छत्तीसगढ़ / रायपुर

विश्व आदिवासी दिवस समाज की संस्कृति, अधिकारों और सम्मान की रक्षा

9 अगस्त


शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला नेवई में आदिवासी समाज की समृद्ध , संस्कृति, परंपराओं, भाषा कला एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा आदिवासी समुदायों के अधिकारों और सम्मान की  रक्षा का संकल्प लिया गया |

डॉ  नीलाजंना जैन ने विद्यार्थियों को इस दिन का महत्व कि 9 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र की वर्किंग  ग्रुप की पहली बैठक हुई थी और  इसी तारीख की याद में  9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा बन गई। संयुक्त  राष्ट्र महासभा में 23 दिसंबर 1994 को 9 अगस्त को आधिारिक रूप घोषित किया | आदिवासी समाज हमारे देश की प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये सभी  प्रकृति के बहुत करीब रहकर जीवन जीते है। पेड-पौधे नदियों पहाड़ो और वन्य जीवों का सम्मान करते है और भारत की सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध बनाते है।
       आदिवासी समाज की कला और लोकनृत्य भी बहुत समृद्ध हैं। पारंपरिक नृत्य, संगीत, चित्रकला, हस्तशिल्प, मिट्टी की कला और लकड़ी की कलाकृतियां उनकी पहचान को दर्शाती हैं। त्योहारों और विशेष अवसरों पर किए जाने वाले लोकनृत्य और लोकगीत समाज के लोगों को आपस में जोड़ते हैं।
                                                                                                                                                                                                                                                                               इस अवसर पर उपस्थित श्रीमती शशिकला वर्मा, उषाकिरण , ज्योति वर्मा, अमृता यादव, अनिता ठाकुर, संत ज्ञानेश्वर मरकाम , दीप्तिरानी, तृप्ति भारती, रेखा साहू , आकाश बंजारे, धनेश यादव, तक्षक  बरेठ तथा वार्ड पार्षद आदि  गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। सभी ने समाज की एकता गरिमा, और अधिकारों की रक्षा  के साथ-साथ प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिवद्धता व्यक्त की।

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