सामान्य ज्ञान

मुफ्त की रेवड़ियांः परजीवियों का तैयार होता एक वर्ग

जीव-विज्ञान की भाशा में परजीवी ऐसे जीवाणु या कीटाणु होते हैं, जो किसी दूसरे जीव के अंदर रहकर उससे भोजन प्राप्त करते हैं। देष की सबसे बड़ी अदालत ने सरकार की मुफ्त रेवड़ियों पर आश्रित ऐसे ही लोगों और सरकार पर कटाक्षपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा नगद धनराषि एवं निषुल्क सुविधाएं देने के वादों पर कहा है कि राश्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्य धारा में लाने की बजाय, क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं बना रहे ? ये लोग मुफ्त राषन और धन मिलने से काम करने को तैयार नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी षहरी इलाकों में बेघर लोगों के आश्रय के अधिकार से जुड़ी मांग पर सुनवाई के दौरान की है। अदालत की इस चिंता को राश्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में वाजिब कहा जा सकता है। क्योंकि मुफ्त राषन और धन मिलने से लोग आलसी और निकम्मे तो हो ही रहे हैं, इनकी संख्या भी लगातार बढ़ रही है। भारत सरकार 81 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को मुफ्त राषन तो दे ही रही है, राज्य सरकारें चुनाव के ठीक पहले लाडली बहनाओं को प्रतिमाह 1250 से लेकर 3000 रुपए तक नगदी का लालच देकर मतदाता को लुभा रहे हैं। नतीजतन मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में मतदान करने लगा है। यह स्थिति संवैधानिक लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।

निर्वाचन लोक-पर्व के अवसर पर मुफ्त में तोहफे बांटे जाने की घोशणाएं सभी राजनीतिक दल बढ़ चढ़कर करते रहे हैं। हालांकि निर्वाचन के बाद ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं। बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याषी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन चुनावी रेवड़ियां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मुफ्त के इन उपाहरों पर लगातार चिंता जताते रहे हैं। परंतु भाजपा भी चुनावों में रेवड़ियां बांटने के वादों से पीछे नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराश्ट्र और दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा की जीत के कारणों में इन वादों की भी अहम् भूमिका रही है। भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अष्विनी उपाध्याय ने भी मुफ्त के वादों पर रोक के लिए न्यायालय में याचिकाएं लगाई हुई हैं। उन्होंने ऐसे दलों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने की मांग की है। इन वादों पर रोक इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन लोक-लुभाव वादों के दो तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। एक तो ये मतदाताओं के निश्पक्ष निर्णय को प्रभावित करते हैं और दूसरे, इन्हें पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

                यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं। राजनेताओं की दानवीर कर्ण की यह भूमिका स्वतंत्र और निश्पक्ष चुनाव की जड़ों में मट्ठा घोलने का काम कर रही है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए मतदाता को बरगलाना आदर्ष चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने जैसा है। सही मायनों में वादों की घूस से निर्वाचन प्रक्रिया प्रदूषित होती है, इसलिए इस घूसखोरी को आदर्श आचार संहिता के दायरे में लाना जरूरी है। वैसे भी इन वादों की हकीकत जमीन पर उतरी होती तो पंजाब में 7000 किसानों ने आत्महत्या न की होती ? क्योंकि पंजाब में किसान कल्याण के सबसे ज्यादा वादे अकाली दल ने सरकार में रहते हुए किए थे। अफलातूनी वादों के उलट  हकीकत में अब  ज्यादा जरूरत शासन-प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है। यह वादा ज्यादातर राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र से हमेशा गायब रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी एक समय जरूर भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की राह पर चली थी, लेकिन अपने तीसरे कार्यकाल में शराब नीति में घोटाले और शीशमहल जैसे राजसी वैभव में डूब गई। आप ने बिजली दरें 50 फीसदी कम करने और हर परिवार को रोजाना 700 लीटर पानी मुफ्त मुहैया कराने के बुनियादी वादों के साथ चुनाव लड़ा और जीता भी, लेकिन सरकार की अर्थव्यवस्था चैपट हो गई। 2025 के विधानसभा चुनाव में आर्थिक स्थिति की बद्हाली और भ्रश्टाचार अरविंद केजरीवाल की हार के प्रमुख कारण बने। 

                देष में मध्यप्रदेष के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने निर्धन परिवारों को मुफ्त में एक बत्ती कनेक्षन देने के वादे के साथ यह षुरूआत आठवें दषक में की थी। तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने तो चुनावी वादों का इतना बड़ा पिटारा खोल दिया था कि यह मामला जनहित याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था। इस याचिका में अन्नाद्रमुक की चुनावी घोशणा को भ्रश्ट आचरण मानते हुए  असंवैधानिक ठहराने की मांग की गयी थी, लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी। उस समय न्यायालय ने दलील दी थी कि घोषणा-पत्रों में दर्ज प्रलोभनों को भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता है। चुनाव का नियमन जनप्रतिनिधित्व कानून के जरिए होता है और उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत इसे गैरकानूनी या भ्रष्ट कदाचरण ठहराया जा सके। न्यायालय ने लाचारगी प्रगट करते हुए कहा था कि इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। लिहाजा इस मसले पर विचार कर कारगर निर्णय लेने का कोई कदम विधायिका ही उठा सकती है। अलबत्ता अदालत ने निर्वाचन आयोग को जरुर निर्देश दिया था कि वह चुनावी घोषणा-पत्रों को मर्यादित करने की दृष्टि से अतिवादी व लोक-लुभावन घोषणाओं को रेखांकित करे, जिससे आदर्श चुनाव संहिता का पालन हो सके।

                इस परिप्रेक्ष्य में दुविधा यह है कि राजनीतिक दलों पर आयोग का अनुषासनात्मक नियंत्रण निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद होता है, जबकि ज्यादातर घोशणा-पत्र इस अधिसूचना के पहले जारी हो जाते हैं और कई वादे तो नेता चुनावी आमसभाओं में आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए भी कर डालते हैं। यहां तक कि अल्पसंख्यक मुस्लिम और सवर्ण ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का वादे किए जाते रहे हैं। तिस पर भी विडंवना है कि आदर्ष निर्वाचन संहिता के तहत न तो कोई दंडात्मक कानून है और न ही इसकी संहिताओं में वैध-अवैध की अवधारणाएं परिभाशित हैं। आयोग यदि संहिता को लागू कर पाता है तो इसलिए कि राजनीतिक दल उसका सहयोग करते हैं और जनमत की भावना आयोग के पक्ष में होती है। तय है दल यदि आयोग के साथ असहयोग करने लग जाएं तो आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा। वैसे भी आयोग की जवाबदेही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है, न कि दलों के चुनावी मुद्दे तय करने की ? बावजूद आयोग मामले संज्ञान में लेता है और उम्मीदवार को चेतावनी भी देता रहता है। लेकिन उम्मीदवार जानते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को तत्काल खारिज करने का कोई अधिकार आयोग के पास नहीं है, इसलिए वे बेपरवाह रहते हैं।

                इन विरोधाभासी हालातों से शीर्ष न्यायालय परिचित है। इसलिए वह मुफ्त की घोषणा पर टिप्पणी कर शांत रह जाती है। दरअसल ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श कर कानून बनाने का अधिकार विधायिका को ही है। यहां विडंबना है कि विधायिका और दल अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रलोभन के जिन वादों के मार्फत मतदाता को बरगलाकर दल सत्ता के अधिकारी हुए हैं, उन वादों को घोशणा-पत्र में नहीं रखने का कानून बनाकर अपने ही हाथों से, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की गलती क्यों करेंगे ? यहां सवाल यह भी उठता है कि दल जो घोशणाएं करते हैं उनका लाभ वर्ग-भेद के बिना जरूरतमंदों को मिलता है। फिर चाहे वह छात्रवृत्ति हो, लैपटाॅप हो, साइकिल हो अथवा टीवी ? मुफ्त बिजली हो, लाडली बहनों को नगद धनराशि हों या सस्ता राशन, इसमें कोई जातीय या वर्गीय भेद नहीं किया जाता। बीपीएल की सूची में आने वाले सभी जरूरतमंद के हकदार होते हैं। ऐसी स्थिति में मुफ्त उपहारों को विभाजित करना एक जटिल प्रक्रिया है। हां, जातीय अथवा अल्पसंख्यक के आधार पर आरक्षण की घोषणा की जाती है तो इस स्थिति को जातीय अथवा सांप्रदायिक भेद की स्थिति माना जा सकता है ? 81 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज देने की सुविधा को भरे पेट वाले गुलछर्रे उड़ा रहे लोग सरकारी धन का दुरुपयोग मानते हैं। जबकि एक कल्याणकारी राज्य के वंचित तबके के लिए ये सुविधाएं अनिवार्य जरूरत भी हैं। ऐसे में इन्हें एकाएक घूस या लालच नहीं कहा जा सकता ? अलबत्ता यह तथ्य जरूर सही है कि प्रलोभन मतदाता की नीयत को प्रभावित करता है और वह व्यापक सामाजिक हित की बजाय व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने को विवश हो जाता है। जाहिर है, यह एक गंभीर मसला है और न्यायालय इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई ऐसा हल जरूर निकले, जो सर्वमान्य होने के साथ लोक कल्याणकारी भी साबित होगा।

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