*भटकाव की राह पर वनांचल की 'आदर्श' संस्था*: सेवा के नाम पर सिर्फ धन संग्रह और दिखावे का खेल
कबीरधाम |
2026-08-31 15:01:51
*भटकाव की राह पर वनांचल की 'आदर्श' संस्था*: सेवा के नाम पर सिर्फ धन संग्रह और दिखावे का खेल
कवर्धा--
मुंगेली और कबीरधाम जिलों के वनांचलो में कभी वनवासियों की सच्ची सेवा,भारतीय संस्कृति, संस्कार और कड़े अनुशासन का पर्याय रही एक प्रतिष्ठित समाजसेवी संस्था दीनदयाल वनवासी आश्रम कोडवगोड़ान आज अपने अस्तित्व और साख के गंभीर संकट से जूझ रही है।
कभी आम जनता से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक 'आदर्श' मानी जाने वाली यह संस्था आज स्थानीय लोगों के आक्रोश और विवादों के केंद्र में है। ग्रामीणों का आरोप है कि निहित स्वार्थों के चलते संस्था पर बाहरी तत्वों का कब्जा हो चुका है, जिससे यह अपने मूल उद्देश्यों से भटक कर पतन की ओर अग्रसर है।
*खोई साख और छद्म समाजसेवा*
अंचल के बुजुर्गों और प्रबुद्ध जनों के अनुसार, आदिवासी शिक्षा और कल्याण के नाम पर स्थापित यह संस्था अब केवल शासकीय अनुदानों और सामाजिक दान को बटोरने का जरिया मात्र बनकर रह गई है। राजनेताओं के संरक्षण में फल-फूल रही इस संस्था का धरातल पर वनवासियों से जुड़ाव अब पूरी तरह खत्म हो चुका है।
स्थिति यह है कि जिस संस्था के आयोजनों में कभी हजारों वनवासी स्वस्फूर्त खिंचे चले आते थे, आज उसे अपने मुख्यालय में 100 लोगों की भीड़ जुटाने के लिए भी राजनेताओं के चेहरों या नाच-गाने जैसे मनोरंजन का सहारा लेना पड़ रहा है।
*पिछले 15 वर्षों के कार्यों पर 'श्वेत पत्र' की चुनौती*
संस्था के स्वर्ण काल को देख चुके अंचल के दर्जनों वरिष्ठ नागरिकों ने वर्तमान प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गहरा दुख और आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने संस्था को खुली चुनौती देते हुए दो टूक सवाल किए हैं:
बीते 15 वर्षों में संस्था ने वनवासियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, संस्कृति रक्षा और धर्मांतरण रोकने के लिए धरातल पर कौन सा ठोस कार्य किया है, इसका ब्यौरा सामने लाया जाए।
लोकप्रियता सिद्ध करने की चुनौती: संचालकों में यदि साहस है, तो वे बिना किसी राजनेता और बिना नाच-गाने के, केवल अपने नाम और काम के दम पर एक आयोजन करके दिखाएं; उनकी वास्तविक लोकप्रियता और जनसमर्थन की पोल खुलकर सामने आ जाएगी।
*मिशनरियों को मिला खुला मैदान खतरे में मूल संस्कृति*
इस संस्था का गठन मूल रूप से वनवासियों को शिक्षा-स्वास्थ्य से जोड़ने, उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने और उन्हें ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के कुचक्र से बचाकर मूल संस्कृति में बनाए रखने के लिए किया गया था। शुरुआती 30 वर्षों तक संस्था ने इस मोर्चे पर बेहतरीन काम किया, जिसके कारण मिशनरियां पैर नहीं पसार सकीं।
*विडंबना का दौर:* बीते डेढ़ दशक में वनवासी सेवा का मुखौटा ओढ़े इस संस्था की सामाजिक गतिविधि पूरी तरह शून्य हो चुकी है। कुछ लोगों की 'जेबी संस्था' बन चुकी यह संस्था अब केवल स्कूल-छात्रावासों में दर्ज बच्चों की संख्या के आधार पर दान-अनुदान डकारने में व्यस्त है। वनांचल के लोगों से संवाद टूटने का नतीजा यह हुआ कि पूरे क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों का जाल फैल चुका है और बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का खेल चल रहा है।
संस्था के इस वैचारिक और नैतिक पतन से पूरे क्षेत्र के शुभचिंतकों और स्थानीय वनांचल वासियों में भारी निराशा और तीव्र आक्रोश व्याप्त है।