‘माया से मुक्त हुए बिना आत्मकल्याण संभव नहीं : मुनिसंवेगरत्न सागर
रायपुर । विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारेव सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में मुनि संवेगरत्न सागर ने श्रावक-श्राविकाओं को माया कषाय से उन्मुक्त होने का संदेश दिया। आचार्य वीरभद्राचार्य रचित ‘आतुर प्रत्याख्यान’ ग्रंथ के माध्यम से मुनिश्री आत्मकल्याण की राह बता रहे हैं।
मुनिश्री ने बुधवार को धर्मसभा में कहा कि माया का सेवन जीव के लिए हानिकारक है। विभाव को स्वभाव बना देने वाला कषाय ही माया है। आत्मा ने न जाने कितने भवों से इस कषाय का अभ्यास किया है। माया के प्रभाव में जीव अपने कार्यों और उपलब्धियों को सफलता मानने लगता है, लेकिन इसके पीछे दुख, दुर्गति और पीड़ा छिपी होती है। अन्य कषाय भी भयंकर हैं, लेकिन माया कषाय महाभयंकर है।
मुनिश्री ने कहा कि जन्म लेते ही काया के प्रति माया शुरू हो जाती है और जीवनभर इसका प्रभाव बना रहता है। माया इतनी प्रबल होती है कि अंतिम समय तक भी जीव इससे मुक्त नहीं हो पाता। इसके कारण जीव कर्मों के बंधन में फंसता चला जाता है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होती जाती है।
माया ही दूसरे कषायों को बढ़ाती है
मुनिश्री ने कहा कि माया के कारण जीव क्रोध, द्वेष, मोह और लोभ जैसे कषायों में उलझता जाता है। एक कषाय दूसरे कषाय को जन्म देता है और जीव इस चक्र से निकल नहीं पाता। माया का अभ्यास धीरे-धीरे इतना गहरा हो जाता है कि विभाव ही जीव को अपना स्वभाव लगने लगता है।
मुनिश्री ने कहा कि यदि इस भव में दुख, दुर्गति और पीड़ा से बचना है तो माया के प्रभाव से स्वयं को मुक्त करना होगा। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर कषायों से दूरी बनाना ही आत्मकल्याण का मार्ग है। माया से मुक्ति के लिए संयम और आत्मचिंतन आवश्यक है।