छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

* न्याय के लिए ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित करने को मजबूर हुए ग्रामीण*

सरपंच, सचिव एवम रोजगार -सहायक को हटाने ग्राम सभा मे प्रस्ताव पारित-

 कवर्धा--कबीरधाम जिले में पंचायत व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिस ग्राम पंचायत प्रणाली को गांव के विकास, पारदर्शिता और जनभागीदारी का आधार माना जाता है, वहीं अब ग्रामीणों को अपने ही अधिकारों की रक्षा के लिए ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित करने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर तक फैले भय, दबाव और कथित अफसरशाही के आतंक की ओर इशारा करती है।
ताजा मामला जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत ग्राम पंचायत देहानडीह का है, जहां 24 जून 2026 को आयोजित ग्राम सभा में ग्रामीणों ने खुलकर पंचायत कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। ग्राम सभा की कार्यवाही पंजिका के अनुसार उपस्थित ग्रामीणों ने सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक के कार्यों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराते हुए जांच की मांग की। इतना ही नहीं, सर्वसम्मति से प्रस्ताव क्रमांक 03 पारित कर संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग भी की गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत क्यों आई कि ग्रामीणों को सामूहिक प्रस्ताव पारित करना पड़ा? क्या व्यक्तिगत शिकायतें पहले की गई थीं और उन्हें दबा दिया गया? क्या पंचायत स्तर पर जवाबदेही पूरी तरह खत्म हो चुकी है? ये प्रश्न अब प्रशासन के सामने खड़े हैं।
भारत के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत ग्राम सभा को पंचायत राज व्यवस्था की मूल इकाई माना गया है। छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम, 1993 में भी ग्राम सभा को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। ग्राम सभा केवल औपचारik बैठक नहीं है, बल्कि वह मंच है जहां ग्रामीण विकास कार्यों की समीक्षा, योजनाओं की स्वीकृति, वित्तीय पारदर्शिता और जनहित से जुड़े निर्णय लिए जाते हैं। कानून स्पष्ट कहता है कि ग्राम सभा के निर्णयों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन कबीरधाम के कई गांवों से लगातार ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि ग्राम सभा को सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित कर दिया गया है। सूचना पटल पर एक बात, जमीन पर दूसरी तस्वीर — यह अंतर ग्रामीणों में अविश्वास बढ़ा रहा है। कई मामलों में आरोप लगे हैं कि विकास कार्यों की गुणवत्ता कमजोर है, भुगतान प्रक्रिया संदिग्ध है और लाभार्थी चयन में पारदर्शिता नहीं है।
देहानडीह का मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि यहां ग्रामीणों ने सीधे पंचायत के तीन प्रमुख जिम्मेदार पदों पर सवाल उठाया है। यदि गांव के लोग सामूहिक रूप से जांच की मांग कर रहे हैं, तो इसे सामान्य असंतोष मानकर टाला नहीं जा सकता।
ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत करने पर सुनवाई के बजाय दबाव और डर का माहौल बनाया जाता है। यही कारण है कि अब लोगों को सामूहिक मंच का सहारा लेना पड़ रहा है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चेतावनी है। यदि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों और तंत्र पर भरोसा न रहे, तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
अब निगाहें जनपद पंचायत और जिला प्रशासन पर हैं। क्या ग्राम सभा के प्रस्ताव को गंभीरता से लिया जाएगा? क्या निष्पक्ष जांच होगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
एक बात साफ है—
जब गांव की जनता ग्राम सभा में खड़ी होकर प्रस्ताव पारित करे, तो यह सिर्फ शिकायत नहीं होती; यह व्यवस्था के खिलाफ अविश्वास का सार्वजनिक घोषणा-पत्र होता है।
कबीरधाम में यदि अधिकारी-कर्मचारियों का भय इतना बढ़ गया है कि ग्रामीणों को न्याय के लिए सामूहिक प्रस्ताव पारित करना पड़े, तो प्रशासन को आत्ममंथन करना होगा। वरना पंचायत राज का सपना केवल कागजों में ही सिमटकर रह जाएगा।

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