बंगाल को क्यों बचाने की ज़रूरत है !
2026-03-11 11:48:08
बंगाल को क्यों बचाने की ज़रूरत है !
- गोपाल सामंतों
आज जब सम्पूर्ण देश राष्ट्र गीत "वन्दे मातरम" के पंक्तियों के बीच एक सम्पूर्ण जीवन शैली की खोज और प्रसंस्करण में व्यस्त है, ठीक उसी वक्त बंगाल जिस पुण्य भूमि में यह गीत लिखी गयी थी वहाँ इस गीत के माध्यम से दोबारा क्रांति की आवश्यकता महसूस की जा रही है। निश्चित ही इस बार की लड़ाई में कोई विदेशी ताकत या सेना सामने नहीं है अपितु यह वैचारिक अंतर्द्वंद से उपजी एक वृहद् सांस्कृतिक विचलन है, जिससे एक आम बांग्लाभाषी लड़ते नज़र आ रहा है ।
बंगाल की बात हो और देश के प्रति ऐतिहासिक योगदान की बात न हो तो कोई भी चर्चा अधूरी सी लगने लगती है , अध्यात्म से विज्ञानं तक और औधोगिकीकरण से चलचित्र तक बंगाल और बंगालियों के योगदान को एकत्रित करके लिखने में ही दशकों बीत जायेंगे। समूर्ण विश्व पटल पर जिस तरह आज स्वामी विवेकानंद जी सनातन के प्रतिक है ठीक उसी तरह से नेताजी सुभाष और खुदीराम बोस भी बलीदान के अमर चिह्न के रूप में हर भारतीय के ह्रदय में बसते है। बंगाल वो भूमि है जिसने असंख्य सपूत अर्पित किये भारत माँ के चरणों में, देश को सुरक्षित और राष्ट्र प्रेम को जागृत रखने के लिए। आज भी गुरुदेव और शरत बाबू के रचनाओं से प्रेरित होकर सिनेमा बन रहे है, ज़रा सोच के देखिये इनके सोच को जो सौ वर्षो से ज़्यादा पुराना तो है पर प्रासंगिक भी है।
ऋषि औरोबिन्दो ने एक बार कहा था की रास्ते पर ठोकर लगने से ही इंसान रास्ते में चलना सीखता है लेकिन बंगाल की वर्तमान पृष्ठ भूमि को अगर देखा जाए तो मानो ऐसा प्रतीत होता है की बांग्लाभाषी भद्रो लोक ने ठोकरों में ही अपना जीवन खोज लिया है और इन बातों से ऊपर उठकर उन्होंने अपनी एक काल्पनिक विचारधारा बना ली है। एक समय था जब सारे मुलभुत विषयों के लिए बंगाल के तरफ पूरा भारतवर्ष देखता था चाहे वो स्वास्थ हो या मशीनी उपकरण, इसलिए कहा जाता था की " जो बंगाल आज सोचता है वो शेष भारत आने वाले कल में सोच पाता है " .
शायद इन्ही बातों ने बंगाल के अस्तित्व को नज़र लगा दी और आज बंगाल उस जगह पहुंच गया है जहा ; रक्तरंजित वर्तमान रोज़ गौरवशाली इतिहास को मिटाने में लगी हुई है। बंगाल के गौरवशाली इतिहास को बनाने में जिस भद्रलोक का हाथ था आज उन्ही के उँगलियों में जबरदस्ती शाही पोतकर नया इतिहास लिखवाने की चेष्ठा की जा रही है। ऐसी भ्रम की स्थिति उत्पन्न की गयी है की बंगालियों का एक बहुत बड़ा वर्ग वैभव की चाहत को छोड़कर दरिद्रता के प्रतियोगिता करने में अपनी पूरी बौद्धिक सम्पदा और क्षमता को झोंक रही है। 35 सालों के कम्युनिज्म के मीठे ज़हर को चखते चखते दो तीन पीढ़िया समाप्त हो गयी और जब उसके बाद नए फ्लेवर में ममता काल आया तो आम बंगाली को मायाजाल में फसने का मानो ज्ञान ही नहीं हो पाया।
ज़रा समझिये इस बौद्धिक समाज ने अपने आप को कैसे विभक्त कर लिया है- कई टुकड़ो में और शायद इन्ही कारणों से राजनैतिक रूप से इस समाज में और बांग्लाभूमि में दो बार विभाजन और एक बार सामूहिक विस्थापन संभव हो सका, आज भी हम उसी राह पर चल रहे है। बांग्लादेश से 1947 के पहले आये बंगाली को बांगाल कहा जाता है, 1947 के बाद जों बंगाली भारत आये उन्हें रिफ्यूजी बंगाली कहा जाता है, बंगाल के बाहर बसें हुए बंगालियों को प्रवाशी बंगाली कहा जाता है और इस सभी प्रकारो के ऊपर एक बंगाली है जिसे ऐदेशी बंगाली कहा जाता है यह वो बंगाली है जिनके पूर्वज पश्चिम बंगाल में ही रहे और जिनका पूर्व बंगाल यानी वर्तमान बांग्लादेश से कोई संपर्क नहीं रहा। विडम्बना देखिये इस विभाजन को आज भावनाओं का जामा पहनाके फुटबॉल टीमों का नामकरण किया जाता है ।
अपने मातृभूमि की इस पतन के विरुद्ध हर बांग्लाभाषी में रोष है और कुछ कर गुजरने की चाहत भी, इन्ही इच्छाओं को एकत्रित करके आज कुछ प्रवासी बंगालियों ने मिलकर एक मुहीम की शुरुवात की है जिसका नाम है "Save Bengal Save India " मुख्यतः इस मुहीम के पीछे जो लोग है वो सारे प्रवासी बंगाली है, जो बंगाल को उस जगह से देख पा रहे है जहा से बंगाल के भीतर रहने वाला बंगाली नहीं देख पा रहा है। जिस प्रकार से किसी भी जगह का सठिक नक्शा बनाने के लिए उस जगह का एरियल व्यू लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार से अगर बंगाल के वर्तमान राजनैतिक-सामाजिक विशेलषण करना हो तो, जो बंगाल को बाकी देश के साथ तुलनात्मक रूप से देख और समझ सकते है, वो ही बेहतर ढंग से इस कार्य को सम्पादित कर पाएंगे। आज सच माना जाए तो यह एक स्वर में कहा जा सकता है की जो बांग्लाभाषी बंगाल के बाहर निवासरत है वो ज्यादा खुशहाल और संपन्न है। यह सम्पन्नता केवल आर्थिक नहीं अपितु बौद्धिक भी है इसलिए बंगाल के बाहर बसें हुए बंगाली अपने आप को कभी रेखांकित करके यह नहीं कहते है की वो "हिन्दू बंगाली" है, जबकि बंगाल में आज बांग्लाभाषी के पास सबसे बड़ी जो समस्या है वो है स्थायी पहचान की, इसलिए उन्हें कहना पड़ता है की हम "हिन्दू बंगाली " है। बंगाली शब्द ही अपने आप में हिन्दू होने का परिचायक है, सामान्यतः इस्लाम में भाषायीं समुदाय नहीं होता है। ईरान हो या बांग्लादेश या फिर पश्चिम बंगाल इस्लाम धर्म में वजीफा या कलमा भी एक और आराध्य भी एक ही है। फिर भी देखिये बंगाल में बसें मुस्लिमों को कम्युनिस्ट काल से बांग्लाभाषी भद्रो लोक ने मुस्लिम बंगाली की परिभाषा देकर अपने खुद के धार्मिक पहचान और अस्तित्व पर निशानिया सवाल खड़ा कर दिया है।
बंगाल के बाहर बसें हुए बंगालियों को मूल रूप से चार वर्गों में बांटा जा सकता है। पहला वो बंगाली परिवार जो सौ वर्षो से भी अधिक समय से बंगाल से अलग हो चुके है, इनको अंग्रेजो ने अलग अलग प्रदेशो में इनकी शैक्षणिक योग्यताओं के लिए बसाया और समाजहीत में स्वास्थ, शिक्षा और अभियांत्रिकी कार्यो में लगाया। दूसरे वो बंगाली परिवार जो बेहतर पेशेवर अवसर के लिए बंगाल से बाहर दूसरे प्रदेशों में पहुंचे और वही बस गए, ऐसा कहा जा सकता है की यह बौधिक पलायन बंगाल में नक्सल आंदोलन की वजह से ही शुरू हुआ और इनके पलायन के साथ ही बंगाल का औधोगिक ढांचे का खस्ताहाल होने की शुरूवात हो गयी। तीसरे वो बंगाली परिवार जो बेरोजगारी और बंगाल के आर्थिक पतन की वजह मजबूरीवश बंगाल छोड़कर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए, इस तबके में उच्च शिक्षित वर्ग के लोग भी है और उसी के साथ वो लोग भी है जो श्रमिक वर्ग से आते है। आज यह तीनों वर्ग भले ही बंगाल के बाहर बसें हुए हो लेकिन बंगाल के संस्कृति से इनका जुड़ाव जिवंत है और बंगालियों के आहार -व्यवहार में भगौलिक परिस्थितयों का कोई असर नहीं है। बंगाली चाहे न्यू यॉर्क में रहे या कोलकाता में पंजिका के अनुसार पुष्पांजलि देना नहीं भूलता है और आज भी महालया के आवाज़ भर से हर बंगाली के मन में उत्सव का उत्साह भर जाता है।
Save Bengal Save India मुहीम सम्पूर्ण रूप से एक डिजिटल मुहीम के रूप में शुरू हुई और पहले कुछ हफ्तों में ही छत्तीसगढ़ के समस्त जिलों के बंगाली समाज के सदस्यों की बीच जगह बना लिया, मध्य प्रदेश के कुछ जिलों तक भी इस मुहीम को डिजिटल रूप से पंहुचा दिया गया है। यह मुहीम सम्पूर्ण देश में अलग अलग प्रदेशो में बसें हुए बंगाली समाज के लोगो को एकत्रित करने का प्रयास है भावनाओं इन विभक्तियों से आगे निकालकर दोबारा बांगला से जोड़ने का यह प्रयास चल रहा है। इस मुहीम के माध्यम से बंगाल में बसें हुए बंगालिओं के बिच यह नैरेटिव को भी स्थापित करना है की बंगाली चाहे कही भी हो वो पहले आपस में एक है एवं राष्ट्रीयता के भावना के साथ अलग अलग प्रदेशो में जो सरकारें काम कर रही है उन कामो से सीधे तौर पर बंगाली समुदाय का विकास हुआ है। कितने आश्चर्य की बात है आज केंद्र सरकार ने बांग्ला भाषा को देश में क्लासिकल भाषा का दर्ज़ा दिया इस बात को बंगाल में रहने वाले ज्यादातर लोग जान ही नहीं पाए या फिर जानकार भी इसके महत्व को समझ नहीं पाए। बांग्लाभाषी बंगाल में सीधे तौर पर राजनैतिक मायाजाल के शिकार बन चुके है इसलिए उन्हें प्राप्त सम्मान को भी शायद संदेह के नज़रो से देखना उनके लिए आम बात बन चुकी है, लेकिन अब यह समझना होगा की इन बातों से हम जैसे बंगालियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है क्योंकि हमें तो बंगाल के बाहर जीवन यापन करना है और नॉन बंगालियों के साथ हमारा सम्बद्ध इतना गाढ़ा हो चूका है की अब हम बंगाली होने से ऊपर उठकर भारतीय बन चुके है। यह भारतीयता की भावना और राष्ट्रीयता की चेतना को बंगाल के बंगालियों के बीच स्थापित करने का काम हम जैसे प्रवाशी बंगाली बड़े आराम से और तार्किक रूप से कर सकते है। बंगाल वो राज्य है आज भी जहा से देश की सेना में प्रति वर्ष लगभग 50000 युवा जुड़ते है और देश की रक्षा करने का प्रण लेते है, यह आकड़ा यह साबित करने को पर्याप्त है की बंगाल में हर गाँव में आज भी राष्ट्रीयता जीवित है। "Save Bengal Save India "मुहीम के माध्यम से छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में स्थित लगभग 130 बंगाली कालीबाड़ियों में पहुंचकर उनके सदस्यों के साथ बैठक कर उन्हें इस मुहीम से जोड़ा गया, इस प्रयास को और अनूठा बनाने लिए बार कोड के माध्यम से सदस्यता शुरू की गयी और इस बार कोड को संलग्न कर पोस्टर बनवाकर हर कालीबाड़ी में चस्पा किया गया। इस माध्यम से वृहद् संख्या में सदस्यता संभव हो सका है। मध्य प्रदेश के जबलपुर और भोपाल जैसे शहरों को भी इस मुहीम से जोड़ा गया और वहा के बंगाली समुदाय के सदस्यों के बिच भी यह मुहीम प्रख्यात बन गयी है, इस मुहीम से जुड़ने वाला प्रत्येक बंगाली कही न कही बंगाल के खोये हुए वैभव को पुनः स्थापित देखना चाहता है। आज बंगाल में धार्मिक और सामाजिक उदारीकरण के नाम पर हो रहे सांस्कृतिक पतन से देश और दुनिया में निवासरत सभी बंगाली क्षुब्ध है और एक परिवर्तन की राह देख रहे है एवं इस परिवर्तन के लिए अपनी भागदारी भी करना चाहते है। छत्तीसगढ़ हिन्दू बंग सम्मलेन का आयोजन भी रायपुर में किया गया जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में पद्मश्री कार्तिक महाराज उपस्थित रहें और उन्होंने समूचे बंगाली समाज को यह समझाने का प्रयास किया की इस अंतिम लड़ाई में अगर एक आम बंगाली हार गया तो निश्चित बंगाल एक नए विभाजन को दोबारा देखेगा और लाखों निरीह बंगाली उस त्रासदी को झेलने के लिए शायद फिर मजबूर होंगे। इस कार्यक्रम में भी सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कई जिलों से बंगाली समुदाय के सदस्यों ने स्वसुफूर्त रूप से हिस्सेदारी निभाई। यह का घोतक है की आज बंगाली समाज के हर व्यक्ति के ह्रदय में बंगाल में हो रहे अन्याय के खिलाफ लौ तो जल रही है, लेकिन इस लौ को मशाल के रूप में बदलने के लिए पर्याप्त मंच उपलब्ध नहीं है।
कुछ लोगो के मन में यह प्रश्न ज़रूर होता है की बंगाल को बचाने की ज़रूरत आखिर क्यों है ? तो उन लोगो के लिए ये चंद उत्तर लगता है काफी होंगे। जिस बंगाल को माँ दुर्गा की पुण्य भूमि के रूप में जाना जाता है वही उस भूमि में माँ दुर्गा के विसर्जन यात्रा के लिए कोर्ट का आदेश लेना पड़ता है साथ ही विसर्जन यात्रा का नाम कार्निवाल रख दिया गया और माँ दुर्गा से परेड शुरू करवा लिया गया है। मुर्शिदाबाद में खुले आम बंगालियों के घरो को आग लगा दिया गया जिसमे कई बंगाली भाई बहन ज़िंदा झुलस कर मर गए, ठीक उसी तरह जिस तरह से बांग्लादेश में हिन्दू युवक दीपू दास को ज़िन्दा जलाया गया। संदेशखाली में हिन्दू बंगाली महिलाओं को घर से उठा ले जाकर यातनाएं दी गयी और उनका यौन उत्पीड़न किया गया और न जाने कितनों का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किया गया। कोलकाता जैसे भद्रो शहर में खुले आम बीफ बिकने लगा है जो समूचे देश में बैन है, खुलेआम गौ माताओं का कत्लखाने बन गए है पुरे बंगाल में और सीधे तौर पर जिन्हे बंगाल के सरकार का संरक्षण प्राप्त है। बंगाल में काँटातार युक्त बॉर्डर बनाने के लिए ज़मीन अधिग्रहण नहीं हो पा रहा जिससे बांग्लादेशी घुसपैठ रोका जा सके। अचानक 60 से अधिक विधानसभा सीटों में हिन्दू - माइनॉरिटी में बदल गया और ऐसा जनसांख्यिकीय बदलाव जो आने वाले समय में बंगाल में निश्चित
तीसरा विभाजन लाने वाला है। आज पूरा देश बाबरी मस्जिद के इतिहास को भली भांति जानता है सोचिये बंगाल में नया बाबरी मस्जिद का निर्माण हो रहा है और उसके लिए एक दिन में सौ करोड़ रुपये इखट्ठा हो जाता है। बंगाल सरकार अपने बजट में 5713 करोड़ का प्रावधान करती है केवल मदरसा बोर्ड के लिए, यानी प्रत्येक मदरसा के लिए लगभग 9 करोड़ रुपयों का प्रावधान, आखिर सोच कर देखिये इन मदरसों से कितने डॉक्टर इंजीनियर निकलेंगे और कितने अफजल गुरु जैसे आतंकी निकलेंगे। यह सूचि बहुत लम्बी है, सांकेतिक रूप से इतने उदहारण काफी है की आखिर बंगाल को बचाने की ज़रूरत क्यों है।