लोभ ही बनता है भोग और रोग का कारण : मुनि संवेगरत्न सागर
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में गुरुवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने लोभ के दुष्परिणामों से सावधान करते हुए आत्मसंयम और आत्मचिंतन का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि लोभ की भयंकरता ही व्यक्ति को भोगी और रोगी बनाती है। लोभ के जाल में फंसकर जीव भोग-विलास में डूबता है और अंततः अनेक दुखों व रोगों से घिर जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि पांच इंद्रियों और छठा मन पर विजय प्राप्त करने वाला व्यक्ति मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होता है। मन और इंद्रियां ही भोग की प्रमुख वजह हैं, जबकि भोग आगे चलकर रोग का कारण बनता है। विषय-वासनाओं और कषायों पर विजय पाने के लिए इन छह पर नियंत्रण जरूरी है।
मुनिश्री ने कहा कि 'जितना प्राप्त है, उतना पर्याप्त है' का भाव जीवन में अपनाने से लोभ से बचा जा सकता है। आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा व्यक्ति को लोभ की ओर ले जाती है, जिससे दुख, दुर्गति और पीड़ा बढ़ती है।
आत्मचिंतन से मिलेगा आत्मकल्याण का मार्ग
मुनिश्री ने कहा कि अतिचार, अतिक्रम और अनाचार से बचना चाहिए। आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपनी गलतियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है। यदि लोभ में फंसकर कोई आत्मकल्याण के मार्ग से भटक गया है, तो उसे गुरु और परमात्मा की शरण में जाकर आत्मालोचना और क्षमायाचना करनी चाहिए।
प्रवचनमाला में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं शामिल होकर आचार्य वीरभद्राचार्य द्वारा रचित आतुर प्रत्याख्यान ग्रंथ के माध्यम से धर्म,आत्मसंयम और आत्मकल्याण का मार्ग समझ रहे हैं।