बिना किसी संशय के मनाएं 31 को दीवाली
हिंदू त्योहारों एवं तिथियों विशेष को लेकर प्रायः असमंजस की स्थिति निर्मित होती रही है । सनातन धर्म में एकादशी एवं प्रदोष व्रत के साथ संकष्टी चौथ तथा अन्य पर्वों में अनेक बार एक ही तिथि के दो दिन आने से व्रतियों के लिए संशय का उत्पन्न होना स्वाभाविक है । पंचांग के अनुसार उदयातिथि और पूर्ण तिथि का व्रत की महिमा के अनुसार महत्व बताया गया है । तिथियो को लेकर प्रायः ज्योतिषियों में भी मतभेद की स्थिति बनती रही है । इसे अधिक अच्छे ढंग से समझने के लिए हम प्रतिवर्ष की जन्माष्टमी तिथि पर नजर दौड़ा सकते हैं । भगवान श्री कृष्ण के जन्म को लेकर किए जाने वाले आयोजन वैष्णव संप्रदाय और स्मारता नाम के संदर्भ में अलग - अलग दिनों में सामने आते रहे हैं । वैष्णव संप्रदाय अर्थात मठाधीशों एवं संन्यासी समाज द्वारा उदयातिथि को महत्व देते हुए पर्व मनाया जाता है । यह गलत भी नहीं है । दांपत्य जीवन व्यतीत करने वालों को स्मारतानाम से संबोधित किया जाता है । इस वर्ग को तिथि वाले दिन पर्व मनाना बताया जाता है । प्रायः पंचांगों में यह स्पष्ट लिखा होता है :- एकादशी (वैष्णवा नाम) एवं एकादशी (स्मारता नाम) इसका अर्थ वही है जो ऊपर बताया गया है । इस वर्ष हिन्दुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को लेकर कुछ ऐसी ही संशय की स्थिति बन रही है । मां लक्ष्मी , सरस्वती एवं कुबेर जी की पूजा अमावस्या तिथि पर किए जाने का प्रावधान है । इस बार 31अक्टूबर को अमावस्या तिथि दोपहर 3 बजे के बाद आ रही है , जो 1 नवंबर को संध्या लगभग सवा छह बजे तक रहेगी ।
सवाल यह उठाया जा रहा है कि मां लक्ष्मी की पूजा कब की जाए ? 31 अक्टूबर को पर्व मनाया जाए या फिर 1 नवंबर को ? देश के अलग - अलग हिस्सों में तिथि और पर्व को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है । बात वहीं आकर अटक रही है कि दोपहर बाद प्रवेश कर रही अमावस्या तिथि को स्वीकार करते हुए 31 अक्टूबर को पूजा की जाए या फिर उदयातिथि को मानते हुए 1 नवंबर को मां लक्ष्मी की आराधना की जाए ? वैसे कुछ पर्व ऐसे हैं जिन्हें मनाने के लिए चंद्रमा अथवा काल को ही महत्वपूर्ण माना जाता है । पूर्णिमा तिथि में चंद्रमा की पूजा के चलते चांद को ध्यान में रखा जाता है , फिर पूर्णिमा तिथि संध्या में ही क्यों न आए , उसी दिन पूजा का महत्व होता है । ठीक इसी तरह मां लक्ष्मी की पूजा में अमावस्या काल का बड़ा महत्व हैव। अमावस्या तिथि के रहने पर ही मां की पूजा - आराधना को फलदाई बताया गया है । इस बार 31 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 12 मिनट के आसपास अमावस्या तिथि का आगमन हो रहा है , जो दूसरे दिन 1 नवंबर को संध्या 6 बजे तक रहने वाली है । ऐसे मेंं पूजा के समय 31 अक्टूबर को अमावस्या तिथि होगी । इसलिए 31अक्टूबर को बिना किसी संशय के पूजा करना श्रेयस्कर होगा । इसे लेकर निर्णय सिंधु में भी कहा गया गया है :- " पूर्वोत्रैव प्रदोष व्यप्तौ लक्ष्मीपूजवादो पूर्वा अभ्यंग स्नान दौ परा " अर्थात यदि कार्तिक अमावस्या दो दिन हो तो उसमें पहले दिन को लेना चाहिए । कारण यह कि अमावस्या प्रदोष और रात्रि व्यापिनी होनी चाहिए जो इस बार 31 अक्टूबर को मिलेगी । दीपावली और मां लक्ष्मी की पूजा 31 अक्टूबर को करना शास्त्र सम्मत है । दूसरी ओर 1 नवंबर को रात्रि में अमावस्या के न होने से पूजा शास्त्र सम्मत नहीं मानी जा सकती है । फिर भी यदि 1 नवंबर को करना चाहें तो इसे किसी भी स्थिति में संध्या 6 बजकर 10 मिनट से पूर्व किया जा सकता है ।
जहां तक बात करें उदयातिथि की अर्थात सूर्योदय के समय की तिथि की ,तो दीपावली पूजन के समय अमावस्या के महत्व को ध्यान में रखते हुए उदयातिथि को मान्यता नहीं दी जा सकती है । यह भी माना जाता है कि अमावस्या की घोर काली रात में मां लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करती हैं। अतः महा निशाकाल में दीपोत्सव और पूजन ही मां लक्ष्मी और मां काली को प्रसन्न करने वाला होता है । हमारे हिन्दू धर्म में सनातियों द्वारा काशी में निर्मित पंचांगों का महत्व ही सर्वोपरि होता है । यह माना जाता है कि काशी में निर्मित पंचांगों का गणित शास्त्रीय विधि से परिपूर्ण होता है । यही कारण है कि निर्णय सिंधु में आए वर्णन 31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाने का संकेत कर रहे हैं । पूर्वांचल की तुलना में पश्चिम में सूर्योदय का समय भिन्न होता है । इसी वजह से उदयातिथि को मानने वाले कई स्थानों पर 1 नवंबर को दीपावली मनाने की बात कर रहे हैं , जो शास्त्र सम्मत नहीं है । 31 अक्टूबर को पूर्णकालीन प्रदोष व्यापिनी अमावस्या मिलने के कारण धर्म सिंधु ग्रंथ भी इसी दिन दीपोत्सव मनाने को तर्क संगत मानता है । इन्हीं सारी परिस्थितियों के चलते सम्पूर्ण काशी प्रदेश में 31अक्टूबर को मां महालक्ष्मी का पर्व दीपावली मनाया जायेगा,,यह निर्णय लिया जा चुका है ।
1 नवंबर को दीपावली मनाने के पीछे एक तर्क यह भी सामने लाया जा रहा है कि पंचांगों के कृष्ण शास्त्रीय वचनानुसार कार्तिक अमावस्या को सूर्यास्त के समय एक घटी तक अमावस्या तिथि हो अर्थात 24 मिनट तक भी अमावस्या तिथि हो तो उस दिन उस तिथि को माना जा सकता है । इसी तथ्य को लेकर बीकानेर के ज्योतिषियों ने 1 नवंबर को दीपावली मनाना शास्त्र सम्मत माना है । बात अभी भी उलझी हुई है कि कब पर्व मनाना चाहिए ? स्पष्ट बात यह है कि 31अक्टूबर को दोपहर बाद अमावस्या प्रवेश करने और पूरी रात के साथ दूसरे दिन की संध्या छह बजे तक बने रहने पर 31अक्टूबर की रात ही पर्व मनाया जाना चाहिए।