स्वस्थ बुजुर्गों को रोजगार से मिल सकती है ऊर्जा
अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस
- डॉ. सूर्यकांत मिश्रा
मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः- इन पंक्तियों का सदैव से बड़ा महत्व रहा है। मैं तो इसे वेद वाक्य मानता हूं। जैसे ही हमारे जेहन में ये शब्द आते हैं, हमारा शीश श्रद्धा पूर्वक झुक जाता है । जिस तरह ईश्वर अदृश्य रहकर हर कठिन परिस्थिति में हमारा मार्ग दर्शन करते हैं, ठीक उसी तरह माता-पिता हमारे जीवन में दृश्य रूप में साक्षात ईश्वर हुआ करते हैं। विडंबना है कि आज के इस भौतिकतावादी युग में हमारी पीढ़ी की सोच में परिवर्तन के चलते ऐसे दृश्य कहीं विलोपित हो गए हैं। हमारे इस मानवीय समाज में चंद सु-संस्कारित परिवारों को छोड़ दें तो अधिकांश परिवारों में बुजुर्गों को भगवान मानना तो दूर इंसान का दर्जा भी नहीं दिया जा रहा है। जिन माता-पिता ने अपनी संतानों को जीवन का हर सुख प्रदान करने अपनी रातों की नींद तक को त्याग दिया, इन्हीं माता - पिता के असक्त होने पर बेटे सहित बहु और पोते-पोतियों का भरापूरा परिवार उनकी देखभाल के लिए लोगों को नियुक्त कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते आ रहे हैं!एक वह समय भी था जब इन्हीं बुजुर्ग माता-पिता की आज्ञा के बगैर घर का कोई काम या निर्णय नहीं लिया जाता था। आज उन्हें ही उपेक्षित, बे - सहारा और दयनीय जीवन जीने विवश किया जा रहा है! परिवार के बुजुर्गों का सम्मान छोड़ आज की पीढ़ी उन्हें - रूढ़िवादी , सनकी तथा न जाने किन - किन शब्दों की संज्ञा से नवाजते चले जा रहे हैं।
एक कटु सत्य बयां करूं तो आज के समय में कामकाजी महिलाओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि देखी जा रही है। यह अच्छी बात भी है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि बुजुर्ग माता-पिता को महज चौकीदार और आया बनाकर रख दिया जाए! परिवार की बुजुर्ग महिला और अपने बेटे की मां तथा बहु की सास का सम्मान आज कहीं खो गया है! परिवार की वही बुजुर्ग मां अपने पोते - पोतियों की दिनभर देखरेख करते हुए सेवा करे। शाम को बेटे-बहु के ऑफिस से आने पर उनके चाय - नाश्ते का बंदोबस्त करे! क्या इसी दिन के लिए उस मां ने पढ़ी-लिखी और कामकाजी लड़की को अपनी बहु बनाया था? यह तो ईश्वरीय देन है कि वही मां बड़े दिल और स्नेहिल आत्मा के चलते सभी प्रकार के दर्द को हंसते-हंसते सह जाती है। उसी मां का बेटा जो आज खुद पिता बन चुका है , कभी उसके दिल के कोने में झांक कर देखें तो उसे वहां छिपा हुआ दर्द अवश्य नजर आएगा। मैं तो यही कहना चाहता हूं कि यदि आप अपना कर्ज चुकाना चाहते हैं तो मां के उस दर्द पर मरहम लगाने का प्रयास उसके पास बैठकर स्नेह पूर्वक बात कर दूर करने का प्रयास जरूर करें । क्या हम इस सच्चाई से मुंह मोड़ सकते हैं कि हमारे बुजुर्ग ही हमारे जीवन के वटवृक्ष होते हैं, जिसकी शीतल छांव में हमारा बचपन बीता और हमारी यौनावस्था को बल मिला ।
आज हमारे देश में लगभग 16 से 18 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी उम्र 60 वर्ष या इससे अधिक है। वे ऐसे माता-पिता, दादा-दादी , नाना-नानी हैं, जिन्होंने इस देश के विकास की गति को बरकरार रखा। ऐसा अनुमान भी सरकारी आंकड़ों के माध्यम से लगाया जा रहा है कि सन 2031 तक इन्हीं बुजुर्गों की संख्या 22 से 25 करोड़ पहुंच सकती है। इस गणितीय आंकड़े के आधार पर प्रत्येक सातवां भारतीय इसी आयु वर्ग का हिस्सा होगा! साथ ही 140 करोड़ की कुल आबादी में युवाओं और किशोरों की संख्या कहीं अधिक होगी । ऐसे में हम चाहें तो अपने बुजुर्गों की देखभाल बड़ी आसानी से कर सकते हैं। जरूरत है सिर्फ संकल्प की। मैं यदि कल्पना करूं तो प्रत्येक तीन में से दो बुजुर्ग किसी लंबी या असाध्य बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं। वहीं तीन में से एक अवसाद का शिकार हो चुके हैं! प्रत्येक चार में से एक को चलने - फिरने में परेशानी हो सकती है! क्या हमारा परिवार और उसमें सम्मिलित सदस्य ऐसे बुजुर्गों की देखभाल करने में असमर्थ हैं ? जहां तक मैं समझता हूं ऐसा नहीं है । यदि बुजुर्गों के प्रति हमारा नजरिया प्रेम और स्नेह से परिपूर्ण है तो उनकी सेवा कोई चुनौती नहीं है। हमारे बुजुर्गों के जीवन में उनके हम उम्र की मौत की खबर उन्हें भय की स्थिति में ला देती है। शारीरिक स्वास्थ्य ,सेवा - निवृत्ति , बच्चों का उनसे दूर रहना , उम्र के कारण लाचारियां , बच्चों द्वारा दुर्व्यवहार से उनकी मानसिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। बुजुर्गों की इन सारी समस्याओं का मनो-वैज्ञानिक समाधान ठीक उसी तरह ढूंढना होगा जिस तरह सामाजिक समस्याओं का हल तलाशा जाता है।
बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता और उनकी देखभाल का बीजारोपण बेहतर तरीके से करने के उद्देश्य से स्कूली स्तर से ही हमारे पाठ्यक्रम में इसे शामिल करना होगा । हमारे भारतवर्ष के सांस्कृतिक मूल्य बुजुर्गों के प्रति सम्मान और दया भाव के साथ ही बनाए गए थे । साथ ही बुजुर्गों की अहमियत को हमारी प्रारंभिक शिक्षा , फिल्मों और साहित्य के माध्यम से बच्चों के हृदय में उतारा गया था । कहीं न कहीं वर्तमान शिक्षा प्रणाली भी इस तरह की लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती है । हमें ऐसे बुजुर्गों के लिए , जो मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं - रोजगार और सक्रिय रहने के लिए विकल्प तलाशने होंगे । परिणाम यह होगा कि वे अर्थव्यवस्था में योगदान करते हुए जहां सम्मान जनक जीवन जी सकेंगे वहीं ऊर्जा का अनुभव भी कर सकेंगे । जहां जिस शासकीय या अशासकीय तथा संस्थागत कार्यालयों में हमारे बुजुर्गों के लायक रोजगार उपलब्ध हों , उन्हें वहां मौका देना और उनके अनुभवों का लाभ लेना हमारे लिए उपयुक्त हो सकता है ।