पीएम मोदी ने सच कहा है,कड़वा सच.
सुनील दास
दो आदमी कोई भी एक काम करे तो एक सफल होता है और दूसरा असफल होता है।एक की तारीफ होती है, दूसरे की आलोचना होती है।एक को योग्य माना जाता है और दूसरे को अयोग्य माना जाता है।एक की सफलता के लिए तारीफ की जाती है और दूसरे की आलोचना की जाती है।लोकतंत्र में होने वाले चुनाव में भी यही होता है।लोकतंत्र में तय समय पर चुनाव होते है, चुनाव दो दलों व दो गठबंधनों के बीच होता है, दोनों दलों व गठबंधन के नेता के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता है।दोनों राजनीतिक दल,गठबंधन के नेता जनादेश मांगते हैं।जनता जिस पर भरोसा करती है,उसे जनादेश देती है, वह सरकार बनाता है और सत्ता पर काबिज होता है और जनहित व देशहित के काम करता है।जनता जिस पर भरोसा नहीं करती है,उसे जनादेश नहीं देती है।जो चुनाव जीतता है, उसे सफल माना जाता है और जो चुनाव हारता है,उसे असफल माना जाता है।
लोकतंत्र में हर पांच साल में केंद्र व राज्य के चुनाव होते हैं, यदि केंद्र का चुनाव कोई नेता तीन बार जीतता है और सरकार बनाता है तो स्वाभाविक है माना तो यही जाएगा कि वह अपने अच्छे जनहित व देशहित के काम के कारण जनता का भरोसा निरंतर जीतता आ रहा है।वह सफल नहीं निरंतर सफल माना जाता है,पार्टी व देश की राजनीति में उसका कद निरंतर ऊंचा होता जाता है।इसके विपरीत जो निरंतर तीन चुनाव हार जाता है तो उसे असफल नहीं घोर असफल नेता माना जाता है और पार्टी व देश में भी उसके प्रति भरोसा कम होता जाता है,उसका राजनीतिक कद छोटा होता जाता है। देश में पीएम मोदी लोकसभा का चुनाव तीन बार तथा राज्यों में होने वाले ज्यादातर चुनाव जीतने के कारण देश के सबसे लोकप्रिय व भरोसेमंद नेता माने जाते हैं। वहीं राहुल गांधी लोकसभा के तीन चुनाव और राज्यों के ज्यादातर चुनाव हारने के कारण कम लोकप्रिय व कम भऱोसेमंद नेता पार्टी और देश में माने जाने जा रहे हैं।
राहुल गांधी जब तक खुद अपनी पार्टी को एक लोकसभा का चुनाव नहीं जिता देते उनकी लोकप्रियता व साख पार्टी के भीतर व देश के भीतर नहीं बढ़ सकती।राहुल गांधी ऐसा अब तक नहीं कर पाए हैं, इसलिए वह जिस काम का कोई फायदा न उनको होता है और न पार्टी को होता है,वही काम करते हैं, पीएम मोदी की रोज आलाेचना।वह उनको निरंतर डरपोक,समझौतावादी,सरेंडर करने वाला,कमजोर नेता कहते रहते हैं लेकिन इससे पीएम मोदी की न तो लोकप्रियता कम होती है और न जनता का भरोसा कम होता है।मोदी अच्छा काम करते जाते है,उसका फायदा उनको और उनकी पार्टी को होता है ,पार्टी चुनाव जीतती जाती है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी खाली पीएम मोदी की आलोचना करते रहते हैं,चुनाव जीत नहीं पाते हैं तो मानते नहीं हैं कि अपनी गलती से चुनाव हार रहे हैं। इसके लिए चुनाव आयोग को दोषी ठहराते हैं।वोट चोरी को कारण बताते हैं। देश में आंदोलन के नाम पर अराजकता फैलाने का प्रयास करते हैं। इसका भी पार्टी को कोई फायदा नहीं हो रहा है,इससे भी पार्टी अगले साल होने वाले चुनाव नहीं जीत सकती।चुनाव जीतने के लिए नेता व संगठन दोनों मजबूत होना चाहिए।
राहुल गांधी न तो चुनाव जीतकर खुद को मजबूत नेता साबित कर पा रहे हैं और नहीं संगठन को मजबूत करने की ओर ध्यान दे रहे हैं। वह मजबूत नेता बनने के लिए क्या नहीं कर चुके हैं,कांग्रेस अध्यक्ष बन के देख लिए,भारत जोड़ो यात्रा करके देख लिए,नेता प्रतिपक्ष बन गए,गठबंधन के अघोषित नेता बन गए हैं,संसद के भीतर व बाहर कई बार धरना प्रदर्शन व आंदोलन कर चुके हैं लेकिन वह मजबूत नेता नहीं बन सके हैं।जनता के भरोसे के नेता नहीं बन सके हैं।यही वजह है कि उनकी आलोचना हो रही है,कभी अमित शाह कहते हैं कि राहुल गांधी से की कि तीस साल तक कांग्रेस की सरकार नहीं आने वाली है,शाह तो कारण भी बताते हैं कि राहुल गांधी जनता के बीच जाने की जगह विदेश ज्यादा जाते हैं।चुनाव जीतने के लिए, जनता का भरोसा जीतने के लिए नेता को जनता के बीच जाना पड़ता है,उसके लिए काम करना पड़ता है,योजनाएं बनानी पड़ती है।
पीएम मोदी राहुल गांधी की नाम लेकर आलोचना नहीं करते हैं लेकिन वह जब कहते हैं तो लोग समझ जाते हैं कि पीेएम मोदी राहुल गांधी के लिए कह रहे हैं।इस बार पीएम मोदी ने कांग्रेस व राहुल गांधी की सबसे तीखी आलोचना की है यह कहकर कि कांग्रेस अपने नाकाम उत्पाद को लांच करने के लिए कब तक देश को दांव पर लगाएगी,परिवार को नाकामी के दाग से बचाने के लिए कांग्रेस भारत की उपलब्धियों पर सवाल उठा रही है,हकीकत यह है कि परिवार पार्टी पर बोझ हो गया है।कांग्रेस एक परजीवी की तरह है,जो किसी और को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती है,कांग्रेस पर दिमागी नक्सलियों का दबदबा है,वह अपने दम पर सोचने पर असमर्थ हो गई है।यह सच भी है।कांग्रेस का संगठन कमजोर हो गया है,गांधी परिवार का चुनाव जिताने का जादू खत्म हो गया है।कांग्रेस के पास राज्यों में चुनाव जिताने वाले नेता भी कम हो गए है,यही वजह है कि कांग्रेस की सत्ता कुछ राज्यों में ही रह गई है।सबसे बुरी बात यह है कि कांग्रेस का चुनाव लड़कर चुनाव जीतने का विश्वास खत्म हो गया है।