शिक्षक गढ़ते कल का भारत
रायपुर |
2026-09-04 13:49:09
श्रीमती द्रौपदी मुर्मु*
ONLY be published on 05.09.2026
शिक्षक नियति-निर्माता होते हैं। करोड़ों विद्यार्थियों के जीवन में विद्या, कौशल, नैतिकता और प्रेरणा का संचार करने वाले शिक्षकों के प्रति सभी देशवासियों की ओर से, ‘शिक्षक दिवस’ के अवसर पर, मैं कृतज्ञता व्यक्त करती हूं।
यह सर्वविदित है कि हमारे देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन चाहते थे कि उनका जन्मदिन ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए। वे विश्वविख्यात विद्वान, लेखक और स्टेट्समैन थे, लेकिन शिक्षक की भूमिका को उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण माना। अत्यंत लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से एक बार पूछा गया कि उन्हें लोग एक वैज्ञानिक के रूप में याद करेंगे या राष्ट्रपति के रूप में। कलाम साहब ने उत्तर दिया कि वे चाहेंगे कि उन्हें एक शिक्षक के रूप में याद किया जाए।
शिक्षक श्रद्धेय हों और विद्यार्थी श्रद्धालु हों, यही हमारा आदर्श रहा है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में कहा गया है कि शिक्षक विद्यार्थियों से अपनी संतान की तरह प्यार करें, उनसे भेदभाव रहित समानता का व्यवहार करें, उन पर क्रोध न करें, धैर्यवान हों, विद्यार्थियों के कल्याण पर दृष्टि केन्द्रित रखें तथा उनकी ग्रहणशक्ति के अनुसार शिक्षा प्रदान करें। ऐसे शिक्षकों के प्रति सम्मान के भाव से ही लगभग तीन हजार वर्ष पहले, तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में ‘आचार्यदेवो भव’ का संदेश दिया गया है।
सौभाग्य से अपने विद्यार्थी जीवन में मुझे बहुत अच्छे और स्नेही शिक्षकों का मार्गदर्शन मिलता रहा। हमारी टीचर्स, स्कूल की छुट्टी के बाद भी, कभी-कभी अपने घर में ही हमें पढ़ाती थीं और हमारी देख-भाल भी करती थीं। सातवीं कक्षा के बाद, अपने गांव से बाहर जाकर पढ़ाई करने वाली मैं पहली छात्रा थी। आगे की पढ़ाई के दौरान भुवनेश्वर में भी, मुझे शिक्षकों का भरपूर स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहा। अपने शिक्षकों का विनम्रतापूर्वक उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया है कि स्नेही और समर्पित शिक्षक विद्यार्थियों में असीम क्षमता और प्रेरणा का संचार करते हैं। इससे शक्ति पाकर, विद्यार्थियों में किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस और बड़े से बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने का उत्साह बना रहता है। मैं मानती हूं कि शिक्षक पाठ्यक्रम तो पढ़ाते ही हैं, अपनी गतिविधियों से, विद्यार्थियों को जीने की कला भी सिखाते हैं। इस प्रकार, शिक्षक अपने विद्यार्थियों के मार्गदर्शक तो होते ही हैं, उनके शुभचिंतक, मित्र और सहयात्री भी होते हैं।
श्रेष्ठ शिक्षक की विशेषता के बारे में हमारी संस्कृति एवं परंपरा में प्राचीन काल से चले आ रहे विचार आज भी पूर्णतः प्रासंगिक हैं। सदियों पहले, अपने नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम्’ में महाकवि कालिदास कहते हैं कि जिस अध्यापक में प्रचुर ज्ञान हो तथा उस ज्ञान को समझाने की क्षमता भी हो, वही अच्छा शिक्षक होता है।
एक लोकप्रिय संस्कृत सुभाषित में कहा गया है: ‘सर्वत्र विजयम् इच्छेत् शिष्यात् इच्छेत् पराजयम्’। इसका आशय यह है कि सर्वत्र विजय की कामना करनी चाहिए परंतु शिष्य से पराजय की इच्छा होनी चाहिए। विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन को प्रोत्साहित करना, जिज्ञासा उत्पन्न करना, प्रश्न करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना, तर्क-शक्ति का विकास करना तथा उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण में योगदान देना शिक्षण कार्य के प्रेरक और उपयोगी आयाम हैं। ऐसी प्रेरक शिक्षा से ही सफल उद्यमी, प्रतिभाशाली वैज्ञानिक, सृजनशील कलाकार और चुनौतियों के नवीन समाधान प्रस्तुत करने वाले नागरिकों की पीढ़ियां तैयार होंगी।
शिक्षण कर्म केवल एक वृत्ति नहीं है, एक व्रत है। यह केवल व्यवसाय या नौकरी नहीं है, अपितु मानवता के निर्माण का पवित्र कार्य है। यह भावी पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करने का सत्कार्य है।
शिक्षाकार्य से जुड़ी स्मृतियां मुझे विशेष संतोष देती हैं। मैंने ओड़िशा के राइरंगपुर में स्थित ‘श्री ऑरोबिंदो इंटीग्रल स्कूल’ में बच्चों को पढ़ाया है। विभिन्न विषयों को पढ़ाने के अलावा मैं बच्चों के साथ संगीत, खेल-कूद और नाटक की तैयारियों में पूरे मन से उनकी सहायता करती थी। बच्चों के साथ स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस की तैयारी और उन समारोहों में उनके उत्साह को याद करके आज भी मुझे रोमांच होता है। विद्यार्थियों को सुंदर प्राकृतिक स्थलों पर पिकनिक के लिए ले जाना तथा खेल-खेल में उन्हें जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के बारे में जानकारी देना मुझे बहुत सार्थक लगता था।
स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बरसों बाद भी मेरे विद्यार्थी मुझे अपने पारिवारिक उत्सवों में बुलाते रहे हैं। मुझे अपने अनेक विद्यार्थियों के नाम तो याद हैं ही, उनको पुकारने के उपनाम भी मुझे आज तक याद हैं। मैंने जिन बच्चों को पढ़ाया है, उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। मैं समझती हूं कि बच्चों की सहजता और जिज्ञासा सभी शिक्षकों को बहुत कुछ सिखाती है।
राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल का दूसरा वर्ष पूरा होने के अवसर पर मैंने राष्ट्रपति भवन परिसर में स्थित स्कूल के विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के विषय पर पढ़ाया और उनसे बातचीत की। मेरा प्रयास रहता है कि मैं विद्यार्थियों से मिलूं और उनके विचारों को समझूं। उनकी बातें मेरे ध्यान में बनी रहती हैं।
लगभग ग्यारह वर्ष पहले, मैंने गांव के अपने निवास-स्थान में एक आवासीय विद्यालय की स्थापना की थी। उस विद्यालय में अनाथ तथा वंचित परिवारों के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते हैं। उन बच्चों से मिलने मैं वहां जाती रहती हूं। इस वर्ष 20 जून को अपने जन्मदिन पर उन बच्चों से मिलकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। उस दिन मेरे साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी उस विद्यालय में जाकर उन बच्चों का उत्साहवर्धन किया। उनसे मिलने का असाधारण अनुभव बच्चों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना रहेगा। उन बच्चों की प्रगति को देखकर मुझे विशेष सार्थकता की अनुभूति होती है।
शिक्षा प्रदान करने का कार्य केवल शिक्षकों तक ही सीमित नहीं होता है। प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जो अपने आचरण और उपलब्धियों से बच्चों के लिए ‘रोल मॉडल’ बनता है, वह भी शिक्षा और प्रेरणा का अमूल्य स्रोत होता है।
माता-पिता और अभिभावक बड़े विश्वास के साथ अपने बच्चों को शिक्षकों के पास भेजते हैं। वे यह मानकर चलते हैं कि शिक्षक अपनेपन की भावना से बच्चों की सुरक्षा और प्रगति पर ध्यान देंगे। इस पवित्र आस्था की रक्षा करना प्रत्येक शिक्षक का धर्म है। शिक्षक की भावना, आचरण और व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे बच्चों में भय और आशंका न उत्पन्न हो, उनका मनोबल न टूटे तथा उनमें हीन भावना न पैदा हो। अच्छे शिक्षक यह सुनिश्चित करते हैं कि विद्यार्थी अपने सर्वोत्तम स्वरूप को प्राप्त कर सकें।
विद्यार्थी को अच्छा व्यक्ति बनाना शिक्षक का पावन कर्तव्य है। नैतिकता के पथ पर चलते हुए समृद्धि और यश प्राप्त करने वाले विद्यार्थी ही शिक्षक की सफलता के जीवंत प्रतिमान होते हैं।
हमारा देश सामाजिक समावेश के साथ विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। मैं चाहूंगी कि विकास यात्रा के इस क्रम में हमारे शिक्षकगण ऐसी पीढ़ियों का निर्माण करें जो हमारी संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानवता के हित में कार्य करें, अंत्योदय के आदर्शों को आत्मसात करें, पर्यावरण और पशु-पक्षियों के संरक्षण में सक्रिय रहें, व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों में उत्कर्ष प्राप्त करें तथा ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ की भावना से आगे बढ़ें। मेरा सभी देशवासियों से अनुरोध है कि वे निष्ठावान शिक्षकों के प्रति सदैव सम्मान की भावना रखें। मेरी कामना है कि समर्पित शिक्षकों के योगदान से भारत पढ़े और बहुत आगे बढ़े।
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(लेखक भारत की राष्ट्रपति हैं।)