महतारी वंदन योजना ने श्यामा बाई की बदली किस्मत बांसशिल्प कला को निखारने में मिल रही मदद, आजीविका का भी हो रहा विस्तार
राधेश्याम सोनवानी
गरियाबंद, 11 मार्च 2026/ गरियाबंद जिला जनजाति बाहूल्य एवं वनांचल क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यहां कमार, भुंजिया, गोंड़ सहित अन्य जनजाति सदस्य निवासरत है। साथ ही बांसशिल्प को अपने आजीविका का माध्यम मानने वाले कंडरा जनजाति के लोग भी इस जिले में निवास करते है। शासन द्वारा जनजाति सदस्यों के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। जिससे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिल रही है। जिले के कुरूद गांव की रहने वाली कंडरा जनजाति सदस्य श्रीमती श्यामा बाई और उनके परिवार का जीवन पहले काफी कठिनाइयों से भरा था। खेतों में मजदूरी करके दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था। उनके पास कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं था। शासन द्वारा संचालित महतारी वंदन योजना ने उनके जीवन में आशा की एक नई किरण लाई। महतारी वंदन योजना उनके जीवन के विकास में सहायक हो रही है। श्रीमती कंडरा संघर्ष और स्वाभिमान की मिसाल बन चुकी हैं। उनका परिवार, जो कभी भूमिहीन मजदूर था, आज अपनी मेहनत और परंपरागत कौशल के दम पर आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहा है। कंडरा जनजाति के होने के कारण अपने पैतृक कार्यों जैसे बांस के समान बनाकर आजीविका चलाती है। उन्हें बांस के समान बनाने के लिए बाहर से बांस खरीदना पड़ता है। लेकिन महतारी वंदन योजना के शुरू होने से प्रतिमाह 1 हजार रूपये की राशि सीधे उनके बैंक खाते में पहुंच रही है। जिससे वह राशि का उपयोग बाहर से बांस खरीदने में कर रही है। इससे बांसशिल्प कला को आगे बढ़ाने एवं परिवार के भरण-पोषण में आर्थिक सहायता में मदद मिल रही है। पहले बहुत कम आय अर्जित करने वाली श्रीमती श्यामा बाई को महतारी वंदन योजना से सहायता मिलने पर उनकी मासिक आय 8 हजार रूपये तक पहुँच गई है।