प्राथमिक लघु वनोपज समितियों में जंगल राज ~तेंदूपत्ता संग्रहण में फड़ मुंशियों की अवैध वसूली,
कबीरधाम |
2026-05-19 16:22:01
~वन विभाग की निगरानी के अभाव में कट रहे तेंदू के जंगल
कवर्धा- लघु वनोपज संग्रहण में देश में प्रथम स्थान पाने वाला छत्तीसगढ़ अब उसी तेंदूपत्ते के कारोबार में फैले भ्रष्टाचार और जंगल के विनाश से जूझ रहा है। राज्य की 901 प्राथमिक लघु वनोपज समितियों में ग्राम स्तर पर प्रबंधकों की मनमानी, फड़ मुंशियों की खुली लूट और वन विभाग के लापरवाही में हो रही पेड़ों की कटाई से 13.76 लाख संग्राहक परिवार ठगे जा रहे हैं।
संग्राहकों का आरोप है कि फड़ मुंशी हर 100 गड्डी तेंदूपत्ता पर 4 से 5 गड्डी अतिरिक्त ले रहे हैं। नहीं देने पर पूरे पत्ते को खराब बताकर खरीदने से इनकार कर दिया जाता है। चिल्फी, रेंगाखार सहित जिले के पंडरिया और बोड़ला के जंगल क्षेत्र में रहने वाले अनेक संग्राहको ने बताया कि यह अलिखित "मुंशी टैक्स" सालों से चल रहा है। नियमों में 1 मानक बोरा 1000 गड्डी का है, लेकिन संग्राहक को भुगतान 1000 गड्डी जमा करने पर भी 950 गड्डी का ही मिलता है। विरोध करने पर धमकी दी जाती है कि अगली बार उनका पत्ता खरीदा ही नहीं जाएगा।
लाखों के फंड में कोई पारदर्शिता नहीं
समितियों को वन धन केंद्र और गोदाम निर्माण के लिए लाखों रुपए का फंड मिलता है, पर ग्राम सभा में इसका हिसाब-किताब कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता। निर्माण कार्यों और अन्य खर्चों में भारी अनियमितता की शिकायतें आम हैं, लेकिन सामाजिक अंकेक्षण न होने से प्रबंधक बेखौफ हैं।
खत्म हो जाएगी तेंदू वृक्ष की प्रजाति
सबसे चिंताजनक स्थिति तेंदू के पेड़ों की कटाई की है। नियमानुसार केवल झाड़ीनुमा छोटे पौधों से पत्ते तोड़ने की अनुमति है ताकि पेड़ जीवित रहे। पर ज्यादा पत्ते और मजदूरी के लालच में संग्राहक 30-40 फीट ऊंचे पेड़ों को ही काट डालते हैं।पूरे जिले केचिल्फी,तरेगांव,
रेंगाखार से लेकर बोड़ला और पंडरिया,कुकदुर के वन क्षेत्रों में रोज पेड़ गिराए जा रहे हैं। वन विभाग की चुप्पी से यह विनाश लीला बदस्तूर जारी है। पर्यावरणविदों का अनुमान है कि अगर इसी तरह से कटाई चलती रही तो अगले एक दशक में छत्तीसगढ़ से तेंदू वृक्षों की प्रजाति ही समाप्त हो जाएगी।
महालेखा परीक्षक से जांच की मांग
छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ इस पूरे तंत्र का राज्य स्तरीय कार्यालय है जिसके प्रशासनिक मुखिया प्रबंध संचालक होता है। सवाल उठता है कि प्रबंध संचालक के अधीन चल रहे इस तंत्र में इतने बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार और जंगल का विनाश कैसे हो रहा है? बताया जाता है कि वनांचल में कार्यरत समाज सेवी संस्थाओं और जन जाति समाज प्रमुखों ने इस संबंध में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 पर शिकायत दर्ज कर दोषी फड़ मुंशियों और लापरवाह वनकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग किए जाने की बात कही है। साथ ही गड्डी की जगह इलेक्ट्रॉनिक कांटे से किलो में तोल कर खरीदी करने और हर समिति के आय-व्यय को सार्वजनिक करने की मांग उठ रही है।
साथ ही ग्राम स्तरीय समितियों का लेखा परीक्षण महालेखा परीक्षक द्वारा कराए जाने की भी मांग की जा रही है!
लघु वनोपज से आदिवासियों की गरीबी दूर करने का दावा करने वाली सरकार के लिए यह दोहरी चुनौती है। एक तरफ संग्राहकों को उनका हक दिलाना है, दूसरी तरफ तेंदू के जंगलों को बचाना है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो "प्रथम" आने का तमगा तेंदू के उजड़े जंगलों की कब्र पर ही लगेगा।