अश्लीलता से जुड़ी दिमागी गंदगी पर रोक की जरूरत
दुनिया के तमाम देषों में से एक भारत ही ऐसा देष है, जहां अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोलने की छूट है। ऐसे ही कुछ हरकत यूट्यूबर रणवीर इलाहबादिया ने की है। उन्होंने अभिभावकों के संबंध में इतनी आपत्तिजनक टिप्पणी अपने यूट्यूब पर की, कि देष भर में उनकी विकृत मानसिकता और नितांत अष्लील भाशा का उपयोग करने पर उनके विरुद्ध देषभर के समाज के प्रति जागरूक लोग खड़े हो गए। उन पर दर्जनों एफआईआर दर्ज हो गईं। उनके भद्दे प्रदर्षन पर प्रतिबंध के नजरिए से जनहित याचिकाएं अदालतों में दायर कर दी गईं। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया और रणवीर को भद्दी भाशा के प्रयोग पर कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय को कहना पड़ा कि अभिव्यक्ति की आजादी के मायने कुछ भी बोलने का लाइसेंस नहीं है। आपके दिमाग में गंदगी भरी है, जो षो में उगल दी। उनकी मानसिक विकृति और भाशा को निंदनीय करार देते हुए अदालत ने कहा कि यह भाशा बहनों-बेटियों, माता-पिता और समाज के लिए भी षर्मिंदगी अनुभव कराती है। अदालत ने इस फटकार के बाद उनकी गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी, लेकिन पासपोर्ट तो समर्पित करने और देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि वकील ने उनके कार्यक्रम को केवल वयस्कों के लिए होने की दलील दी थी, परंतु अदालत ने नहीं मानी।
आजकल ‘ओवर द टाॅप‘ अर्थात ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म, यूट्यूब एवं वेब सीरीज पर दिखाई जा रही अश्लीलता चिंता का विषय बनी हुई है, अतएव इस पर नियंत्रण जरूरी है। इन पर अश्लील सामग्री के साथ ऐसी धार्मिक सामग्री भी परोसी जा रही है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बहुसंख्यक लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करती है। जरूरत यह है कि अश्लीलता दिखाने वाले सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जांच होनी चाहिए। इन पर नियंत्रण तो जरूरी है ही एक बोर्ड का भी गठन किया जाए, जो इन पर नियंत्रण के उपाय सुझाए। हालांकि अब ओटीटी पर नियंत्रण के लिए ऐसी व्यवस्था बन गई है कि जिससे पालक अपने बच्चों के लिए ऐसी सीरीज प्रतिबंधित कर सकेंगे, जिनमें अश्लीलता परोसी जा रही है। आयु वर्ग के हिसाब से भी इन्हें बालक, किशोर एवं वयस्क श्रेणियों में बांटा जाएगा। जिससे जरूरत के हिसाब से इन पर नियमन संभव हो।
मोबाइल व कंप्युटर पर इंटरनेट की घातकता का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। इंस्टाग्राम हो या फेसबुक या फिर गूगल ये सब विदेषी कंपनियां अकूत धन कमाने की तृश्णा में सोषल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से भारतीय बच्चों, किषोरों व युवकों को पोर्नोग्राफी के जाल में फंसाकर उनका न केवल भविश्य बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि साइबर अपराधी बनाकर उनके पूरे जीवन पर ही कालिख पोतने का काम कर रहे हैं। ये सब कंपनियां आॅनलाइन सेक्स ट्रेफिकिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि किशोरों को अश्लील फिल्में दिखाकर बच्चे और सगे-संबंधी नाबालिग ही इनकी करतूतों का शिकार हो रहे हैं। लंदन के पास बसे शहर सोहो में इस तरह की वीडियो क्लिपिंग बनाने का धंधा खुलेआम चल रहा है। भारत में अब रणवीर की तरह कई यूट्यूबर अश्लील सामग्री यूट्यूब के माध्यम से परोस रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी भी देखी जा रही है।
आज सूचना तकनीक की जरूरत इस हद तक बढ़ गई है कि समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है। कोरोना-काल में बच्चों को डिजीटल माध्यम से पढ़ने का जो बहाना मिला है, उसमें इंटरनेट पर डेटा की खपत से पता चला है कि पोर्नाग्राफी की बीमारी भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। भारत में इंटरनेट डेटा की खपत इसके सस्ते होने की वजह से भी बढ़ रही है। इस सिलसिले में बच्चों के संदर्भ में मिली यह जानकारी अत्यंत चिंताजनक हैं। बेटियों से दरंदिगी की एक बड़ी वजह पोर्न साइट्स की बिना किसी बाधा के उपलब्धता है। ऐसे में जो विद्यार्थी इंटरनेट पर पढ़ाई के बहाने पोर्न देखने में लग जाते हैं, उनके पालक सामान्य तौर से ऐसा कैसे सोच सकते हैं कि वे जिनके भविश्य के सपने बुन रहे हैं, वे स्वयं किस मानसिक अवस्था से गुजर रहे हैं और किस गलत दिषा का रुख कर रहे हैं। ऐसे में उन अभिभावकों के बच्चों को ज्यादा भटकने का अवसर मिल रहा है, जिनके माता-पिता दोनों ही नौकरी में हैं। क्योंकि ऐसे में यह निगरानी रखनी मुष्किल होती है कि आखिर बच्चे मोबाइल पर देख क्या रहे हैं ? पढ़ाई-लिखाई के लिए आॅनलाइन विकल्पों के चलते यह स्थिति बढ़ रही है। बावजूद यह प्रष्न नहीं उठाया जा रहा है कि पढ़ाई-लिखाई के दौरान बच्चे मोबाइल पर कौनसा पाठ पढ़ रहे हैं ? उन्हें कौन अज्ञात व्यक्ति बरगलाकर गलत दिशा दे रहा है ? इसकी निगरानी कैसे संभव है ? क्योंकि इस अकेलेपन में दिमाग में शक्तियां पनपने की आशंका कहीं ज्यादा हैं। प्रारंभ में यह आकर्षण थ्रिल या रोमांच की तरह लगता है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता विकार रूप में बदलने लगता हैं। सोशल मीडिया पर निर्बाध पहुंच और बच्चों की जरूरतों के प्रति अभिभावकों की निश्चितता एवं लापरवाही इस तरह की घटनाओं के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। ये घटनाएं इसलिए और बढ़ रही हैं, क्योंकि हमारी परिवारिक और कौटुंबिक जो सरंचना थी, उसे सुनियोजित ढंग से तोड़ा जा रहा है। ऐसे में बच्चों को नैतिक मूल्यों से जुड़े पाठ, पाठ्यक्रम से तो गायब कर ही दिए हैं, घरों में भी दादा-दादी या नाना-नानी इन पाठों को किस्सों-कहानियों के जरिए पढ़ाने के लिए उपलब्ध नहीं रह गए हैं। यदि नैतिक षिक्षा का पाठ पढ़ाने की बात कोई षिक्षाषास्त्री करता भी है तो उसे पुरातनपंथी कहकर नकार दिया जाता है। अब नई षिक्षा नीति में जरूर कुछ इस तरह के पाठ जोड़ने की पैरवी हो रही है। ऐसे में रणवीर के षो पारिवारिक रिष्तों को तार-तार करने वाले हैं।
यह समस्या इसलिए विकट होती जा रही है, क्योंकि इंटरनेट और सोशल प्लेटफॉर्म प्रदाता कंपनियां इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कारगर पहल करने को तैयार नहीं हैं। कंपनियां अकसर इस तरह के मामले उठते हैं तो उस बाबत यह कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं कि वह ऐसी किसी आपत्तिजनक तस्वीर या सामग्री के उपयोग की अनुमति नहीं देती है। ज्यादा हुआ तो जो आपत्तिजनक सामग्री अपलोड हो जाती है, उसे हटाने का आश्वासन दे देती हैं। लेकिन कंपनी के ऐसे दावे भरोसे के लायक नहीं होते हैं, क्योंकि ऐसी सामग्री की पुनरावृत्ति होती रहती है। यदि ज्यादा जोर डाला जाता है तो सोशल साइट के उपभोक्ता सुनियोजित ढंग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होने का शोर मचाने लगता है और इंटरनेट पर दुरुपयोग के दूर करने के उपायों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि सोशल मीडिया पर नियमन, स्व-नियमन या सरकारी नियंत्रण की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है ? हकीकत तो यह है कि किषोर बच्चों को इंटरनेट घातक साबित हो रहा है। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में नियंत्रण की जरूरत कहीं अधिक बढ़ गई है। इसका आधार यही है कि सोषल मीडिया पर बढ़ती अष्लील करतूतें अब नैतिक मर्यादा के उल्लंघन और सभ्य समाज की संरचना के लिए गंभीर चुनौती के रूप में पेष आने लगी हैं, इसलिए ओटीटी पर अंकुष जरूरत तो है ही रणवीर जैसे यूट्यूबरों को दंडित करने की भी जरूरत है, जिससे आपत्तिजनक यूट्यूब बनाने और षो करने की विकृत मानसिकता वाले लोग हिम्मत जुटाने से कतराएं।