व्यापार

एएआई ने एल्युमीनियम आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए खनन मंत्रालय के हस्तक्षेप की माँग की

 

•  भारत की एल्युमीनियम विज़न 2047 के अनुरूप, एएआई ने सभी एल्युमीनियम उत्पादों पर समान 15% बेसिक कस्टम ड्यूटी (बीसीडी) और स्क्रैप आयात पर सख्त गुणवत्ता नियंत्रण लागू करने की सिफारिश की है।
•  एएआई ने सरकार से घरेलू एल्युमीनियम उद्योग को मजबूत करने और देश में “क्रिटिकल मिनरल्स” जैसी संभावित संकट स्थिति से बचाने का आग्रह किया है।

रायपुर, नवंबर 2025: एल्युमीनियम एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएआई) ने खनन मंत्रालय को एक विस्तृत प्रस्तुति सौंपी है, जिसमें भारत के एल्युमीनियम उद्योग को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाने हेतु तत्काल कदम उठाने की अपील की गई है, ताकि भारतीय उद्योग लगभग 20 लाख करोड़ रुपए के निवेश आकर्षित कर सकें। एएआई ने यह रेखांकित किया है कि वर्तमान नीतिगत ढाँचा देश के एल्युमीनियम विनिर्माण आधार के लिए चुनौतियाँ पैदा कर रहा है, खासकर ऐसे समय में जब एल्युमीनियम अधिशेष वाले देशों से आयात में तेजी आई है, जो वैश्विक टैरिफ और गैर-टैरिफ संरक्षणवादी उपायों से प्रेरित है।

एएआई ने अपने प्रस्तुतीकरण में यह रेखांकित किया है कि पिछले पाँच वर्षों में देश में एल्युमीनियम आयात में 50% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ते आयात से उद्योग की सुरक्षा और निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए, प्रस्तुतीकरण में सभी संबंधित श्रेणियों के एल्युमीनियम उत्पादों पर 15% की समान आयात शुल्क लगाने और गैर-मानक स्क्रैप आयात पर कड़े गुणवत्ता मानकों को लागू करने की सिफारिश की गई है। ये कदम घरेलू विनिर्माण की रक्षा करने, भारत को निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप के डंपिंग स्थल बनने से रोकने, दीर्घकालिक निवेश आकर्षित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि भारत का एल्युमीनियम उद्योग आत्मनिर्भर बने और आयात पर निर्भर न रहे।

भारत सरकार की एल्युमीनियम उद्योग के लिए विज़न 2047 के अनुसार, एल्युमीनियम को एक रणनीतिक धातु के रूप में चिन्हित किया गया है, जो देश के औद्योगिक परिवर्तन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह रक्षा, अवसंरचना, राष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा, एयरोस्पेस, परिवहन और समग्र आर्थिक विकास को सशक्त बनाने में अहम् भूमिका निभाता है।

वर्तमान में, भारत में एल्युमीनियम की माँग लगभग 5.5 मिलियन टन है, जिसके 2030 तक बढ़कर 8.5 मिलियन टन तक पहुँचने की संभावना है। एल्युमीनियम विज़न डॉक्यूमेंट के अनुसार, यह माँग 2047 तक लगभग छह गुना बढ़कर 37 मिलियन टन तक पहुँच सकती है, जिसके लिए आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने हेतु 20 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश की आवश्यकता होगी।
हालाँकि, यदि तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो भारत उस स्थिति को दोहराने का जोखिम उठा रहा है, जो चीन में रेयर अर्थ मटेरियल्स के साथ देखने को मिली थी, जहाँ रणनीतिक खनिज निर्यात प्रतिबंधों के माध्यम से व्यापारिक हथियार बन गए थे। इस चुनौती को ‘स्क्रैप नेशनलिज़्म’ की वैश्विक प्रवृत्ति और जटिल बना रही है, जहाँ विकसित अर्थव्यवस्थाएँ, जैसे- अमेरिका और यूरोप उच्च गुणवत्ता वाले स्क्रैप को अपने घरेलू उपयोग के लिए सुरक्षित रखती हैं, जबकि निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप भारत जैसे देशों को निर्यात करती हैं। यह संरक्षणवादी रुझान भारत के विनिर्माण आधार को कमजोर कर सकता है, भविष्य के निवेश को सीमित कर सकता है और आत्मनिर्भर भारत के विज़न को बाधित कर सकता है।

जबकि दुनिया की अर्थव्यवस्थाएँ एल्युमीनियम को एक रणनीतिक धातु के रूप में उसकी अहमियत को समझते हुए अपनी घरेलू उद्योगों को टैरिफ और नॉन-टैरिफ उपायों से सुरक्षा दे रही हैं, भारत में भी ऐसे कदम उठाने से एल्युमीनियम की कमी को रोका जा सकता है, जो देश के जीडीपी और अवसंरचना विकास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

संघ ने दोहराया कि भारत का मजबूत घरेलू एल्युमीनियम सेक्टर अब तक 8 लाख से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर पैदा कर चुका है और 4,000 से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को सहयोग दे रहा है। लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के त्वरित निवेश, जो पहले से ही पाइपलाइन में हैं, रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा देंगे और नए एमएसएमई के विकास और विस्तार में सहायक बनेंगे। यह कदम लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएँ बनाकर सरकार के ‘विकसित भारत’ विज़न को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

खनन मंत्रालय को प्रस्तुत यह अनुशंसा वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय के डीपीआईआईटी को पहले भेजे गए समान प्रस्ताव का अगला चरण है, जो एल्युमीनियम क्षेत्र में सुधारों के लिए विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय स्थापित करने की एक संगठित उद्योग पहल का हिस्सा है।

Leave Your Comment

Click to reload image