*मानव भव केवल भोग- विलास के लिए नहीं,जीवन को सार्थक बनाओ : मुनिश्री संवेगरत्न सागर म.सा.*
रायपुर |
2026-09-07 11:31:41
रायपुर। विवेकानंद नगर स्थित श्री ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में रविवार को विशेष प्रवचनमाला में परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने श्रावक-श्राविकाओं को मानव भव की दुर्लभता समझाई। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जन्म केवल सुख और भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है। मानव भव मिला है तो सबसे पहले मानव बनें, फिर उत्तम,श्रेष्ठ और महान मानव बनने का प्रयास करें।
*मोक्ष लक्ष्य है तो सुख के राग को छोड़ना होगा*
मुनिश्री ने कहा कि संसार के परिभ्रमण को समाप्त कर मोक्ष प्राप्त करना जीवन का अंतिम लक्ष्य है। इसके लिए सुख के प्रति राग और आसक्ति को छोड़ना होगा। परमात्मा के वचनों का आलंबन मिलने पर जीव मोक्ष की ओर आगे बढ़ता है। गुरु भगवंत प्रतिबोध दे सकते हैं, लेकिन जिनवाणी का श्रवण केवल कानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे जीवन में आत्मसात करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि मानव भव अत्यंत दुर्लभ है। इसके साथ उत्तम धर्म और कुल की प्राप्ति भी हुई है। ऐसे में धर्म से विमुख होना मोक्ष के लक्ष्य को दूर करना है। हर व्यक्ति को स्वयं से यह सवाल करना चाहिए कि मानव भव प्राप्त करने के बाद क्या वह वास्तव में मानव बन पाया है?
*उत्तम मानव की पहचान है सत्संग और बड़ों का सम्मान*
मुनिश्री ने कहा कि उत्तम मानव का पहला कर्तव्य सत्संग है। बड़ों की आज्ञा और उनका सम्मान करना उसका धर्म है। लोक-विरुद्ध आचरणों का त्याग करना चाहिए। उत्तम मानव कभी विश्वासघात नहीं करता। विश्वासघात महाभयंकर होता है और विश्वासघाती व्यक्ति अक्सर स्वयं को बुद्धिमान समझने की भूल करता है।
मुनिश्री ने कहा कि महान इंसान करुणावान होता है, दोषों से दूर रहता है और स्वधर्म का पालन करता है। पुरुष का स्वधर्म है सदाचार, स्त्री का सम्मान, बालकों को शिक्षित करना और राष्ट्र के प्रति भक्ति। महिलाओं का स्वधर्म है जीव की रक्षा, बाल संस्करण,पति की सेवा, कुटुंब को संभालना। ये मानव जीवन की सार्थकता है।
*देव-गुरु-धर्म को समय नहीं दिया तो संसार में ही देना पड़ेगा*
मुनिश्री ने कहा कि हमें यह विचार करना चाहिए कि कितने भवों के बाद मानव जन्म मिला है। यह दुर्लभ अवसर केवल काम और भोग में गंवाने के लिए नहीं मिला। यदि इस भव में आत्मा का कल्याण नहीं हुआ तो भव-भव के फेर चलते रहेंगे।
मुनिश्री ने कहा कि जो देव,गुरु व धर्म को समय नहीं देंगे तो संसार को समय देना ही पड़ेगा। जो देव, गुरु और धर्म को समय देता है, वह संसार के फेरों से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है। मानव भव को पहचानकर जीवन को आत्मकल्याण, सदाचार और मोक्ष की साधना में लगाना चाहिए।