छत्तीसगढ़ / रायपुर

क्रोध पर विजय प्राप्त करनी है तो मौन रहें : मुनि संवेगरत्न सागर

 रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में धर्म, तप और आत्मचिंतन की साधना के साथ ज्ञान की गंगा प्रवाहित हो रही है। मुनि संवेगरत्न सागर धर्मसभा में आचार्य वीरभद्राचार्य द्वारा रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं को आत्मकल्याण का मार्ग बता रहे हैं। शुक्रवार को धर्मसभा में मुनिश्री ने क्रोध के से बचने के उपायों को समझाया।

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध पर विजय प्राप्त करनी है तो मौन का अभ्यास करना होगा। मनुष्य को यह विवेक होना चाहिए कि कब बोलना आवश्यक है और कब मौन रहना ही उचित है। वचन लब्धि का सदुपयोग विवेकपूर्वक किया जाना चाहिए। अनावश्यक वचनों का परिणाम कई बार असहनीय हो जाता है। मुनिश्री ने कहा कि सभी का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मौन साधना का अभ्यास जरूरी है।

 
 
 
 
 

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध का जनक अभिमान और क्रोध की जननी अपेक्षाएं हैं। अभिमान, अपेक्षा और ईर्ष्या सहित अनेक कारणों से व्यक्ति क्रोधित होता है। क्रोध की तपिश इतनी भयंकर होती है कि क्रोधित व्यक्ति दूसरों को नुकसान पहुंचाने के साथ अपनी आत्मा का भी अहित कर बैठता है। अभिमान जब हावी हो जाता है तो व्यक्ति देव, गुरु और धर्म के प्रति भी क्रोध कर सकता है। इससे बचने के लिए विनम्रता अपनाना और अभिमान का त्याग करना आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि क्रोध और अभिमान से दुख, दुर्गति और पीड़ा का सृजन होता है। क्रोध की परंपरा से बाहर निकलने के लिए सदाचार का पालन जरूरी है। व्यक्ति को अपने व्यवहार में विवेक और संयम को स्थान देना चाहिए।

मुनिश्री ने धर्मसभा में बताया कि क्रोध से बचने के लिए पांच बातों का सदैव ध्यान रखना चाहिए। पहला- गुरु एवं अपने से बड़ों पर विश्वास रखना चाहिए। दूसरा- सत्य ज्ञात होने पर यदि उसे कहने का अधिकार नहीं है तो मौन रहना चाहिए। तीसरा-सत्य ज्ञात है और अधिकार भी है, तो पहले यह आकलन करें कि सामने वाला आपकी बात सुनेगा या स्वीकार करेगा चौथा- सत्य ज्ञात है, अधिकार भी है और पुण्य भी है, लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि सत्य को प्रस्तुत करने की उचित भाषा आपके पास है या नहीं। पांचवा-अपेक्षाओं की उपेक्षा व्यक्ति के पुण्य-पाप और कर्मों के परिणाम पर निर्भर करती है।

 
 
 
 
 
 

मुनिश्री ने कहा कि इन बातों पर ध्यान देकर व्यक्ति क्रोध पर विजय प्राप्त करने का पुरुषार्थ कर सकता है। विनम्रता, मौन, विवेक और सदाचार को जीवन में उतारना ही क्रोध से मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।

 

 

 

Leave Your Comment

Click to reload image