांव में मारबत के पुतले का भव्य जुलूस निकाला जाता है। साथ ही मिट्टी की मारबत बनाकर बांस की गेड़ी के साथ दूसरे गांव की सीमा में दहन करके बुराई के अंत का प्रतीक मनाया जाता है, जिसमें लोग "ईडा-पीडा घेऊन जा रे मारबत" (सारी बुराइयां और कष्ट दूर हो जाएं) के नारे लगाते हैं। परंपरा में मारबत के साथ 'बडग्या' नाम के छोटे पुतले भी होते हैं, जो समाज की वर्तमान बुराइयों जैसे महंगाई, भ्रष्टाचार और अन्य समस्याओं पर तीखा कटाक्ष करते हैं।

जैविक खेती और लोक संस्कृति

यह केवल अनुष्ठानिक पूजा नहीं, बल्कि मवेशियों की रक्षा, देखभाल और पशु-कल्याण का एक सशक्त माध्यम है। पारिस्थितिक संतुलन की दृष्टि से यह पर्व याद दिलाता है कि जैविक खेती और प्राकृतिक पर्यावरण के बिना टिकाऊ कृषि संभव नहीं है। वहीं लोकाचार और शिल्प संरक्षण के बारे में मिट्टी के खिलौनों के माध्यम से यह स्थानीय कुम्हारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा प्रोत्साहन देता है, जो पशुपालन, जैविक खेती और लोक संस्कृति की मान्यता को महत्वपूर्ण बनाता है।

जड़ों से जोड़े रखती सुगंध

समय की मांग है कि हम पोला को केवल अतीत की एक याद या रस्म न बनने दें। मशीनीकरण आधुनिकता का अनिवार्य अंग हो सकता है, लेकिन जिस निष्ठा के साथ पोला पर मवेशियों को अन्नदाता के सहयोगी के रूप में पूजा जाता है, वह भावना पर्यावरण संरक्षण और पशु-अधिकारों के लिए आज भी प्रासंगिक है। पोला माटी की उसी सुगंध और संवेदना को जीवित रखने का संकल्प है, जो मानव को उसकी जड़ों से जोड़े रखती है।


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