छत्तीसगढ़ / कबीरधाम

बिना अधिकार चेक काटकर भुगतान का खेल, लोहारा मनरेगा में वित्तीय अनियमितताओं की बू, करोड़ों के लेनदेन पर उठे गंभीर सवाल

कवर्धा

कबीरधाम जिले के जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत संचालित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आ रहे हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 16/10/2025 के आदेश में तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी को प्रशासनिक व्यवस्था एवं कार्य संचालन की दृष्टि से जिला पंचायत कबीरधाम में संलग्न किया गया था। इसके बाद 22/12/2025 के आदेश में सहायक प्रोग्रामर को कार्यक्रम अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार अस्थायी रूप से सौंपे जाने का उल्लेख है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, तत्कालीन कार्यक्रम अधिकारी के हटने और कार्यक्रम अधिकारी के विधिवत आदेश जारी होने के पूर्व ही सहायक प्रोग्रामर द्वारा स्वयं को कार्यक्रम अधिकारी मानते हुए चेक काटकर भुगतान किए जाने की बात सामने आ रही है। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर वित्तीय अनियमितता और नियमों का खुला उल्लंघन माना जाएगा।
मनरेगा के वित्तीय संचालन में भुगतान संबंधी अधिकार स्पष्ट रूप से अधिकृत अधिकारी को ही प्राप्त होते हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी मनरेगा संचालन दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी भुगतान, वित्तीय स्वीकृति अथवा चेक निर्गमन के लिए विधिवत पदस्थापन अथवा सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिकृत आदेश आवश्यक है। बिना वैधानिक प्रभार के वित्तीय दस्तावेजों पर हस्ताक्षर या भुगतान करना छत्तीसगढ़ वित्तीय संहिता, कोषालय नियम, तथा पंचायत राज वित्तीय प्रावधानों के प्रतिकूल माना जा सकता है। जबकि उक्त मामले में जिला कार्यक्रम समन्यक के अनुमोदन उपरांत मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत सक्षम अधिकारी हैं!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि उस समय कार्यक्रम अधिकारी का वैध प्रभार दिलीप साहू को प्राप्त नहीं था, तो चेक किस अधिकार से काटे गए। क्या संबंधित बैंक दस्तावेजों, हस्ताक्षरों और भुगतान अभिलेखों का सत्यापन हुआ। यदि नहीं, तो मामला लाखों नहीं बल्कि संभावित रूप से करोड़ों रुपये के भुगतान पर संदेह खड़ा करता है।
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि इस पूरे मामले में केवल एक कर्मचारी की भूमिका नहीं, बल्कि कई स्तरों पर मौन सहमति या संरक्षण की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल जिला पंचायत के नियंत्रण तंत्र पर भी उठ रहे हैं कि आखिर संवेदनशील वित्तीय प्रक्रिया में निगरानी क्यों नहीं हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय दंड संहिता की धोखाधड़ी, कूटरचना एवं शासकीय धन के दुरुपयोग से संबंधित धाराओं तक जा सकता है, यदि दस्तावेजी जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं। ऐसे में केवल विभागीय जांच पर्याप्त नहीं होगी।
जनहित और पारदर्शिता की दृष्टि से आवश्यक है कि कलेक्टर स्तर पर एक उच्च स्तरीय जांच टीम गठित कर बैंक स्टेटमेंट, चेक रजिस्टर, भुगतान आदेश, हस्ताक्षर नमूने और संबंधित फाइल नोटशीट की गहन जांच कराई जाए। क्योंकि मामला केवल पदभार का नहीं, बल्कि सरकारी धन की वैधता और जवाबदेही का है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस संवेदनशील मामले में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाता है या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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