देश-विदेश

अंधभक्त होना चाहिए पर दूसरी पार्टी का नहीं होना चाहिए

 देश में बहुत सारे राजनीतिक दल हैं. सभी राजनीतिक दल चाहते हैं अंधभक्त होना चाहिए तो उनकी पार्टी का अंधभक्त होना चाहिए।कोई यह नहीं चाहता है कि लोग अंधभक्त हों और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के हों।क्योंकि सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि अंधभक्त होना उनके लिए फायदे की बात होती है,अंधभक्त दूसरे किसी राजनीतिक दल को वोट हीं देता है,वह जिस राजनीतिक दल का अंधभक्त होता है,उसे ही चुनाव में वोट करता है, राजनीतिक दल को उसके वोट के लिए कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है।कोई पैसा नहीं देना पड़ता है।अंधभक्त अपऩे राजनीतिक दल को हो कोई डर नहीं होता है कि वह उससे नाराज हो सकता है, वह किसी दूसरे राजनीतिक दल को वोट दे सकता है।अंधभक्त तो सभी राजनीतिक दलों के कम या ज्यादा होते हैं,जिन राजनीतिक दलों के कम होते हैं,वह चाहते हैं कि और ज्यादा होना चाहिए ताकि उनको पता रहे कि चुनाव में इतने वोट तो उनको पक्का मिलने वाले हैं। ताकि उनको पता रहे कि चुनाव जीतने के लिए उऩको और कितने वोट की जरूरत है।
लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी मप्र के इंदौर में आयोजित छात्रों के गूंज कार्यक्रम में यह कहते हैं कि सिस्टम का पूरी देश की व्यवस्था पर कब्जा हो गया है।मोदी और आरएसएस के इस सिस्टम को छात्र स्वीकार्य नहीं हैं,क्योंकि वह सवाल करते हैं।मौजूदा सिस्टम पूरे देश में अंधभक्त चाहता है।छात्र जहां ईमानदार होते है,निडर होते हैं,वहीं अंधभक्त बेईमान व झूठे होते हैं।इससे यह साफ हो जाता है कि राहुल गांधी की नजर में वह युवा या व्यक्ति अंधभक्त नहीं है जो सरकार से सवाल पूछता है।यानी जो सवाल पूछता है,वह अंधभक्त नहीं है। जो सवाल नहीं पूछता है वह अंधभक्त है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में उन लोगों को पसंद करते हैं या करेंगे जो गांधी परिवार या उनसे कोई सवाल पूछते हैं।

 
 
 

आज तक तो गांधी परिवार या राहुल गांधी से जिसने भी सवाल किया है,उसे तो कांग्रेस से बाहर कर दिया गया है। गांधी परिवार व राहुल गांधी अपनी पार्टी में ऐसे लोगों को ही पसंद करते हैं,जो उनसे कोई सवाल करे कि आपने ऐसा किया है तो क्यों किया है। राहुल गांधी ही नहीं सभी राजनीतिक दल अपनी पार्टी में ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो उनसे पार्टी से संबंधित कोई सवाल न करे, पार्टी कुछ करने को कहे तो वह मान लें कि पार्टी जो कह रही है या कर रही है वही सही है। कोई भी राजनीतिक पार्टी जब व्हिप जारी करती है तो उसका मतलब क्या होता है,उसका मतलब तो यह भी होता है कि अंधभक्त बन जाओ,मत पूछाे पार्टी ऐसा करने को क्यों कह रही है। देश में सबसे ज्यादा परिवारवादी पार्टियां हैं,वह तो चाहती है कि पार्टी में अंधभक्त रहें, पार्टी कुछ भी करे या कहे तो बिना सवाल उठाए करने को राजी रहे।पार्टी जो कहे या करे उसे ही सबसे अच्छा माने।

राहुल गांधी देश के कई शहरों में गूंज कार्यक्रम का आयोजन कर कांग्रेस से जेनजी को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं,देश और भाजपा को बताने या जताने का प्रयास कर रहे हैं कि देखो अंधभक्त तुम्हारे साथ हैं तो जेनजी कांग्रेस के साथ हैं।बताया जाता है कि १९ सिंतबर को राहुल गांधी के गूंज कार्यक्रम का आयोजन इंदौर मे इसलिए किए गया था कि १९ सिंतबर को दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव था और राहुल गांधी को बताया गया था कि एनएसयूआई यहां चुनाव जीत रही है। यानी दिल्ली में १९ सिंतबर को एनएसयूआई चुनाव जीतता और इंदौर में राहुल गांधी इस बात की गर्व से घोषणा करते कि देखो जेनजी भाजपा के साथ नही है, जेनजी तो कांग्रेस के साथ है। जेनजी जिस तरह डेसू में चुनाव जिताया है, उसी तरह अब उसे जेनजी हर चुनाव में जिताएगा। लेकिन दिल्ली विवि का चुनाव मे एनएसयूआई के हार जाने के कारण इंदौर में राहुल गांधी दावा नहीें कर सके कि जेनजी उनके साथ है।

 
 
 
 

इससे तो साफ हो गया कि राहुल गांधी पूरे देश में जेनजी को कांग्रेस से जोड़ने और मोदी सरकार से नाराज होने का जो नरेटिव बनाने का प्रयास कर रहे थे,उसको बड़ा झटका लगा है कि राहुल गांधी का अब तक कई शहरों में किया गया गूंज कार्यक्रम का जेनजी पर कोई असर नहीं हुआ है।जेन जी न पहले कांग्रेस के साथ था और न जेनजी आज कांग्रेस के साथ है।मजे की बात तो यह है कि डेसू के चुनाव में एक पदाधिकारी निर्दलीय लड़ा है और बड़े अंतर से जीता है तो वह कांग्रेस का प्रत्याशी था जिसका नाम काट दिए जाने पर वह निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत भी गया।कांग्रेस ने उसका टिकट नहीं काटा होता वह आज कांग्रेस की विजयी प्रत्याशी होता और कांग्रेस कह सकती थी कि उसके साथ जेनजी है। कांग्रेस की गलती के कारण ही कांग्रेस आज यह दावे से नहीं कह सकती कि जेनजी उसके साथ है।

 

 

 

Leave Your Comment

Click to reload image