शिक्षक गैर-शिक्षकीय कार्यों में व्यस्त, शासन के आदेशों की उड़ रही धज्जियां
कबीरधाम |
2026-10-29 15:15:56
शिक्षक गैर-शिक्षकीय कार्यों में व्यस्त, शासन के आदेशों की उड़ रही धज्जियां
15 से 85 किलोमीटर दूर तक तय कर रहे दूरी, छात्रावास-आश्रम अधीक्षक का संभाल रहे दायित्व; दोहरा प्रभार और मुख्यालय से अनुपस्थिति पर उठे सवाल
कवर्धा -: प्रदेश में शिक्षकों को शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और विद्यार्थियों के भविष्य को स्वारनें
की जिम्मेदारी सौंपी गई है, लेकिन जब शिक्षक ही गैर-शिक्षकीय कार्यों में उलझे रहेंगे, तो विद्यालयों में पढ़ाई की व्यवस्था कैसे सुचारु रहेगी? आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग के अंतर्गत छात्रावास एवं आश्रम अधीक्षक के रूप में शिक्षकों की संलग्नता को लेकर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, कुछ शिक्षक अपने पदस्थापना मुख्यालय से लगभग 15 से 85 किलोमीटर तक की दूरी तय कर छात्रावास एवं आश्रम अधीक्षक के रूप में गैर-शिक्षकीय दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। ऐसे में शिक्षकों के नियमित अध्यापन कार्य, विद्यालयों में उनकी उपलब्धता और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई जा रही है।
जिला मुख्यालय को बना लिया मुख्यालय!
शिकायतें यह भी सामने आ रही हैं कि कुछ छात्रावास एवं आश्रम अधीक्षक अपने निर्धारित कार्यस्थल अथवा मुख्यालय में नियमित रूप से उपस्थित नहीं रहते और जिला मुख्यालय को ही अपना मुख्यालय बनाकर कार्य करते हैं। यदि ऐसा है, तो यह जांच का विषय है कि संबंधित अधिकारियों द्वारा निर्धारित मुख्यालय में उपस्थिति और कार्यों की नियमित निगरानी की जा रही है या नहीं।
एक अधीक्षक के पास दो स्थानों का प्रभार
कुछ मामलों में छात्रावास एवं आश्रम अधीक्षक दो स्थानों का प्रभार सौंपे जाने की बात भी सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक ही व्यक्ति दो अलग-अलग स्थानों की व्यवस्थाओं की निगरानी किस प्रकार करता है? छात्रावासों में विद्यार्थियों की सुरक्षा, भोजन, आवास, अनुशासन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की नियमित निगरानी सुनिश्चित करना विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। दोहरा प्रभार होने की स्थिति में इन व्यवस्थाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन आवश्यक है ।
शिक्षा विभाग और आदिम जाति कल्याण विभाग की भूमिका पर सवाल
शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय कार्यों में संलग्न किए जाने के मामलों में शिक्षा विभाग और आदिम जाति कल्याण विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि शिक्षकों को उनके मूल शैक्षणिक दायित्वों से अलग रखकर अन्य विभागीय कार्यों में लगाया जा रहा है, तो विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? वहीं, संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी का खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ सकता है।
शासन के आदेशों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शासकीय कर्मचारियों की संलग्नता समाप्त करने के संबंध में जारी आदेशों के पालन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतों के अनुसार, कुछ स्थानों पर इन आदेशों के अनुरूप कार्रवाई नहीं होने की बात कही जा रही है। हालांकि, संबंधित आदेशों की तिथि, दायरे और वर्तमान प्रभावशीलता के आधार पर प्रत्येक मामले की जांच आवश्यक है।
यदि शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद शिक्षकों की संलग्नता जारी है, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही का गंभीर विषय है। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शासन के निर्देशों का पालन हो और शिक्षकों की सेवाओं का उपयोग निर्धारित नियमों के अनुरूप किया जाए।
जांच हुई तो सामने आ सकती है वास्तविक स्थिति
इस पूरे मामले में संबंधित विभागों को शिक्षकों की संलग्नता, पदस्थापना, छात्रावास एवं आश्रम अधीक्षकों के दोहरे प्रभार, निर्धारित मुख्यालय में उपस्थिति और शासन के आदेशों के पालन की समीक्षा करनी चाहिए। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय दायित्व सौंपे गए हैं और क्या इसके लिए नियमानुसार अनुमति प्राप्त की गई है।
अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग और आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और शासन के निर्देशों के पालन के लिए क्या कदम उठाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब शिक्षक गैर-शिक्षकीय कार्यों में व्यस्त रहेंगे, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा?