छत्तीसगढ़ / बिलासपुर

स्कूलों में पढ़ाई जाए नैतिक और धार्मिक विकास की कहानियां,गुरुकुल की कहानी पढ़कर संचालक चरणजीत सिंह ने कहा

 बिलासपुर। एक दिल को छू लेने वाली कहानी ने सरदार संतोष सिंह मेमोरियल स्कूल सिरगिट्टी के संचालक चरणजीत सिंह खनूजा को गहराई से प्रेरित किया। कहानी में एक दादी और उनके पोते रौनक का प्रसंग है, जिसमें दादी अपने जीवन के धार्मिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सहजता से रौनक को समझाती हैं। यह कहानी न केवल उनके अपने परिवार में बल्कि छात्रों और शिक्षकों के जीवन में भी मार्गदर्शक सिद्धांतों का संचार करती है।

रौनक जैसे बच्चे जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में उलझे रहते हैं, उन्हें अक्सर धर्म और अध्यात्म की ओर झुकाव की आवश्यकता होती है। उन्होंने बताया कि स्कूलों में ऐसे विषयों पर चर्चा होनी चाहिए ताकि बच्चे अपनी संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिकता को समझ सकें और उनके मूल्यों को आत्मसात कर सकें।

कहानी में दादी का चरित्र एक आदर्श गुरु

 

कहानी में दादी का चरित्र एक आदर्श गुरु के रूप में उभरता है, जो न केवल धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं, बल्कि अपने पोते को भी इनकी उपयोगिता समझाने में सफल रहती हैं। वह बताती हैं कि कैसे धार्मिक गतिविधियों से आत्मिक शांति और संतोष की अनुभूति होती है। दादी घर में छोटे-से मंदिर की स्थापना करती हैं और हर दिन सुबह पूजा करती हैं। उनकी दिनचर्या से रौनक का ध्यान धार्मिक अनुष्ठानों की ओर जाता है और वह जिज्ञासु हो उठता है। दादी का चरित्र आज के समाज में नारी की आस्था और संस्कारों का प्रतीक बनता है।
 
 
संचालक श्री खनूजा आगे कहते हैं कि आज के बच्चे एक व्यस्त जीवन जी रहे हैं, जहां अध्यात्म के लिए समय निकालना चुनौतीपूर्ण होता है। किशोरावस्था में बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील होते हैं। ऐसे समय में उन्हें सही दिशा देने के लिए हमें आध्यात्मिकता का मार्ग दिखाना जरूरी है। उन्होंने कहा की स्कूलों में छात्रों के नैतिक और धार्मिक विकास के लिए ऐसी कहानियां पढ़ाई जानी चाहिए। इससे बच्चों में आत्मसंयम, आत्मविश्वास और सहनशीलता जैसे गुण विकसित होते हैं।
 

घर और स्कूल दोनों का दायित्व: काव्या

 

अभिभावक काव्या कहती हैं कि मुझे यह कहानी बहुत प्रेरणादायक लगी। आज के बच्चों में इन मूल्यों की कमी महसूस होती है। बच्चों के लिए यह जरूरी है कि वे धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़े रहें ताकि उनमें संयम और संतुलन बने। मेरे विचार में घर और स्कूल दोनों को मिलकर ऐसे माहौल का निर्माण करना चाहिए जहां बच्चे अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को समझ सकें।

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