कवर्धा। जनपद पंचायत बोड़ला अंतर्गत मुढघुसरी जंगल के ठाकुरटोला स्थित मई झरिया नाला में निर्माणाधीन चेक डैम कार्य अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गया है। लगभग 19 लाख 72 हजार 935 रुपये की लागत से बनने वाले इस कार्य में शुरुआती चरण से ही मनरेगा नियमों की खुली अनदेखी के आरोप सामने आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जहां यह कार्य मजदूरों के हाथों होना चाहिए था, वहां जेसीबी मशीनों का उपयोग कर खुदाई कराई गई, जबकि मनरेगा कानून मशीनों और ठेकेदारी दोनों पर स्पष्ट रोक लगाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार चेक डैम निर्माण कार्य की कुल स्वीकृत राशि 19,72,935 रुपये है, जिसमें मजदूरी मद 2,26,690 रुपये तथा सामग्री मद 18,17,245.06 रुपये निर्धारित है। कार्य की प्रारंभ तिथि 15 जून 2026 दर्ज है। लेकिन कार्यस्थल की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों ने नियमों को केवल कागजों तक सीमित कर दिया है।
मनरेगा अधिनियम के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य को प्रारंभ करने से पहले नागरिक सूचना पटल लगाना अनिवार्य है, जिसमें कार्य का नाम, लागत, एजेंसी, स्वीकृति संख्या, मजदूरी-सामग्री अनुपात और समयसीमा स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना चाहिए। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और जन निगरानी सुनिश्चित करना है। लेकिन यहां चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सूचना पटल कार्य प्रारंभ होने से पहले नहीं, बल्कि कार्य लगभग अंतिम चरण में पहुंचने पर लगाया जा रहा है। इससे संदेह और गहरा गया है कि कहीं नियमों के उल्लंघन को छिपाने की कोशिश तो नहीं की जा रही।
ग्रामीणों के आरोप और भी गंभीर हैं। उनका कहना है कि चेक डैम निर्माण के लिए सबसे पहले निर्धारित तकनीकी मापदंडों के अनुसार गड्ढे की खुदाई होनी चाहिए थी, ताकि मजबूत नींव तैयार हो सके। परंतु यहां कथित रूप से जेसीबी मशीन से तेजी से खुदाई कराई गई, जिससे न केवल मनरेगा की मूल भावना पर चोट पहुंची बल्कि स्थानीय मजदूरों के रोजगार पर भी सीधा असर पड़ा।
मनरेगा योजना का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराना है। कानून स्पष्ट कहता है कि जहां मानव श्रम संभव हो, वहां मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके अलावा धारा 17 (सामाजिक अंकेक्षण) और संचालन दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य में जनभागीदारी एवं सामाजिक अंकेक्षण अनिवार्य है। यदि मशीनों से काम कराया गया, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मनरेगा की आत्मा के खिलाफ गंभीर कदम माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल कार्य एजेंसी को लेकर भी उठ रहा है। नियमानुसार इस निर्माण कार्य की एजेंसी ग्राम पंचायत है। अर्थात कार्य का संचालन, मजदूरों की उपस्थिति, मस्टर रोल संधारण और भुगतान पंचायत के माध्यम से होना चाहिए। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि वास्तविकता में काम किसी बाहरी ठेकेदार से कराया जा रहा है। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह मनरेगा के सबसे महत्वपूर्ण नियमों में से एक—ठेकेदार पूर्णतः प्रतिबंधित—का सीधा उल्लंघन होगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पंचायत ही एजेंसी है तो फिर कार्यस्थल पर ठेकेदार जैसे व्यक्तियों की सक्रिय भूमिका क्यों दिखाई दे रही है। मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति कितनी रही। क्या मस्टर रोल में दर्ज नाम और कार्यस्थल पर काम करने वाले लोग एक ही हैं। ऐसे कई गंभीर बिंदु अब प्रशासन के सामने खड़े हो गए हैं।
चिंता की बात यह भी है कि चेक डैम जैसे निर्माण कार्य में यदि प्रारंभिक खुदाई और नींव निर्माण तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं हुआ, तो बरसात के दौरान पूरी संरचना की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। लाखों की योजनाओं का उद्देश्य जल संरक्षण और ग्रामीण विकास है, लेकिन यदि निर्माण ही संदिग्ध तरीके से हो तो सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब निगाहें जनपद पंचायत बोड़ला, कार्यक्रम अधिकारी मनरेगा, तकनीकी सहायक और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी। क्या कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन कराया जाएगा। क्या जेसीबी उपयोग और कथित ठेकेदारी की जांच होगी। या फिर यह मामला भी केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाएगा।
ग्रामीणों ने पूरे निर्माण कार्य की उच्चस्तरीय जांच, मस्टर रोल सत्यापन, तकनीकी परीक्षण और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। क्योंकि मामला केवल एक चेक डैम का नहीं, बल्कि मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
फिलहाल मई झरिया नाला का यह चेक डैम निर्माण एक बड़े विवाद का केंद्र बन चुका है, जहां ग्रामीण विकास की तस्वीर के पीछे नियम उल्लंघन, मशीनों का उपयोग और कथित ठेकेदारी की परछाई साफ दिखाई दे रही है।