महापुरुष मिथ्या आशीर्वाद व श्राप दोनों नहीं देता - सुश्री धामेश्वरी देवी
जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रांगण, अनुष्ठा रेसीडेंसी, जुनवानी खम्हारिया रोड नियर स्मृति नगर भिलाई, में चल रही 11 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के सातवें दिन बताया कि उस ईश्वर तत्व को जानने के लिए श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की आवश्यकता है, जिसके शरणागत होकर, सेवापूर्वक जिज्ञासु बनकर ही परमतत्व का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। ग्रंथों एवं लोक में भी तीन शब्द पढ़ने सुनने में आते हैं - एक पुरुष, दूसरा महापुरुष, तीसरा परमपुरुष। जिस पुरुष या जीवात्मा ने परमपुरुष या परमात्मा को जान लिया, देख लिया, उसमें प्रविष्ट हो चुका हो, वही महापुरुष या महात्मा है। भावार्थ यह कि ईश्वर-प्राप्त जीव को ही महापुरुष कहते हैं। प्रायः दो प्रकार के महापुरुष प्राप्त होते हैं।
1. जिनको ईश्वर का वास्तविक ज्ञान, दर्शन आदि अनुभव हो एवं बाहर भी उसी रूप में दिखते हो। ऐसे महापुरुष को पहचानना सरल है।
2. दूसरे महापुरुष होते हैं जो भीतर से तो वास्तव में ही महापुरुष होते हैं किंतु बाह्य व्यवहार में सांसारिक से दिखते हैं ऐसे महापुरुष को पहचाना अति कठिन होता है।
जो महापुरुष अनादिकाल से मायातीत ही रहे, कभी मायाधीन नहीं थे। उन्हें ईश्वर का परिकर, पार्षद आदि कहते हैं। दूसरे वे जो अनादिकाल से मायाधीन रहे हैं, किन्तु किसी गुरु की शरण में जाकर उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर चलकर अनंत काल के लिए वे भी महापुरुष हो गए हैं।
वास्तव में महापुरुष उसे कहते हैं जो कुछ न कर सके, न शुभ कर्म कर सके और न अशुभ कर्म कर सके। महापुरुष मिथ्या आशीर्वाद नहीं देता एवं श्राप भी नहीं देता।
महापुरुष को पहचानने का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि महापुरुष के दर्शन सत्संग आदि से ईश्वर में स्वाभाविक रूप से मन लगने लगता है। दूसरा प्रत्यक्ष लाभ यह होता है कि साधक की साधना पथ की क्रियात्मक गुत्थियां होती हैं, उन्हें वह सुलझाने का कार्य करता है। तीसरा प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि वास्तविक महापुरुष की वें क्रियात्मक अवस्थाएं जो समय-समय पर बहिरंग रूप से गोचर होती है उन्हें देखकर साधक को स्वाभाविक उत्साह एवं भगवदीय उत्तेजना मिलती है। प्रेमास्पद भगवान् के नाम, गुण, लीला आदि के स्मरण कीर्तन आदि से वह प्रेम बाहर छलक पड़ता है। जिसे हम सात्विक भाव के रूप में देखते हैं।
प्रवचन का अंत श्री राधा कृष्ण भगवान् की आरती के साथ हुआ। प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 14 मई 2025 तक प्रतिदिन शाम 7 से रात 9 बजे तक होगा।