जब अनिष्ट ग्रह पड़ जाएं पीछे, तो याद करें भैरव बाबा को क्योंकि काल भी डरता है भैरव बाबा से
भैरव उपासना करने से अशुभ ग्रह राहु, केतु, शनि की पीड़ा से शीघ्र-अतिशीघ्र मुक्ति मिलती है। जिन राशि वालों को शनि पीड़ा दे रहे हैं, उन्हें तथा जिन राशि का गोचर में राहु अशुभ स्थान पर आ रहा हो, उन्हें भैरव जी की उपासना करने से नहीं चूकना चाहिए। भैरव जी को भगवान शिव का रूप माना जाता है, भैरव जी कई रूप में प्रसिद्ध हैं, जिसमें बटुक भैरव, चण्ड भैरव, काल भैरव, कपाल भैरव इत्यादि प्रमुख हैं।
भैरवजी के संबंध में कई कथाओं का विवरण विभिन्न पुराणों में प्राप्त होता है। इस कथा से तो सभी परिचित होंगे कि जब भगवान शिव सती का निर्जीव देह अपने कंधे पर रखकर ब्रह्माण्ड का चक्कर लगा रहे थे तो भगवान श्रीहरि विष्णु के सुदर्शन द्वारा सती के विभिन्न अंग कटकर पृथ्वी पर जगह-जगह गिरे, उन स्थलों पर भगवान शिव ने साधना की और उन शक्तिपीठों की सुरक्षा के लिए गण के रूप में एक-एक भैरव को स्थित किया। इस प्रकार 108 शक्तिपीठों का सृजन हुआ और मान्यता अनुसार शंकरजी भैरव रूप में प्रत्येक शक्तिपीठ पर भिन्न नामों से निवास करने लगे, इसलिए भैरव जी को देवी का द्वारपाल और रक्षक भी कहा जाता है।
भैरवजी से काल भी सहमा-सहमा रहता है इसलिए इन्हें 'काल भैरव' भी कहा जाता है। काल भैरव की शरण में जाने से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। कहते हैं, भैरवजी का सच्चा भक्त होने पर उसके पाप कर्मों का भोग काल भैरव सोटे से पीटकर समाप्त करते हैं। इस पीटन-क्रीड़ा को 'भैरव-यातना' कहा जाता है। चिरकाल तक नरक भोगे जाने का कष्ट इस यातना द्वारा कुछ ही क्षणों में निपट जाता है। कालभैरव सदा धर्मसाधक, शांत, तितिक्षु तथा सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले प्राणी की काल से रक्षा करते हैं। भैरवजी का व्रत संकटों से बचाता है, शत्रुओं का नाश करता है।