छत्तीसगढ़ / रायपुर

कुदर्शन ध्यान को समय रहते दूर करना ही हितकारी : मुनि संवेगरत्न सागर

 रायपुर । विवेकानंद नगर के ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में ज्ञान की गंगा बह रही है। मुनि संवेगरत्न सागर के मुखारविंद से श्रावक-श्राविकाएं जिनवाणी का श्रवण कर आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं। शनिवार को मुनिश्री ने धर्मसभा में कुदर्शन ध्यान से दूरी बनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते क़ुदर्शन ध्यान से सुदर्शन ध्यान की ओर नहीं आए तो धर्म और संस्कृति से विमुख हो जाओगे। 

मुनिश्री ने कहा कि चील सबसे ऊंचाई पर उड़ती है लेकिन उसकी दृष्टि सबसे नीचे होती है। चकोर ऊंचाई पर नहीं उड़ पाता लेकिन उसकी दृष्टि चंद्रमा की तरफ रहती है। इसी प्रकार मानव भव प्राप्त करने के पश्चात दृष्टि यदि इंद्रियों के पोषण पर रहे तो अनुकूलता का राग और मिथ्यात्व की पीड़ा रहती है। यह अनुकूलता का राग विष पर विश्वास करता है। 

 
 
 
 
 

जो कुदर्शन ध्यान का भागी रहता है वह अनुकूलता के राग से घिरे रहता है। मिथ्यात्व की पीड़ा में फंसे रहता है। अपने धर्म और संस्कृति से दूर होकर कुदर्शन के कारण अपने ही धर्म और संस्कृति का निंदक हो जाता है। कुदर्शन ध्यान से बचना ही होगा। ये कुदर्शन ध्यान ही अन्य दर्शन का अनुरागी बना देगा। बोध को प्राप्त करना है, अन्य दर्शन को प्राप्त नहीं करना है।

दुर्लभ बोधी नहीं बनना है। यदि यह बंध हो जाए तो उत्तम निमित्त, देव,गुरु व धर्म भी मिल जाए तो क़ुदर्शन ध्यान में घिरकर कुछ समझ नहीं आता। दुर्लभ बोधी अशुभ कर्म का उदय हो जाए तो सब अच्छा भी सामने होने पर भी दिखाई नहीं देता।  कुदर्शन ध्यान का रागी  देव, गुरु और धर्म से विमुख हो जाता है। जीव कुदर्शन से जुड़कर सुदर्शन से भटक जाता है।

 
 
 
 
 
 

मुनिश्री ने कहा कि कुदर्शन ध्यान संसार में मिथ्यात्व से घेरकर विपरीत क्रियाओं में ले जाता है। जैसे मानव के दुख को दूर करने के लिए सृष्टि में जो परिवर्तन होता है वह विज्ञान है। वहीं मानव के जीवन में जो दुख आए जो दृष्टि में परिवर्तन करता है वह धर्म है। धर्म से दूर होकर दुख,दुर्गति व पीड़ा का सर्जन होता है। संसार में वीतराग विज्ञान आपको कुदर्शन ध्यान से बचाता है।

22 दिवसीय गिरनार नेमी तप की तपस्या पूर्ण
चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया एवं महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि 150 तपस्वियों का 22 दिवसीय गिरनार नेमी तप पूर्ण होने पर 28 अगस्त को सामूहिक पारणा कराया गया। लाभार्थी परिवार ने सभी तपस्वियों का तिलक, माला और श्रीफल से सम्मान किया। चातुर्मास समिति की ओर से पारणा के पश्चात लाभार्थी परिवार के हाथों तपस्वियों को तपस्या की स्मृति में उपहार भेंट किए गए। श्रावक-श्राविकाओं ने तपस्वियों की कठिन साधना की अनुमोदना करते हुए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।

 

 

 

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