सामान्य ज्ञान
डायबिटीज की आयुर्वेदिक दवा में काम आता है ये फल
ऐसे कई खरपतवार और जंगली फल हैं जिनके औषधिय गुणों से लोग अनजान हैं। ऐसा ही एक फल है तुंबा, जो रेगिस्तान और रेतीले जंगलों में उगता है। तुंबा स्वाद में खीरा के जैसा होता है। पानी से भरपूर ये फल रेगिस्तान में रहने वाले जानवरों के लिए प्यास बुझाने के काम आता है। हालांकि तुंबा में कई गुण पाए जाते हैं। डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए भी इस फल का इस्तेमाल किया जाता है। इस फल के सेवन से शरीर में इंसुलिन रेसिस्टेंट की क्षमता बढ़ती है। हालांकि किसान इसे बेकार समझकर खेतों से उखाडकर फेंक देते हैं।
फार्मास्युटिकल एंड केमिकल जर्नल में छपी एक स्टडी की मानें तो तुम्बा फल डायबिटीज को कंट्रोल करने में असरदार भूमिका निभाता है। इस फल को खाने से इंसुलिन बढ़ता है। तुंबा के फल, जड़, पत्ते, और बीज का कई औषधियों में इस्तेमाल किया जाता है।
डायबिटीज कंट्रोल करने में असरदार है तुंबा
सोशल मीडिया पर खुद को वैद्य बताने वाले जगदीश सुमन की मानें तो डायबिटीज को काबू करने के लिए सौंठ और तुम्बा को बराबर मात्रा में मिला लें। दोनों चीजों को मिक्सी में डालकर पीस लें और बारीक पाउडर बना लें। अब हथेली पर थोड़ा पाउडर लें और पानी डालकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को अपनी नाभि पर लगा लें। आप इसे किसी भी वक्त लगा सकते हैं। इस पेस्ट को करीब 8 से 10 घंटे नाभि पर लगाकर रखें। इससे शुगर की बीमारी को कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
तुंबा का औषधीय महत्व क्या है?
तुंबा का इस्तामल कई बीमारियों में दवा के रूप में किया जाता है। लोगों का कहना है कि तुंबा को सुखाकर-पीसकर इसका चूर्ण बनाकर इस्तेमाल किया जाता है। तुंबा का पाउडर खाने से कब्ज की समस्या दूर होती है। इसका इस्तेमाल करने से न सिर्फ शुगर बल्कि पीलिया जैसी बीमारियों में फायदा मिलता है। तुंबा का पाउडर खाने से मानसिक तनाव, पेशाब से जुड़ी समस्याएं भी दूर होती हैं। तुंबा से आयुर्वेदिक दवाएं बनाकर रेचक और गुल्म, पित्त, पेट रोग, कफ, कुष्ठ और बुखार में इस्तेमाल किया जाता है।
प्रगति यात्रा के सहारे चुनावी नैया पार उतारने की कोशिश में नीतीश
बिहार में विधानसभा चुनावों की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। छह महीने बाद राज्य में चुनाव होने हैं। ऐसे में पक्ष और विपक्ष-दोनों ने चुनावी समर के लिए कमर कस लिया है। इन तैयारियों के बीच एक बात तय है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए एक बार फिर नीतीश कुमार की ही अगुआई में चुनावी मैदान में उतरने जा रहा है। पिछले साल नीतीश और लालू के मिलने की खबरिया कानाफूसी हो रही थी, उन्हीं दिनों पहले अमित शाह और बाद बीजेपी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, दोनों नीतीश के ही चेहरे पर चुनाव लड़ने का ऐलान करने में देर नहीं लगाई। वहीं विपक्षी खेमे की कमान बीमारी के बावजूद लालू यादव ने अपने हाथ में ले ली है।
जनता दल से अलग होकर जब से नीतीश कुमार ने अपनी अलग राह चुनी है, बिहार में ज्यादातर जंग लालू बनाम नीतीश ही रही है। सियासी इतिहास गवाह है कि जब भी लालू बनाम नीतीश की जंग होती है, लालू का जंगलराज के भूत का डर बिहार के लोगों को सताने लगता है। इस जंग में लालू की बनिस्बत नीतीश का चमकदार और सुलझा हुआ सामने आ जाता है और सियासी बाजी नीतीश की अगुआई वाले गठबंधन के ही हाथ लगती रही है। एनडीए अगर बिहार की सत्ता से अतीत में कभी दूर हुआ भी है तो उसकी वजह खुद नीतीश का उसका साथ छोड़ना रहा है।
नीतीश कुमार की अगुआई में 2005 में बिहार की सत्ता पर एनडीए के काबिज होने के बाद बिहार की अराजक छवि में तेजी से बदलाव हुआ। शासन की गाड़ी पटरी पर लगातार आती गई। नीतीश के पहले बिहार में बिजली के दर्शन कभी-कभी होते थे, लेकिन बाद में हालात बदले। बिहार की सड़कें देश और दुनिया में अपनी बदहाली के लिए जानी जाती थीं, लेकिन नीतीश ने उन्हें भी बदला। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिलों की सौगात मिली। कभी माफिया, अपहरण और वसूली के लिए बदनाम बिहार की छवि बदलने लगी। इसके बाद नीतीश कुमार की भी नई छवि बनी, उन्हें नया नाम भी मिला, सुशासन कुमार। पंद्रह साल बाद हुए विधानसभा चुनावों में नीतीश की पार्टी की सीटें घटीं। हाल के दिनों में उनके कुछ बयानों पर सवाल भी उठे, इसके बावजूद बिहार की राजनीति का सबसे चमकदार चेहरा अब भी नीतीश कुमार ही हैं। शायद यही वजह है कि एनडीए एक बार नीतीश कुमार के ही चेहरे के साथ मैदान में उतरने जा रहा है। एनडीए और जनता दल यू को लगता है कि इस जंग में इस बार सियासी कामयाबी दिलाने में मददगार नीतीश कुमार की प्रगति यात्रा ही हो सकती है। इसलिए सत्ताधारी खेमे की ओर से एक तरफ जहां विकास को मुद्दा बनाने की तैयारी है, वहीं विकास के सिलसिले में नए आयाम जोड़ने को लेकर तेजी से काम हो रहा है। इसी के तहत नीतीश सरकार सड़क और पुल निर्माण जैसे विकास कार्यों को ज़मीन पर उतारने की तैयारी तेज कर दी है।
एनडीए के साथ ही बिहार के सियासी जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह यात्रा बिहार के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। क्योंकि नीतीश सरकार की नीतियों की वजह से पहले से ही समूचे राज्य में बुनियादी सुविधाओं में तेजी से सुधार हो रहा है। अपनी सरकार की उपलब्धियों के साथ ही लोगों की राय जानने के लिए कुछ दिनों पहले से नीतीश कुमार ने राज्य में प्रगति यात्रा की। इस यात्रा के दौरान नीतीश ने राज्य के तमाम जिलों में लोगों से मिलकर उनकी समस्याओं को सुना और उनके समाधान के लिए सुनवाई की जगह पर ही अधिकारियों को सीधे निर्देश दिए। इस यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने बिहार के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी कीं। विशेष रूप से सड़क निर्माण, बाईपास और उच्चस्तरीय रेलवे ओवर ब्रिज की योजनाओं पर जोर दिया गया, ताकि राज्य में आवागमन की सुगमता बढ़े और यात्रा समय में कमी आए।
प्रगति यात्रा के ही दौरान नीतीश कुमार ने 20,000 करोड़ रुपये की 188 योजनाओं की घोषणा की, जिनमें 121 योजनाओं को मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिल चुकी है और उन्हें जमीनी हकीकत बनाने को लेकर तेजी से काम शुरू हो चुका है। इनमें से कई योजनाएं ग्रामीण सड़कों को बेहतर बनाने, उनका पुनर्निर्माण करने और उनकी हालत पहले की तुलना में और बेहतर बनाने को लेकर हैं। इस दौरान समस्तीपुर और मधेपुरा जिलों में महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। साथ ही, सीवान, छपरा, गोपालगंज और मुजफ्फरपुर जिलों में सड़क चौड़ीकरण, बाईपास और पुल निर्माण कार्यों के लिए भी भारी धनराशि स्वीकृत की गई है। सत्ताधारी खेमे का दावा है कि नीतीश कुमार की दूरदर्शी सोच और कड़ी मेहनत की वजह से बिहार का तकरीबन हर गांव पक्की और चौड़ी सड़कों से जोड़ा जा रहा है। बहुत सारी सड़कें तैयार भी हो चुकी हैं। जिनकी मदद से बिहार के किसी भी कोने से पहले की तुलना में राजधानी पटना पहुंचना कहीं ज्यादा आसान हुआ है। इसकी वजह से लोगों के समय और ईंधन की बचत हो रही है। नीतीश की अगुआई में 2010 में मिली दूसरी जीत में बेहतर सड़कों की बड़ी भूमिका रही। शायद यही वजह है कि नीतीश कुमार ने सड़कों और बुनियादी सुविधाओं के लिए खजाना खोल दिया है।
नीतीश के लिए चुनौती शराबबंदी बनी हुई है। सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार की वजह से शराब की तस्करी बढ़ी है। हालांकि शराबबंदी से महिलाएं खुश हैं। नीतीश को इस चुनौती से पार पाना होगा। वैसे प्रशांत किशोर जैसे उनके पुराने साथी विपक्षी खेमे की ओर से इसे बड़ा मुद्दा बना रहे हैं। फिर भी कह सकते हैं कि बिहार की आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ा नीतीश सरकार का पहिया अब भी प्रमुख मुद्दा है। उम्मीद की जा रही है कि चुनावों की घोषणा होने तक नीतीश और बीजेपी इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित और विस्तारित करते रहेंगे। यह सच है कि जातिवाद से ग्रस्त बिहार की राजनीति पर विकास की राजनीति भारी पड़ती रही है। शायद यही वजह है कि नीतीश सरकार विकास पर जोर दे रही है और इसे ही अपना सियासी हथियार बनाने की तैयारी में है।
अश्लीलता से जुड़ी दिमागी गंदगी पर रोक की जरूरत
दुनिया के तमाम देषों में से एक भारत ही ऐसा देष है, जहां अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी बोलने की छूट है। ऐसे ही कुछ हरकत यूट्यूबर रणवीर इलाहबादिया ने की है। उन्होंने अभिभावकों के संबंध में इतनी आपत्तिजनक टिप्पणी अपने यूट्यूब पर की, कि देष भर में उनकी विकृत मानसिकता और नितांत अष्लील भाशा का उपयोग करने पर उनके विरुद्ध देषभर के समाज के प्रति जागरूक लोग खड़े हो गए। उन पर दर्जनों एफआईआर दर्ज हो गईं। उनके भद्दे प्रदर्षन पर प्रतिबंध के नजरिए से जनहित याचिकाएं अदालतों में दायर कर दी गईं। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया और रणवीर को भद्दी भाशा के प्रयोग पर कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय को कहना पड़ा कि अभिव्यक्ति की आजादी के मायने कुछ भी बोलने का लाइसेंस नहीं है। आपके दिमाग में गंदगी भरी है, जो षो में उगल दी। उनकी मानसिक विकृति और भाशा को निंदनीय करार देते हुए अदालत ने कहा कि यह भाशा बहनों-बेटियों, माता-पिता और समाज के लिए भी षर्मिंदगी अनुभव कराती है। अदालत ने इस फटकार के बाद उनकी गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी, लेकिन पासपोर्ट तो समर्पित करने और देश से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि वकील ने उनके कार्यक्रम को केवल वयस्कों के लिए होने की दलील दी थी, परंतु अदालत ने नहीं मानी।
आजकल ‘ओवर द टाॅप‘ अर्थात ओटीटी प्लेटफॉर्म पर फिल्म, यूट्यूब एवं वेब सीरीज पर दिखाई जा रही अश्लीलता चिंता का विषय बनी हुई है, अतएव इस पर नियंत्रण जरूरी है। इन पर अश्लील सामग्री के साथ ऐसी धार्मिक सामग्री भी परोसी जा रही है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बहुसंख्यक लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करती है। जरूरत यह है कि अश्लीलता दिखाने वाले सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जांच होनी चाहिए। इन पर नियंत्रण तो जरूरी है ही एक बोर्ड का भी गठन किया जाए, जो इन पर नियंत्रण के उपाय सुझाए। हालांकि अब ओटीटी पर नियंत्रण के लिए ऐसी व्यवस्था बन गई है कि जिससे पालक अपने बच्चों के लिए ऐसी सीरीज प्रतिबंधित कर सकेंगे, जिनमें अश्लीलता परोसी जा रही है। आयु वर्ग के हिसाब से भी इन्हें बालक, किशोर एवं वयस्क श्रेणियों में बांटा जाएगा। जिससे जरूरत के हिसाब से इन पर नियमन संभव हो।
मोबाइल व कंप्युटर पर इंटरनेट की घातकता का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। इंस्टाग्राम हो या फेसबुक या फिर गूगल ये सब विदेषी कंपनियां अकूत धन कमाने की तृश्णा में सोषल मीडिया प्लेटफार्मों के माध्यम से भारतीय बच्चों, किषोरों व युवकों को पोर्नोग्राफी के जाल में फंसाकर उनका न केवल भविश्य बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि साइबर अपराधी बनाकर उनके पूरे जीवन पर ही कालिख पोतने का काम कर रहे हैं। ये सब कंपनियां आॅनलाइन सेक्स ट्रेफिकिंग को बढ़ावा दे रही हैं। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि किशोरों को अश्लील फिल्में दिखाकर बच्चे और सगे-संबंधी नाबालिग ही इनकी करतूतों का शिकार हो रहे हैं। लंदन के पास बसे शहर सोहो में इस तरह की वीडियो क्लिपिंग बनाने का धंधा खुलेआम चल रहा है। भारत में अब रणवीर की तरह कई यूट्यूबर अश्लील सामग्री यूट्यूब के माध्यम से परोस रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी भी देखी जा रही है।
आज सूचना तकनीक की जरूरत इस हद तक बढ़ गई है कि समाज का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है। कोरोना-काल में बच्चों को डिजीटल माध्यम से पढ़ने का जो बहाना मिला है, उसमें इंटरनेट पर डेटा की खपत से पता चला है कि पोर्नाग्राफी की बीमारी भी उसी अनुपात में बढ़ रही है। भारत में इंटरनेट डेटा की खपत इसके सस्ते होने की वजह से भी बढ़ रही है। इस सिलसिले में बच्चों के संदर्भ में मिली यह जानकारी अत्यंत चिंताजनक हैं। बेटियों से दरंदिगी की एक बड़ी वजह पोर्न साइट्स की बिना किसी बाधा के उपलब्धता है। ऐसे में जो विद्यार्थी इंटरनेट पर पढ़ाई के बहाने पोर्न देखने में लग जाते हैं, उनके पालक सामान्य तौर से ऐसा कैसे सोच सकते हैं कि वे जिनके भविश्य के सपने बुन रहे हैं, वे स्वयं किस मानसिक अवस्था से गुजर रहे हैं और किस गलत दिषा का रुख कर रहे हैं। ऐसे में उन अभिभावकों के बच्चों को ज्यादा भटकने का अवसर मिल रहा है, जिनके माता-पिता दोनों ही नौकरी में हैं। क्योंकि ऐसे में यह निगरानी रखनी मुष्किल होती है कि आखिर बच्चे मोबाइल पर देख क्या रहे हैं ? पढ़ाई-लिखाई के लिए आॅनलाइन विकल्पों के चलते यह स्थिति बढ़ रही है। बावजूद यह प्रष्न नहीं उठाया जा रहा है कि पढ़ाई-लिखाई के दौरान बच्चे मोबाइल पर कौनसा पाठ पढ़ रहे हैं ? उन्हें कौन अज्ञात व्यक्ति बरगलाकर गलत दिशा दे रहा है ? इसकी निगरानी कैसे संभव है ? क्योंकि इस अकेलेपन में दिमाग में शक्तियां पनपने की आशंका कहीं ज्यादा हैं। प्रारंभ में यह आकर्षण थ्रिल या रोमांच की तरह लगता है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता विकार रूप में बदलने लगता हैं। सोशल मीडिया पर निर्बाध पहुंच और बच्चों की जरूरतों के प्रति अभिभावकों की निश्चितता एवं लापरवाही इस तरह की घटनाओं के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। ये घटनाएं इसलिए और बढ़ रही हैं, क्योंकि हमारी परिवारिक और कौटुंबिक जो सरंचना थी, उसे सुनियोजित ढंग से तोड़ा जा रहा है। ऐसे में बच्चों को नैतिक मूल्यों से जुड़े पाठ, पाठ्यक्रम से तो गायब कर ही दिए हैं, घरों में भी दादा-दादी या नाना-नानी इन पाठों को किस्सों-कहानियों के जरिए पढ़ाने के लिए उपलब्ध नहीं रह गए हैं। यदि नैतिक षिक्षा का पाठ पढ़ाने की बात कोई षिक्षाषास्त्री करता भी है तो उसे पुरातनपंथी कहकर नकार दिया जाता है। अब नई षिक्षा नीति में जरूर कुछ इस तरह के पाठ जोड़ने की पैरवी हो रही है। ऐसे में रणवीर के षो पारिवारिक रिष्तों को तार-तार करने वाले हैं।
यह समस्या इसलिए विकट होती जा रही है, क्योंकि इंटरनेट और सोशल प्लेटफॉर्म प्रदाता कंपनियां इस दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कारगर पहल करने को तैयार नहीं हैं। कंपनियां अकसर इस तरह के मामले उठते हैं तो उस बाबत यह कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती हैं कि वह ऐसी किसी आपत्तिजनक तस्वीर या सामग्री के उपयोग की अनुमति नहीं देती है। ज्यादा हुआ तो जो आपत्तिजनक सामग्री अपलोड हो जाती है, उसे हटाने का आश्वासन दे देती हैं। लेकिन कंपनी के ऐसे दावे भरोसे के लायक नहीं होते हैं, क्योंकि ऐसी सामग्री की पुनरावृत्ति होती रहती है। यदि ज्यादा जोर डाला जाता है तो सोशल साइट के उपभोक्ता सुनियोजित ढंग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होने का शोर मचाने लगता है और इंटरनेट पर दुरुपयोग के दूर करने के उपायों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि सोशल मीडिया पर नियमन, स्व-नियमन या सरकारी नियंत्रण की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है ? हकीकत तो यह है कि किषोर बच्चों को इंटरनेट घातक साबित हो रहा है। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में नियंत्रण की जरूरत कहीं अधिक बढ़ गई है। इसका आधार यही है कि सोषल मीडिया पर बढ़ती अष्लील करतूतें अब नैतिक मर्यादा के उल्लंघन और सभ्य समाज की संरचना के लिए गंभीर चुनौती के रूप में पेष आने लगी हैं, इसलिए ओटीटी पर अंकुष जरूरत तो है ही रणवीर जैसे यूट्यूबरों को दंडित करने की भी जरूरत है, जिससे आपत्तिजनक यूट्यूब बनाने और षो करने की विकृत मानसिकता वाले लोग हिम्मत जुटाने से कतराएं।
हिंदवी स्वराज जनक: छत्रपति शिवाजी महाराज
हेमेन्द्र क्षीरसागर, पत्रकार, लेखक व स्तंभकार
हिंदवी स्वराज प्रणेता: श्रीमंत योगी छत्रपति शिवाजी महाराज निर्विवाद रूप से 1674–1680 तक भारत के सबसे महान राजाओं में से एक हैं। उनकी युद्ध प्रणालियाँ आज भी आधुनिक युग में अपनायीं जातीं हैं। उन्होंने अकेले दम पर मुग़ल सल्तनत को चुनौती दी थी। शाश्वत, माता जीजा बाई, पिता शाहजी भोंसले के पुत्र शिवाजी भोंसले का अवतरण 19 फरवरी, 1630 को पावन धरा शिवनेरी किला, पुणे जिला, महाराष्ट्र में हुआ था। जीवन साथी साई बाई, सोयारा बाई, पुतला बाई, सकवर बाई, लक्ष्मीबाई, काशीबाई। उनकी संभाजी, राजाराम, सखु बाई निम्बालकर, रणु बाई जाधव, अंबिका बाई महादिक और राजकुमार बाई शिर्के संतानें थी। अपनी बहादुरी, रणनीति और प्रशासनिक कौशल के लिए प्रसिद्ध, परम प्रतापी योद्धा शिवाजी महाराज ने 3 अप्रैल, 1680 को कैसे प्राण त्यागे असंमजस है।
कुशल सेनापति
प्रेरक, शिवाजी भोंसले को पूना में उनकी माँ और काबिल ब्राह्मण दादाजी कोंडा-देव की देखरेख में पाला गया। जिन्होंने उन्हें एक विशेषज्ञ सैनिक और एक कुशल प्रशासक बनाया था। शिवाजी महाराज, गुरु रामदास से धार्मिक रूप से प्रभावित थे, जिन्होंने उन्हें अपनी मातृभूमि पर गर्व करना सिखाया था। 17वीं शताब्दी की शुरुआत में नए योद्धा वर्ग मराठों का उदय हुआ। जब पूना जिले के भोंसले परिवार को सैन्य के साथ-साथ अहमदनगर साम्राज्य का राजनीतिक लाभ मिला था। भोंसले ने अपनी सेनाओं में बड़ी संख्या में मराठा सरदारों और सैनिकों की भर्ती की थी जिसके कारण उनकी सेना में बहुत अच्छे लड़ाके सैनिक हो गये थे। शिवाजी एक न केवल एक कुशल सेनापति, एक कुशल रणनीतिकार और एक चतुर कूटनीतिज्ञ था बल्कि एक कट्टर देशभक्त भी थे। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए औरंगजेब जैसे बड़े मुग़ल शासक से भी दुश्मनी की थी।
भारतीय नौसेना के पिता
प्रासंगिक, शिवाजी बहुत बुद्धिमान थे और उन्हे यह कतई मंजूर नहीं था की लोग जात पात के झगड़ों में उलझे रहे। वह किसी भी धर्म के खिलाफ नही थे। उनका नाम भगवान शिव के नाम से नही अपितु एक क्षेत्रीय देवता शिवाई से लिया गया है। उन्होंने एक शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया था। इसलिए उन्हें भारतीय नौसेना के पिता के रूप में जाना जाता है। अपने प्रारंभिक चरणों में ही उनको नौ सैनिक बल के महत्व का एहसास हो गया था। क्योंकि उन्हें यकीन था कि यह डच, पुर्तगाली और अंग्रेजों सहित विदेशी आक्रमणकारियों से स्वतंत्र रखेगा। समुद्री डाकुओं से कोंकण तट की भी रक्षा करेगा। यहाँ तक कि उन्होंने जयगढ़, विजयदुर्ग, सिन्धुदुर्ग और अन्य कई स्थानों पर नौसेना किलों का निर्माण किया।
नि: शुल्क राज्य की स्थापना
आदर, शिवाजी महिलाओं के सम्मान के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ दृढ़ता से उन पर हुई हिंसा या उत्पीड़न का विरोध किया था। उन्होंने सैनिकों को सख्त निर्देश दिये थे कि छापा मारते वक्त किसी भी महिला को नुकसान नही पहुचना चाहिए। यहा तक कि अगर कोई भी सेना में महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते वक्त पकड़ा गया तो गंभीर रूप से उसे दंडित किया जाएगा। उनकी खासियत थी की वह अपने राज्य के लिए बादमें लड़ते थे पहले भारत के लिए लड़ते थे। उनका लक्ष्य था नि: शुल्क राज्य की स्थापना करना और हमेशा से अपने सैनिकों को प्रेरित करना की वह भारत के लिए लड़े और विशेष रूप से किसी भी राजा के लिए नहीं। अतुलनीय, छत्रपति शिवाजी महाराज के विराट व्यक्तित्व, कृतित्व, अस्तित्व और उनके महान अवदान को भारत वर्ष कभी नहीं भूल पाएगा।
एक भारत-श्रेष्ठ भारत
स्तुत्य, 'हिंदवी स्वराज' के जनक छत्रपति शिवाजी महाराज ने हमेशा भारत की एकता और अखंडता को सर्वोपरि रखा। आज 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' की दृष्टि में शिवाजी महाराज के विचारों का ही प्रतिबिंब देखा जा सकता है। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी ने देशवासियों से उनका आत्मविश्वास छीन लिया था। ऐसे समय में लोगों में आत्मविश्वास जगाना एक कठिन कार्य था। उस दौर में छत्रपति शिवाजी महाराज ने ना केवल आक्रमणकारियों का मुकाबला किया बल्कि जन मानस में यह विश्वास भी कायम किया कि स्वयं का राज संभव है। फलीभूत स्वाधीनता के अमृत काल में राष्ट्रीय एकता- अखंडता, सांस्कृतिक, उत्कर्ष को लेकर शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र राष्ट्र निर्माण, पुनरुत्थान के लिए सदा-सर्वदा अनुकरणीय और कालजयी रहेगा। जय शिवाजी!
रेलवे ने पिछले हादसों से कोई सबक नहीं सीखा ?
नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में 18 लोगों की मौत ही बड़ी खबर नहीं है। बड़ी खबर यह भी है कि रेलवे ने पिछले हादसों से कोई सबक नहीं सीखा है। बड़ी खबर यह भी है कि लोग यह समझ चुके हैं कि रेलवे में सुधार की बातें सिर्फ खोखली हैं। बड़ी खबर यह भी है कि तमाम लोगों को इस बात का पक्का विश्वास हो चला है कि पर्वों-त्योहारों और छुटि्टयों के समय टिकट खरीदने से लेकर अपने गंतव्य तक पहुँचने तक रेल का सफर परेशान करेगा ही करेगा। बड़ी खबर यह भी है कि रेलवे स्टेशन पर या पटरी पर चलती ट्रेन के साथ कितनी बड़ी दुर्घटना हो जाये, रेल मंत्री कभी नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे। बड़ी खबर यह भी है कि दुर्घटना होने पर मुआवजे या जांच का ऐलान तुरंत ही करने वाले रेल मंत्री अपना इस्तीफा देना तो दूर कभी इस्तीफे की पेशकश तक नहीं करेंगे।
देखा जाये तो रेल मंत्री पद से अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा मांगा जा रहा है तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि बात सिर्फ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे की ही नहीं है। आप रेलवे को समग्र रूप में देखेंगे तो पाएंगे कि कोई बड़ा सुधार कर पाने में अश्विनी वैष्णव पूरी तरह विफल रहे हैं। अगर महाकुंभ की ही बात कर लें तो भले रेल मंत्री ने प्रयागराज के लिए हजारों ट्रेनें चलाने के दावे किये हों लेकिन आप देशभर में सर्वे करा लें तो पाएंगे कि प्रयागराज के लिए ज्यादातर लोगों को ट्रेनों में टिकट मिले ही नहीं और जिनको टिकट मिले उनका सफर आरामदायक नहीं रहा। यही नहीं, हैरानी की बात यह भी रही कि प्रयागराज के लिए रेलवे की वेबसाइट और ऐप पर भले टिकट नहीं थे लेकिन मेकमाई ट्रिप जैसी ट्रैवल साइटों पर 500 रुपए की अतिरिक्ति फीस देकर उसी तारीख के रेलवे टिकट उपलब्ध थे। हम 2047 तक भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन 2025 तक रेलवे को इतना भी आत्मनिर्भर नहीं बना पाये हैं कि उसकी ही वेबसाइट और ऐप पर सभी को कंफर्म टिकट मिल जायें। आज भी रेल यात्रियों को अपना टिकट कंफर्म कराने के लिए वीआईपी कोटा या रेलवे कोटा लगवाने के लिए नेताओं और अधिकारियों से मदद मांगनी पड़ती है जोकि शर्मनाक है।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना के जांच के आदेश तो दे दिये गये हैं लेकिन सवाल उठता है कि पहले की घटनाओं की जांच रिपोर्टों का क्या हुआ? पिछली घटनाओं के लिए कौन लोग दोषी ठहराये गये, उन्हें कौन-सी कड़ी सजा हुई? क्या इसका विवरण कभी रेल मंत्री देश के सामने रखने का साहस जुटाएंगे? देखा जाये तो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ की घटना का प्रमुख कारण था ऐन समय पर ट्रेनों के प्लेटफॉर्म का बदला जाना। यह ऐसी चूक है जिसकी वजह से पहले भी दुर्घटनाएं हुई हैं लेकिन रेलवे ने कभी सबक नहीं सीखा। जब रेलवे स्टेशन का प्रबंधन यह देख रहा था कि वहां भारी भीड़ उमड़ी हुई है तो प्लेटफॉर्म बदलने का फैसला टाल कर क्या घटना को रोका नहीं जा सकता था?
बात सिर्फ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की भी नहीं है। देश के तमाम शहरों से इस प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं कि प्रयागराज जाने वाली ट्रेनों में लोग भारी भीड़ की वजह से चढ़ नहीं पा रहे हैं। इस प्रकार के भी वीडियो वायरल हैं जिसमें देखा जा सकता है कि यात्री सिर्फ दरवाजों से ही नहीं बल्कि खिड़कियों से भी ट्रेन के भीतर जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तमाम वायरल वीडियो में भी देखा जा सकता है कि लोग ट्रेनों में नहीं चढ़ पाने को लेकर तोड़फोड़ तक कर रहे हैं। जनता की यह नाराजगी साफ दर्शाती है कि महाकुंभ जैसे बड़े आयोजन को लेकर रेलवे की ओर से पर्याप्त तैयारियां नहीं की गयी थीं।
यही नहीं, हमने दुनिया के सबसे ऊँचे पुल पर ट्रेन दौड़ाने का कीर्तिमान तो अपने नाम कर लिया लेकिन जमीन पर बिछी पटरियों पर दौड़ती ट्रेन की 100 प्रतिशत सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाये हैं। आये दिन होते रेल हादसे दर्शा रहे हैं कि संभवतः मंत्रीजी का पूरा ध्यान इस विभाग पर नहीं है। हाल के रेल हादसों में से अधिकांश के पीछे साजिश का एंगल सामने आया है। यदि ऐसा है तो यह भी सुरक्षा में एक बहुत बड़ी खामी है। यही नहीं, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना के दौरान कुली और प्लेटफॉर्म पर स्टॉल लगाने वाले ही यात्रियों के बचाव में उतरे। एक भी यात्री ने यह नहीं बताया कि रेलवे पुलिस ने किसी की मदद की हो या उसे बचाया हो। साथ ही, भगदड़ की घटना के तत्काल बाद जिस तरह प्रयागराज के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाईं गयीं वह दिखाता है कि रेलवे के पास अतिरिक्त ट्रेनों की व्यवस्था थी। इसलिए सवाल उठता है कि भीड़ को देखते हुए उन स्पेशल ट्रेनों को पहले क्यों नहीं चलाया गया? रेलवे ने गत शनिवार को प्रयागराज के लिए स्पेशल वंदे भारत ट्रेनें चलाने की घोषणा की थी लेकिन साधारण ट्रेनों को क्यों नहीं चलाया गया? क्या ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वंदे भारत जैसी महंगी ट्रेनों से रेलवे को ज्यादा आमदनी होती है और साधारण ट्रेनों को चलाने से ज्यादा लाभ नहीं होता? क्या रेलवे ने अब सिर्फ अपने लाभ के बारे में ही सोचना शुरू कर दिया है?
सवाल और भी कई हैं लेकिन उनके जवाब मिलने की संभावना कम ही है। वैसे यह भी एक तथ्य है कि भारतीय रेलवे भारी दबाव में है। रेलवे में सुधार की अत्यंत जरूरत है। रेलवे को ऐसे मंत्री की भी जरूरत है जिसके पास रेलवे के अलावा अन्य किसी मंत्रालय का कार्यभार नहीं हो ताकि वह रेलवे पर ही पूरी तरह से ध्यान दे पाये। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अश्विनी वैष्णव उच्च शिक्षित, अनुभवी और ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन आंकड़े दर्शाते हैं कि उनकी यह योग्यताएं रेलवे के काम नहीं आ पा रही हैं। अश्विनी वैष्णव अक्सर रेलवे की सुनहरी तस्वीर के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते रहते हैं जबकि हकीकत उससे काफी अलग होती है। यही नहीं, आज भले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन या देश के अन्य स्टेशनों पर सब कुछ व्यवस्थित दिखाई दे रहा हो लेकिन सवाल उठता है कि क्या ऐसी ही व्यवस्था जल्द ही आने वाली होली की छुटि्टयों और उसके बाद गर्मी की छुटि्टयों के दौरान भी दिखाई देगी?
बहरहाल, देखना होगा कि भारतीय रेलवे का भविष्य कैसा रहता है? वैसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बिखरे हुए जूते-चप्पलों, टूटी हुई चूड़ियों, कपड़ों, बैंगों के दृश्य और जिन 18 परिवारों में मौत हुई है उनके घर में पसरे मातम का दृश्य हर किसी के मन में सिहरन पैदा कर गये हैं।
कुंभ श्रद्धालुओं का नई दिल्ली स्टेशन पर हुआ हादसा
प्रचार का प्रभाव और पर्व विषेश में त्रिवेणी में डूबकी लगाने के उत्साह में मची भगदड़ में तीस लोगों के प्रयागराज के संगमत ट पर चले गए थे और अब नई दिल्ली रेलवे स्टेषन पर प्रयागराज विषेश रेल में बैठने की भगदड़ में 18 लोग मारे गए। इन दोनों हादसों में महिलाओं की संख्या अधिक रही है। ये घटनाएं इसलिए घटीं, क्योंकि सुविधाजनक यात्रा और प्रयागराज कुंभ में आस्था की डुबकी के आकर्शण ने देष ही नहीं दुनिया से सनातन हिंदुओं को बुला लिया। भारतीय ही नहीं अनेक पष्चिमी देषों के नागरिकों ने भी त्रिवेणी में डुबकी लगाकर आध्यात्मिक षांति का अनुभव किया। फलतः 50 करोड़ से भी ज्यादा लोग अब तक गंगा स्नान कर चुके है और करोड़ों इस आस में प्रयागराज की ओर बढ़ रहे हैं, कि उन्हें भी कुंभ में डुबकी का अवसर मिल जाए तो मोक्ष का मार्ग प्रषस्त हो जाए।
उत्तरप्रदेष सरकार ने अपनी क्षमता से अधिक आवागमन के साधनों से लेकर अनेक तकनीकी प्रबंध किए हैं। लेकिन भीड़ के आगे सभी प्रबंध कमजोर साबित हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही दुनिया के इस सबसे बड़े मेले में देखने में आ रहा है। बावजूद दिल्ली की घटना रेल प्रशासन की लापरवाही के संकेत देती है। जब दिल्ली से प्रयागराज जाने वाली रेलों के लिए 1 घंटे में 15 हजार टिकट बिक रहे थे, तब उसने रेलों की उपलब्धता से अधिक टिकट क्यों बेचे ? वे टिकट यात्रियों को प्लेटफार्म पर जाने ही क्यों दिया ? यदि रेल की क्षमता से अधिक यात्रियों को स्टेषन के भीतर नहीं घुसने दिया जाता तो षायद भगदड़ में निर्दोश श्रद्धालुओं को प्राण गंवाने नहीं पड़ते ? दरअसल हमारे यहां विभाग कोई सा भी हो, अंत में संपूर्ण जुम्मेबारी और जबावदेही तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों पर छोड़ दिया जाता है। जबकि ये खुद कोई निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते हैं। वस्तुतः आस्था के अनियंत्रित आवेग में अनहोनी घट जाती है। देश के प्रशासनिक अमले ने इसी कुंभ में त्रिवेणी संगम में घटी घटना से भी कोई सबक लेते हुए सावधानियां नहीं बरती ?
भारत में पिछले डेढ़ दषक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही ह्रै। जिसके चलते दर्षन-लाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाली भगदड़ व आगजनी का सिलसिला हर साल इस तरह के धार्मिक मेलों में देखने में आ रहा है। इसी प्रयाग के 2013 में संपन्न हुए कुंभ मेले में रेलवे स्टेषन पर बने पैदल पुल पर भगदड़ मचने से 42 लोगों की मौत हो गई थीं। 1954 में भी प्रयागराज के कुंभ में 3 फरवरी को मौनी अमावस्या पर भगदड़ मची और 800 लोग काल के गाल में समा गए। 1986 में हरिद्वार के कुंभ में वीआईपी दर्जे के लोगों को विषेश स्नान के लिए भीड़ रोक देने के कारण भगदड़ मची और 200 लोग मारे गए थे। 2003 के नासिक कुंभ में 39 और 2010 के हरिद्वार के कुंभ में षाही स्नान के दौरान भगदड़ मचने से 7 लोगों की मौतें हुई थीं। साफ है, प्रत्येक कुंभ में जानलेवा घटनाएं घटती रहने के बावजूद शासन-प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिए। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें। किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती, अतएव उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अक्सर देखने में नहीं आती ? लिहाजा आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेष बेकाबू ही नहीं हुए होते ? आयोजन को सफल बनाने में जुटे अधिकारी भीड़ के मनोविज्ञान का आकलन करने में चूकते दिखाई देते है।
इस कुंभ की तैयारियों के लिए कई हजार करोड़ की धनराषि खर्च की गई। जरूरत से ज्यादा प्रचार करके लोगों को कुंभ स्नान के लिए आमंत्रित किया गया। फलतः कौने-कौने से श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाने का मन बना लिया। नतीजा यह निकला कि जिसे जो आवागमन का साधन मिला प्रयागराज की ओर चल दिया। जनसैलाब इतनी बड़ी संख्या में उमड़ा कि परिवहन से लेकर प्रयाग में प्रबंधन के सभी साधन कम पड़ गए। करोड़ो की भीड़ को संभालने के लिए सात स्तरीय सुरक्षा प्रबंधों से लेकर जो भी आधुनिक तकनीकि उपाय किए गए थे, वे सब ध्वस्त हो गए। ऐसा मेले के विराट रूप में बदल जाने के कारण हुआ। वैसे भी हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विषेश पर्वों के अवसर पर एक साथ कई करोड़ लोग एक निष्चित समय के बीच स्नान करते हैं। ऐसे में भीड़ के अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि षासन-प्रषासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े और अनुभव होते हैं। बावजूद लापरवाही और बद्इंतनीजामी सामने आना चकित करती है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौषल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देषों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रषिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देष में किसी एक दिन और विशेष मुहूत्र्त के समय लाखों-करोडों़ की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जाती ? बावजूद हमारे नौकरषाह भीड़ प्रबंधन का प्रषिक्षण, लेने खासतौर से योरुपीय देषों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रषिक्षण विदेषी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देषज ज्ञान और अनुभव से लिखने होंगे। इस बार तो केवल प्रयागराज में ही नहीं उत्तरप्रदेष की सीमा में प्रवेष करने वाली सभी सड़कों पर कई-कई दिन जाम लगे रहे। नतीजतन सीमाई प्रांतों के प्रषासन को भी सजग रहना पड़ा।
प्रषासन के साथ हमारे राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी सितारे और आला अधिकारी भी धार्मिक लाभ लेने की होड़ में व्यवस्था को भंग करने का काम करते हैं। इनकी वीआईपी व्यवस्था और यज्ञकुण्ड अथवा मंदिरों में मूर्तिस्थल तक ही हर हाल में पहुंचने की रूढ़ मनोदषा, मौजूदा प्रबंधन को लाचार बनाने का काम करती है। नतीजतन भीड़ ठसाठस के हालात में आ जाती है। ऐसे में कोई महिला या बच्चा गिरकर अनजाने में भीड़ के पैरों तले रौंद दिया जाता है और भगदड़ मच जाती है। इस कुंभ में जहां केंद्रीय मंत्रीमंडल के मंत्री स्नान के लिए आते रहे, वहीं भाजपा षासित प्रदेष सरकारों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने भी वीआईपी घेरे में श्रद्धालुओं को परे करके डुबकी लगाई। बड़े व्यापारी घरानों ने भी परिवार सहित वीआईपी स्नान किए। कांग्रेस व अन्य दलों के दिग्गज नेता भी वीआईपी डुबकी लगा रहे हैं।
दरअसल दर्षन-लाभ और पूजापाठ जैसे अनुश्ठान अषक्त और अपंग मनुश्य की वैषाखी हैं। जब इंसान सत्य और ईष्वर की खोज करते-करते थक जाता है और किसी परिणाम पर भी नहीं पहुंचता है तो वह पूजापाठों के प्रतीक गढ़कर उसी को सत्य या ईष्वर मानने लगता है। यह मनुश्य की स्वाभाविक कमजोरी है। यथार्थवाद से पलायन अंधविष्वास की जड़ता उत्पन्न करता है। भारतीय समाज में यह कमजोरी बहुत व्यापक और दीर्घकालीक रही है। जब चिंतन मनन की धारा सूख जाती है तो सत्य की खोज मूर्ति पूजा और मुहूत्र्त की षुभ घड़ियों में सिमट जाती है। जब अध्ययन के बाद मौलिक चिंतन का मन-मस्तिश्क में हृास हो गया तो मानव समुदाय भजन-र्कीतन में लग गया। यही हश्र हमारे पथ-प्रदर्षकों का हो गया है। नतीजतन पिछले कुछ समय से सबसे ज्यादा मौतें भगदड़ की घटनाओं और सड़क दुर्घटनाओं में उन श्रद्धालुओं की हो रही हैं, जो ईष्वर से खुषहाल जीवन की प्रार्थना करने धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं।
भीड़ बढ़ाने में सोषल मीडिया की भूमिका
धार्मिक स्थलों पर भीड़ बढ़ाने का काम सोषल मीडिया भी कर रहा है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ सोषल मीडिया भी टीआरपी के लालच में अहम् भूमिका निभाता नजर आ रहा है। इस कुंभ में हम देख रहे है कि नीली आंखों वाली लड़की और आईआईटिअन साधु के वीडियो एक तमाषे के रूप में कहीं ज्यादा दिखाए और देखे गए है। जबकि षंकराचार्यों से धर्म और आस्था के गूढ़ रहस्यों को ज्ञात करने की जरूरत थी ? परंतु हमारे यहां प्रत्येक छोटे बड़े मंदिर के दर्षन को चमात्कारिक लाभ से जोड़कर देष के भोले-भाले भक्तगणों से एक तरह का छल मीडिया कर रहा है। इस मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद धर्म के क्षेत्र में कर्मकांड और पाखण्ड का आडंबर जितना बड़ा है, उतना पहले कभी देखने में नहीं आया। इसकी पृश्ठभूमि में बाजारवाद की भूमिका भी रहती है। हालांकि यही मीडिया पाखंड के सार्वजनिक खुलासे के बाद मूर्तिभंजक की भूमिका में भी खड़ा हो जाता है।
मीडिया का यही नाट्य रूपांतरण अलौकिक कलावाद, धार्मिक आस्था के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविष्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईष्वरीय अथवा भाग्य आधारित अवधारणा को भाग्य का प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। दरअसल मीडिया, राजनेता और बुद्धिजीवियों का काम लोगों को जागरूक बनाने का है, लेकिन निजी लाभ का लालची मीडिया, लोगों को धर्मभीरू बना रहा है। राजनेता और धर्म की आंतरिक आध्यात्मिकता से अज्ञान बुद्धिजीवी भी धर्म के छद्म का शिकार होते दिखाई देते हैं। यही वजह है कि पिछले दो दशक के भीतर मंदिर हादसों में लगभग 5000 से भी ज्यादा भक्त मारे जा चुके हैं। बावजूद श्रद्धालु हैं कि दर्शन, आस्था, पूजा और भक्ति से यह अर्थ निकालने में लगे हैं कि इनको संपन्न करने से इस जन्म में किए पाप धुल जाएंगे, मोक्ष मिल जाएगा और परलोक भी सुधर जाएगा। गोया, पुनर्जन्म हुआ भी तो श्रेष्ठ वर्ण में होने के साथ आर्थिक रूप से समृद्ध व वैभवशाली होगा। परंतु इस तरह के खोखले दावों का दांव हर मेले में ताश के पत्तों की तरह बिखरता दिखाई दे रहा है। जाहिर है, धार्मिक दुर्घटनाओं से छुटकारा पाने की कोई उम्मीद निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रही है ?
क्या अब विपक्षी एकता कायम रहेगी?
राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इसलिए ही तो राजनीति को अनिश्चितता का खेल कहा जा सकता है। लेकिन ज़ब राजनेता और राजनीतिक दल इस धारणा को तिलांजलि देते दिखाई देते हैं, तो उस अवस्था को अति आत्म विश्वास के भाव में व्यक्त किया जाता है। अति आत्मविश्वास का होना सदैव विनाशकारी और आत्म घातक माना जाता है। ऐसा ही दुखद अध्याय दिल्ली विधानसभा के चुनाव में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के नेताओं का व्यवहार निश्चित ही ऐसा होता जा रहा था, जो अति विश्वास को ही परिलक्षित करने वाला ही था। हालांकि किसी किसी भी चुनाव के दो पहलू होते हैं। किसी भी चुनाव क्षेत्र में केवल एक ही व्यक्ति विजय प्राप्त करता है, शेष सभी पराजित ही होते हैं। पराजय निश्चित रूप से गलती सुधारने का अवसर प्रदान करती है। आम आदमी पार्टी इस पराजय को अपनी भूल सुधार के लिए स्वीकार करेगी, यह होना चाहिए, लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता ऐसा करने की मानसिकता में दिखाई नहीं देते। इसका कारण यही है कि उनमें राजनीतिक दल की सरकार को चलाने का अनुभव नहीं है। आम आदमी पार्टी के नेताओं का अभी भी यह मानना है कि उनकी पार्टी मात्र दो प्रतिशत के अंतर से हारी है, लेकिन उनको पता होना चाहिए कि एक प्रतिशत का अंतर भी राजनीति का दृश्य बदल सकता है। इसलिए यही कहा जा सकता है कि हार तो हार होती है, उसके तर्क का सहारा लेकर मन को दिलासा दी जा सकती है, जीत नहीं मानी जा सकती।
वैसे विपक्ष को इसकी आदत सी हो गई है कि वह हार को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता। पिछले लोकसभा के चुनाव परिणाम आने के बाद भी ऐसी ही तस्वीर दिखाने का प्रयास किया गया कि विपक्ष ने मानो सरकार बनाने लायक़ जीत हासिल कर ली हो, लेकिन तस्वीर का असली चेहरा कुछ और ही था।
वर्तमान राजनीतिक उतार चढ़ाव का अध्ययन किया जाए तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए एक होने की क़वायद कर चुके हैं, लेकिन यह क़वायद परवान नहीं प्राप्त कर सकी। लोकसभा चुनाव के समय इंडी गठबंधन बनाकर तमाम भाजपा विरोधी दलों ने कई राज्यों में एकता का दिखावा किया। लेकिन कई राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय इंडी गठबंधन के दल एक साथ न होकर बिखरे हुए दिखाई दिए। अब आगे चलकर एकता के प्रयास किए तो जाएंगे, लेकिन वे एक साथ हो जाएंगे, इस बात की संभावना बहुत कम दिखाई देती है। सीधे अर्थों में कहा जाए तो विपक्षी एकता को कई बार झटके लग चुके हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार विपक्ष की एकता के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। कांग्रेस ने जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर करने का सुनियोजित षड्यंत्र किया, वह चुनाव परिणाम आने के बाद पूरी तरह से सामने आ गया। ऐसी स्थिति में अब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक मंच पर आएंगे, इस बात की संभावना बहुत कम ही है। हालांकि कांग्रेस की ओर अपनाई गई यह रणनीति कोई नई बात नहीं है। कई दलों को ऐसा झटका मिल चुका है, स्वयं आम आदमी पार्टी ने हरियाणा में ऐसा ही राजनीतिक खेल खेलकर कांग्रेस को सत्ता में आने से रोक दिया था।
जहां तक विपक्षी एकता की बात है तो इसकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम खुद इंडी गठबंधन या भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों ने किया है। कई राज्यों में एक दूसरे के विरोध में ताल ठोकने वाले यह दिखावे की एकता वाले राजनीतिक दल आगे भी ऐसी ही नीति का अनुसरण करेंगे, इस बात की गुंजाईश ज्यादा दिखाई देती है। क्योंकि गठबंधन में शामिल होने का दावा करने वाले राजनीतिक दल किसी भी दल से पीछे रहने की मानसिकता में दिखाई नहीं देते। कांग्रेस भी इसी मानसिकता से ग्रसित दिखाई देती है। राज्यों तक प्रभाव रखने वाले क्षेत्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस को बेहद कमजोर मानकर व्यवहार कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार कांग्रेस को आईना दिखाते हुए व्यवहार किया है। ऐसी स्थिति में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और ममता बनर्जी की पार्टी एक साथ आकर पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे, दूर की बात दिखती है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भी कांग्रेस को ज़मीन दिखाने के प्रयास में खुद के लिए आत्म घाती रास्ता तैयार किया। यह बात सही है कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल अपने आपको कांग्रेस से बड़ा मानने लगे थे, इसलिए ही कांग्रेस से किनारा करके चुनाव मैदान में कूद गए, और पहली बार सत्ता से दूर हो गए। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए राजनेताओं को बड़े बोल बोलने से हमेशा बचना चाहिए। लेकिन अरविंद केजरीवाल यहां पर चूक गए। उन्होंने जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, वह उनके अहंकार का ही परिचायक कहा जा सकता है। अब केजरीवाल को स्वयं समझ जाना चाहिए कि व्यवहार ऐसा होना चाहिए, जो प्रिय लगे।
कहा जाता है कि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के उभार ने कांग्रेस का बंटाधार करने का ही काम किया है। कहीं कहीं यह भी सत्य है कि कांग्रेस के अप्रिय व्यवहार के चलते ही इन क्षेत्रीय दलों का गठन हुआ। इसलिए यह क्षेत्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस के साथ मिलकर आसानी से चुनाव लड़ेंगे, यह उचित प्रतीत नहीं होता। कई राज्यों में यह भी दिखाई दिया कि जिन क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस ने समझौता किया, उन राज्यों में कांग्रेस तो डूबी ही, साथ में साथ आने वाले दलों को भी डुबा दिया। कहीं कहीं कांग्रेस को डूबता हुआ जहाज तक कहा गया। आज कांग्रेस की मजबूरी यह है कि उसे तिनके की जरूरत है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति में जो मामूली सुधार हुआ, उसका कारण क्षेत्रीय दलों का सहयोग ही था। उत्तरप्रदेश में अगर समाज़वादी पार्टी का साथ नहीं होता तो कांग्रेस आज की स्थिति में भी नहीं होती।
दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम आम आदमी पार्टी के विजयी रथ को रोकने वाला ही साबित हुआ। यह कहीं न कहीं विपक्षी एकता के सपने को चूर चूर करने वाला भी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब विपक्षी एकता कायम रह पाएगी।
युद्ध के प्रति भारतीय तटस्थता नहीं, बल्कि शांतिपरक पक्षधरता को ऐसे समझिए
इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध के दौरान भी भारत का कुल मिलाकर यही नजरिया रहा है। चाहे चीन-ताइवान युद्ध की अटकलें हों या ईरान-इजरायल युद्ध की संभावनाएं, अफगानिस्तान सरकार का तालिबान के हाथों पतन हो या तुर्की के इशारे पर सीरिया की सरकार का पतन, भारत ने कभी हस्तक्षेप नहीं किया।
चाहे 'वैश्विक युद्ध' की संभावना की बात हो या विभिन्न देशों के बीच ब्रेक के बाद जारी 'द्विपक्षीय युद्ध' की, भारत ने साफ कर दिया है कि वह ऐसे किसी भी मामले में तटस्थ नहीं, बल्कि शांति का पक्षधर है। बता दें कि अपनी हालिया अमेरिकी यात्रा (12-13 फरवरी 2025) के क्रम में भारत के पीएम नरेंद्र मोदी ने एक सवाल का जवाब देते हुए यह साफ कर दिया है कि "रूस-यूक्रेन जंग पर भारत न्यूट्रल यानी तटस्थ नहीं है। भारत शांति का पक्षधर है।" इसलिए दुनियादारी के निष्णात लोग 'ह' से 'हलंत' तक की अटकलें लगा रहे हैं और उनके इस वक्तव्य के अंतर्राष्ट्रीय मायने निकाले जा रहे हैं।
ऐसा इसलिए कि इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध के दौरान भी भारत का कुल मिलाकर यही नजरिया रहा है। चाहे चीन-ताइवान युद्ध की अटकलें हों या ईरान-इजरायल युद्ध की संभावनाएं, अफगानिस्तान सरकार का तालिबान के हाथों पतन हो या तुर्की के इशारे पर सीरिया की सरकार का पतन, भारत ने कभी हस्तक्षेप नहीं किया। वह हमेशा यही कहता रहा कि हम वसुधैव कुटुंबकम के पक्षधर हैं। पीएम मोदी भी लगातार कहते रहे हैं कि यह युद्ध नहीं, बुद्ध का समय है। जी हां, भगवान बुद्ध!
वैसे दुनिया को यह भी पता है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे अमन-चैन के दुश्मनों से घिरा भारत यदि उनकी बड़ी-बड़ी कायराना व हिन्दू/भारत विरोधी हरकतों को नजरअंदाज करते हुए सीधी कार्रवाई से यदि बचता आया है तो सिर्फ इसलिए कि वह युद्ध नहीं बल्कि शांति चाहता है। इन देशों का जन्म भी क्रमशः भारत और पाकिस्तान के विभाजन से हुआ है। पाकिस्तान ने आजादी हासिल करते ही कश्मीर के सवाल पर भारत से छद्म लड़ाई छेड़ दी। उसके बाद 1965 और 72 में सीधी लड़ाई लड़कर बुरी तरह से मात खाया। 1999 में भी उसने कारगिल में छद्म युद्ध छेड़ा और बुरी तरह से पीटा। उसके इशारे पर थिरकने वाले बंगलादेश की भी कुछ ऐसी ही नियति है।
उधर, 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध लड़ चुका चीन इन दोनों देशों को प्रोत्साहन देता आया है। हालांकि, आजादी के बाद पाकिस्तान की और पाकिस्तान से आजादी हासिल करने के दौरान बंगलादेश की भारत ने दिल खोलकर मदद की, लेकिन दोनों देश भारत से सांप्रदायिक नफरत रखते हैं, इस वास्ते किसी भी हद तक गुजर जाने के लिए ततपर रहते हैं और विदेशी ताकतों की हाथों में खेलते रहते हैं। भारत इसे बखूबी समझता है। वह इन दोनों देशों में निरंतर ब्रेक के बाद जारी हिंदुओं के दमन-उत्पीड़न और हत्याओं के बावजूद इन्हें क्षमा करता आया है, ताकि इनकी सांप्रदायिक फितरत बदलते।
इतना ही नहीं, नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव आदि जैसे मौकापरस्त पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रमों पर जब आप गौर करेंगे तो भारतीय धैर्य की दाद आपको देनी पड़ेगी। यदि उनके हितों का सवाल नहीं हो तो भारत ने कभी सैन्य हस्तक्षेप इन देशों के खिलाफ नहीं किया। वहीं, दुनियावी मंचों पर अमेरिका, सोवियत संघ (अब रूस), चीन आदि के मामलों में भी न तो किसी का पक्ष लिया, न किसी का विरोध किया। इन बातों का सीधा संदेश है कि जो शांति का दुश्मन है, वो भारत का दुश्मन है।
इस नजरिए से यदि देखा जाए तो 'आतंकवाद' और उसको प्रोत्साहित करने वाले 'देश' या उनका गुट भी भारत के दुश्मन हैं। पूरी दुनिया में हथियारों की होड़ पैदा करके एक दूसरे पर कोहराम मचाने वाले देश या उनके संरक्षक भी भारत के दुश्मन हैं।.....और शायद इसलिए भी भारत हथियारों की होड़ में शामिल हो चुका है, क्योंकि लोहा को लोहा ही काटता है। भारत का बढ़ता रक्षा कारोबार भी उसके इसी नजरिए का द्योतक है।
सीधा सवाल है कि समकालीन विश्व में शांति का दुश्मन कौन है? तो सीधा जवाब होगा कि ट्रंफ के नेतृत्व में अमेरिका भले ही 'चंद्रायण व्रत' करने का संकेत लगातार दे रहा है, लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के लिए कहीं न कहीं उसकी नीतियां ही जिम्मेदार रही हैं। हालांकि, भारत से मित्रता के चलते अब उसका भी स्वभाव बदल रहा है।जबकि चीन ऐसा करने को राजी नहीं है। अपने साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा वश चीन अभी जो दुनियावी तिकड़म बैठा रहा है, देर-सबेर उस पर ही भारी पड़ेंगी, क्योंकि भारत की नीतियां ही ऐसी परिपक्व हैं।
वहीं, यह भी कड़वा सच है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस ने अब तक जो कुछ भी किया है, वह अमेरिकी रणनीतियों से अपने बचाव में किया है या फिर उसे संतुलित रखने के लिए किया है। जबकि चीन जो कुछ भी कर रहा है, वह उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा है। यह भी अजीबोगरीब है कि दुनिया को आतंकवाद और आतंकवादियों का निर्यातक देश पाकिस्तान (अब बंगलादेश भी) अब अमेरिका की बजाय चीनी गोद में खेल रहा है।
यदि आप अमेरिका, रूस, चीन की बात छोड़ दें तो जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, इजरायल, जर्मनी, ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, ईरान, तुर्की जैसे दूसरी पंक्ति के बहुत सारे देश हैं, जो अपनी अपनी सुविधा के अनुसार नाटो या सीटो में शामिल होते रहे। लेकिन भारत हमेशा ही गुटनिरपेक्ष रहा और गुटनिरपेक्षता की नीति को बढ़ावा दिया। यह गुटनिरपेक्षता की नीति ही शांति की गारंटी है।
दुनिया प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के संतापों को झेल चुकी है। लेकिन तीसरा विश्वयुद्ध यदि दस्तक देते देते सहम जाता है तो उसके पीछे भारत के नेतृत्व में लामबंद तीसरी दुनिया के देश ही हैं, जो किसी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के समक्ष घुटने टेकने को तैयार नहीं हैं, बल्कि शांति का पैगाम देते आए हैं। जी-7, जी-20 आदि में भारत की बढ़ती भूमिका इसी बात की परिचायक है। यदि भारत ने चीनी नेतृत्व वाले 'ब्रिक्स' की सदस्यता ली है तो उसके पीछे भी पुनीत भावना यही है। वहीं, अमेरिकी नेतृत्व वाले 'क्वाड' में भारत की मौजूदगी दुनियावी शांति से ही अभिप्रेरित है।
इसलिए दुनिया के युद्धोन्मत देशों को यह समझ लेना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय जरूरतों वश भारत उनका मित्र देश भले ही है, लेकिन उनके यौद्धिक मिजाजों का सम्बर्द्धक बनने में उसकी कोई भी दिलचस्पी नहीं है। चाहे अमेरिका हो या रूस, दोनों देशों पर यह बात लागू होती है। भारत हिंसा की दृष्टि से अभिशप्त दुनिया को 'बुद्धम शरणम गच्छामि', वसुधैव कुटुंबकम एवं सत्य-अहिंसा का संदेश देना चाहता है और इसी दिशा में मजबूती पूर्वक वह अग्रसर है।
कुंभ श्रद्धालुओं का नई दिल्ली स्टेशन पर हुआ हादसा
प्रचार का प्रभाव और पर्व विषेश में त्रिवेणी में डूबकी लगाने के उत्साह में मची भगदड़ में तीस लोगों के प्रयागराज के संगमत ट पर चले गए थे और अब नई दिल्ली रेलवे स्टेषन पर प्रयागराज विषेश रेल में बैठने की भगदड़ में 18 लोग मारे गए। इन दोनों हादसों में महिलाओं की संख्या अधिक रही है। ये घटनाएं इसलिए घटीं, क्योंकि सुविधाजनक यात्रा और प्रयागराज कुंभ में आस्था की डुबकी के आकर्शण ने देष ही नहीं दुनिया से सनातन हिंदुओं को बुला लिया। भारतीय ही नहीं अनेक पष्चिमी देषों के नागरिकों ने भी त्रिवेणी में डुबकी लगाकर आध्यात्मिक षांति का अनुभव किया। फलतः 50 करोड़ से भी ज्यादा लोग अब तक गंगा स्नान कर चुके है और करोड़ों इस आस में प्रयागराज की ओर बढ़ रहे हैं, कि उन्हें भी कुंभ में डुबकी का अवसर मिल जाए तो मोक्ष का मार्ग प्रषस्त हो जाए।
उत्तरप्रदेष सरकार ने अपनी क्षमता से अधिक आवागमन के साधनों से लेकर अनेक तकनीकी प्रबंध किए हैं। लेकिन भीड़ के आगे सभी प्रबंध कमजोर साबित हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही दुनिया के इस सबसे बड़े मेले में देखने में आ रहा है। बावजूद दिल्ली की घटना रेल प्रशासन की लापरवाही के संकेत देती है। जब दिल्ली से प्रयागराज जाने वाली रेलों के लिए 1 घंटे में 15 हजार टिकट बिक रहे थे, तब उसने रेलों की उपलब्धता से अधिक टिकट क्यों बेचे ? वे टिकट यात्रियों को प्लेटफार्म पर जाने ही क्यों दिया ? यदि रेल की क्षमता से अधिक यात्रियों को स्टेषन के भीतर नहीं घुसने दिया जाता तो षायद भगदड़ में निर्दोश श्रद्धालुओं को प्राण गंवाने नहीं पड़ते ? दरअसल हमारे यहां विभाग कोई सा भी हो, अंत में संपूर्ण जुम्मेबारी और जबावदेही तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों पर छोड़ दिया जाता है। जबकि ये खुद कोई निर्णय लेने में सक्षम नहीं होते हैं। वस्तुतः आस्था के अनियंत्रित आवेग में अनहोनी घट जाती है। देश के प्रशासनिक अमले ने इसी कुंभ में त्रिवेणी संगम में घटी घटना से भी कोई सबक लेते हुए सावधानियां नहीं बरती ?
भारत में पिछले डेढ़ दषक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही ह्रै। जिसके चलते दर्षन-लाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाली भगदड़ व आगजनी का सिलसिला हर साल इस तरह के धार्मिक मेलों में देखने में आ रहा है। इसी प्रयाग के 2013 में संपन्न हुए कुंभ मेले में रेलवे स्टेषन पर बने पैदल पुल पर भगदड़ मचने से 42 लोगों की मौत हो गई थीं। 1954 में भी प्रयागराज के कुंभ में 3 फरवरी को मौनी अमावस्या पर भगदड़ मची और 800 लोग काल के गाल में समा गए। 1986 में हरिद्वार के कुंभ में वीआईपी दर्जे के लोगों को विषेश स्नान के लिए भीड़ रोक देने के कारण भगदड़ मची और 200 लोग मारे गए थे। 2003 के नासिक कुंभ में 39 और 2010 के हरिद्वार के कुंभ में षाही स्नान के दौरान भगदड़ मचने से 7 लोगों की मौतें हुई थीं। साफ है, प्रत्येक कुंभ में जानलेवा घटनाएं घटती रहने के बावजूद शासन-प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिए। धर्म स्थल हमें इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें। किंतु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती, अतएव उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अक्सर देखने में नहीं आती ? लिहाजा आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेष बेकाबू ही नहीं हुए होते ? आयोजन को सफल बनाने में जुटे अधिकारी भीड़ के मनोविज्ञान का आकलन करने में चूकते दिखाई देते है।
इस कुंभ की तैयारियों के लिए कई हजार करोड़ की धनराषि खर्च की गई। जरूरत से ज्यादा प्रचार करके लोगों को कुंभ स्नान के लिए आमंत्रित किया गया। फलतः कौने-कौने से श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाने का मन बना लिया। नतीजा यह निकला कि जिसे जो आवागमन का साधन मिला प्रयागराज की ओर चल दिया। जनसैलाब इतनी बड़ी संख्या में उमड़ा कि परिवहन से लेकर प्रयाग में प्रबंधन के सभी साधन कम पड़ गए। करोड़ो की भीड़ को संभालने के लिए सात स्तरीय सुरक्षा प्रबंधों से लेकर जो भी आधुनिक तकनीकि उपाय किए गए थे, वे सब ध्वस्त हो गए। ऐसा मेले के विराट रूप में बदल जाने के कारण हुआ। वैसे भी हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रुप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विषेश पर्वों के अवसर पर एक साथ कई करोड़ लोग एक निष्चित समय के बीच स्नान करते हैं। ऐसे में भीड़ के अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि षासन-प्रषासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े और अनुभव होते हैं। बावजूद लापरवाही और बद्इंतनीजामी सामने आना चकित करती है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुंचती है और उसके प्रबंधन के लिए जिस प्रबंध कौषल की जरुरत होती है, उसकी दूसरे देषों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते ? इसलिए हमारे यहां लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रषिक्षण से नहीं ले सकते ? क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देष में किसी एक दिन और विशेष मुहूत्र्त के समय लाखों-करोडों़ की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जाती ? बावजूद हमारे नौकरषाह भीड़ प्रबंधन का प्रषिक्षण, लेने खासतौर से योरुपीय देषों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रषिक्षण विदेषी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देषज ज्ञान और अनुभव से लिखने होंगे। इस बार तो केवल प्रयागराज में ही नहीं उत्तरप्रदेष की सीमा में प्रवेष करने वाली सभी सड़कों पर कई-कई दिन जाम लगे रहे। नतीजतन सीमाई प्रांतों के प्रषासन को भी सजग रहना पड़ा।
प्रषासन के साथ हमारे राजनेता, उद्योगपति, फिल्मी सितारे और आला अधिकारी भी धार्मिक लाभ लेने की होड़ में व्यवस्था को भंग करने का काम करते हैं। इनकी वीआईपी व्यवस्था और यज्ञकुण्ड अथवा मंदिरों में मूर्तिस्थल तक ही हर हाल में पहुंचने की रूढ़ मनोदषा, मौजूदा प्रबंधन को लाचार बनाने का काम करती है। नतीजतन भीड़ ठसाठस के हालात में आ जाती है। ऐसे में कोई महिला या बच्चा गिरकर अनजाने में भीड़ के पैरों तले रौंद दिया जाता है और भगदड़ मच जाती है। इस कुंभ में जहां केंद्रीय मंत्रीमंडल के मंत्री स्नान के लिए आते रहे, वहीं भाजपा षासित प्रदेष सरकारों के मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने भी वीआईपी घेरे में श्रद्धालुओं को परे करके डुबकी लगाई। बड़े व्यापारी घरानों ने भी परिवार सहित वीआईपी स्नान किए। कांग्रेस व अन्य दलों के दिग्गज नेता भी वीआईपी डुबकी लगा रहे हैं।
दरअसल दर्षन-लाभ और पूजापाठ जैसे अनुश्ठान अषक्त और अपंग मनुश्य की वैषाखी हैं। जब इंसान सत्य और ईष्वर की खोज करते-करते थक जाता है और किसी परिणाम पर भी नहीं पहुंचता है तो वह पूजापाठों के प्रतीक गढ़कर उसी को सत्य या ईष्वर मानने लगता है। यह मनुश्य की स्वाभाविक कमजोरी है। यथार्थवाद से पलायन अंधविष्वास की जड़ता उत्पन्न करता है। भारतीय समाज में यह कमजोरी बहुत व्यापक और दीर्घकालीक रही है। जब चिंतन मनन की धारा सूख जाती है तो सत्य की खोज मूर्ति पूजा और मुहूत्र्त की षुभ घड़ियों में सिमट जाती है। जब अध्ययन के बाद मौलिक चिंतन का मन-मस्तिश्क में हृास हो गया तो मानव समुदाय भजन-र्कीतन में लग गया। यही हश्र हमारे पथ-प्रदर्षकों का हो गया है। नतीजतन पिछले कुछ समय से सबसे ज्यादा मौतें भगदड़ की घटनाओं और सड़क दुर्घटनाओं में उन श्रद्धालुओं की हो रही हैं, जो ईष्वर से खुषहाल जीवन की प्रार्थना करने धार्मिक यात्राओं पर जाते हैं।
भीड़ बढ़ाने में सोषल मीडिया की भूमिका
धार्मिक स्थलों पर भीड़ बढ़ाने का काम सोषल मीडिया भी कर रहा है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के साथ सोषल मीडिया भी टीआरपी के लालच में अहम् भूमिका निभाता नजर आ रहा है। इस कुंभ में हम देख रहे है कि नीली आंखों वाली लड़की और आईआईटिअन साधु के वीडियो एक तमाषे के रूप में कहीं ज्यादा दिखाए और देखे गए है। जबकि षंकराचार्यों से धर्म और आस्था के गूढ़ रहस्यों को ज्ञात करने की जरूरत थी ? परंतु हमारे यहां प्रत्येक छोटे बड़े मंदिर के दर्षन को चमात्कारिक लाभ से जोड़कर देष के भोले-भाले भक्तगणों से एक तरह का छल मीडिया कर रहा है। इस मीडिया के अस्तित्व में आने के बाद धर्म के क्षेत्र में कर्मकांड और पाखण्ड का आडंबर जितना बड़ा है, उतना पहले कभी देखने में नहीं आया। इसकी पृश्ठभूमि में बाजारवाद की भूमिका भी रहती है। हालांकि यही मीडिया पाखंड के सार्वजनिक खुलासे के बाद मूर्तिभंजक की भूमिका में भी खड़ा हो जाता है।
मीडिया का यही नाट्य रूपांतरण अलौकिक कलावाद, धार्मिक आस्था के बहाने व्यक्ति को निष्क्रिय व अंधविष्वासी बनाता है। यही भावना मानवीय मसलों को यथास्थिति में बनाए रखने का काम करती है और हम ईष्वरीय अथवा भाग्य आधारित अवधारणा को भाग्य का प्रतिफल व नियति का कारक मानने लग जाते हैं। दरअसल मीडिया, राजनेता और बुद्धिजीवियों का काम लोगों को जागरूक बनाने का है, लेकिन निजी लाभ का लालची मीडिया, लोगों को धर्मभीरू बना रहा है। राजनेता और धर्म की आंतरिक आध्यात्मिकता से अज्ञान बुद्धिजीवी भी धर्म के छद्म का शिकार होते दिखाई देते हैं। यही वजह है कि पिछले दो दशक के भीतर मंदिर हादसों में लगभग 5000 से भी ज्यादा भक्त मारे जा चुके हैं। बावजूद श्रद्धालु हैं कि दर्शन, आस्था, पूजा और भक्ति से यह अर्थ निकालने में लगे हैं कि इनको संपन्न करने से इस जन्म में किए पाप धुल जाएंगे, मोक्ष मिल जाएगा और परलोक भी सुधर जाएगा। गोया, पुनर्जन्म हुआ भी तो श्रेष्ठ वर्ण में होने के साथ आर्थिक रूप से समृद्ध व वैभवशाली होगा। परंतु इस तरह के खोखले दावों का दांव हर मेले में ताश के पत्तों की तरह बिखरता दिखाई दे रहा है। जाहिर है, धार्मिक दुर्घटनाओं से छुटकारा पाने की कोई उम्मीद निकट भविष्य में दिखाई नहीं दे रही है ?
रात में 2 लौंग खाने से सेहत को मिलते हैं ये फायदे
सर्दी-खांसी सहित कई गंभीर समस्याओं की होगी छुट्टी
दिखने में छोटा सा लौंग कई आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो कई बीमारियों के इलाज में मदद कर सकते हैं। आयुर्वेद में भी लौंग को सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना गया है। औषधिय गुणों से भरपूर इस मसाले का सेवन नियमित रूप से किया जाए तो कई गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल गुणों के अलावा विटामिन ई, विटामिन सी, फोलेट, राइबोफ्लेविन, विटामिन ए, थायमिन और विटामिन डी, ओमेगा 3 फैटी एसिड जैसे आवश्यक तत्व पाए जाते हैं जो सेहत का बेहतरीन ख्याल रखते हैं ।
रात के समय लौंग का सेवन करने से पेट संबंधी समस्या जैसे कब्ज, एसिडिटी, गैस में आराम मिलता है और पाचन तंत्र भी ठीक ढंग से काम करता है। अगर दांतों में कीड़े लगे हैं और मुंह से बदबू आती है तो लौंग फायदेमंद है। रात को सोने से पहले 2 लौंग चबाकर सोएं। इससे केविटी से छुटकार मिलेगा और दातों का दर्द भी खत्म होगा। जी मिचला रहा हो तो आप लौंग के फायदे लें। 2 लौंग को पानी के साथ पीसकर थोड़ा गर्म कर लें। इसे थोड़ा-थोड़ा पिलाने से जी मिचलाने और अत्यधित प्यास लगने की समस्या ठीक होती है। लौंग के फायदे आप गठिया जैसी बीमारी में भी ले सकते हैं। लौंग के तेल गठिया वाले स्थान पर लगाएं। सिरदर्द की समस्या है तो छुटकारा पाने के लिए रात को सोने से पहले 2 लौंग चबाकर सो जाएं। अगर सर्दी खाँसी की समस्या ज़्यादा होती है तो रोज़ाना रात को सोने से पहले 2 लौंग का सेवन करें। अगर इम्यूनिटी कमजोर है तो रोजाना लौंग का सेवन शुरू कर दें। वायरल इंफेक्शन, ब्रोंकाइटिस, साइनस, अस्थमा आदि की समस्या से निजात पाने के लिए आप लौंग का रोजाना सेवन करे।
कैसे करें लौंग का सेवन?
रात को सोने से पहले मुंह अच्छी तरह से साफ़ करें और 2 लौंग को चबाकर 1 गिलास गुनगुना पानी पी लें। आप चाहें तो गुनगुने पानी में 2 लौंग का पाउडर मिलाएं और उसे पी जाएं।
सर्दियों में किशमिश को भूनकर खाएं
किशमिश में पाए जाने वाले तमाम पोषक तत्व आपकी सेहत को काफी हद तक सुधार सकते हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स अक्सर सर्दियों में इस ड्राई फ्रूट का सेवन करने की सलाह देते हैं। क्या आप जानते हैं कि आप किशमिश को भूनकर भी अपने डेली डाइट प्लान में शामिल कर सकते हैं? भुनी हुई किशमिश को सही मात्रा में कंज्यूम करके आपको सेहत से जुड़ी कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।
हड्डियों को बनाए मजबूत
भुनी हुई किशमिश आपकी बोन हेल्थ के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है। कैल्शियम रिच भुनी हुई किशमिश आपकी जोड़ों के दर्द की समस्या को दूर करने में कारगर साबित हो सकती है। इसके अलावा भुनी हुई किशमिश में आयरन की अच्छी खासी मात्रा पाई जाती है, जो आपके शरीर में पैदा हुई खून की कमी को दूर कर सकती है।
बूस्ट करे इम्यून सिस्टम
एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन सी रिच भुनी हुई किशमिश आपके इम्यून सिस्टम को काफी हद तक बूस्ट कर सकती है। सर्दियों में बार-बार बीमार पड़ने से बचने के लिए हर रोज भुनी हुई किशमिश को कंज्यूम करना शुरू कर दीजिए। सर्दियों में अक्सर लोगों को थकान, कमजोरी और सुस्ती महसूस होती है। भुनी हुई किशमिश खाकर आप दिन भर एनर्जेटिक महसूस कर पाएंगे।
शरीर में बनी रहेगी गर्माहट
किशमिश में पाए जाने वाले तत्व आपकी बॉडी के अंदर गर्माहट बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इसके अलावा अपनी गट हेल्थ को इम्प्रूव कर पेट से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए भी आप भुनी हुई किशमिश का सेवन कर सकते हैं। भुनी हुई किशमिश खाकर आप अपनी बॉडी के मेटाबॉलिज्म को भी बूस्ट कर सकते हैं। बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए सुबह-सुबह किशमिश को भूनकर खाया जा सकता है।
भारत एआई क्रांति में अग्रणी बन दुनिया का नेतृत्व करें
पेरिस में हुए दो दिवसीय एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) एक्शन समिट ने जहां दुनिया के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के महत्व को उजागर किया, वहीं यह भी साफ कर दिया कि इस मामले में होड़ के बावजूद सभी देशों का आपसी तालमेल बनाए रखते हुए सावधानी से आगे बढ़ना जरूरी है। एआई से बदलती दुनिया के चमत्कार वरदान से कम नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी चुनौतियां एवं खतरे इसे अभिशाप में भी बदल सकते हैं। बहुत आवश्यक है कि इसके उपयोग के संदर्भ में कोई वैश्विक ढांचा एवं नियंत्रण का केन्द्र एवं नीति बने। क्योंकि एआई के दुरुपयोग के खतरे किसी से छिपे नहीं। अभी एआई का उपयोग अपने प्रारंभिक चरण में ही है, लेकिन उससे पैदा होने वाली कई चुनौतियों एवं खतरों ने सिर उठा लिया है। लेकिन इस नई तकनीक से जीवनशैली, शिक्षा, चिकित्सा, युद्ध, सेना, शासन-प्रशासन, चुनाव, व्यापार, विचार आदि में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। भारत एआई को लेकर बहुत उत्साहित है और दुनिया में एआई का सबसे बड़ा केन्द्र बनने को भी तैयार है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के साथ इस शिखर बैठक की सह-अध्यक्षता की बल्कि अगली शिखर बैठक की मेजबानी करने की पेशकश भी करते हुए बता दिया कि भारत इस पहल को कितनी गंभीरता से लेता है।
भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर होते हुए तकनीकी विकास की दृष्टि से भी सफलता के नये झंडे गाड रहा है। एआई को लेकर भारत की सोच सकारात्मक एवं विकासमूलक है इसीलिये प्रधानमंत्री मोदी ने यह सही कहा कि इस तकनीक में दुनिया को बदलने की ताकत है, लेकिन अमेरिका की कुछ बड़ी तकनीकी कंपनियों ने सूचना संसार में अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया है। उनके एकाधिकार और उनकी मनमानी से निपटना विश्व के तमाम देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। यदि इसी तरह का एकाधिकार एआई कंपनियों ने भी स्थापित कर लिया तो फिर समस्या गंभीर हो जाएगी। सबसे अधिक समस्या विकासशील और निर्धन देशों को होगी, जो पहले से ही चुनिंदा तकनीकी कंपनियों के वर्चस्व तले दबी हुई है। मोदी ने एआई तकनीक के संतुलित एवं विवेकसम्मत उपयोग एवं विकास की आवश्यकता को भी व्यक्त किया। क्योंकि यह उन्नत तकनीक बनाने वाली कुछ कंपनियां उसे अपने हिसाब से संचालित करती हुई भी दिख रही हैं। इस तकनीक का मनमाना इस्तेमाल न होने पाए, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को प्रभावी कदम उठाने होंगे। यह एआई एक्शन समिट ऐसे समय हो रही है, जब चीनी कंपनी डीपसीक दुनिया को एक जबर्दस्त झटका दे चुकी है।
भारत एआई की चुनौतियों एवं खतरों को लेकर सतर्क है। क्योंकि एआई द्वारा प्रस्तुत चुनौतियाँ बहुआयामी हैं और लगातार विकसित हो रही हैं। उदाहरण के लिए डीपफेक, जो डिजिटल मीडिया हैं-वीडियो, ऑडियो और चित्र-जिन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके संपादित और हेरफेर किया जाता है, हाइपर-रियलिस्टिक डिजिटल मिथ्याकरण को शामिल करते हैं। इसका संभावित रूप से प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने, सबूत गढ़ने और लोकतांत्रिक संस्थानों में विश्वास को कम करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। जबकि डीपफेक का इस्तेमाल चुनावों जैसे कुछ मामलों में किया गया है, उनका उपयोग विभिन्न अन्य क्षेत्रों में भी तेजी से देखा जा रहा है। डीपफेक के अलावा, एआई से जुड़े अन्य जोखिम भी हैं। इनमें गोपनीयता, पूर्वाग्रह, पारदर्शिता, जवाबदेही और दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के लिए एआई के संभावित दुरुपयोग से संबंधित मुद्दे शामिल हैं। भारत सरकार इन मुद्दों को सलाह और विनियमों के माध्यम से नियोजित एवं नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है जो पारदर्शिता, सामग्री मॉडरेशन, सहमति तंत्र और डीपफेक पहचान पर जोर देते हैं ताकि जिम्मेदार एआई तैनाती सुनिश्चित हो और चुनावी अखंडता की रक्षा हो सके। यह एक सतत प्रयास है और जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, इन चुनौतियों से निपटने के लिए अधिक मजबूत तंत्र के विकास के साथ सक्षम होने की अपेक्षा रहेगी। एआई विकसित होता रहेगा, नये-नये करिश्माई एवं चमत्कारी आयाम उससे जुड़ते रहेंगे और हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह ऐसे तरीके से हो जो सभी के लिए सुरक्षित, नैतिक और लाभकारी हो। आवश्यक बुनियादी ढांचे, हार्डवेयर और क्लाउड कंप्यूटिंग क्षमताओं के विकास में सहायता के लिए निवेश महत्वपूर्ण है। सरकार और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग से आवश्यक पूंजी जुटाई जा सकती है। यह संयुक्त प्रयास एआई नवाचार, आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा दे सकेगा और जिससे भारत एआई क्रांति में अग्रणी बन दुनिया का नेतृत्व कर सकेगा।
इसी पहलू को रेखांकित करती है यह पेरिस की तीसरी एआई एक्शन समिट, जिसमें दुनिया भर के 90 देशों और तमाम बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस हमारे भविष्य का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन किसी भी वजह से इसकी ग्रोथ को बेकाबू होने दिया गया तो उसके परिणाम खतरनाक साबित हो सकते हैं। भारत की भूमिका को खास बनाता है इसका असाधारण टैलंट पूल, इसके वे इंजिनियर और वैज्ञानिक जो नाम मात्र की लागत पर बड़े-बड़े अंतरिक्ष अभियान को अंजाम देते रहे हैं। हालांकि अभी तक इस मामले में भारत की पहल बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। बेहतर होगा कि केंद्र सरकार एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाकर इस तकनीक को लेकर अपनी प्राथमिकता तय करे। इनोवेशन में भारत को हर जोखिम को उठाने के लिये स्वयं को सक्षम करना होगा। एआई का समुचित लाभ उठाने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। एआई के जरिये वे अनेक काम किए जा सकते हैं, जो अब तक मनुष्य करते रहे हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि उसमें मानवीय संवेदनाएं नहीं होतीं और वह उपलब्ध डाटा के आधार पर ही किसी नतीजे पर पहुंचती है। अब यदि डाटा ही सटीक न हो तो नतीजे भी नुकसान पैदा करने वाले हो सकते हैं। इस पर हैरानी नहीं कि अति उन्नत एआई को मानव सभ्यता के लिए संकट के रूप में भी देखा जा रहा है। इस आशंका को निर्मूल साबित करने वाले उपाय करना समय की मांग हैं और उन पर ज्यादा फोकस करना होगा।
इस तरह की तकनीक तभी लाभकारी सिद्ध होती है, जब उसका उपयोग समझदारी, नैतिकता एवं विवेकपूर्ण होता है। ज्यादा जरूरी है उसके दुरुपयोग की आशंकाओं पर प्रभावी ढंग से लगाम लगाने की स्थितियों एवं तंत्र को विकसित करने की। एआई के मामले में ऐसा इसलिए अनिवार्य रूप से करना होगा, क्योंकि यह मानव जीवन को कहीं गहराई से प्रभावित करने की क्षमता रखती है। एआई एक नई तकनीक है और बहुत से लोग उसके प्रयोग के तौर-तरीकों से अपरिचित हैं। इसीलिए यह आशंका उभरी है कि उसके कारण रोजगार का संकट पैदा हो सकता है। भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न नौकरियों पर एआई के प्रभाव को समझने के लिए एक व्यापक, डेटा-समर्थित अध्ययन आवश्यक है। आईएमएफ की एक रिपोर्ट ने अनुमान लगाया है कि एआई दुनिया भर में लगभग 40 प्रतिशत नौकरियों को प्रभावित करेगा, कुछ को प्रतिस्थापित करेगा और दूसरों को पूरक करेगा। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एआई अपने उपयोग के विकास के साथ नए प्रकार की नौकरियां भी पैदा करेगा। एआई पहले से ही विनिर्माण से लेकर बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और शिक्षा तक सभी क्षेत्रों में बदलाव ला रहा है। उदाहरण के लिए, शिक्षा क्षेत्र में, एआई व्यक्तिगत पाठ्यक्रम, परीक्षण, सीखने के तरीके और वितरण को सक्षम करके भारत के सीखने के परिदृश्य को बदल रहा है। निःसंदेह यह नई तकनीक अवसर बन रही है, तकनीकी विकास का सूरज बनकर नयी समाज संरचना को बल दे रही है। यह संभावनाभरा है कि पेरिस शिखर सम्मेलन में एआई के क्षेत्र में भारत और प्रमुख देशों के बीच सामंजस्य बढ़ने के संकेत मिले, लेकिन बात तब बनेगी, जब यह मंच एआई के नियमन एवं नियोजित विकास के लिए सहमति कायम करने की बुनियाद बने। एआई की तीव्र प्रगति और व्यापक अनुप्रयोग को देखते हुए, भारत के लिए अपना स्वयं का एआई सुरक्षा संस्थान स्थापित करना अपेक्षित है। ऐसा संस्थान सुरक्षित और नैतिक एआई प्रथाओं को विकसित करने, अनुसंधान करने और एआई के उपयोग में सुरक्षा की संस्कृति को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
मुफ्त की रेवड़ियांः परजीवियों का तैयार होता एक वर्ग
जीव-विज्ञान की भाशा में परजीवी ऐसे जीवाणु या कीटाणु होते हैं, जो किसी दूसरे जीव के अंदर रहकर उससे भोजन प्राप्त करते हैं। देष की सबसे बड़ी अदालत ने सरकार की मुफ्त रेवड़ियों पर आश्रित ऐसे ही लोगों और सरकार पर कटाक्षपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा नगद धनराषि एवं निषुल्क सुविधाएं देने के वादों पर कहा है कि राश्ट्रीय विकास के लिए लोगों को मुख्य धारा में लाने की बजाय, क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं बना रहे ? ये लोग मुफ्त राषन और धन मिलने से काम करने को तैयार नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी षहरी इलाकों में बेघर लोगों के आश्रय के अधिकार से जुड़ी मांग पर सुनवाई के दौरान की है। अदालत की इस चिंता को राश्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में वाजिब कहा जा सकता है। क्योंकि मुफ्त राषन और धन मिलने से लोग आलसी और निकम्मे तो हो ही रहे हैं, इनकी संख्या भी लगातार बढ़ रही है। भारत सरकार 81 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को मुफ्त राषन तो दे ही रही है, राज्य सरकारें चुनाव के ठीक पहले लाडली बहनाओं को प्रतिमाह 1250 से लेकर 3000 रुपए तक नगदी का लालच देकर मतदाता को लुभा रहे हैं। नतीजतन मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग मुफ्त की रेवड़ियों के लालच में मतदान करने लगा है। यह स्थिति संवैधानिक लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।
निर्वाचन लोक-पर्व के अवसर पर मुफ्त में तोहफे बांटे जाने की घोशणाएं सभी राजनीतिक दल बढ़ चढ़कर करते रहे हैं। हालांकि निर्वाचन के बाद ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं। बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याषी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन चुनावी रेवड़ियां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मुफ्त के इन उपाहरों पर लगातार चिंता जताते रहे हैं। परंतु भाजपा भी चुनावों में रेवड़ियां बांटने के वादों से पीछे नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराश्ट्र और दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा की जीत के कारणों में इन वादों की भी अहम् भूमिका रही है। भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अष्विनी उपाध्याय ने भी मुफ्त के वादों पर रोक के लिए न्यायालय में याचिकाएं लगाई हुई हैं। उन्होंने ऐसे दलों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने की मांग की है। इन वादों पर रोक इसलिए जरूरी है, क्योंकि इन लोक-लुभाव वादों के दो तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। एक तो ये मतदाताओं के निश्पक्ष निर्णय को प्रभावित करते हैं और दूसरे, इन्हें पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं। राजनेताओं की दानवीर कर्ण की यह भूमिका स्वतंत्र और निश्पक्ष चुनाव की जड़ों में मट्ठा घोलने का काम कर रही है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए मतदाता को बरगलाना आदर्ष चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने जैसा है। सही मायनों में वादों की घूस से निर्वाचन प्रक्रिया प्रदूषित होती है, इसलिए इस घूसखोरी को आदर्श आचार संहिता के दायरे में लाना जरूरी है। वैसे भी इन वादों की हकीकत जमीन पर उतरी होती तो पंजाब में 7000 किसानों ने आत्महत्या न की होती ? क्योंकि पंजाब में किसान कल्याण के सबसे ज्यादा वादे अकाली दल ने सरकार में रहते हुए किए थे। अफलातूनी वादों के उलट हकीकत में अब ज्यादा जरूरत शासन-प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है। यह वादा ज्यादातर राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र से हमेशा गायब रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी एक समय जरूर भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने की राह पर चली थी, लेकिन अपने तीसरे कार्यकाल में शराब नीति में घोटाले और शीशमहल जैसे राजसी वैभव में डूब गई। आप ने बिजली दरें 50 फीसदी कम करने और हर परिवार को रोजाना 700 लीटर पानी मुफ्त मुहैया कराने के बुनियादी वादों के साथ चुनाव लड़ा और जीता भी, लेकिन सरकार की अर्थव्यवस्था चैपट हो गई। 2025 के विधानसभा चुनाव में आर्थिक स्थिति की बद्हाली और भ्रश्टाचार अरविंद केजरीवाल की हार के प्रमुख कारण बने।
देष में मध्यप्रदेष के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने निर्धन परिवारों को मुफ्त में एक बत्ती कनेक्षन देने के वादे के साथ यह षुरूआत आठवें दषक में की थी। तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने तो चुनावी वादों का इतना बड़ा पिटारा खोल दिया था कि यह मामला जनहित याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था। इस याचिका में अन्नाद्रमुक की चुनावी घोशणा को भ्रश्ट आचरण मानते हुए असंवैधानिक ठहराने की मांग की गयी थी, लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी। उस समय न्यायालय ने दलील दी थी कि घोषणा-पत्रों में दर्ज प्रलोभनों को भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता है। चुनाव का नियमन जनप्रतिनिधित्व कानून के जरिए होता है और उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत इसे गैरकानूनी या भ्रष्ट कदाचरण ठहराया जा सके। न्यायालय ने लाचारगी प्रगट करते हुए कहा था कि इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। लिहाजा इस मसले पर विचार कर कारगर निर्णय लेने का कोई कदम विधायिका ही उठा सकती है। अलबत्ता अदालत ने निर्वाचन आयोग को जरुर निर्देश दिया था कि वह चुनावी घोषणा-पत्रों को मर्यादित करने की दृष्टि से अतिवादी व लोक-लुभावन घोषणाओं को रेखांकित करे, जिससे आदर्श चुनाव संहिता का पालन हो सके।
इस परिप्रेक्ष्य में दुविधा यह है कि राजनीतिक दलों पर आयोग का अनुषासनात्मक नियंत्रण निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद होता है, जबकि ज्यादातर घोशणा-पत्र इस अधिसूचना के पहले जारी हो जाते हैं और कई वादे तो नेता चुनावी आमसभाओं में आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए भी कर डालते हैं। यहां तक कि अल्पसंख्यक मुस्लिम और सवर्ण ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का वादे किए जाते रहे हैं। तिस पर भी विडंवना है कि आदर्ष निर्वाचन संहिता के तहत न तो कोई दंडात्मक कानून है और न ही इसकी संहिताओं में वैध-अवैध की अवधारणाएं परिभाशित हैं। आयोग यदि संहिता को लागू कर पाता है तो इसलिए कि राजनीतिक दल उसका सहयोग करते हैं और जनमत की भावना आयोग के पक्ष में होती है। तय है दल यदि आयोग के साथ असहयोग करने लग जाएं तो आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा। वैसे भी आयोग की जवाबदेही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है, न कि दलों के चुनावी मुद्दे तय करने की ? बावजूद आयोग मामले संज्ञान में लेता है और उम्मीदवार को चेतावनी भी देता रहता है। लेकिन उम्मीदवार जानते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को तत्काल खारिज करने का कोई अधिकार आयोग के पास नहीं है, इसलिए वे बेपरवाह रहते हैं।
इन विरोधाभासी हालातों से शीर्ष न्यायालय परिचित है। इसलिए वह मुफ्त की घोषणा पर टिप्पणी कर शांत रह जाती है। दरअसल ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श कर कानून बनाने का अधिकार विधायिका को ही है। यहां विडंबना है कि विधायिका और दल अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रलोभन के जिन वादों के मार्फत मतदाता को बरगलाकर दल सत्ता के अधिकारी हुए हैं, उन वादों को घोशणा-पत्र में नहीं रखने का कानून बनाकर अपने ही हाथों से, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की गलती क्यों करेंगे ? यहां सवाल यह भी उठता है कि दल जो घोशणाएं करते हैं उनका लाभ वर्ग-भेद के बिना जरूरतमंदों को मिलता है। फिर चाहे वह छात्रवृत्ति हो, लैपटाॅप हो, साइकिल हो अथवा टीवी ? मुफ्त बिजली हो, लाडली बहनों को नगद धनराशि हों या सस्ता राशन, इसमें कोई जातीय या वर्गीय भेद नहीं किया जाता। बीपीएल की सूची में आने वाले सभी जरूरतमंद के हकदार होते हैं। ऐसी स्थिति में मुफ्त उपहारों को विभाजित करना एक जटिल प्रक्रिया है। हां, जातीय अथवा अल्पसंख्यक के आधार पर आरक्षण की घोषणा की जाती है तो इस स्थिति को जातीय अथवा सांप्रदायिक भेद की स्थिति माना जा सकता है ? 81 करोड़ लोगों को सस्ता अनाज देने की सुविधा को भरे पेट वाले गुलछर्रे उड़ा रहे लोग सरकारी धन का दुरुपयोग मानते हैं। जबकि एक कल्याणकारी राज्य के वंचित तबके के लिए ये सुविधाएं अनिवार्य जरूरत भी हैं। ऐसे में इन्हें एकाएक घूस या लालच नहीं कहा जा सकता ? अलबत्ता यह तथ्य जरूर सही है कि प्रलोभन मतदाता की नीयत को प्रभावित करता है और वह व्यापक सामाजिक हित की बजाय व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने को विवश हो जाता है। जाहिर है, यह एक गंभीर मसला है और न्यायालय इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई ऐसा हल जरूर निकले, जो सर्वमान्य होने के साथ लोक कल्याणकारी भी साबित होगा।
भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त की हैं असाधारण उपलब्धियां
दिनांक 31 जनवरी 2025 को देश की राष्ट्रपति आदरणीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने लोक सभा एवं राज्य सभा के संयुक्त अधिवेशन को अपने सम्बोधन में, हाल ही के समय में, भारत में विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त की गई उपलब्धियों के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा है कि “भारत की विकास यात्रा के इस अमृतकाल को आज मेरी (केंद्र) सरकार अभूतपूर्व उपलब्धियों के माध्यम से नई ऊर्जा दे रही है। तीसरे कार्यकाल में तीन गुना तेज गति से काम हो रहा है। आज देश बड़े निर्णयों और नीतियों को असाधारण गति से लागू होते देख रहा है। और, इन निर्णयों में देश के गरीब, मध्यम वर्ग, युवा, महिलाओं, किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिली है।” आदरणीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू द्वारा दिए गए उक्त भाषण में अंशों को जोड़कर इस लेख में यह बताने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार भारत में गरीब वर्ग, युवाओं, मातृशक्ति, किसानों, आदि के लिए विभिन्न योजनाएं सफलतापूर्वक चलाई जा रही हैं।
आज आम नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और मकान के साथ साथ स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। समस्त परिवारों को आवास सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना का विस्तार करते हुए तीन करोड़ अतिरिक्त परिवारों को नए घर देने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए 5 लाख 36 हजार करोड़ रुपए की राशि का खर्च किए जाने की योजना है। इसी प्रकार, गांव में गरीबों को उनकी आवासीय भूमि का हक देने के उद्देश्य से स्वामित्व योजना के अंतर्गत अभी तक 2 करोड़ 25 लाख सम्पत्ति कार्ड जारी किए जा चुके हैं। साथ ही, पीएम किसान सम्मान निधि योजना के अंतर्गत लगभग 11 करोड़ किसानों को पिछले कुछ महीनों में 41,000 करोड़ रुपए की राशि का भुगतान किया गया है। जनजातीय समाज के पांच करोड़ नागरिकों के लिए “धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष” अभियान प्रारंभ हुआ है। इसके लिए अस्सी हजार करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया है। आज मध्यम वर्ग को मकान/फ्लैट खरीदने के लिए लोन पर सब्सिडी भी दी जा रही है एवं रेरा जैसा कानून बनाकर मध्यम वर्ग के स्वयं के मकान सम्बंधी सपने को सुरक्षा दी गई है।
देश के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराए जाने के उद्देश्य से आयुषमान भारत योजना चलाई जा रही है। अब इस योजना के अंतर्गत 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा देने का निर्णय लिया गया है। इन वरिष्ठ नागरिकों को प्रत्येक वर्ष में पांच लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराया जाएगा।
केंद्र सरकार द्वारा आज युवाओं की शिक्षा और उनके लिए रोजगार के नए अवसर तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। मेधावी छात्रों को उच्च शिक्षा में वित्तीय सहायता देने के लिए पीएम विद्यालक्ष्मी योजना शुरू की गई है। एक करोड़ युवाओं को शीर्ष पांच सौ कंपनियों में इंटर्नशिप के अवसर भी दिये जाएंगे। पेपर लीक की घटनाओं को रोकने और भर्ती में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए नया कानून लागू किया गया है।सहकार से समृद्धि की भावना पर चलते हुए सरकार ने ‘त्रिभुवन’ सहकारी यूनिवर्सिटी की स्थापना का प्रस्ताव स्वीकृत किया है।
जब देश के विकास का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी मिलने लगता है तभी विकास सार्थक होता है। गरीब को गरिमापूर्ण जीवन मिलने से उसमें जो सशक्तिकरण का भाव पैदा होता है, वो गरीबी से लड़ने में उसकी मदद करता है। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत बने 12 करोड़ शौचालय, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत निशुल्क दिए गए 10 करोड़ गैस कनेक्शन, 80 करोड़ जरूरतमंदों को राशन, सौभाग्य योजना, जल जीवन मिशन जैसी अनेक योजनाओं ने गरीब को ये भरोसा दिया है कि वो सम्मान के साथ जी सकते हैं। ऐसे ही प्रयासों की वजह से देश के 25 करोड़ लोग गरीबी को परास्त करके आज अपने जीवन में आगे बढ़ रहे हैं। इन्होंने नियो मिडिल क्लास का एक ऐसा समूह तैयार किया है, जो भारत की ग्रोथ को नई ऊर्जा से भर रहा है।
उड़ान योजना ने लगभग डेढ़ करोड़ लोगों का हवाई जहाज में उड़ने का सपना पूरा किया है। जन औषधि केंद्र में 80 प्रतिशत रियायती दरों पर मिल रही दवाओं से, देशवासियों के 30 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बचे हैं। हर विषय की पढ़ाई के लिए सीटों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी का बहुत लाभ मध्यम वर्ग को मिला है।
केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के चौथे चरण में पच्चीस हजार बस्तियों को जोड़ने के लिए 70,000 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की हैं। आज जब हमारा देश अटल जी की जन्म शताब्दी का वर्ष मना रहा है, तब प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना उनके विजन का पर्याय बनी हुई है। देश में अब 71 वंदे भारत, अमृत भारत और नमो भारत ट्रेन चल रही हैं, जिनमें पिछले छह माह में ही 17 नई वंदे भारत और एक नमो भारत ट्रेन को जोड़ा गया है।
आगे आने वाले समय में देश के आर्थिक विकास में देश की आधी आबादी अर्थात मातृशक्ति के योगदान को बढ़ाना ही होगा। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत 91 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों को सशक्त किया जा रहा है। देश की दस करोड़ से भी अधिक महिलाओं को इसके साथ जोड़ा गया है। इन्हें कुल नौ लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि बैंक लिंकेज के माध्यम से वितरित की गई है। केंद्र सरकार ने देश में तीन करोड़ लखपति दीदी बनाने लक्ष्य निर्धारित किया है। आज एक करोड़ 15 लाख से भी अधिक लखपति दीदी एक गरिमामय जीवन जी रही हैं। इनमें से लगभग 50 लाख लखपति दीदी, बीते 6 महीने में बनी हैं। ये महिलाएं एक उद्यमी के रूप में अपने परिवार की आय में योगदान दे रही हैं। भारत में सभी के लिए बीमा की भावना के साथ कुछ महीने पूर्व ही बीमा सखी अभियान भी शुरू किया गया है। बैंकिंग और डिजी पेमेंट सखियां दूर दराज के इलाकों में लोगों को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कृषि सखियां नेचुरल फार्मिंग को बढ़ावा दे रही हैं और पशु सखियों के माध्यम से देश का पशुधन मजबूत हो रहा है। आज भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, पुलिस में भर्ती हो रही हैं और कॉरपोरेट कंपनियों का नेतृत्व भी कर रही हैं। आज बालिकाओं की भर्ती राष्ट्रीय मिलिट्री स्कूलों में भी प्रारंभ हो गई है। नेशनल डिफेंस अकैडमी में भी महिला कैडेट्स की भर्ती शुरू हो गई है।
पिछले एक दशक में मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी पहल ने युवाओं को रोजगार के अनेक अवसर प्रदान किए हैं। पिछले दो वर्षों में सरकार ने, रिकॉर्ड संख्या में दस लाख स्थायी सरकारी नौकरियां प्रदान की हैं। युवाओं के बेहतर कौशल और नए अवसरों के सृजन के लिए दो लाख करोड़ रुपए का पैकेज केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत किया गया है। एक करोड़ युवाओं के लिए इंटर्नशिप की व्यवस्था से युवाओं को ग्राउंड पर काम करने का अनुभव प्राप्त होगा। आज भारत में डेढ़ लाख से अधिक स्टार्टअप हैं जो इनोवेशन के स्तंभ के रूप में उभर रहे हैं। एक हजार करोड़ रुपए की लागत से स्पेस सेक्टर में वेंचर कैपिटल फंड की शुरुआत भी की गई है। आज भारत क्यूएस वर्ल्ड फ्यूचर स्किल इंडेक्स 2025 में पूरे विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। अर्थात, फ्यूचर ऑफ वर्क श्रेणी में AI और डिजिटल तकनीक अपनाने में भारत दुनिया को रास्ता दिखा रहा है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में भी भारत की रैंकिंग 76 से सुधर कर 39 हो गई है। यह सब भारतीय युवाओं के भरोसे ही सम्भव हो पा रहा है।
देश में आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से विद्यार्थियों के लिए आधुनिक शिक्षा व्यवस्था तैयार की जा रही है। कोई भी शिक्षा से वंचित ना रहे, इसीलिए मातृभाषा में शिक्षा के अवसर दिये जा रहे हैं। विभिन्न भर्ती परीक्षाएं तेरह भारतीय भाषाओं में आयोजित कर, भाषा संबंधी बाधाओं को भी दूर किया गया है। बच्चों में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए दस हजार से अधिक स्कूलों में अटल टिंकरिंग लैब्स खोली गई हैं। “ईज ऑफ डूइंग रिसर्च” के लिए हाल ही में वन नेशन-वन सब्सक्रिप्शन स्कीम लायी गई है। इससे अंतरराष्ट्रीय शोध की सामग्री निशुल्क उपलब्ध हो सकेगी। पिछले एक दशक में भारत में उच्च शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ी है। इनकी गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार हुआ है। क्यूएस विश्व यूनिवर्सिटी - एशिया रैंकिंग में भारत के 163 विश्वविद्यालय शामिल हुए हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के नये कैंपस का शुभारंभ कर शिक्षा में, भारत का पुराना गौरव वापस लाया गया है।
विकसित भारत के निर्माण में किसान, जवान और विज्ञान के साथ ही अनुसंधान का बहुत बड़ा महत्व है। भारत को भारत को ग्लोबल इनोवेशन पावरहाउस बनाने के लक्ष्य निर्धारित किया गया है। देश के शिक्षण संस्थाओं में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए पचास हजार करोड़ रुपए की लागत से अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउन्डेशन स्थापित किया गया है। 10,000 करोड़ रुपए की लागत से “विज्ञानधारा योजना” के तहत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में इनोवेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है। आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत के योगदान को आगे बढ़ाते हुए “इंडिया ए आई मिशन” प्रारम्भ किया गया है। राष्ट्रीय क्वांटम मिशन से भारत, इस फ्रंटियर टेक्नॉलाजी में दुनिया के अग्रणी देशों की पंक्ति में स्थान बना सकेगा। देश में “बायो - मैन्यूफैक्चरिंग” को बढ़ावा देने के उद्देश्य से BioE3 Policy लायी गई है। यह पॉलिसी भविष्य की औद्योगिक क्रांति का सूत्रधार होगी। बायो इकॉनामी का उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का कुशल उपयोग करना है जिससे पर्यावरण को संरक्षित करते हुए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
भारत के छोटे व्यापारी गांव से लेकर शहरों तक, हर जगह आर्थिक प्रगति को गति देते हैं। केंद्र सरकार छोटे उद्यमियों को अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हुए उन्हें स्वरोजगार के नए अवसर दे रही है। MSME के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम और ई-कॉमर्स एक्सपोर्ट हब्स सभी प्रकार के उद्योगों को बढ़ावा दे रहे हैं। मुद्रा ऋण की सीमा को दस लाख रुपए से बढ़ाकर बीस लाख रुपए करने का लाभ करोड़ों छोटे उद्यमियों को हुआ है। केंद्र सरकार ने क्रेडिट एक्सेस को आसान बनाया है। इससे वित्तीय सेवाओं को लोकतांत्रिक बनाया जा सका है। आज लोन, क्रेडिट कार्ड, बीमा जैसे प्रोडक्ट, सबके लिए आसानी से सुलभ हो रहे हैं। दशकों तक भारत के रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाकर आजीविका चलाने वाले भाई-बहन बैंकिंग व्यवस्था से बाहर रहे। आज उन्हें पीएम स्वनिधि योजना का लाभ मिल रहा है। डिजिटल ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड के आधार पर उनको बिजनेस बढ़ाने के लिए और लोन मिलता है। ओएनडीसी की व्यवस्था ने डिजिटल कॉमर्स यानी ऑनलाइन शॉपिंग की व्यवस्था को समावेशी बनाया है। आज देश में छोटे बिजनेस को भी आगे बढ़ने का समान अवसर मिल रहा है।
युवाओं को लेकर कांग्रेस के संगठात्मक ढांचे में बड़े फेरबदल की जरुरत - अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)
भारत जब आजाद हुआ तो कई सारे विकसित देशों खासकर पश्चिम के देशों को लगा कि भारत जैसा इतना बड़ा देश लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चल पाएगा। भारत का लोकतंत्र फेल हो जाएगा और सबसे बड़ा लिखित संविधान भी किसी काम नहीं आएगा। लेकिन इसके उलट आज इतने सालों बाद भारत को एक सफल लोकतांत्रिक देश के रूप में जाना जाता है। भारत को अपने पैरों पर खड़ा होने, चलने और फिर दौड़ने का साहस देने में एक बहुत बड़ा योगदान कांग्रेस पार्टी का रहा है। हालांकि केंद्र सरकार में 5 दशक से अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते नजर आ रही है और इस लड़ाई में चुनाव दर चुनाव हार का घाव सहते हुए, अपने पतन की ओर बढ़ रही है। इसका ताजा उदाहरण दिल्ली के विधानसभा चुनाव के रूप में देखा जा सकता है। जिस दिल्ली में शीला दीक्षित के शासनकाल में कांग्रेस लगातार 15 साल सत्ता में बनी रही, वही पार्टी अब लगातार तीसरी बार न केवल चुनाव हारी बल्कि एक भी सीट अपने नाम न कर पाने का कलंक ढ़ोने पर मजबूर हो गई है। सवाल है कि पार्टी हाईकमान ने आखिर ऐसा कौन सा चश्मा पहन रखा है जिससे उसे तिल-तिल ख़त्म होती आजादी की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी की दयनीय स्थित नजर नहीं आ रही! क्या कारण है कि मतदाताओं के बीच कांग्रेस अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर पा रही, या यूँ कहें कि मतदाताओं की नजर से पूरी तरह उतरती जा रही है।
स्थिति यह हो गई है कि 2024 के लोकसभा चुनाव को संजीवनी समझ रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं को ये नहीं समझ आ रहा कि वह आधी की भी आधी सीट जीतने का जश्न मना रहे हैं। समझने वाली बात है कि आखिर वह क्या कारण रहे जिन्होंने कांग्रेस के किले को ढहाने और बचे हुए खंडहर का भी सफाया करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है! पिछले दस बारह सालों में 50 से अधिक अनुभवी व कद्दावर नेताओं ने हाथ का साथ छोड़ दिया है। फिर बात ज्योतिरादित्य सिंधिया की हो, महाराष्ट्र के दो बार सीएम रहे अशोक चव्हाण की, 55 साल से कांग्रेस के साथ रहने वाले राजनीतिक परिवार के मिलिंद मुरली देओरा की, ग़ुलाम नबी आज़ाद की या कपिल सिब्बल की, सभी ने एक-एक कर के या तो बीजेपी का दामन थामा या कहीं और अपना राजनीतिक भविष्य तलाशा, लेकिन कांग्रेस पर विश्वास करना मुनासिब नहीं समझा। पार्टी में लगी इस पतझड़ ने न केवल पुराने दिग्गजों को पार्टी से तोड़ा बल्कि मतदाताओं को भी दूर कर दिया। इसके पीछे एक प्रमुख कारण संगठन नेतृत्व का माना जा सकता है। अब इसे नेतृत्व के प्रति असंतुष्टि कहें या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, लेकिन लगातार नेताओं के पार्टी से अलग होने ने निश्चित रूप से आम जनमानस के बीच कांग्रेस को लेकर एक नकारात्मक छवि पैदा कर दी है।
दूसरी ओर कांग्रेस की जमीनी कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं को तवज्जों न दिए जाने की छवि भी उसपर भारी पड़ती जा रही है। जिसे अब न केवल बदलने बल्कि जड़ से ख़त्म करने की जरुरत है। एक बात जो जग-जाहिर है उसमें पार्टी की अंतरकलह के साथ-साथ सिर्फ एक परिवार की बातों को सुना जाना भी शामिल है। कांग्रेस के लिए इसे तत्काल प्रभाव से सुधारने और कुछ मूलभूत बदलावों के साथ कुछ कड़े निर्णय लेने की आवश्यकता है। आवश्यकता है कि पूरी कांग्रेस पार्टी को पुनः गठित किया जाए, जिसमें निर्णायक भूमिका में 50 वर्ष से कम उम्र के कुछ नए चेहरों को आगे बढ़ाया जाए और इस बात का खास ख्याल रखा जाए कि नए, युवा व अनुभवी चेहरे देश के हर कोनों से शामिल हों। इसके अतिरिक्त एक निर्णय जो कांग्रेस की खोई साख को वापस लाने में रामबाण साबित हो सकता है वो है, गांधी परिवार द्वारा खुद को आलाकमान की गद्दी से अलग कर, इस शब्द को ही कांग्रेस की डिक्शनरी से बाहर निकाल फेंकना। कांग्रेस नेतृत्वकर्ता की भूमिका अब कुछ अन्य युवा उम्मीदवारों को सौंप कर, राहुल, प्रियंका व सोनिया गांधी को कम से कम आगामी लोकसभा चुनावों तक सिर्फ जमीनी स्तर पर जनता के बीच रह कर काम करना चाहिए। मेरा एक सुझाव यह भी है कि कांग्रेस जन मुद्दों को उठाने में विश्वास करे, न कि पीएम मोदी के दोस्तों को उजागर करने और संविधान की ढपली में अपनी ऊर्जा खपाये। उसे यह समझने और मानने की भी जरुरत है कि आम जन को इन मुद्दों से फिलहाल तो कोई सरोकार नहीं है।
गरीबी: स्थिति या मानसिक सोच?
गरीबी, हमारे देश में एक ऐसी समस्या है, जिसे खत्म करने के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किए गए। इसके लिए हर प्रकार की योजनाएँ, कार्यक्रम और अभियान चलाए गए, फिर भी इस समस्या से छुटकारा नहीं पाया जा सका। इसका एक कारण यह है कि इस समस्या को केवल एक आर्थिक स्थिति मानकर ही इसका हल खोजा जाता रहा, जबकि यह समस्या केवल आर्थिक अभाव की स्थिति नहीं है, बल्कि इससे बढ़कर यह एक मानसिक स्थिति भी है। जब इस समस्या की जड़ आर्थिकता से कहीं अधिक है, तो केवल ऊपरी समाधान करने से इस समस्या को हल कैसे किया जा सकता है? यही कारण है कि सरकार आज तक गरीबी से निकलने का कोई सार्थक तरीका खोज नहीं पाई है।
एक दिन में 3-4 से ज्यादा काजू ना खाएं
फायदे की जगह उठाना पड़ेगा नुकसान
काजू खाने के ढेरों फायदे हैं, पर आपको दिन में 3-4 या बहुत से बहुत 5 काजू से ज्यादा नहीं खाने चाहिए। अगर आप इससे ज्यादा काजू खाते हैं तो इससे पेट खराब हो सकता है। ज्यादा काजू खाने से फायदे की जगह नुकसान हो सकता है।
काजू खाने के फायदे
जो लोग रोजाना काजू खाते हैं उनकी हड्डियां मजबूत बनती है। काजू में कैल्शियम और मैग्नीशियम होता है जो बोन्स के लिए अच्छा होता है। बच्चों को रोजाना 2-3 काजू खिला सकते हैं।
2-3 काजू डायबिटीज के मरीज भी खा सकते हैं। काजू खाने से ग्लूकोज लेवल कंट्रोल रहता है। ऐसे में डायबिटीज के रोगी अपने खाने में काजू को जरूर शामिल कर लें।
अगर आप सीमित मात्रा में काजू खाते हैं तो इससे पेट और पाचन अच्छा बनता है। काजू में फाइबर होता है जो डाइजेशन को बेहतर बनाता है। इससे गैस और कब्ज की समस्या दूर होती है।
काजू में गुड फैट और कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है जो मेटाबॉलिज्म बढ़ाते में मदद करता है। 3-4 काजू खाने से मोटापा भी कम किया जा सकता है। इससे भूख को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है।
स्किन के लिए भी काजू बहुत फायदेमंद हैं। रोजाना काजू खाने से त्वचा की झुर्रियां कम होती हैं। काजू में विटामिन ई और एंटी-क्सीडेंट तत्व पाए जाते हैं जो त्वचा और बालों को मजबूत बनाने का काम करता है।