छत्तीसगढ़ / दुर्ग

कभी भीम की गदा तो कभी अर्जुन का गांडीव बना तीजन का तंबूरा नहीं जाएगा संग्रहालय, परिजन बोले हमारी अमूल्य विरासत

 

पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन के बाद छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग ने उनके ऐतिहासिक तंबूरे को संग्रहालय में संरक्षित करने का अनुरोध किया था। लेकिन स्वजनों ने इसे मां की आत्मा और परिवार की अमूल्य धरोहर बताते हुए संग्रहालय को देने से विनम्रतापूर्वक इनकार कर दिया है। परिवार का कहना है कि यह तंबूरा घर में सुरक्षित रहेगा।

भिलाई। पंडवानी गायन की विश्वविख्यात कलाकार, पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित तथा भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) की पूर्व कर्मचारी डा. तीजन बाई के निधन के बाद उनकी स्मृतियों को सहेजने की पहल शुरू हो गई है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग ने उनकी जीवनभर की साधना के प्रतीक रहे तंबूरे को संरक्षित करने के उद्देश्य से परिवार से उसे संग्रहित करने का अनुरोध किया था। हालांकि, स्वजनों ने इस अनुरोध को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए स्पष्ट कर दिया कि यह तंबूरा उनके लिए केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि तीजन बाई की आत्मा, उनकी साधना और परिवार की अमूल्य धरोहर है। इसलिए इसे किसी भी परिस्थिति में परिवार से अलग नहीं किया जाएगा।

स्वजनों का कहना है कि जिस तंबूरे को हाथ में लेकर तीजन बाई ने दशकों तक महाभारत की कथाओं को स्वर दिया, देश-दुनिया के मंचों पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का परचम लहराया और करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाई, उसे वे अपने घर से दूर नहीं जाने देंगे। परिवार के सदस्यों के अनुसार यह तंबूरा उनकी मां की जीवंत स्मृति है और उनके जाने के बाद भी उसी श्रद्धा के साथ घर में सुरक्षित रखा जाएगा।

साधना और संघर्ष का साक्षी है तंबूरा

तीजन बाई का तंबूरा केवल संगीत का साधन नहीं था। यह उनके संघर्ष, समर्पण और साधना का जीवंत इतिहास है। जब समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, तब भी उन्होंने इसी तंबूरे को साथी बनाकर अपनी कला को आगे बढ़ाया। गांव की छोटी-सी चौपाल से लेकर देश के प्रतिष्ठित मंचों और विदेशों तक उनकी आवाज इसी तंबूरे के साथ गूंजती रही। महाभारत के प्रसंगों को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत करते समय तंबूरा उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन जाता था। मंच पर उनके हाथ में तंबूरा आते ही दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। यही कारण है कि परिवार इस वाद्य यंत्र को केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत मानता है।

संस्कृति विभाग की पहल, लेकिन परिवार की भावनाएं सर्वोपरि

छत्तीसगढ़ शासन का संस्कृति विभाग प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए लगातार प्रयासरत है। विभाग की ओर से तीजन बाई के तंबूरे को संरक्षित कर संग्रहालय अथवा सांस्कृतिक केंद्र में सुरक्षित रखने का प्रस्ताव परिवार के समक्ष रखा गया था, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अमूल्य विरासत को देख सकें और उनसे प्रेरणा ले सकें। हालांकि, परिवार ने विभाग के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि वे शासन की भावना को समझते हैं, लेकिन यह तंबूरा उनके घर की सबसे बड़ी धरोहर है। इसे परिवार से अलग करना उनके लिए भावनात्मक रूप से संभव नहीं है। उनका कहना है कि तीजन बाई की स्मृतियां उनके घर में ही सुरक्षित रहेंगी और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

सोमनी गांव से विश्व मंच तक का अद्भुत सफर

दुर्ग जिले के सोमनी गांव में जन्मी तीजन बाई ने अत्यंत साधारण परिवेश से निकलकर विश्वभर में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने पंडवानी की कापालिक शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित किया। उनकी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय, संवाद शैली और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली प्रस्तुति ने उन्हें देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाई। उन्होंने एशिया, यूरोप, अमेरिका और अनेक देशों में अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय लोक संस्कृति का गौरव बढ़ाया।

राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत हुईं तीजन बाई

भारतीय लोक कला और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने तीजन बाई को पद्मश्री, पद्म भूषण और बाद में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत रहते हुए भी उन्होंने अपनी कला साधना को कभी नहीं छोड़ा। बीएसपी ने भी समय-समय पर उनकी उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त किया और उन्हें सम्मानित किया।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं तीजन बाई

लोक कला को नई पहचान दिलाने वाली तीजन बाई आज भी हजारों कलाकारों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा किसी संसाधन या परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। कठिन संघर्षों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से वह मुकाम हासिल किया, जो विरले कलाकारों को ही प्राप्त होता है। उनकी कला, व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। उनके निधन से भारतीय लोक कला जगत ने एक ऐसी आवाज खो दी है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।

स्वजनों ने कहा— घर में ही सुरक्षित रहेगी अमूल्य धरोहर

स्वजनों का कहना है कि तीजन बाई की सबसे बड़ी पहचान उनका तंबूरा था। उनके जीवन के अंतिम समय तक यह तंबूरा उनके साथ रहा। इसलिए परिवार इसे किसी संग्रहालय या अन्य स्थान पर नहीं भेजेगा। इसे उसी श्रद्धा और सम्मान के साथ घर में सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसे देखकर अपनी मां, दादी और देश की महान लोक कलाकार की विरासत को महसूस कर सकें।

 

 

Leave Your Comment

Click to reload image