मन की शुद्धि से प्रशस्त होगा आत्मकल्याण का मार्ग : मुनिसंवेगरत्न सागर
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में शुक्रवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने धर्मसभा में समझाया कि लोभ ध्यान से बचने के लिए मन पर नियंत्रण जरूरी है। केवल बाहरी आचरण या ध्यान की मुद्रा अपना लेने से आत्मकल्याण नहीं होता, इसके लिए अंतर्मन की शुद्धि आवश्यक है।
आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री ने समझाया कि मन कब, कहां और किस दिशा में जा रहा है, इसका बोध होना चाहिए। मन का भटकाव ही लोभ को बढ़ाता है। मन में मलिनता हो तो परमात्मा की वाणी सुनने के बाद भी उसका प्रभाव अंतर्मन तक नहीं पहुंचता। अशुद्ध दृष्टिकोण के साथ की गई आराधना भी संसार भ्रमण का कारण बन सकती है।
मुनिश्री ने कहा कि आत्मा ने अनंत बार संयम जीवन अंगीकार किया होगा, लेकिन आत्मकल्याण के लिए मन की शुद्धि जरूरी है। केवल बाहरी आचरण से विकार दूर नहीं होते। व्यक्ति को अपने भीतर झांककर अशुद्धियों को पहचानना होगा। जिनवाणी का श्रवण यानी श्रुत भावना धर्मध्यान की ओर ले जाती है। इसके बिना चारित्र्य भावना विकसित नहीं हो सकती।
आसन लगाना ही ध्यान नहीं
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में केवल पुष्टि नहीं, शुद्धि को लक्ष्य बनाना चाहिए। अंतर्मन निर्मल नहीं होगा तो सद्गति का मार्ग भी कठिन हो जाएगा। पुष्टि को लक्ष्य बनाने से संसार का विस्तार होता है, जबकि शुद्धि का लक्ष्य आत्मकल्याण की दिशा में ले जाता है।
मुनिश्री ने ध्यान के महत्व पर कहा कि केवल आसन लगाकर शरीर स्थिर कर लेना ध्यान नहीं है। चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण और मन की गतिविधियों पर चौकसी ही वास्तविक ध्यान है। साधक को मन की शुद्धि के लिए प्रयास करना चाहिए। अंतर्मन शुद्ध होने पर आत्मा की उन्नति का मार्ग स्वतः प्रशस्त होता है।