छत्तीसगढ़ / बालोद

प्रेम, करुणा, दया भाव के साथ किया गया कार्य ही धर्म है : ऋषभ सागर

बालोद । हम अपने को धार्मिक कहते हैं किंतु जीवन जीने के ढंग में और ना ही विचारों में कोई अंतर दिखाई देता है ।पूजा पाठ आदि एक धार्मिक क्रिया मात्र है। प्रत्येक क्षेत्र में पात्रता का महत्व है बिना पात्रता के धर्म के क्षेत्र में भी प्रवेश एक दिखावा होता है।

संत ऋषभ सागर ने अपने व्याख्यान में धर्म और धार्मिकता पर अपना उद्बोधन देते हुए कहा कि धर्म पात्र जीव ही कर सकता है। प्रत्येक जीव में आत्मा होती है और इन समस्त जीवों के प्रति अनुकंपा के भाव यदि नहीं आते तो व्यक्ति धार्मिक नहीं हो सकता, क्योंकि प्रेम करुणा दया सेवा आदि भावों के साथ किया गया कार्य ही धर्म है। हमारी धार्मिक क्रियाएं उथली होती है क्योंकि हम धर्म शरीर के स्तर पर करते हैं आत्मा के उत्थान के स्तर पर नहीं। राग द्वेष,क्रोध ,अहंकार आदि आत्मा के विकार हैं। जिस तरह शरीर की बीमारियां होती है वैसे ही यह आत्मा की बीमारियां हैं और ऐसे विकारों से ग्रस्त व्यक्ति कृपा के पात्र ही होते हैं।इन विकारों से ग्रस्त व्यक्ति किसी भी हद तक गिर जाता है। इसलिए आत्मा के विकारों को दूर करना आवश्यक होता है परमात्मा के बताएं मार्ग पर चलना ही सच्ची श्रद्धा है ,जो भी स्थितियां परिस्थितियों बनती है वह कर्म के प्रभाव से होता है ,आस्तिक व्यक्ति में यह स्वीकार्यता का भाव होता है। और जिसमें यह स्वीकार्यता का भाव होता है वह किसी के प्रति भी अपने भाव नहीं बिगड़ता। ज्ञानी कहते हैं भाव बिगड़ने से भव बिगड़ता है ।संतश्री ने कहा कि अपने भावों को और भव को सुधारने का अवसर पर्युषण पर आने वाला है ,सभी अपने अंदर के विकारों को दूर कर आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करें।

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