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आलेख: लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण जनता का विश्वास

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आलेख
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण जनता का विश्वास
सौरभ वार्ष्णेय
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुनाव प्रणाली और जनता का मताधिकार है। सत्ता बदलने का अधिकार जनता के पास है और इसी अधिकार की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करती है। लेकिन जब चुनाव प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, मतदाता सूची की शुद्विता को लेकर संदेह पैदा हो और विपक्ष चुनाव प्रणाली में कथित अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए सड़क पर उतर आए, तो यह केवल किसी राजनीतिक दल का विरोध नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण है जनता का विश्वास है। अगर यह विश्वास खो गया  तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खो जायेगा? इस पर लोकतंत्र के चौकीदारों को सोचा पड़ेगा समझना पड़ेगा? जनता के अंदर यह विश्वास दिलाना होगा कि आपका वोट सुरक्षित है।
राजधानी दिल्ली में मंगलवार को जो राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, उसने इस बहस को और तेज कर दिया। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इंडिया गठबंधन के मार्च की धुरी बने और विपक्षी सांसद संसद भवन से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर मार्च करने निकले, लेकिन पुलिस ने उन्हें संसद मार्ग पर ही रोक दिया। इसके बाद सड़क पर धरना, हिरासत और फिर आकाशवाणी भवन परिसर में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा अन्य नेताओं का करीब नौ घंटे तक चला विरोध प्रदर्शन भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में सामने आया। राहुल गांधी की हिरासत और उनके साथ बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी ने राजनीतिक टकराव को और तीखा कर दिया। देर रात सभी को छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल जरूर खड़ा किया है। क्या चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान राजनीतिक टकराव से होगा या संस्थागत संवाद से? विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची और चुनाव प्रणाली में ऐसी अनियमितताएं हो रही हैं जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए तथा वोट चोरी के जरिए देश को हाईजैक करने तक की बात कही। उन्होंने इसे देशद्रोह बताया और कहा कि ऐसा करने वाले बच नहीं पाएंगे। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए इनका राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह जाना उचित नहीं होगा। यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाना चाहिए और यदि किसी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के प्रमाण हैं तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में आरोप और प्रत्यारोप से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य और प्रमाण होते हैं।दूध का दूध पानी का पानी होना चाहिए।
यहां निर्वाचन आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। चुनाव आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है, बल्कि उसकी निष्पक्षता पर जनता का विश्वास चुनाव परिणामों की स्वीकार्यता का आधार है। इसलिए जब देश का प्रमुख विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, तब आयोग को इसे केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज करने के बजाय जनता के सामने अधिकतम पारदर्शिता के साथ तथ्यों को रखना चाहिए। इसी तरह विपक्ष की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना उसका अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों के साथ ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना उसकी जिम्मेदारी भी है। वोट चोरी जैसा आरोप सामान्य राजनीतिक आरोप नहीं है। यह करोड़ों मतदाताओं के विश्वास और पूरी चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाता है। इसलिए यदि विपक्ष के पास प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक और संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष रखना चाहिए। केवल नारों और राजनीतिक आक्रोश से लोकतंत्र की विश्वसनीयता मजबूत नहीं हो सकती। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष को भी विपक्ष के सवालों को देशविरोध या लोकतंत्र विरोध के चश्मे से देखने से बचना होगा। लोकतंत्र में असहमति व्यवस्था की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। यदि विपक्ष सवाल पूछता है तो सरकार और संवैधानिक संस्थाओं का दायित्व है कि वे सवालों का जवाब दें। सवालों से बचने के बजाय पारदर्शिता के जरिए संदेह दूर करना अधिक प्रभावी रास्ता है।
मंगलवार का घटनाक्रम इस दृष्टि से भी चिंताजनक है कि देश की संसद से निकले निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को निर्वाचन आयोग तक मार्च करने से रोक दिया गया और बाद में उन्हें हिरासत में लिया गया। कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन लोकतांत्रिक विरोध को किस सीमा तक रोका जाए, यह भी लोकतंत्र की परिपक्वता की कसौटी है। शांतिपूर्ण विरोध, धरना और अपनी बात रखने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है।वहीं इस संबंध में केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने कहा कि किसी ने मिलने का समय नहीं मांगा तो ऐसे में जब विपक्ष मिलने आ रहा है तो खुले दिन से स्वागत करना चाहिए। उनका समाधान करना चाहिए। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव केवल पांच वर्ष में एक बार होने वाली प्रक्रिया नहीं है। चुनाव जनता के विश्वास का उत्सव है। बूथ पर खड़ा मतदाता जब अपना वोट डालता है तो उसे यह भरोसा होना चाहिए कि उसका मत सुरक्षित है, उसकी पसंद का सम्मान होगा और चुनाव परिणाम निष्पक्ष प्रक्रिया का परिणाम होंगे। यदि इस विश्वास में दरार आती है तो उसका असर किसी एक पार्टी पर नहीं, पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ता है। आज आवश्यकता राजनीतिक आरोपों को और तीखा करने की नहीं, बल्कि चुनाव प्रणाली में जनता का विश्वास और मजबूत करने की है। मतदाता सूची, मतदान प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक मतदान व्यवस्था, परिणामों और चुनावी शिकायतों से जुड़े प्रत्येक सवाल पर पारदर्शिता बढ़ाई जानी चाहिए। राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और नागरिक समाज के बीच संवाद का रास्ता खुला रहना चाहिए।
राहुल गांधी का सड़क पर उतरना कांग्रेस और विपक्ष की राजनीतिक रणनीति हो सकती है, लेकिन इसके पीछे उठाया गया मूल सवाल राजनीति से कहीं बड़ा है। क्या भारत का मतदाता अपनी वोट की ताकत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है? इस सवाल का जवाब किसी राजनीतिक दल के भाषण से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच, पारदर्शी व्यवस्था और संस्थागत विश्वास से मिलना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव केवल जीतने और हारने का माध्यम नहीं हैं। चुनाव वह प्रक्रिया है जिसके जरिए जनता सत्ता को अधिकार देती है और आवश्यकता पडऩे पर सत्ता वापस भी ले सकती है। इसलिए चुनाव प्रणाली पर उठने वाले हर सवाल को गंभीरता से लेना जरूरी है।
सरकार को विपक्ष की आवाज सुननी चाहिए, विपक्ष को अपने आरोपों के प्रमाण देने चाहिए और निर्वाचन आयोग को अपनी विश्वसनीयता के लिए पारदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो मंगलवार का टकराव लोकतंत्र के लिए संकट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण न सरकार है, न विपक्ष सबसे महत्वपूर्ण है जनता का विश्वास। और जनता का विश्वास तभी कायम रहेगा, जब उसके वोट की पवित्रता पर कोई सवाल अनुत्तरित न रहे।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।


 

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