छत्तीसगढ़ / सुकमा

सुकमा में धान की फसल पर झुलसा रोग का खतरा, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय

 जिले में खरीफ मौसम के दौरान धान की फसल में जीवाणु जनित झुलसा रोग (बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट) के लक्षण सामने आने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। कृषि विज्ञान केंद्र, सुकमा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख तथा पौध रोग वैज्ञानिक राजेन्द्र प्रसाद कश्यप और कीट वैज्ञानिक डॉ. योगेश कुमार सिदार ने मुरतोण्डा, सोनाकुकानार, बोरगुड़ा, केरलापाल, चीकपाल, पाकेला, पुजारीपाल, सुरेपाल और धोबनपाल क्षेत्रों में नैदानिक भ्रमण तथा किसानों से मिली जानकारी के आधार पर स्थिति का आकलन किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार रोपाई या बुवाई के 20-25 दिन बाद रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई दे सकते हैं। पत्तियों के किनारों और ऊपरी सिरे पर पीलापन आने के बाद वे नोक और किनारों से सूखने लगती हैं तथा पत्तियों पर राख के रंग के चकत्ते दिखाई दे सकते हैं।
   रोग का प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां पूरी तरह सूख सकती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि, कल्लों की संख्या और दानों के भराव पर प्रतिकूल असर पड़ने के साथ उपज में कमी की आशंका रहती है। वैज्ञानिकों ने किसानों को खेतों को खरपतवार मुक्त रखने, पुराने फसल अवशेषों को नष्ट करने और संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग करने की सलाह दी है। विशेष रूप से अनावश्यक नत्रजन के इस्तेमाल से बचने को कहा गया है। रोग के लक्षण दिखाई देने पर खेत में उपलब्ध पानी की निकासी कर 3-4 दिन तक खेत को खुला रखने तथा 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
   जीवाणु जनित झुलसा रोग के शुरुआती लक्षण दिखने पर 2 किलोग्राम ताजा गोबर को 100 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करने की सलाह वैज्ञानिकों ने दी है। कृषि विज्ञान केंद्र ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान स्थिति में किसी भी रासायनिक उपचार की अनुशंसा नहीं की जा रही है। किसानों से धान की फसल की नियमित निगरानी करने और रोग के लक्षण दिखाई देते ही कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर सही पहचान एवं आगे के प्रबंधन की जानकारी लेने की अपील की गई है।

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