मनुष्य के जीवन में दो राह, प्रगति या पतन : ऋषभ सागर
बालोद । प्रगति या पतन ये दो राहें हैं मनुष्य के जीवन मे। वहअपने आचार,विचार और व्यवहार में सुधार करके प्रगति और शांति प्राप्त कर सकता है।खुद में सुधार हो जाये तो जगत का स्वरूप उतना खराब नही लगता।इसलिए सुधार खुद में करें दुनिया को सुधारने की कोशिश न करें।
उक्ताशय के विचार संत ऋषभ सागर ने महावीर भवन में जीवन दर्शन पर आधारित अपने प्रवचन श्रृंखला में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि व्यवहार में सौम्य व्यक्ति प्रशंसनीय होता है।सौम्य व्यक्ति अपने को शांत रखता है। संतश्री ने कहा कि आत्मा के पिछले भव का प्रभाव इस भव पर भी पड़ता है।इसलिए एक ही परिवार के सदस्यों का स्वभाव अलग अलग हो सकता है।स्वभाव को समझकर व्यवहार करें तो मन का भाव नही बिगड़ेगा। मन की सजगता के लिए सौम्यता के साथ ही धैर्यता का होना भी आवश्यक है।जल्दबाजी में कोई निर्णय नही लेना चाहिए।बुद्धि व्यवस्थित हो तो जगत व्यवस्थित दिखेगा।किसी के प्रति गलत मान्यता है तो उसके प्रति भाव भी गलत ही होंगे।सौम्य व्यक्ति में धैर्य होता है तथा धैर्य का प्रतिफल हमेशा अच्छा मिलता है।रिश्तों को निभाने में भी धैर्य बहुत जरुरी होता है।उन्होंने कहा कि लोग जीवन तो अच्छा जीना चाहते है लेकिन स्वभाव को सुधारने की दिशा में कोई प्रयास नही करते।कोशिश करें जिसतरह शरीर का मैल साफ करते है उसी तरह मन का मैल साफ करें।दूसरों की गलतियों को माफ करने तथा स्वयं की गलतियों के लिए भी क्षमा मांगने का स्वभाव बनाएं।