पीके कर रहे हैं उलट राजनीति
सुनील दास
बिहार में चुनाव आने वाले समय में होंगे, इसके लिए वहां राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। प्रशांत किशोर ने दो साल की पदयात्रा के बाद वादे के मुताबिक अपनी नई राजनीतिक पार्टी जनसुराज पार्टी बना ली है। यह घोषणा की है कि वह अगले विधानसभा चुनाव में बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लडेंगे। बिहार की राजनीति के मैदान में पीके के आ जाने से बिहार की राजनीति में एक और विकल्प जनता के समक्ष होगा। यह जनता के लिए नया विकल्प होगा।
बिहार में जनता के सामने अब तक लालू यादव व नीतीश कुमार दो ही विकल्प हुआ करते थे।लालू की जगह उनके पुत्र तेजस्वी ने ले ली है तो नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी अभी सामने नहीं आया है। चुनाव के समय ही यह साफ होगा कि नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी कौन होगा। भाजपा ने सम्राट चौधरी के रूप में अपना अगला सीएम चुन लिया है।बिहार में भाजपा की सरकार बनी तो ज्यादा संभावना इस बात की है कि स्रमाट चौधरी ही सीएम बनें। नीतीश रहते भाजपा अपना सीएम अब तक नहीं बना पाई है।सुशील मोदी उसके अच्छे नेता थे, उनके न रहने पर अब उनकी जगह सम्राट चौधरी को सामने लाया गया है।
नीतीश के रिटायर होने पर भाजपा अपना सीएम बनाना पसंद करेगी। ऐसे में बिहार की राजनीति में पीके का उभार किसके लिए चुनौती होगा। माना जाता है कि पीके का सारा जोर लालू परिवार को कमजोर करना और चुनाव में उनकी सरकार न बनने देना है।यानी पीके बिहार में वही भूमिका निभाना चाहते हैं जो केजरीवाल की आप पार्टी ने दिल्ली में निभाई थी। यानी कांग्रेस को सत्ता से दूर करने की। दिल्ली में जब से आप आई है तब से कांग्रेस सत्ता से दूर हो गई है और सत्ता में उसकी वापसी नहींं हो रही है।
जब तक दिल्ली में आप नहीं थी तो भाजपा और कांग्रेस की ही सरकार यहां बना करती थी। बिहार में भी सरकार या तो लालू यादव की पार्टी की बनती है या नीतीश कुमार की पार्टी की बनती है। भाजपा यहां अब तक अपन बूते सरकार नहीं बना पाई है।पीेके की जनसुराज पार्टी के बनने के बाद हो सकता है कि नीतीश कुमार के न रहने पर नीतीश कुमार की पार्टी कमजोर हो जाए और उनकी जगह पीके ले ले। यह संभावना तो है। लालू व नीतीश कुमार की युग समाप्त हो गया है। हो सकता है जनता लालू परिवार की जगह किसी दूसरे नेता को ज्यादा महत्व दे।जैसा कि जनता ने दिल्ली में किया। नए नेता व नई पार्टी को महत्व दिया।
अगर चुनाव में पीके को अच्छी सफलता मिलती है तो वह नीतीश कुमार की जगह ले सकते हैं।भाजपा भी उनको उतना ही महत्व दे सकती है, जितना नीतीश कुमार को दिया करती थी।कांग्रेस भी उनको महत्व दे सकती है। पीके की तो भाजपा व कांग्रेस दोनो से अच्छी बनती है।जब जैसी जरूरत होगी वह भी नीतीश कुमार के समान दोनों में से किसी एक को .चुन सकते हैंं। चुनाव जीतने के लिए जनता का बताना होता है कि नेता व पार्टी का विजन क्या है।
पीके ने साफ कर दिया है कि वह बिहार पिछड़ापन दूर करेंगे, बिहार में उच्चस्तरीय शिक्षा की व्यवस्था करेंगे, शराबबंदी को समाप्त करेंगे तथा इससे जो नुकसान हो रहा है, उस पैसे से शिक्षा की व्यवस्था करेंगे। जहां तक बिहार के पिछड़ेपने की बात है तो लालू व नीतीश कुमार जैसे नेता उसे दूर नहीं कर सके हैं तो पीके क्या कुछ कर पाएंगे।जहां तक शराबबंदी का बात है तो पीके नीतीश कुमार के उलट काम करने की सोच रहे हैं तो इससे साफ है कि नीतीश कुमार की शराबबदी की गलती को वह सुधारना चाहते हैं। वह समझ गए हैं कि शराबबंदी से राज्य को कोई फायदा नहीं होता है,उल्टे नुकसान होता है।
वह भी शराब के पैसे से कुछ अच्छा काम करने की सोच रहे हैं तो इसमें खतरा भी होता है क्योंकि शराब के धंधे में बहुत पैसा होता है,बहुत भ्रष्टाचार भी होता है। इससे सरकार का नाम बदनाम भी होता है जैसा कि दिल्ली में केजरीवाल सरकार और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार का नाम बदनाम हुआ। राजनीति में किसी नेता के उलट काम करने से फायदा होता है जैसे मोदी को कांग्रेस के भ्रष्टाचार के कारण राजनीति में फायदा हुआ, केजरीवाल को कांग्रेस के भ्रष्ट्राचार की राजनीति के कारण फायदा हुआ। कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति करती थी,इसलिए मोदी व केजरीवाल ने उसके उलट ईमानदारी की राजनीति की और जनता ने उसे पसंद किया और मोदी तीसरी बार पीएम बने है और केजरीवाल भी लंबे समय तक सत्ता मे रहे है।
पीके भी नीतीश कुमार की शराबबंदी के उलट शराबबंदी समाप्त करने की राजनीति करने की बात कर रहे है तो हो सकता है कि जनता को यह अच्छा लगे। उच्च शिक्षा की बात भी अच्छी लगे।पीके ऐसे समय मे बिहार की राजनीति मे आए हैं जब दो दिग्गज नेता का सूरज डूबने को है। यानी उनके लिए अच्छी संभावना है। जनता के पास मौका है बिहार के लिए नया नेता चुनने का।अब तक तो जनता ने उलट राजनीति करने वालों को मौका दिया है, जनता के सामने पीके ने खुद को पेश कर दिया है, जनता का फैसला करना है और वह अगले चुनाव मेे फैसला करेगी कि पीके की बिहार में क्या भूमिका होगी।