सुशासन की सरकार में ‘थप्पड़बाज’ IAS को आदिवासी जिले की कमान!
गरियाबंद |
2026-08-19 17:18:54
सवाल—जनता की सुनवाई होगी या फिर पद का रौब चलेगा?
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच विवादों से घिरे अधिकारी पर मेहरबानी?
6 महीने में तीसरी पदस्थापना, अब गरियाबंद की जिम्मेदारी
*राधेश्याम सोनवानी
गरियाबंद :-
जिस सरकार के सुशासन, पारदर्शिता, संवेदनशील प्रशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के दावे लगातार किए जाते हैं, उसी सरकार के प्रशासनिक फैसले अब सवालों के घेरे में हैं। वजह है विवादों में रहे आईएएस अधिकारी रणबीर शर्मा को गरियाबंद जैसे आदिवासी बहुल और संवेदनशील जिले की कमान सौंपे जाने की चर्चा। सवाल यह है कि जिस अधिकारी का नाम अतीत में आम नागरिक के साथ कथित दुर्व्यवहार और रिश्वत के मामले में सामने आ चुका है, क्या वही अधिकारी आदिवासी बहुल जिले की जनता की समस्याओं को संवेदनशीलता से समझने के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प हैं?
गरियाबंद में कमार और भुंजिया जैसी विशेष पिछड़ी जनजातियों सहित बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी निवास करती है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी गरियाबंद को आदिवासी बहुल जिला बताते हुए कमार और भुंजिया जैसी विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आवास और आजीविका के क्षेत्र में विशेष प्रयासों का उल्लेख कर चुके हैं।
ऐसे जिले में कलेक्टर केवल प्रशासनिक मुखिया नहीं होता, बल्कि वह शासन और आम जनता के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। खासकर आदिवासी क्षेत्रों में अधिकारी से कानून-व्यवस्था और योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ-साथ धैर्य, संवाद, संवेदनशीलता और भरोसा पैदा करने की क्षमता की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में विवादित छवि वाले अधिकारी को जिले की कमान सौंपने का निर्णय स्वाभाविक रूप से चर्चा और सवालों को जन्म देता है।
*छह महीने में तीसरी जिम्मेदारी, फिर कलेक्टर की कुर्सी क्यों?*
उपलब्ध प्रशासनिक फेरबदल की रिपोर्टों के अनुसार रणबीर शर्मा 2012 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। मई 2026 में हुए बड़े प्रशासनिक फेरबदल में उन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के प्रबंध संचालक पद से हटाकर समाज कल्याण विभाग का संचालक बनाया गया था।
अब एक बार फिर उन्हें जिला प्रशासन की कमान सौंपे जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सवाल केवल तबादले का नहीं, बल्कि पोस्टिंग के संदेश का है। क्या किसी अधिकारी की विवादित कार्यशैली और पुराने प्रकरणों को दरकिनार कर केवल प्रशासनिक अनुभव के आधार पर उसे संवेदनशील जिले की जिम्मेदारी दी जा सकती है?
*‘थप्पड़ कांड’ जिसने पूरे देश में दिलाई पहचान*
रणबीर शर्मा का नाम वर्ष 2021 में सूरजपुर कलेक्टर रहते हुए सामने आए उस विवाद से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया था, जब लॉकडाउन के दौरान सड़क पर एक युवक को थप्पड़ मारने और उसका मोबाइल पटकने का वीडियो वायरल हुआ था। घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें कलेक्टर पद से हटाने के निर्देश दिए थे।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार युवक ने बताया था कि वह आवश्यक कार्य से बाहर निकला था। घटना का वीडियो सामने आने के बाद तत्कालीन आईएएस एसोसिएशन ने भी इस व्यवहार की आलोचना करते हुए इसे सिविल सेवा की मर्यादा और सहानुभूतिपूर्ण रवैये के विपरीत बताया था।
यानी जिस घटना ने प्रशासनिक पद की शक्ति और आम आदमी के साथ व्यवहार को लेकर पूरे प्रदेश में बहस छेड़ दी थी, उसका असर अब वर्षों बाद फिर चर्चा में है—क्योंकि वही अधिकारी दोबारा जिले की कमान संभालने की स्थिति में हैं।
*2015 में ACB की कार्रवाई भी रह चुकी है सुर्खियों में*
रणबीर शर्मा के करियर से जुड़ा एक अन्य विवाद वर्ष 2015 का है। उस समय भानुप्रतापपुर में एसडीएम के पद पर रहते हुए उनके खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो ने कार्रवाई की थी। रिपोर्ट के अनुसार ACB टीम ने उनके सहयोगी के पास से 10 हजार रुपये बरामद किए थे। शिकायत में उनसे रिश्वत की मांग किए जाने का आरोप लगाया गया था।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ACB की कार्रवाई अथवा आरोप अपने आप में न्यायिक दोषसिद्धि नहीं है। लेकिन किसी वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ इस प्रकार की कार्रवाई का रिकॉर्ड मौजूद होना निश्चित रूप से उस अधिकारी की पोस्टिंग और प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करते समय विचार का विषय बन सकता है।
*भालू प्रकरण भी रहा था विवाद का कारण*
वर्ष 2014 में मरवाही क्षेत्र में एसडीएम के रूप में पदस्थ रहने के दौरान एक भालू को गोली मारने के मामले में भी रणबीर शर्मा का नाम विवादों में आया था। उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है कि भालू द्वारा एक व्यक्ति की जान लेने और लोगों पर हमला करने के बाद उसे मारने का आदेश दिया गया था। इस घटना को लेकर भी उस समय विवाद हुआ था। अर्थात उनके प्रशासनिक करियर में विवादों की सूची केवल एक घटना तक सीमित नहीं रही है।
*‘सुशासन’ में सवाल यही—थप्पड़ का जवाब तबादला, फिर पदोन्नति और अब कलेक्टर की कुर्सी?*
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी अधिकारी का व्यवहार इतना विवादित रहा हो कि उसे कलेक्टर पद से हटाना पड़े, यदि उसके खिलाफ ACB कार्रवाई का इतिहास रहा हो और उसके आचरण पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठ चुके हों, तो ऐसे अधिकारी को दोबारा जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक जिम्मेदारी देने से पहले सरकार को किन मानकों पर विचार करना चाहिए?
क्या प्रशासनिक व्यवस्था में “तबादला ही कार्रवाई और कुछ समय बाद नई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी” का फार्मूला चल रहा है?
यदि हां, तो भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस और संवेदनशील प्रशासन जैसे नारों का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
*गरियाबंद में जरूरत ‘सुनने वाले’ कलेक्टर की, ‘हाथ उठाने वाले’ की छवि वाले अधिकारी की नहीं*
गरियाबंद की सामाजिक संरचना अन्य जिलों से अलग है। कमार और भुंजिया जैसी विशेष पिछड़ी जनजातियों के साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण और वनांचल क्षेत्र के लोग यहां निवास करते हैं। प्रधानमंत्री जनमन योजना, धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और अन्य योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन तभी संभव है जब प्रशासनिक अधिकारी ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझे और उनकी बात सुने। मुख्यमंत्री श्री साय ने भी गरियाबंद में इन क्षेत्रों के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, आवास और आजीविका को प्राथमिकता देने की बात कही है।
ऐसे में जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस जिले को संवेदनशील प्रशासन चाहिए, वहां विवादों में रहे अधिकारी को ही संवेदनशीलता की परीक्षा लेने क्यों भेजा जा रहा है?
*सरकार को बताना चाहिए—क्या बदली है कार्यशैली या सिर्फ कुर्सी?*
रणबीर शर्मा को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि वर्ष 2021 की घटना के बाद उनकी प्रशासनिक कार्यशैली में क्या बदलाव आया? क्या सरकार ने उनके आचरण, पुराने विवादों और प्रशासनिक व्यवहार का कोई मूल्यांकन किया है? यदि किया है तो उसका आधार क्या है?
क्योंकि कलेक्टर की कुर्सी केवल अधिकारों की कुर्सी नहीं है। यह जनता के विश्वास की कुर्सी है। एक कलेक्टर के एक निर्णय से किसी गरीब का जीवन बदल सकता है, किसी आदिवासी परिवार को न्याय मिल सकता है और किसी गांव की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान हो सकता है।
इसलिए गरियाबंद जैसे जिले में कलेक्टर चुनते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि अधिकारी कितना अनुभवी है। यह भी देखना जरूरी है कि वह जनता को कितना सुनता है, कितना समझता है और सत्ता के बजाय सेवा की भावना से कितना काम करता है।
*अब सरकार के सामने असली परीक्षा*
रणबीर शर्मा की गरियाबंद में पदस्थापना यदि होती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं होगा, बल्कि सरकार की सुशासन, संवेदनशील प्रशासन और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीतियों की भी परीक्षा होगी। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि क्या पुराने विवादों को गंभीरता से लेकर प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की गई है या फिर समय के साथ सभी सवालों पर पर्दा डाल दिया गया है।
क्योंकि जनता यह जानना चाहती है कि—
*सुशासन में कलेक्टर जनता की आवाज सुनने के लिए भेजा जाता है या जनता को अपनी आवाज धीमी रखने की याद दिलाने के लिए?*
और गरियाबंद की जनता शायद इस सवाल का जवाब किसी प्रेस विज्ञप्ति से नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में प्रशासन के व्यवहार से पाएगी।