सामान्य ज्ञान

मजबूरी में कुर्बानी व एकता का राग

गठबंधन की राजनीति में जब किसी राजनीतिक दल की इज्जत चली जाती है और वह इज्जत बचाने गठबंधन के लिए कुर्बानी व गठबंधन की एकता का राग अलापता है तो वह सबको समझ में आ जाता है कि न तो यह कुर्बानी खुशी खुशी दी जा रही है और न ही एकता का राग खुशी से अलापा जा रहा है। राजनीति में जो बयान आते रहते हैं, जो घटनाएं घटती रहती हैं, उस पर नजर रखने वाले समझ जाते हैं कि सबसे बड़ी व पुरानी पार्टी की इज्जत चली गई है और उसे पार्टी बचाने का प्रयास कर रही है।

इस बात से कोई इंकार नहीं करता है कि इज्जत जा रही है तो उसे बचाने का हक तो सबको होता है।आखिर कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हैं राहुल गांधी। वह यूपी में क्रांति करने वाले दो लड़के में से एक लड़के हैं। यूपी में अखिलेश यादव को जिताने के साथ छह सीटें जीतने और देश में 99 सीटें जीतने वाले नेता हैं राहुल गांधी।इससे देश में उनकी बड़ी इज्जत है। जो भी यूपी फतह करता है, फतह करने में सहयोग करता है, उसकी बड़ी इज्जत होती है देश में।

 
 

सब मानते हैं कि योध्दा है राहुल गांधी,वह चुनाव हारते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता है,वह मैदान में भाजपा को हराने के लिए डटे रहते हैं।भाजपा से हारते रहते हैं लेकिन भाजपा से लड़ते रहते हैं।वह तो चाहते थे कि सपा यूपी में कांग्रेस को ज्यादा नहीं तो बराबरी सीटें यानी दस में पांच सीटें तो दें ताकि सपा और कांग्रेस मिलकर एक बार फिर भाजपा का यूपी उपचुनाव में सुपड़ा साफ कर दें। फिर एक बार यूपी में क्रांति कर दें।अब अखिलेश ही इसके लिए तैयार नहीं हुए तो इसमें कांग्रेस का क्या दोष।

 
 

अखिलेश यादव भी तो अखिलेश यादव हैं, वह अपना अपमान नहीं भूलते हैं। बार-बार किया अपमान तो कभी नहीं भूलते हैं।कांग्रेस नेता एक बार अपमान करते तो वह मान भी लेते कि चलो गलती से अपमान कर दिया। दूसरी बार हरियाणा में फिर उसी तरह अपमान, यह तो ज्यादा हो गया।वह अपनी बारी की इंतजार कर रहे थे। वह मौका आया यूपी उपचुनाव में। कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने पांच सीटों की मांग की थी।अखिलेश यादव ने कुछ नहीं कहा।वह तो तय कर चुके थे कि क्या करना है, जैसे ही हरियाणा विधानसभा का चुनाव का रिजल्ट आया कि कांग्रेस तीसरी बार चुनाव हार गई है तो अखिलेश यादव ने बिना राहुल गांधी,कांग्रेस के किसी नेता से बात किए उपचुनाव के लिए घोषित छह सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा कर दी।कांग्रेस सोच रही थी कि तीन सीट तो मिलेगी लेकिन एक और सीट पर सपा ने अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया।

 
 

इसके बाद सपा की तरह कांग्रेस से कहा गया कि वह चाहे तो जो दो सीटें बचीं है, उस पर चुनाव लड़ सकती है और भाजपा को हरा सकती है।यह दो सीटें भी ऐसी थीं जो लंबे समय से भाजपा के पास थी यानी इन दो सीटों पर कांग्रेस भाजपा को हरा नहीं सकती थी यानी वह चुनाव लड़ती तो चुनाव हारना तय था। अखिलेश ने भाजपा प्रभाव वाली दो सीटें देकर कांग्रेस को एक तरह से चुनौती दी थी, बड़ा दावा करते हो कि भाजपा के विजय रथ को यूपी में कांग्रेस ने रोका है तो इन दो सीटों पर भाजपा को हराकर बताओ। अखिलेश यादव इस तरह यूपी में कांग्रेस के मजबूत होने के वहम को दूर करना चाहते थे।वह यूपी व देश के लोगों को बताना चाहते थे कि कांग्रेस यूपी में मजबूत नहीं है। उसने छह सीटें जीती हैं तो सपा के कारण जीती हैं।

 
 

कांग्रेस अखिलेश यादव की चाल को समझ गई और हारने वाली सीटों से चुनाव लड़ने से मना कर दिया और मना इस तरह किया कि किसी को पता न चले कि अखिलेश यादव ने तो कांग्रेस का जरा भी सम्मान नहीं किया।कांग्रेस को अपनी कमजोरी को अपनी महानता बताना है कि यानी दो सीटों पर हारने की जगह वह दो सीटें भी सपा को चुनाव लड़ने के लिए दे दीं। कहा क्या, हम उपचुनाव में सपा का समर्थन करेंगे। जवाब में सपा की तरफ से भी कहा गया कि नौ सीटें पर इंडी गठबंधन के प्रत्याशी चुनाव लड़ेेंगे। दांव के जवाब में अखिलेश ने भी दांव चल दिया। 

अब सपा चुनाव हार जाती है तो वह इसे सपा की हार नहीं इंडी गठबंधन की हार बताएगी। कांग्रेस की कोशिश थी कि उपचुनाव में सपा की हार को सपा की हार बताया जाए ताकि वह संदेश दिया जा सके कि सपा भाजपा के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ी इसलिए वह चुनाव हार गई। अगर सपा ने कांग्रेस को पांच सीटें दी होती तो दोनों मिलकर भाजपा को लोकसभा चुनाव की तरह हरा देते।

 
 

सपा व कांग्रेस अब इस मामले कितना भी लीपापोती करें,यह सच तो बाहर आ गया है कि खुद को भाजपा का विकल्प मानने वाली,भाजपा को हराने का दम भरने वाली कांग्रेस पहली बार यूपी में भाजपा से हारने के डर से चुनाव लडऩे से ही मना कर दिया। यह राहुल गांधी व कांग्रेस के दामन पर ऐसा दाग है जो बरसों बना रहेगा।

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